भारत में परिसीमन (Delimitation) को लेकर चल रही बहस केवल लोकसभा में सांसदों की संख्या बढ़ाने तक सीमित नहीं है। इसका वास्तविक उद्देश्य जनसंख्या में वृद्धि के अनुरूप निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्गठन करना और नागरिकों को प्रभावी राजनीतिक प्रतिनिधित्व उपलब्ध कराना है।
प्रभावी प्रतिनिधित्व के दो प्रमुख आयाम हैं:
- सांसद तक पहुँच (Access to Representation): नागरिकों को ऐसा निर्वाचित प्रतिनिधि उपलब्ध हो, जिससे वे अपनी समस्याएँ और माँगें रख सकें।
- संसद में अपनी बात रखने का अवसर (Voice in Parliament): सांसदों को सदन में प्रश्न पूछने, बहस में भाग लेने, विधेयक प्रस्तुत करने और सरकार को जवाबदेह बनाने के लिए पर्याप्त समय मिलना चाहिए।
प्रस्तावित संविधान (131वाँ संशोधन) विधेयक और परिसीमन विधेयक, 2026 के माध्यम से लोकसभा की सदस्य संख्या 550 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव है। इस संदर्भ में मुख्य प्रश्न यह है कि क्या केवल सांसदों की संख्या बढ़ाने से लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व अधिक प्रभावी हो जाएगा?
यदि संसद के कार्यदिवस, चर्चा का समय और संसदीय समितियों की क्षमता नहीं बढ़ाई जाती, तो अधिक सांसदों के कारण सीमित संसदीय समय के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है। इससे विधायी भागीदारी और कार्यपालिका की जवाबदेही कमजोर होने का जोखिम है।
विधेयकों और प्रस्तावित सदस्य संख्या से संबंधित विवरण दिए गए संपादकीय के अनुसार हैं; इन्हें पारित कानून या लागू हो चुकी व्यवस्था नहीं समझना चाहिए।

परिसीमन और निष्पक्ष प्रतिनिधित्व की आवश्यकता
परिसीमन (Delimitation) वह प्रक्रिया है जिसके अंतर्गत लोकसभा और विधानसभा जैसे निर्वाचित सदनों के लिए निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएँ निर्धारित या पुनर्निर्धारित की जाती हैं। इसका उद्देश्य जनसंख्या और प्रतिनिधित्व के बीच यथासंभव उचित संतुलन स्थापित करना है।
भारत में परिसीमन का प्रश्न इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों में मतदाताओं की संख्या में काफी अंतर पाया जाता है।
भारत निर्वाचन आयोग के 2024 एटलस के संबंध में दिए गए आँकड़ों के अनुसार:
- भारत में लगभग 97.98 करोड़ मतदाता थे।
- लोकसभा के 543 निर्वाचन क्षेत्रों में औसतन लगभग 18 लाख मतदाता प्रति निर्वाचन क्षेत्र थे।
- तेलंगाना के मलकाजगिरि निर्वाचन क्षेत्र में लगभग 37.8 लाख मतदाता थे।
- लक्षद्वीप में मतदाताओं की संख्या केवल 57,953 थी।
ये आँकड़े निर्वाचन क्षेत्रों के आकार में असमानता को रेखांकित करते हैं। बड़े निर्वाचन क्षेत्र में सांसद के लिए प्रत्येक मतदाता तक पहुँचना और स्थानीय समस्याओं पर पर्याप्त ध्यान देना कठिन हो सकता है।
हालाँकि, परिसीमन का उद्देश्य केवल जनसंख्या के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएँ बदलना नहीं होना चाहिए। यह भी सुनिश्चित करना आवश्यक है कि चुने गए प्रतिनिधियों को संसद में अपने मतदाताओं की समस्याएँ उठाने का पर्याप्त अवसर मिले।
