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वॉशिंगटन का रूस की ओर झुकाव: बदलती भू-राजनीति

भारत के लिए संदेश

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में राष्ट्रीय हित स्थायी होते हैं, नीतियाँ नहीं। अमेरिका की हालिया रूस नीति इस कथन का ताज़ा उदाहरण है। एक महीने से भी कम समय में वॉशिंगटन ने तीन परस्पर विरोधी कदम उठाए। पहले उसने रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों को दंडात्मक शुल्क की धमकी दी, फिर स्वयं रूस से डीज़ल का खरीदार बन गया और अंततः दंड को स्थगित कर दिया। भारत के लिए यह उलटफेर केवल ऊर्जा सुरक्षा का प्रश्न नहीं है, बल्कि अमेरिका के साथ चल रही व्यापार वार्ता की दिशा और शर्तों से भी गहराई से जुड़ा है।

घटनाक्रम: धमकी से सौदे तक

अमेरिकी नीति में आए इस नाटकीय परिवर्तन को तिथिवार समझना आवश्यक है:

  • 18 सितंबर 2026: अमेरिका ने ग्राहम प्रतिबंध कानून लागू किया। सीनेटर लिंडसे ग्राहम की पहल पर बने इस कानून के तहत रूसी तेल खरीदने वाले भारत सहित अन्य देशों पर 100 प्रतिशत तक अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रावधान है।
  • 9 अक्टूबर 2026: घरेलू स्तर पर ईंधन की बढ़ती कीमतों के दबाव में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ रूसी डीज़ल खरीदने का समझौता कर लिया।
  • 16 अक्टूबर 2026: स्वयं रूसी ऊर्जा का खरीदार बनने के बाद दूसरों को दंडित करना पाखंड कहलाता, इसलिए ट्रंप ने दंडात्मक शुल्क से छूट दे दी। किंतु यह छूट कब तक रहेगी, इसकी कोई अवधि तय नहीं की गई।

इस स्थगन से भारत फ़िलहाल रूसी तेल खरीदना जारी रख सकता है, परंतु शुल्क की तलवार अभी भी लटकी हुई है। आशंका यह है कि अमेरिका इसी धमकी को दबाव के औज़ार की तरह प्रयोग कर भारत को एक असंतुलित व्यापार समझौते के लिए विवश कर सकता है।

नीति परिवर्तन के घरेलू कारण

अमेरिका के इस पलटाव की जड़ें उसकी आंतरिक अर्थव्यवस्था में हैं:

  • खुदरा डीज़ल की कीमत एक वर्ष में 66.5 प्रतिशत बढ़ गई। अक्टूबर 2025 में यह 3.71 डॉलर प्रति गैलन थी, जो अक्टूबर 2026 में 6.18 से 6.20 डॉलर प्रति गैलन तक पहुँच गई।
  • डीज़ल ट्रकों, कृषि मशीनरी और औद्योगिक आपूर्ति श्रृंखलाओं की धुरी है। इसकी महँगाई से किराना और अन्य उपभोक्ता वस्तुओं के दाम भी चढ़ जाते हैं।
  • सर्दियों से पहले हीटिंग का बढ़ता खर्च जनता पर अतिरिक्त बोझ डाल रहा है।
  • मध्यावधि चुनावों से पहले मतदाताओं की नाराज़गी रिपब्लिकन पार्टी के लिए गंभीर राजनीतिक खतरा बन गई है।

अमेरिका-रूस डीज़ल सौदा: किसे क्या मिला

समझौते के तहत रूस चरणबद्ध ढंग से डीज़ल की आपूर्ति करेगा: एक खेप तत्काल, एक बड़ी खेप नवंबर में और उसके बाद लगभग 10 लाख टन की अतिरिक्त आपूर्ति। कुल आपूर्ति 48 लाख टन तक पहुँच सकती है।

बदले में रूस को 7 अप्रैल 2027 तक प्रतिबंधों से राहत मिली है। इससे वह वैश्विक बाज़ारों में तेल बेच सकेगा और रोसनेफ्ट तथा लुकोइल जैसी प्रमुख रूसी तेल कंपनियाँ अरबों डॉलर कमा सकेंगी। उल्लेखनीय है कि इन्हीं दोनों कंपनियों पर अमेरिका ने अक्टूबर 2025 में प्रतिबंध लगाए थे। स्पष्ट है कि वॉशिंगटन दूसरों को रूसी ऊर्जा खरीदने पर दंड की धमकी देता है, परंतु जब उसकी अपनी अर्थव्यवस्था को राहत चाहिए होती है तो अपने लिए अपवाद गढ़ लेता है।

स्टारलिंक और स्टारशील्ड का प्रश्न

इस सौदे में स्पेसएक्स की स्टारलिंक और स्टारशील्ड सेवाओं पर लगे प्रतिबंधों की भूमिका भी मानी जा रही है:

