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गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार

मानव सभ्यता में जीवन को सर्वोच्च मूल्य के रूप में स्वीकार किया गया है। लगभग सभी समाजों, संस्कृतियों और धार्मिक परंपराओं में जीवन को पवित्र माना गया है और उसकी रक्षा को नैतिक कर्तव्य समझा गया है। किंतु आधुनिक चिकित्सा विज्ञान और संवैधानिक लोकतंत्र के विकास ने एक जटिल प्रश्न को जन्म दिया है—क्या मनुष्य को केवल “जीवन का अधिकार” ही प्राप्त है, या उसे “गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार” भी होना चाहिए?

हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने एक 31 वर्षीय व्यक्ति के जीवन रक्षक उपकरण हटाने की अनुमति देते हुए इस बहस को नए सिरे से राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया है। यह व्यक्ति कई वर्षों से स्थायी वेजिटेटिव अवस्था में था और चिकित्सकीय रूप से उसके स्वस्थ होने की कोई संभावना नहीं बताई गई थी। अदालत ने परिवार की याचिका को स्वीकार करते हुए निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) की अनुमति दी।

यह निर्णय केवल एक व्यक्ति के जीवन और मृत्यु से संबंधित मामला नहीं है। यह भारतीय संविधान, चिकित्सा नैतिकता, मानव अधिकारों और सामाजिक मूल्यों के बीच संतुलन खोजने का प्रयास भी है। इस फैसले ने यह प्रश्न पुनः उठाया है कि क्या किसी व्यक्ति को उस स्थिति में, जब उसका जीवन केवल मशीनों के सहारे चल रहा हो और उसके ठीक होने की कोई संभावना न हो, सम्मानजनक मृत्यु का अधिकार होना चाहिए।

इस संदर्भ में यह आवश्यक हो जाता है कि इस विषय को केवल भावनात्मक दृष्टि से नहीं बल्कि कानूनी, नैतिक, सामाजिक और अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण से भी समझा जाए।

इच्छामृत्यु की अवधारणा : अर्थ और प्रकार

इच्छामृत्यु (Euthanasia) शब्द ग्रीक भाषा के दो शब्दों से मिलकर बना है—“eu” जिसका अर्थ है अच्छा और “thanatos” जिसका अर्थ है मृत्यु। इस प्रकार इच्छामृत्यु का शाब्दिक अर्थ है “अच्छी या शांतिपूर्ण मृत्यु”।

आधुनिक चिकित्सा और कानून के संदर्भ में इच्छामृत्यु का अर्थ है ऐसी स्थिति में किसी व्यक्ति के जीवन को समाप्त करने की अनुमति देना जब वह असाध्य बीमारी, असहनीय पीड़ा या स्थायी अचेत अवस्था में हो और उसके ठीक होने की कोई संभावना न हो।

इच्छामृत्यु को सामान्यतः दो प्रमुख प्रकारों में विभाजित किया जाता है।

  1. पहला प्रकार है सक्रिय इच्छामृत्यु। इसमें डॉक्टर किसी दवा या चिकित्सकीय प्रक्रिया के माध्यम से सीधे तौर पर मृत्यु लाते हैं। उदाहरण के लिए किसी मरीज को ऐसी दवा देना जिससे उसकी मृत्यु हो जाए।
  2. दूसरा प्रकार है निष्क्रिय इच्छामृत्यु। इसमें मरीज के जीवन को बनाए रखने वाले कृत्रिम उपचार—जैसे वेंटिलेटर, कृत्रिम पोषण या अन्य जीवन रक्षक उपकरण—हटा दिए जाते हैं और प्रकृति को अपना कार्य करने दिया जाता है।

भारत में वर्तमान समय में सक्रिय इच्छामृत्यु अवैध है, जबकि निष्क्रिय इच्छामृत्यु को कुछ कठोर शर्तों के साथ अनुमति दी गई है।

भारतीय संविधान और गरिमापूर्ण मृत्यु का प्रश्न

भारतीय संविधान का अनुच्छेद 21 प्रत्येक व्यक्ति को “जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार” प्रदान करता है। लंबे समय तक इस अधिकार की व्याख्या केवल जीवित रहने के अधिकार के रूप में की जाती रही।

किन्तु समय के साथ सर्वोच्च न्यायालय ने अनुच्छेद 21 की व्याख्या को विस्तृत करते हुए इसे मानव गरिमा से जोड़ दिया। न्यायालय ने अनेक फैसलों में कहा कि जीवन का अर्थ केवल शारीरिक अस्तित्व नहीं है, बल्कि सम्मान और गरिमा के साथ जीवन जीना भी इसका हिस्सा है।

इसी व्यापक व्याख्या ने आगे चलकर “गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार” की अवधारणा को जन्म दिया।

यह तर्क दिया गया कि यदि संविधान व्यक्ति को गरिमापूर्ण जीवन का अधिकार देता है, तो उसे ऐसी स्थिति में जब जीवन केवल पीड़ा और निर्थक चिकित्सा उपचार तक सीमित हो जाए, सम्मानजनक मृत्यु चुनने का अधिकार भी मिलना चाहिए।