निर्वाचन क्षेत्र छोटा होने से सांसद तक पहुँच आसान हो सकती है, लेकिन संसद में चर्चा का समय अपर्याप्त होने पर प्रभावी प्रतिनिधित्व फिर भी सीमित रह सकता है।
संरचनात्मक समस्या: संसद की सीमित कार्यक्षमता
लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ाने के साथ संसद के कामकाज की क्षमता बढ़ाना भी आवश्यक है। यदि सांसदों की संख्या बढ़ती है, लेकिन संसद के कार्यदिवस और कामकाज के घंटे पहले जैसे ही रहते हैं, तो प्रत्येक सांसद को मिलने वाला समय कम हो सकता है।
इसके प्रमुख प्रभाव निम्नलिखित हैं:
- प्रश्न पूछने के अवसरों में कमी: अधिक सांसदों के कारण मंत्रियों से प्रश्न पूछने के लिए प्रतिस्पर्धा बढ़ सकती है।
- बहस में सीमित भागीदारी: सभी सांसदों को विधेयकों और राष्ट्रीय महत्त्व के मुद्दों पर अपने विचार रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिल पाएगा।
- विधायी पहल में बाधा: निजी सदस्य विधेयक प्रस्तुत करने और उन पर चर्चा करने के अवसर सीमित हो सकते हैं।
- कार्यपालिका की जवाबदेही में कमी: यदि सांसदों को सरकार से प्रश्न पूछने और उसके निर्णयों की जाँच करने के पर्याप्त अवसर नहीं मिलते, तो संसदीय नियंत्रण कमजोर हो सकता है।
- विधायी गुणवत्ता पर प्रभाव: पर्याप्त चर्चा और समीक्षा के अभाव में कानूनों के संभावित परिणामों का समुचित मूल्यांकन कठिन हो सकता है।

इसलिए, संसद की सदस्य संख्या और उसकी संस्थागत कार्यक्षमता के बीच संतुलन आवश्यक है। केवल संख्यात्मक विस्तार को लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की सफलता नहीं माना जा सकता।
संसदीय कार्यवाही की प्रमुख कमियाँ
(क) प्रश्नकाल का कमजोर होना (Weakening of Question Hour)
प्रश्नकाल संसदीय कार्यवाही का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा है। इसमें सांसद मंत्रियों से सरकारी नीतियों, योजनाओं, प्रशासनिक निर्णयों और सार्वजनिक समस्याओं के संबंध में प्रश्न पूछते हैं।
प्रश्नकाल के माध्यम से:
- कार्यपालिका को अपने निर्णयों के संबंध में स्पष्टीकरण देना पड़ता है।
- सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन की जानकारी प्राप्त होती है।
- प्रशासनिक कमियों और अनियमितताओं को उजागर किया जा सकता है।
- जनता की समस्याओं को राष्ट्रीय स्तर पर उठाया जाता है।
प्रश्नों के दो प्रमुख प्रकार हैं:
तारांकित प्रश्न (Starred Questions): इनका उत्तर मंत्री द्वारा सदन में मौखिक रूप से दिया जाता है। इनके उत्तर के बाद पूरक प्रश्न पूछे जा सकते हैं।
अतारांकित प्रश्न (Unstarred Questions): इनका उत्तर लिखित रूप में दिया जाता है। सामान्यतः इनके संबंध में पूरक प्रश्न नहीं पूछे जाते।
लोकसभा के नियमों के अंतर्गत एक बैठक के लिए अधिकतम 20 तारांकित प्रश्नों के मौखिक उत्तर और 230 अतारांकित प्रश्नों के लिखित उत्तर निर्धारित किए गए हैं।
सांसद प्रतिदिन अधिकतम पाँच प्रश्न प्रस्तुत कर सकते हैं, लेकिन प्रश्नों का चयन निर्धारित प्रक्रिया और मतपत्र (Ballot) के माध्यम से किया जाता है।