  • यूक्रेनी सैनिकों ने बताया कि 100 मील प्रति घंटे से अधिक गति पर सेवा बाधित हो रही है, जिससे इंटरसेप्टर और आक्रामक ड्रोन अभियानों में रुकावट आई।
  • एलन मस्क का कहना है कि वाणिज्यिक स्टारलिंक नागरिक और रक्षात्मक प्रयोजनों के लिए है, जबकि स्टारशील्ड अमेरिकी सरकार की निगरानी में संचालित होता है।
  • इन प्रतिबंधों ने रूसी हमलों से यूक्रेन की रक्षा करने वाले ड्रोनों की क्षमता को भी कमज़ोर किया।

यूक्रेन और यूरोप की प्रतिक्रिया

यूक्रेन और उसके यूरोपीय सहयोगियों ने इस सौदे की तीखी आलोचना की है। राष्ट्रपति वोलोदिमिर ज़ेलेंस्की ने चेताया कि स्थायी तनाव-शमन के बिना प्रतिबंधों में ढील मॉस्को को वैधता प्रदान करेगी और उसके युद्ध को आर्थिक ईंधन देगी। यूरोपीय नेताओं का तर्क है कि इससे प्रतिबंध व्यवस्था खोखली होती है और वार्ता में उनकी सौदेबाज़ी की शक्ति घटती है।

भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौता: वार्ता की वर्तमान स्थिति

दोनों पक्षों के हालिया वक्तव्यों से संकेत मिलता है कि 6 फ़रवरी के संयुक्त वक्तव्य के तहत प्रस्तावित अंतरिम व्यापार समझौता पूर्णता के निकट है:

  • 1 अक्टूबर: अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि जेमिसन ग्रीर ने कहा कि वार्ता अंतिम चरण में है। उसी दिन वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने शीघ्र अंतरिम समझौते की आशा जताई।
  • 5 अक्टूबर: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने कहा कि वार्ता एक ठहराव पर पहुँच गई है और आगे रियायतें देना अत्यंत कठिन होगा।
  • 14 अक्टूबर: विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि वार्ता काफ़ी आगे बढ़ चुकी है और निष्कर्ष की ओर अग्रसर है।

इन वक्तव्यों से प्रतीत होता है कि वार्ता का मूल कार्य पूरा हो चुका है। सीतारमण की चेतावनी बताती है कि 6 फ़रवरी के ढाँचे से आगे भारतीय रियायतों की गुंजाइश बहुत कम है, जबकि गोयल और जयशंकर समझौते को अंतिम रूप देने की इच्छा दर्शाते हैं। ताज़ा सूचनाओं के अनुसार समझौते का कानूनी मसौदा तैयार हो रहा है। यह तभी हस्ताक्षरित हो सकता है जब अमेरिका भारतीय वस्तुओं को प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में शुल्क लाभ देने पर सहमत हो। समय और अंतिम शर्तें अभी अनिश्चित हैं।

ध्यान रहे कि फ़रवरी 2025 में दोनों देशों ने द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर वार्ता शुरू करने और 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को 500 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य (“मिशन 500”) तय किया था।

केंद्रीय बाधा: अमेरिका वास्तव में क्या दे रहा है?

वार्ता का मूल प्रश्न यही है कि वॉशिंगटन कौन-सी शुल्क दर प्रस्तावित कर रहा है। इसकी पृष्ठभूमि इस प्रकार है:

  • अगस्त 2025 में अमेरिका ने भारत पर 25 प्रतिशत पारस्परिक शुल्क के ऊपर रूसी तेल खरीद के लिए 25 प्रतिशत अतिरिक्त दंड लगाकर कुल शुल्क 50 प्रतिशत कर दिया था।
  • 6 फ़रवरी के ढाँचे में प्रस्ताव था कि भारत की बड़ी रियायतों के बदले अमेरिकी पारस्परिक शुल्क 25 से घटाकर 18 प्रतिशत किया जाएगा।
  • 20 फ़रवरी को अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने उन शुल्कों को ही रद्द कर दिया। ये शुल्क अंतरराष्ट्रीय आपातकालीन आर्थिक शक्तियाँ अधिनियम (IEEPA), 1977 के आधार पर लगाए गए थे। परिणामतः उस प्रस्ताव का कानूनी आधार समाप्त हो गया।
  • भारत की प्रस्तावित रियायतें तो मेज़ पर बनी रहीं, किंतु बदले में मिलने वाला अमेरिकी लाभ अस्पष्ट हो गया।
  • इसके बाद अमेरिका ने व्यापार अधिनियम, 1974 की धारा 301 के तहत 10 प्रतिशत “बलात् श्रम शुल्क” लगा दिया। धारा 301 अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि को अनुचित व्यापार प्रथाओं के विरुद्ध एकतरफ़ा कार्रवाई का अधिकार देती है।
  • ग्राहम कानून रूसी ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर 100 प्रतिशत तक शुल्क की अनुमति देता है।
  • इस प्रकार 16 अक्टूबर की छूट के बावजूद भारत एक मौजूदा अतिरिक्त शुल्क और एक संभावित बड़े दंड के बीच फँसा है, और उसे यह भी ज्ञात नहीं कि समझौता होने पर इनमें से कौन-से शुल्क हटेंगे।