भारतीय न्यायपालिका में इच्छामृत्यु पर प्रमुख निर्णय

1- अरुणा शानबाग मामला:

  • भारत में इच्छामृत्यु पर न्यायिक बहस का सबसे प्रसिद्ध उदाहरण अरुणा शानबाग का मामला है।
  • अरुणा शानबाग मुंबई के एक अस्पताल में नर्स थीं। 1973 में उनके साथ अस्पताल के एक कर्मचारी ने क्रूर हमला किया जिसके परिणामस्वरूप उनका मस्तिष्क गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त हो गया। इसके बाद वे दशकों तक वेजिटेटिव अवस्था में रहीं।
  • 2011 में इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पहली बार निष्क्रिय इच्छामृत्यु को कुछ शर्तों के साथ अनुमति दी।
  • अदालत ने कहा कि यदि कोई मरीज स्थायी वेजिटेटिव अवस्था में है और उसके स्वस्थ होने की कोई संभावना नहीं है, तो डॉक्टरों और परिवार की सहमति से जीवन रक्षक उपचार हटाने की अनुमति दी जा सकती है।
  • हालाँकि अदालत ने यह भी कहा कि ऐसे मामलों में उच्च न्यायालय की अनुमति आवश्यक होगी ताकि किसी प्रकार के दुरुपयोग की संभावना न रहे।

2- कॉमन कॉज मामला :

  • 2018 में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने “कॉमन कॉज बनाम भारत संघ” मामले में एक ऐतिहासिक निर्णय दिया।
  • इस फैसले में अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा कि गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत आता है।
  • अदालत ने “लिविंग विल” की अवधारणा को भी मान्यता दी। लिविंग विल एक ऐसा दस्तावेज है जिसमें कोई व्यक्ति पहले से यह लिख सकता है कि यदि वह भविष्य में असाध्य बीमारी या अचेत अवस्था में पहुंच जाए, तो उसे कृत्रिम जीवन रक्षक उपकरणों पर न रखा जाए।
  • यह निर्णय भारतीय कानून में इच्छामृत्यु पर एक महत्वपूर्ण प्रगति माना गया।

3- प्रक्रियात्मक सुधार : 2023 के दिशानिर्देश

  • बाद के वर्षों में यह महसूस किया गया कि इच्छामृत्यु से संबंधित प्रक्रिया अत्यधिक जटिल है। इसलिए 2023 में सर्वोच्च न्यायालय ने इन दिशानिर्देशों को सरल बनाया।
  • नए प्रावधानों के अनुसार अस्पतालों में चिकित्सा विशेषज्ञों के दो अलग-अलग मेडिकल बोर्ड बनाए जाते हैं जो मरीज की स्थिति का मूल्यांकन करते हैं। यदि दोनों बोर्ड यह मानते हैं कि मरीज के ठीक होने की कोई संभावना नहीं है, तो परिवार की सहमति के साथ जीवन रक्षक उपकरण हटाए जा सकते हैं।

हालिया सुप्रीम कोर्ट निर्णय

  • हाल ही में दिए गए फैसले में सर्वोच्च न्यायालय ने एक ऐसे युवक के मामले में निष्क्रिय इच्छामृत्यु की अनुमति दी जो कई वर्षों से स्थायी वेजिटेटिव अवस्था में था।
  • चिकित्सकीय रिपोर्टों में स्पष्ट रूप से कहा गया कि उसके ठीक होने की संभावना लगभग शून्य है और उसका जीवन केवल कृत्रिम चिकित्सा उपकरणों के सहारे चल रहा है।
  • परिवार ने अदालत से अनुरोध किया कि उसे इस स्थिति से मुक्त किया जाए क्योंकि यह न केवल मरीज बल्कि पूरे परिवार के लिए भी अत्यंत पीड़ादायक स्थिति बन गई थी।
  • सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर विचार करते हुए कहा कि कानून का उद्देश्य केवल जीवन को लंबा करना नहीं है, बल्कि मानव गरिमा की रक्षा करना भी है।
  • इस प्रकार अदालत ने चिकित्सा विशेषज्ञों की निगरानी में जीवन रक्षक उपकरण हटाने की अनुमति दे दी।
  • यह निर्णय भारतीय न्यायपालिका द्वारा गरिमापूर्ण मृत्यु के अधिकार को व्यावहारिक रूप से लागू करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य : दुनिया में इच्छामृत्यु

  • दुनिया के विभिन्न देशों में इच्छामृत्यु को लेकर अलग-अलग कानूनी व्यवस्थाएँ हैं।
  • नीदरलैंड, बेल्जियम और लक्ज़मबर्ग जैसे देशों में सक्रिय इच्छामृत्यु भी कानूनी है, बशर्ते कि मरीज असाध्य बीमारी से पीड़ित हो और उसने स्वेच्छा से अनुरोध किया हो।
  • स्विट्जरलैंड में चिकित्सकीय सहायता से आत्महत्या की अनुमति है, जहाँ डॉक्टर मरीज को ऐसी दवा प्रदान कर सकते हैं जिसे मरीज स्वयं ले सकता है।
  • संयुक्त राज्य अमेरिका में कुछ राज्यों—जैसे ओरेगन और कैलिफोर्निया—में “मेडिकल एड इन डाइंग” की अनुमति दी गई है।
  • हालाँकि कई देशों में इच्छामृत्यु अभी भी अवैध है क्योंकि इसे जीवन के अधिकार के विरुद्ध माना जाता है।

