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भारत-अमेरिका की सुदृढ़ साझेदारी के लिए छह कदम

भारत और अमेरिका के संबंध इस समय उतार-चढ़ाव और नाटकीय घटनाक्रमों के दौर से गुजर रहे हैं। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि भारत के लिए अमेरिका इससे अधिक अनुकूल समय पर नहीं आ सकता था। दूसरी ओर एलन मस्क की टिप्पणियों और अस्थिर टैरिफ प्रहारों ने सुर्खियाँ बटोरीं और द्विपक्षीय संबंधों में खिंचाव पैदा किया। किंतु इस शोर के पीछे एक शांत, ठोस धारा निरंतर बहती रही है: रक्षा और प्रौद्योगिकी सहयोग, जिसकी प्रेरक शक्ति चीन के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने की साझा अनिवार्यता है।

भले ही ऐतिहासिक समझौतों के क्रियान्वयन में विलंब हुआ हो, जैसे भारत में GE जेट इंजनों का सह-उत्पादन और अरबों डॉलर के सशस्त्र ड्रोनों की तैनाती, फिर भी दोनों देशों का सामरिक एकीकरण मजबूत है और आगे बढ़ रहा है। इस साझेदारी को और सशक्त बनाने के लिए दोनों राजधानियों को उन आशंकाओं का सीधे सामना करना होगा जो गहन एकीकरण में बाधक बनती हैं।

पृष्ठभूमि: संबंधों की विकास यात्रा

भारत-अमेरिका रक्षा संबंध पिछले दो दशकों में क्रमिक रूप से संस्थागत हुए हैं:

  • रक्षा फ्रेमवर्क: दोनों देशों ने पहला 10 वर्षीय रक्षा फ्रेमवर्क 2005 में और दूसरा 2015 में हस्ताक्षरित किया था। तीसरा फ्रेमवर्क ‘फ्रेमवर्क फॉर द यूएस-इंडिया मेजर डिफेंस पार्टनरशिप’ नाम से मलेशिया में आसियान रक्षा मंत्रियों की बैठक के दौरान राजनाथ सिंह और पीट हेगसेथ ने हस्ताक्षरित किया। (tribuneindia) (tribuneindia)
  • प्रमुख रक्षा साझेदार: 2016 में अमेरिका ने भारत को ‘मेजर डिफेंस पार्टनर’ का दर्जा दिया, जिससे संवेदनशील सैन्य उपकरण और प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण का मार्ग खुला।
  • आधारभूत समझौते: LEMOA (2016) लॉजिस्टिक सहयोग हेतु, COMCASA (2018) सुरक्षित संचार हेतु और BECA (2020) भू-स्थानिक सूचना के आदान-प्रदान हेतु।
  • प्रौद्योगिकी सहयोग: 2023 में आरंभ iCET पहल को आगे TRUST (Transforming the Relationship Utilizing Strategic Technology) के रूप में विस्तार दिया गया।

व्यापारिक तनाव और नरमी का दौर

2025 में रूसी तेल आयात के मुद्दे पर अमेरिका द्वारा लगाए गए अतिरिक्त शुल्क से भारतीय वस्तुओं पर कुल टैरिफ 50 प्रतिशत तक पहुँच गया था। इसके बाद स्थिति में सुधार हुआ। 2 फरवरी 2026 को दोनों देशों ने व्यापार समझौते की घोषणा की, 7 फरवरी को संयुक्त वक्तव्य जारी हुआ और उसी दिन रूसी तेल से जुड़ा 25 प्रतिशत का अतिरिक्त शुल्क वापस ले लिया गया। किंतु 20 फरवरी 2026 को अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने पारस्परिक टैरिफ व्यवस्था को ही अमान्य कर दिया, जिससे अंतिम समझौते की समय-सारिणी अनिश्चित हो गई। यह प्रकरण दर्शाता है कि आर्थिक मोर्चे की अस्थिरता के बावजूद सामरिक सहयोग अपनी गति से चलता रहा।

परस्पर आशंकाएँ: बाधा या पड़ाव?

अमेरिका की चिंता

  • भारत अपनी स्थलीय सीमा से परे चीन के साथ प्रतिस्पर्धा करने में संकोच करता है।
  • दक्षिण चीन सागर जैसे महत्वपूर्ण समुद्री गलियारों के प्रति प्रतिबद्धता से भारत बचता रहा है।

भारत की चिंता

  • हाल के ट्रम्प-शी शिखर सम्मेलन से अमेरिका और चीन के बीच ‘G2’ जैसी सौदेबाजी की आशंका।
  • अमेरिका द्वारा इंडो-पैसिफिक कमान का नाम पुनः पैसिफिक कमान करने से यह आशंका और गहरी हुई है।
  • ये टकराव बिंदु हैं, बंद गलियाँ नहीं। अमेरिका के नीति मामलों के युद्ध उप-सचिव एलब्रिज कोल्बी के अनुसार हाल का रक्षा सहयोग न तो औपचारिक संधि की माँग करता है और न ही पूर्ण संरेखण की।
  • ‘धुंधले आदर्शों’ को छोड़कर कठोर यथार्थवाद अपनाने से दोनों देश मतभेदों से आगे निकल सकते हैं।
  • नई दिल्ली और वाशिंगटन को यह स्वीकार करना होगा कि भारत रूस के साथ अपने संबंध बनाए रखेगा, जैसे अमेरिका पाकिस्तान के साथ अपने संबंध बनाए रखेगा।
  • टकराव बिंदुओं को अलग-अलग खानों में रखकर (compartmentalisation) दोनों राजधानियाँ एक व्यापक और दूरदर्शी संरेखण की ओर बढ़ सकती हैं।

