भारत की न्यायपालिका लंबे समय से एक गंभीर समस्या से जूझ रही है, लंबित मामलों का बढ़ता बोझ। लाखों लोग वर्षों तक न्याय की प्रतीक्षा करते रहते हैं। इसी चुनौती से निपटने के लिए केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। हाल ही में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने Supreme Court (Number of Judges) Amendment Bill, 2026 को मंजूरी दी है, जिसके तहत सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 करने का प्रस्ताव रखा गया है।
यह केवल चार नए जज जोड़ने का मामला नहीं है, बल्कि यह भारतीय न्याय व्यवस्था की क्षमता, गति और विश्वसनीयता से जुड़ा एक बड़ा संस्थागत सुधार माना जा रहा है। इस निर्णय को समझने के लिए हमें सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक संरचना, न्यायिक चुनौतियों और न्यायिक सुधारों की व्यापक पृष्ठभूमि को समझना होगा।
Supreme Court (Number of Judges) Amendment Bill, 2026: मुख्य प्रावधान
- वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में 33 जज (मुख्य न्यायाधीश को छोड़कर) स्वीकृत हैं।
- नए विधेयक के तहत इसमें 4 अतिरिक्त जज जोड़े जाएंगे।
- इसके बाद सुप्रीम कोर्ट की कुल जज संख्या 37 हो जाएगी (CJI को छोड़कर)।
- यह प्रस्ताव अभी संसद में विधेयक के रूप में पेश किया जाना है, अभी यह कानून नहीं बना है।
भारत का सर्वोच्च न्यायालय : लोकतंत्र का अंतिम प्रहरी
सुप्रीम कोर्ट भारत की सर्वोच्च न्यायिक संस्था है। इसकी स्थापना 28 जनवरी 1950 को हुई थी। यह केवल एक अदालत नहीं बल्कि संविधान का रक्षक, मौलिक अधिकारों का संरक्षक और संघीय व्यवस्था का निर्णायक स्तंभ है।
जब संसद और कार्यपालिका के निर्णयों पर संवैधानिक प्रश्न उठते हैं, तब अंतिम निर्णय सुप्रीम कोर्ट ही देता है। यही कारण है कि इसे भारतीय लोकतंत्र का “Guardian of the Constitution” कहा जाता है।
संबंधित अनुच्छेद
| अनुच्छेद | विषय |
| Article 124 | सुप्रीम कोर्ट की स्थापना एवं संरचना |
| Article 125 | न्यायाधीशों का वेतन |
| Article 126 | कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश |
| Article 127 | एड-हॉक जज |
| Article 128 | सेवानिवृत्त जजों की उपस्थिति |
| Article 131 | मूल अधिकारिता |
| Article 132-136 | अपीलीय अधिकारिता |
| Article 137 | पुनर्विचार शक्ति |
| Article 141 | सुप्रीम कोर्ट के निर्णय बाध्यकारी |
| Article 142 | पूर्ण न्याय करने की शक्ति |
संविधान क्या कहता है?
सुप्रीम कोर्ट की संरचना का उल्लेख संविधान के अनुच्छेद 124 में किया गया है।
अनुच्छेद 124(1)
इस अनुच्छेद के अनुसार: “सुप्रीम कोर्ट में भारत के मुख्य न्यायाधीश तथा संसद द्वारा निर्धारित संख्या तक अन्य न्यायाधीश होंगे।”
- इसका अर्थ है कि सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या बढ़ाने या घटाने का अधिकार केवल संसद के पास है। केंद्र सरकार स्वयं आदेश जारी करके संख्या नहीं बढ़ा सकती। इसके लिए संसद में कानून पारित करना आवश्यक होता है।
- इसी उद्देश्य से Supreme Court (Number of Judges) Act, 1956 बनाया गया था, जिसमें समय-समय पर संशोधन करके जजों की संख्या बढ़ाई जाती रही है।
सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या कैसे बढ़ती गई?
भारत की आबादी, आर्थिक गतिविधियाँ और मुकदमों की संख्या लगातार बढ़ती रही है। इसी के साथ सुप्रीम कोर्ट पर काम का दबाव भी बढ़ा। इसलिए विभिन्न समयों पर जजों की संख्या बढ़ाई गई।
| वर्ष | जजों की संख्या (CJI को छोड़कर) |
| 1950 | 7 |
| 1956 | 10 |
| 1960 | 13 |
| 1977 | 17 |
| 1986 | 25 |
| 2008 | 30 |
| 2019 | 33 |
| 2026 (प्रस्तावित) | 37 |
यह तालिका स्पष्ट करती है कि जैसे-जैसे देश का आकार और न्यायिक आवश्यकताएँ बढ़ीं, वैसे-वैसे सुप्रीम कोर्ट का विस्तार भी आवश्यक होता गया।
Supreme Court (Number of Judges) Act, 1956
संविधान लागू होने के बाद संसद ने 1956 में यह कानून बनाया।
उद्देश्य
- सुप्रीम कोर्ट में जजों की अधिकतम संख्या तय करना।
- न्यायिक कार्यभार के अनुसार समय-समय पर संख्या बढ़ाना।
आखिर जजों की संख्या बढ़ाने की जरूरत क्यों पड़ी?