प्रतिस्पर्धियों की तुलना में भारत की विशिष्ट स्थिति

अपने अधिकांश प्रतिस्पर्धियों के विपरीत भारत रूसी तेल आयात के कारण अमेरिकी दंडात्मक शुल्क के खतरे का सामना कर रहा है। चीन, उदाहरण के लिए, बुसान समझौते के तहत जनवरी 2027 तक नए द्विपक्षीय शुल्कों से सुरक्षित है। भारत को यह जानना आवश्यक है कि प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में उसकी वस्तुओं पर अंतिम अमेरिकी शुल्क कितना होगा। इन आँकड़ों के अभाव में वार्ता ठप पड़ी रही। यह गतिरोध तब तक बना रहा जब तक अमेरिका ने रूस से अपना डीज़ल सौदा नहीं कर लिया और 16 अक्टूबर को अस्थायी छूट नहीं दे दी।

संभावित अमेरिकी प्रस्ताव और उसकी सीमाएँ

छूट के बावजूद रूसी तेल पर नए शुल्क की धमकी अमेरिका को एक स्पष्ट प्रस्ताव रखने में सहायक हो सकती है। संभावित प्रस्ताव कुछ इस प्रकार हो सकता है:

  • भारत को लंबी अवधि के लिए रूसी तेल संबंधी दंड से छूट।
  • धारा 301 का 10 प्रतिशत शुल्क यथावत, साथ में सामान्य सर्वाधिक अनुकूल राष्ट्र (MFN) शुल्क।
  • बदले में भारत 6 फ़रवरी की शर्तें स्वीकार करे और रूसी तेल खरीद जारी रख सके।
  • इससे शुल्क की तस्वीर तो स्पष्ट होगी, परंतु मूल समस्या बनी रहेगी। 100 प्रतिशत दंड से बच निकलना कोई विशेष अनुग्रह नहीं है, जब बिना व्यापार समझौते वाले अधिकांश प्रतिस्पर्धी देश सामान्य शुल्क के साथ केवल 10 या 12.5 प्रतिशत अतिरिक्त शुल्क चुका रहे हैं, और जब अमेरिका स्वयं रूसी डीज़ल खरीद रहा है।
  • फ़रवरी के ढाँचे में भारत से बड़ी रियायतें माँगी गई थीं। जब वादा किया गया अमेरिकी लाभ ही बदल चुका है, तब उन्हीं शर्तों को स्वीकार करना भारत को घाटे में डाल सकता है। स्पष्ट और स्थायी लाभ के बिना हस्ताक्षर करने से बेहतर है प्रतीक्षा करना।

एकतरफ़ा रियायतें: घटती सौदेबाज़ी की शक्ति

वार्ता अधूरी रहते हुए भारत को बड़ी एकतरफ़ा रियायतें देना बंद करना चाहिए। पिछले दो वर्षों में भारत ने अमेरिकी हितों से जुड़े कई कदम उठाए हैं:

  • मोटरसाइकिल, बर्बन व्हिस्की, कुछ औषधियों और ईथरनेट स्विच पर आयात शुल्क में कटौती।
  • निर्यात के लिए इन्वेंट्री आधारित ई-कॉमर्स में विदेशी निवेश की अनुमति।
  • विदेशी डिजिटल प्लेटफ़ॉर्मों पर लगने वाली समकारी लेवी (Equalisation Levy) की समाप्ति। यह लेवी 2016 में ऑनलाइन विज्ञापन सेवाओं पर 6 प्रतिशत की दर से लागू हुई थी; ई-कॉमर्स पर 2 प्रतिशत वाला भाग अगस्त 2024 से और 6 प्रतिशत वाला भाग 1 अप्रैल 2025 से समाप्त किया गया।
  • दीवाली के बाद प्रस्तावित UPI शुल्क, जिससे वीज़ा और मास्टरकार्ड जैसी अमेरिकी भुगतान कंपनियों को लाभ हो सकता है, क्योंकि शून्य शुल्क वाला UPI उनके लिए कड़ी प्रतिस्पर्धा रहा है।
  • बिना प्रतिफल के दी गई हर रियायत भारत की सौदेबाज़ी शक्ति को क्षीण करती है। अतः अमेरिका से अपेक्षित प्रस्ताव तय करते समय भारत को इन सभी रियायतों के कुल मूल्य का हिसाब रखना चाहिए।