इसके लिए छह कदम उठाने होंगे:

1- पहला कदम: पारस्परिक उपस्थिति से प्रतिरोधक क्षमता

  • प्रशांत में भारत की भूमिका: भारत को अमेरिकी नेतृत्व के समर्थन में प्रशांत क्षेत्र में अधिक सक्रिय होना चाहिए। इसका आधार पूर्वी बेड़े (Eastern Fleet) की दक्षिण-पूर्व एशिया में अग्रिम तैनाती और फिलीपीन सागर में समन्वित गश्त होगी।
  • हिंद महासागर में अमेरिका की भूमिका: अमेरिका को भारत के पृष्ठ-समर्थन हेतु हिंद महासागर में नौसैनिक उपस्थिति बढ़ानी चाहिए, संयुक्त गश्त करनी चाहिए और क्षेत्रीय लॉजिस्टिक केंद्रों तक पहुँच का विस्तार करना चाहिए।
  • संयुक्त प्रयास: मौजूदा लॉजिस्टिक समझौतों को व्यवहार में उतारना, अग्रिम तैनात अमेरिकी नौसैनिक परिसंपत्तियों के लिए भारत को प्रमुख मरम्मत केंद्र के रूप में विकसित करना और सामरिक अवरोध बिंदुओं (chokepoints) पर संयुक्त गहन-समुद्री सेंसर नेटवर्क स्थापित करना।

2- दूसरा कदम: सैन्य समन्वय का संस्थानीकरण

  • उच्च प्रौद्योगिकी से जुड़े टकराव बिंदुओं के प्रबंधन हेतु संयुक्त सैन्य समन्वय को संस्थागत रूप देना होगा।
  • सुरक्षित संचार और भू-स्थानिक खुफिया समझौतों को इस प्रकार लागू करना कि औपचारिक सैन्य अभ्यासों से आगे बढ़कर वास्तविक समय में सामरिक डेटा का प्रवाह संभव हो।
  • महत्वपूर्ण ऊर्जा ग्रिडों और उपग्रह नेटवर्कों को साइबर हमलों से बचाने हेतु संयुक्त ढाँचा।
  • छोटे सैन्य उपग्रहों के सह-विकास हेतु संयुक्त अंतरिक्ष रक्षा कमान के साथ सहयोग का विस्तार।

3- तीसरा कदम: पारस्परिक रक्षा खरीद के मार्ग

‘मेक इन इंडिया’ पहल के अंतर्गत भारतीय निजी कंपनियों को वैश्विक रक्षा अधिग्रहण शृंखला से जोड़ना होगा। लंबी दूरी के ड्रोनों की घरेलू असेंबली और जेट इंजनों के सह-उत्पादन जैसे संयुक्त उपक्रम भविष्य में सटीक प्रहार करने वाले युद्धास्त्रों और स्वायत्त प्रणालियों के सह-विकास का आधार बनने चाहिए। साथ ही रक्षा त्वरण पारिस्थितिकी तंत्र (INDUS-X) के अंतर्गत उद्यम पूँजी के प्रवाह को बढ़ाना होगा, ताकि दोहरे उपयोग वाले स्टार्टअप नवाचार पारंपरिक खरीद प्रक्रिया की जटिलताओं में फँसने से पहले ही व्यावसायिक रूप ले सकें।

4- चौथा कदम: प्रौद्योगिकी और संसाधन आपूर्ति शृंखलाओं की सुरक्षा

सैन्य तत्परता के लिए सुरक्षित आपूर्ति शृंखलाएँ अनिवार्य हैं। भारत 20 फरवरी को नई दिल्ली में AI इम्पैक्ट समिट के दौरान पैक्स सिलिका घोषणा पर हस्ताक्षर कर इस अमेरिकी नेतृत्व वाली पहल का दसवाँ हस्ताक्षरकर्ता बना। इस संदर्भ में:

  • भारत को अपने सेमीकंडक्टर मिशन को गति देने हेतु नियामक तंत्र को सुदृढ़ करना चाहिए।
  • अमेरिका को निर्यात नियंत्रणों को सरल बनाना चाहिए, ताकि विश्वसनीय AI अवसंरचना का पूर्वानुमेय हस्तांतरण हो सके।
  • दोनों देशों को द्विपक्षीय क्रिटिकल मिनरल्स फ्रेमवर्क लागू कर सार्वजनिक और निजी पूँजी के मेल से दुर्लभ मृदा तत्वों और लिथियम के सुरक्षित शोधन केंद्र विकसित करने चाहिए, जिससे वाणिज्यिक और बाजार-पहुँच संबंधी बाधाएँ दूर हों।