- लंबित मामलों का पहाड़
- आज सुप्रीम कोर्ट में लगभग 92,000 से अधिक मामले लंबित हैं। इनमें संवैधानिक विवाद, नागरिक अधिकार, चुनावी याचिकाएँ, पर्यावरणीय मामले, कॉर्पोरेट विवाद, आपराधिक अपीलें शामिल हैं।
- कई मामलों में लोगों को वर्षों तक सुनवाई का इंतजार करना पड़ता है। “Justice delayed is justice denied” यानी “देरी से मिला न्याय, न्याय न मिलने के समान है” यह स्थिति भारत में वास्तविक चुनौती बन चुकी है।
- मुकदमों की बदलती प्रकृति
- आज के मुकदमे पहले की तुलना में अधिक जटिल हो चुके हैं।
- अब अदालतों को केवल संपत्ति विवाद नहीं बल्कि डेटा प्राइवेसी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजिटल अधिकार, साइबर अपराध, पर्यावरण संरक्षण, अंतरराष्ट्रीय व्यापार जैसे विषयों पर भी निर्णय देने पड़ते हैं।
ऐसे मामलों के लिए अधिक विशेषज्ञता और अधिक न्यायाधीशों की आवश्यकता होती है।
- संविधान पीठों की कमी
संविधान से जुड़े बड़े मामलों की सुनवाई Constitution Bench करती है, जिसमें कम से कम 5 जज होते हैं।
लेकिन जब जजों की संख्या सीमित होती है, तब:
- नियमित मामलों की सुनवाई भी करनी पड़ती है,
- और संविधान पीठों का गठन कठिन हो जाता है।
परिणामस्वरूप कई महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न वर्षों तक लंबित रहते हैं।
- डिजिटल इंडिया और बढ़ती न्यायिक पहुँच
- e-Courts और ऑनलाइन फाइलिंग जैसी सुविधाओं ने आम लोगों की अदालत तक पहुँच आसान बना दी है।
- अब देश के दूर-दराज़ इलाकों से भी लोग आसानी से याचिका दायर कर पा रहे हैं। इससे न्याय तक पहुँच बढ़ी है, लेकिन साथ ही मामलों की संख्या भी तेजी से बढ़ी है।
क्या केवल जज बढ़ाने से समस्या हल हो जाएगी?
यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। जजों की संख्या बढ़ाना आवश्यक है, लेकिन यह अकेला समाधान नहीं है।
भारत की न्यायपालिका की समस्याएँ बहुआयामी हैं:
- रिक्त पद: कई बार स्वीकृत पद होने के बावजूद नियुक्तियाँ समय पर नहीं होतीं।
- आधारभूत ढाँचे की कमी: कोर्ट रूम की कमी, तकनीकी सुविधाओं का अभाव, स्टाफ की कमी भी न्यायिक देरी का कारण बनते हैं।
- सरकारी मुकदमेबाजी: भारत सरकार देश की सबसे बड़ी litigant है। बड़ी संख्या में मामले सरकार द्वारा दायर या सरकार के खिलाफ होते हैं।
- प्रक्रिया संबंधी देरी: बार-बार स्थगन (adjournment), लंबी कानूनी प्रक्रिया और जटिल प्रक्रियाएँ भी देरी बढ़ाती हैं।
इस निर्णय का वास्तविक महत्व क्या है?
- तेज न्याय की दिशा में कदम: अधिक जज होने का अर्थ है अधिक बेंच, अधिक सुनवाई, अधिक फैसले। इससे मामलों के निपटारे की गति बढ़ सकती है।
- संविधान पीठों को मजबूती: अब सुप्रीम कोर्ट एक साथ अधिक संविधान पीठें गठित कर सकेगा। इससे संवैधानिक प्रश्नों का शीघ्र समाधान, महत्वपूर्ण मामलों का तेजी से निपटारा संभव होगा।
- न्यायपालिका में जनता का विश्वास: जब न्याय समय पर मिलता है, तब नागरिकों का लोकतंत्र और संविधान पर विश्वास मजबूत होता है। तेज और प्रभावी न्याय व्यवस्था किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र की सबसे बड़ी पहचान होती है।
अंतरराष्ट्रीय तुलना : भारत कहाँ खड़ा है?
- भारत की जनसंख्या दुनिया में सबसे अधिक है, लेकिन न्यायाधीशों का अनुपात अभी भी कम माना जाता है।
- कई विशेषज्ञ लंबे समय से कह रहे हैं कि भारत को अधिक न्यायाधीश, अधिक अदालतें, और बेहतर न्यायिक प्रशासन की आवश्यकता है।
- Law Commission ने भी कई बार जजों की संख्या बढ़ाने की सिफारिश की है।
आगे की राह : केवल विस्तार नहीं, सुधार भी जरूरी
यदि वास्तव में न्याय व्यवस्था को मजबूत बनाना है, तो निम्न सुधार भी आवश्यक होंगे:
- न्यायाधीशों की समय पर नियुक्ति
- AI आधारित केस मैनेजमेंट
- डिजिटल न्याय प्रणाली का विस्तार
- निचली अदालतों को मजबूत करना
- सरकारी मुकदमों में कमी
- प्रक्रिया सुधार
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट में जजों की संख्या 33 से बढ़ाकर 37 करना भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह निर्णय केवल प्रशासनिक बदलाव नहीं बल्कि न्याय वितरण प्रणाली को अधिक सक्षम और आधुनिक बनाने का प्रयास है।
हालांकि, केवल संख्या बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। न्यायपालिका को वास्तविक रूप से प्रभावी बनाने के लिए संरचनात्मक सुधार, तकनीकी आधुनिकीकरण और पारदर्शी नियुक्ति प्रणाली भी उतनी ही आवश्यक है।
यदि ये सुधार साथ-साथ लागू किए जाते हैं, तो यह कदम भारत में “समय पर न्याय” के सपने को वास्तविकता के करीब ला सकता है।
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