नैतिक और दार्शनिक विमर्श

  • इच्छामृत्यु का प्रश्न केवल कानूनी नहीं बल्कि गहरे नैतिक और दार्शनिक प्रश्नों से भी जुड़ा हुआ है।
  • समर्थकों का तर्क है कि यदि कोई व्यक्ति असाध्य बीमारी से पीड़ित है और अत्यधिक पीड़ा में है, तो उसे गरिमा के साथ मृत्यु चुनने का अधिकार होना चाहिए।
  • वे यह भी कहते हैं कि आधुनिक चिकित्सा ने कई बार जीवन को केवल मशीनों के सहारे बनाए रखने की स्थिति पैदा कर दी है, जो मानव गरिमा के विरुद्ध हो सकती है।
  • इसके विपरीत विरोधियों का कहना है कि इच्छामृत्यु को वैध बनाने से जीवन का मूल्य कम हो सकता है।कई धार्मिक परंपराओं में जीवन को ईश्वर का उपहार माना गया है और मानव को उसे समाप्त करने का अधिकार नहीं दिया गया है।
  • इसके अलावा यह भी चिंता व्यक्त की जाती है कि यदि इच्छामृत्यु को व्यापक रूप से वैध बना दिया गया, तो कमजोर वर्गों—जैसे बुजुर्ग या विकलांग लोगों—पर सामाजिक या पारिवारिक दबाव बढ़ सकता है।

चिकित्सा नैतिकता और डॉक्टरों की दुविधा

  • चिकित्सा पेशे का मूल सिद्धांत जीवन बचाना है,लेकिन इच्छामृत्यु के मामलों में डॉक्टरों को अक्सर एक कठिन नैतिक दुविधा का सामना करना पड़ता है।
  • एक ओर वे मरीज के जीवन को बचाने की शपथ लेते हैं, दूसरी ओर उन्हें यह भी देखना पड़ता है कि कहीं चिकित्सा उपचार स्वयं ही अनावश्यक पीड़ा का कारण तो नहीं बन रहा।
  • इसी कारण अधिकांश देशों में इच्छामृत्यु से संबंधित निर्णयों में कई स्तरों की चिकित्सकीय जांच और विशेषज्ञों की राय आवश्यक होती है।

सामाजिक और पारिवारिक आयाम

ऐसे मामलों में केवल मरीज ही नहीं बल्कि उसका पूरा परिवार प्रभावित होता है।कई बार परिवार वर्षों तक आर्थिक, मानसिक और भावनात्मक दबाव में रहता है।स्थायी वेजिटेटिव अवस्था में पड़े मरीज की देखभाल करना अत्यंत कठिन और महंगा होता है।इसलिए इच्छामृत्यु पर चर्चा करते समय इस सामाजिक और मानवीय पहलू को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

भविष्य की दिशा : क्या भारत में व्यापक कानून बनेगा

  • वर्तमान समय में भारत में इच्छामृत्यु से संबंधित व्यवस्था मुख्यतः न्यायालय के दिशानिर्देशों पर आधारित है।
  • कई विशेषज्ञों का मानना है कि इस विषय पर संसद को एक स्पष्ट और व्यापक कानून बनाना चाहिए।
  • ऐसा कानून न केवल मरीजों और परिवारों के अधिकारों को स्पष्ट करेगा बल्कि डॉक्टरों और अस्पतालों के लिए भी एक स्पष्ट कानूनी ढाँचा प्रदान करेगा।

निष्कर्ष : जीवन और मृत्यु के बीच मानवीय संतुलन

  • गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार आधुनिक लोकतांत्रिक समाजों के सामने खड़ा एक जटिल नैतिक और कानूनी प्रश्न है।
  • सुप्रीम कोर्ट का हालिया निर्णय इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह निर्णय हमें याद दिलाता है कि कानून का उद्देश्य केवल जीवन को बनाए रखना नहीं बल्कि मानव गरिमा की रक्षा करना भी है।
  • इच्छामृत्यु का प्रश्न केवल कानून का विषय नहीं है। इसमें नैतिकता, चिकित्सा, धर्म, समाज और मानव संवेदना सभी का गहरा संबंध है।
  • अंततः किसी भी समाज को यह तय करना होता है कि वह जीवन की रक्षा और मानव गरिमा के बीच किस प्रकार संतुलन स्थापित करना चाहता है।
  • भारत में यह बहस अभी जारी है, लेकिन यह स्पष्ट है कि भविष्य में गरिमापूर्ण मृत्यु का अधिकार संवैधानिक और नैतिक विमर्श का एक महत्वपूर्ण विषय बना रहेगा।

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