5- पाँचवाँ कदम: लघु-पक्षीय (मिनीलेटरल) नेटवर्क में साझेदारी

  • द्विपक्षीय संबंधों को लघु-पक्षीय ढाँचों में स्थापित करना होगा, ताकि सुरक्षा लाभ पूरे क्षेत्र में फैलें।
  • इस साझेदारी को क्वाड जैसे मंचों में नई जान फूँकनी चाहिए और फिलीपींस जैसे क्षेत्रीय साझेदारों के साथ परिचालन प्रारूपों का विस्तार करना चाहिए।
  • द्विपक्षीय लॉजिस्टिक और निगरानी क्षमताओं को इन व्यापक समूहों में एकीकृत करके दोनों देश संवाद से आगे बढ़कर सामूहिक क्षेत्रीय रक्षा की ओर अग्रसर हो सकते हैं।

6- छठा कदम: प्रवासी समुदाय और नई पीढ़ी का निवेश

  • दोनों देशों को अपने प्रभावशाली प्रवासी समुदाय का लाभ उठाना चाहिए और विभिन्न वर्गों को जोड़ने वाली नई पीढ़ी तैयार करनी चाहिए।
  • द्विपक्षीय फेलोशिप का वित्तपोषण।
  • हिंद-प्रशांत साझेदारों को शामिल करते हुए ट्रैक-टू संवादों को प्रोत्साहन।
  • एक नेटवर्क आधारित अग्रणी वर्ग का निर्माण।
  • इन प्रयासों को व्यापक आर्थिक और वाणिज्यिक जुड़ाव का आधार चाहिए, जिसमें पेशेवर आवागमन को सुगम बनाना भी शामिल है। H-1B वीज़ा शुल्क में भारी वृद्धि जैसे निर्णय इसी आयाम की संवेदनशीलता को रेखांकित करते हैं।

भारत के लिए निहितार्थ

  • रणनीतिक स्वायत्तता: कम्पार्टमेंटलाइजेशन का सिद्धांत भारत को रूस के साथ संबंध बनाए रखते हुए अमेरिका से गहन सहयोग की गुंजाइश देता है।
  • आत्मनिर्भर रक्षा उद्योग: सह-उत्पादन और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण से भारत आयातक से निर्माता बनने की दिशा में बढ़ सकता है।
  • समुद्री शक्ति: हिंद महासागर में ‘प्रथम प्रत्युत्तरदाता’ और ‘नेट सुरक्षा प्रदाता’ की भारत की भूमिका सुदृढ़ होगी।
  • चुनौतियाँ: टैरिफ अनिश्चितता, निर्यात नियंत्रण, अमेरिकी नीति की अस्थिरता और G2 जैसी किसी संभावित अमेरिका-चीन सहमति का जोखिम।

निष्कर्ष

भारत-अमेरिका साझेदारी को शक्तिशाली बनने के लिए घर्षण-मुक्त होना आवश्यक नहीं है। पुरानी अपेक्षाओं को त्यागकर और व्यावहारिक, हित-आधारित संरेखण को अपनाकर दोनों देश ऐसा ढाँचा खड़ा कर सकते हैं जो परस्पर लाभकारी हो। संबंधों की असली कसौटी सुर्खियों में छाए विवाद नहीं, बल्कि वह मौन सामरिक एकीकरण है जो समुद्र, अंतरिक्ष, साइबर क्षेत्र और प्रौद्योगिकी की आपूर्ति शृंखलाओं में आकार ले रहा है।

वन लाइनर फैक्ट्स फॉर रिवीजन

  • भारत-अमेरिका का पहला 10 वर्षीय रक्षा फ्रेमवर्क 2005 में और दूसरा 2015 में हुआ।
  • तीसरा 10 वर्षीय फ्रेमवर्क 31 अक्टूबर 2025 को कुआलालंपुर में हस्ताक्षरित हुआ।
  • अमेरिका ने भारत को 2016 में ‘मेजर डिफेंस पार्टनर’ घोषित किया।
  • LEMOA (2016) लॉजिस्टिक सहयोग से संबंधित है।
  • COMCASA (2018) सुरक्षित सैन्य संचार से संबंधित है।
  • BECA (2020) भू-स्थानिक सूचना साझा करने से संबंधित है।
  • पैक्स सिलिका अमेरिका द्वारा दिसंबर 2025 में शुरू की गई पहल है।
  • भारत 20 फरवरी 2026 को पैक्स सिलिका का दसवाँ हस्ताक्षरकर्ता बना।
  • INDUS-X भारत-अमेरिका रक्षा नवाचार और स्टार्टअप सहयोग का मंच है।
  • GE F414 इंजन का सह-उत्पादन HAL के साथ तेजस Mk2 हेतु प्रस्तावित है।
  • भारतीय नौसेना के पूर्वी बेड़े का मुख्यालय विशाखापत्तनम में है।
  • iCET पहल का विस्तार TRUST पहल के रूप में हुआ।
  • क्वाड के सदस्य: भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया।

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