संपादकीय में प्रश्नकाल की कार्यक्षमता के संबंध में निम्नलिखित आँकड़े दिए गए हैं:
- 17वीं लोकसभा के दौरान प्रश्नकाल अपने निर्धारित समय का केवल 60% ही संचालित हो सका।
- वर्ष 2026 के मानसून सत्र के संबंध में प्रश्नकाल के केवल नौ मिनट संचालित होने और निर्धारित समय के लगभग 1% तक सीमित रहने का दावा किया गया है।
ये आँकड़े प्रश्नकाल के लिए पर्याप्त समय सुनिश्चित करने की आवश्यकता को रेखांकित करते हैं। हालाँकि, दूसरे आँकड़े की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
यदि लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ती है, लेकिन प्रश्नकाल का समय नहीं बढ़ाया जाता, तो सांसदों के लिए मंत्रियों से प्रश्न पूछने और पूरक प्रश्नों के माध्यम से जवाबदेही सुनिश्चित करने के अवसर और सीमित हो सकते हैं।
(ख) शून्यकाल और निजी सदस्य कार्य का क्षरण
- शून्यकाल (Zero Hour)
शून्यकाल में सांसद ऐसे तात्कालिक सार्वजनिक मुद्दे उठाते हैं जिन पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता होती है। उदाहरण के लिए:
- किसानों की फसल का नुकसान।
- प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित लोगों को राहत।
- सार्वजनिक सेवाओं में कमियाँ।
- क्षेत्रीय समस्याएँ और नागरिकों की शिकायतें।
शून्यकाल का महत्त्व इस बात में है कि यह सांसदों को तत्काल सार्वजनिक महत्त्व के मुद्दों को सदन के सामने रखने का अवसर देता है।
- निजी सदस्य कार्य (Private Members’ Business)
मंत्री न होने वाले सांसदों को निजी सदस्य कहा जाता है। उनके द्वारा प्रस्तुत विधेयकों और प्रस्तावों से संबंधित कार्य को निजी सदस्य कार्य कहा जाता है।
इसका उद्देश्य केवल सरकार द्वारा प्रस्तुत विधेयकों पर चर्चा करना नहीं, बल्कि अन्य सांसदों को भी स्वतंत्र विधायी पहल करने का अवसर देना है।
इसके महत्त्व में शामिल हैं:
- वैकल्पिक नीतिगत विचारों को सामने लाना।
- सरकार से स्वतंत्र विधायी पहल को प्रोत्साहित करना।
- क्षेत्रीय तथा सामाजिक समस्याओं पर चर्चा करना।
- लोकतांत्रिक बहुलवाद को मजबूत करना।
यदि शून्यकाल और निजी सदस्य कार्य के लिए पर्याप्त समय सुरक्षित नहीं किया जाता, तो लोकसभा की सदस्य संख्या बढ़ने के बाद इन प्रक्रियाओं की प्रभावशीलता प्रभावित हो सकती है।
इसलिए, इन दोनों प्रक्रियाओं के लिए समय का संरक्षण आवश्यक है।
(ग) विधायी विचार–विमर्श की गुणवत्ता में गिरावट
संसद का प्रमुख कार्य केवल कानून पारित करना नहीं है। उसे प्रस्तावित कानूनों की जाँच, सरकारी नीतियों की समीक्षा और सार्वजनिक धन के उपयोग पर निगरानी भी रखनी होती है।
पर्याप्त विचार-विमर्श के अभाव में कानूनों की कमियों, उनके संभावित प्रभावों और उनके क्रियान्वयन से जुड़ी समस्याओं पर गंभीर चर्चा नहीं हो पाती।
संपादकीय में 17वीं लोकसभा के संबंध में निम्नलिखित आँकड़े प्रस्तुत किए गए हैं:
- लगभग 35% विधेयक एक घंटे से भी कम समय की चर्चा के बाद पारित किए गए।
- केंद्रीय बजट की लगभग 80% राशि से संबंधित व्यय माँगें गिलोटिन प्रक्रिया के माध्यम से पारित की गईं।
गिलोटिन प्रक्रिया (Guillotine Procedure) क्या है?