व्यापक परिप्रेक्ष्य: ऊर्जा सुरक्षा और सामरिक स्वायत्तता

भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 85 प्रतिशत आयात करता है। 2022 के यूक्रेन युद्ध के बाद रियायती रूसी तेल भारत के कुल कच्चे तेल आयात का एक-तिहाई से अधिक हिस्सा बन गया, जिससे महँगाई नियंत्रण और चालू खाता घाटे को संभालने में सहायता मिली। ऐसे में रूसी तेल पर निर्णय केवल व्यापार का नहीं, बल्कि सामरिक स्वायत्तता का प्रश्न है। साथ ही भारत ने यूनाइटेड किंगडम के साथ व्यापक आर्थिक एवं व्यापार समझौते और EFTA देशों के साथ व्यापार एवं आर्थिक साझेदारी समझौते जैसे कदमों से निर्यात बाज़ारों के विविधीकरण की दिशा भी पकड़ी है, जो अमेरिका पर अत्यधिक निर्भरता के जोखिम को कम करती है।

आगे की राह

  • समझौते का मूल्यांकन मिलने वाले स्पष्ट, मापने योग्य और स्थायी लाभों के आधार पर हो, न कि अमेरिका द्वारा स्वयं गढ़ी गई धमकियों से राहत के आधार पर।
  • प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में भारतीय वस्तुओं पर शुल्क का अंतर लिखित और कानूनी रूप से सुनिश्चित हो।
  • वार्ता पूरी होने तक एकतरफ़ा रियायतों पर विराम लगे।
  • ऊर्जा स्रोतों और निर्यात बाज़ारों का विविधीकरण जारी रहे।

निष्कर्ष

वॉशिंगटन का मॉस्को की ओर मुड़ना दर्शाता है कि घरेलू आवश्यकताएँ कितनी शीघ्रता से विदेश नीति संबंधी प्रतिबद्धताओं पर भारी पड़ जाती हैं। भारत को इस अनुभव से सीख लेनी चाहिए। व्यापार समझौते की कसौटी वे ठोस और दीर्घकालिक लाभ होने चाहिए जो भारत को प्राप्त हों। यदि ये लाभ अनिश्चित बने रहते हैं, तो नई दिल्ली को अपनी सौदेबाज़ी की शक्ति सुरक्षित रखनी चाहिए और अधिकांश देशों की तरह धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करनी चाहिए।

वन लाइनर फैक्ट्स फॉर रिवीजन

  • ग्राहम प्रतिबंध कानून 18 सितंबर 2026 को लागू हुआ; रूसी तेल खरीदारों पर 100 प्रतिशत तक शुल्क का प्रावधान।
  • 9 अक्टूबर 2026 को ट्रंप-पुतिन डीज़ल सौदा हुआ।
  • 16 अक्टूबर 2026 को रूसी तेल खरीदारों पर दंड से अनिश्चितकालीन छूट दी गई।
  • अमेरिका में डीज़ल की खुदरा कीमत एक वर्ष में 66.5 प्रतिशत बढ़ी।
  • रूस से कुल डीज़ल आपूर्ति 48 लाख टन तक पहुँच सकती है।
  • रूस को 7 अप्रैल 2027 तक प्रतिबंधों से राहत मिली।
  • रोसनेफ्ट और लुकोइल रूस की प्रमुख तेल कंपनियाँ हैं।
  • स्टारशील्ड अमेरिकी सरकार की निगरानी में संचालित उपग्रह सेवा है।
  • भारत-अमेरिका अंतरिम व्यापार समझौते का आधार 6 फ़रवरी का संयुक्त वक्तव्य है।
  • 6 फ़रवरी के ढाँचे में अमेरिकी शुल्क 25 से घटाकर 18 प्रतिशत करने का प्रस्ताव था।
  • 20 फ़रवरी 2026 को अमेरिकी सर्वोच्च न्यायालय ने IEEPA आधारित शुल्क रद्द किए।
  • धारा 301 अमेरिकी व्यापार अधिनियम, 1974 का प्रावधान है।
  • भारत पर धारा 301 के तहत 10 प्रतिशत बलात् श्रम शुल्क लगाया गया।
  • बुसान समझौते के तहत चीन जनवरी 2027 तक नए द्विपक्षीय अमेरिकी शुल्कों से सुरक्षित है।
  • समकारी लेवी 2016 में शुरू हुई और 1 अप्रैल 2025 से पूर्णतः समाप्त हुई।
  • “मिशन 500” का लक्ष्य 2030 तक भारत-अमेरिका व्यापार को 500 अरब डॉलर तक ले जाना है।

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