संसदीय बजट प्रक्रिया में जब निर्धारित समय समाप्त हो जाता है, तो शेष अनुदान माँगों को अलग-अलग विस्तृत चर्चा के बिना मतदान के लिए प्रस्तुत कर दिया जाता है। इस प्रक्रिया को गिलोटिन कहा जाता है।
इसका उद्देश्य बजट प्रक्रिया को निर्धारित समय में पूरा करना है। लेकिन यदि बहुत बड़ी संख्या में अनुदान माँगें बिना विस्तृत चर्चा के पारित हो जाती हैं, तो सरकारी व्यय की संसदीय जाँच सीमित हो सकती है।
इसके परिणामस्वरूप:
- सार्वजनिक व्यय की विस्तृत समीक्षा प्रभावित हो सकती है।
- सरकारी योजनाओं की प्रभावशीलता पर चर्चा सीमित हो सकती है।
- विधेयकों के संभावित सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक प्रभावों का समुचित मूल्यांकन कठिन हो सकता है।
- सांसदों की विधायी भूमिका औपचारिक मतदान तक सीमित होने का जोखिम बढ़ सकता है।
अतः बड़ी लोकसभा के साथ पर्याप्त चर्चा समय और प्रभावी संसदीय समीक्षा सुनिश्चित करना आवश्यक है।
- संसदीय कार्यप्रणाली में सुधार के लिए आवश्यक संस्थागत उपाय
(क) संसद के न्यूनतम वार्षिक कार्यदिवस निर्धारित करना
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 85(1) संसद के दो सत्रों के बीच अधिकतम छह महीने का अंतराल निर्धारित करता है। इसका अर्थ यह नहीं है कि संविधान में संसद के लिए न्यूनतम वार्षिक बैठक दिवसों की संख्या निर्धारित की गई है।
राष्ट्रीय संविधान कार्यकरण समीक्षा आयोग (National Commission to Review the Working of the Constitution) ने लोकसभा की बैठक कम-से-कम 120 दिन प्रतिवर्ष आयोजित करने की सिफारिश की थी।
न्यूनतम वार्षिक कार्यदिवस निर्धारित करने के संभावित लाभ हैं:
- विधेयकों पर विस्तृत चर्चा के लिए पर्याप्त समय।
- बजट और सार्वजनिक व्यय की बेहतर जाँच।
- प्रश्नकाल और शून्यकाल का नियमित संचालन।
- कार्यपालिका की जवाबदेही में वृद्धि।
- सांसदों की भागीदारी के अवसरों में विस्तार।
इस प्रकार, संसद के न्यूनतम वार्षिक कार्यदिवस निर्धारित करने के लिए उपयुक्त कानूनी या प्रक्रियागत व्यवस्था पर विचार किया जा सकता है।
(ख) आवश्यक संसदीय प्रक्रियाओं के लिए समय सुरक्षित करना
प्रश्नकाल और शून्यकाल संसदीय जवाबदेही तथा जनसमस्याओं को उठाने के प्रमुख माध्यम हैं। इसलिए इनके लिए पर्याप्त और संरक्षित समय सुनिश्चित करना आवश्यक है।
प्रस्तावित सुधारों में शामिल हैं:
- प्रश्नकाल के लिए निर्धारित समय को नियमित रूप से सुरक्षित रखना।
- शून्यकाल के दौरान सांसदों को जनहित के मुद्दे उठाने का पर्याप्त अवसर देना।
- निजी सदस्य विधेयकों और प्रस्तावों पर सार्थक चर्चा सुनिश्चित करना।
- महत्त्वपूर्ण विधेयकों और बजटीय प्रस्तावों पर पर्याप्त विचार-विमर्श करना।
- संसद की कार्यवाही में व्यवधान कम करने के लिए प्रक्रियागत सुधार करना।
इन उपायों से सांसदों की भागीदारी और सरकार के प्रति जवाबदेही दोनों मजबूत हो सकती हैं।
(ग) संसदीय समितियों को मजबूत बनाना
संसदीय समितियाँ संसद के कामकाज का महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं। ये विधेयकों, सरकारी नीतियों, मंत्रालयों के कामकाज और सार्वजनिक व्यय की विस्तृत जाँच करती हैं।
समितियों में अपेक्षाकृत छोटे समूहों के माध्यम से किसी विषय पर गहराई से चर्चा करना संभव होता है। वे विशेषज्ञों, संबंधित पक्षों और उपलब्ध साक्ष्यों के आधार पर नीतियों की समीक्षा करने में भी सहायता कर सकती हैं।
संसदीय समितियों की प्रमुख भूमिकाएँ
- विधेयकों की विस्तृत जाँच करना।
- मंत्रालयों की अनुदान माँगों और व्यय की समीक्षा करना।
- सरकारी नीतियों के क्रियान्वयन का मूल्यांकन करना।
- विशेषज्ञता आधारित विचार-विमर्श को प्रोत्साहित करना।
- विधायी प्रक्रिया की गुणवत्ता में सुधार करना।
हालाँकि, समिति का आकार बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है। अधिक सदस्यों के साथ समन्वय, विशेषज्ञ सहायता, शोध सुविधाओं और बैठक के समय की व्यवस्था भी आवश्यक होगी।
संसदीय समितियों को मजबूत करने से सदन के भीतर सीमित समय के दबाव को कुछ हद तक कम किया जा सकता है और विधायी समीक्षा को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
विषय की संवैधानिक एवं राजनीतिक पृष्ठभूमि
| संवैधानिक प्रावधान | विषय एवं महत्त्व |
| अनुच्छेद 79 | संघ के लिए संसद की संरचना: राष्ट्रपति, राज्यसभा और लोकसभा |
| अनुच्छेद 81 | लोकसभा की संरचना और राज्यों तथा केंद्रशासित प्रदेशों के प्रतिनिधित्व से संबंधित प्रावधान |
| अनुच्छेद 82 | प्रत्येक जनगणना के बाद सीटों के पुनर्समायोजन और निर्वाचन क्षेत्रों के परिसीमन से संबंधित प्रावधान |
| अनुच्छेद 85 | संसद के सत्र बुलाने, सत्रावसान और लोकसभा के विघटन से संबंधित प्रावधान |
| अनुच्छेद 100 | संसद में मतदान तथा गणपूर्ति से संबंधित प्रावधान |
| अनुच्छेद 105 | संसद और उसके सदस्यों की शक्तियाँ, विशेषाधिकार और उन्मुक्तियाँ |
| अनुच्छेद 118 | संसद के प्रत्येक सदन की कार्यप्रणाली के नियम बनाने की शक्ति |
अनुच्छेद 82 परिसीमन के संवैधानिक आधार को समझने के लिए विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण है। वहीं अनुच्छेद 85 संसद के सत्रों के बीच अंतराल से संबंधित है। इन दोनों प्रावधानों को एक-दूसरे से अलग समझना चाहिए।
परिसीमन की चर्चा में जनसंख्या और प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन के साथ संघवाद, राज्यों के बीच राजनीतिक प्रतिनिधित्व और जनसांख्यिकीय परिवर्तनों के प्रभावों पर भी ध्यान देना आवश्यक है।
निष्कर्ष
परिसीमन भारत में प्रतिनिधित्व की निष्पक्षता और सांसदों तक नागरिकों की पहुँच सुधारने का एक महत्त्वपूर्ण माध्यम हो सकता है। लेकिन लोकसभा की सदस्य संख्या 550 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव तभी प्रभावी सिद्ध हो सकता है, जब संसद की कार्यक्षमता और संस्थागत क्षमता भी मजबूत की जाए।
यदि संसद के कार्यदिवस, प्रश्नकाल, शून्यकाल, विधायी बहस और संसदीय समितियों की क्षमता में पर्याप्त सुधार नहीं होता, तो संख्यात्मक प्रतिनिधित्व बढ़ने के बावजूद वास्तविक लोकतांत्रिक भागीदारी सीमित रह सकती है।
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