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न्यायिक औचित्य की कसौटी पर शक्तियों का पृथक्कर

भारतीय लोकतंत्र की संवैधानिक संरचना इस आधारभूत मान्यता पर टिकी है कि राज्य के तीनों अंग, अर्थात विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका, अपने-अपने निर्धारित क्षेत्र में कार्य करें और एक-दूसरे की सीमाओं का अतिक्रमण न करें। अक्टूबर 2026 में इस सिद्धांत की एक महत्त्वपूर्ण परीक्षा तब हुई, जब भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) न्यायमूर्ति सूर्यकांत ने विपक्ष के शीर्ष नेताओं राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खरगे के उस अनुरोध को अस्वीकार कर दिया, जिसमें उन्होंने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के आचरण से जुड़े आरोपों पर चर्चा हेतु भेंट का समय माँगा था। ये आरोप मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (Special Intensive Revision, SIR) की प्रक्रिया, शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों की हिरासत तथा दिल्ली के प्रमुख मार्गों की घेराबंदी से संबंधित थे।

मुख्य न्यायाधीश का यह निर्णय राजनीतिक विवादों से न्यायपालिका की तटस्थ दूरी बनाए रखने की परंपरा पर आधारित था। उनके पत्र में स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया कि न्यायपालिका अपनी संवैधानिक मर्यादाओं को धुंधला नहीं कर सकती। यह प्रकरण शक्तियों के पृथक्करण, विचाराधीन मामलों के नियम (sub judice), न्यायिक औचित्य और न्यायिक आचरण के अंतरराष्ट्रीय मानकों पर गंभीर विमर्श का अवसर प्रदान करता है।

विपक्ष ने मुख्य न्यायाधीश से संपर्क क्यों किया?

10 अक्टूबर का संयुक्त पत्र

10 अक्टूबर को राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे और लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने संयुक्त रूप से मुख्य न्यायाधीश को पत्र लिखा। यह एक दुर्लभ और ऐतिहासिक घटना थी, क्योंकि विपक्ष ने किसी अन्य संवैधानिक प्राधिकारी, अर्थात मुख्य चुनाव आयुक्त, के विरुद्ध शिकायत करने के लिए सीधे देश के सर्वोच्च न्यायिक पद से संपर्क किया था।

इस संक्षिप्त पत्र की प्रमुख बातें निम्नलिखित थीं:

  • दोनों नेता मुख्य चुनाव आयुक्त और भारत निर्वाचन आयोग के संबंध में मुख्य न्यायाधीश को एक ज्ञापन सौंपना चाहते थे।
  • यह पत्र उस पुलिस कार्रवाई के कुछ ही घंटों बाद भेजा गया, जिसमें मुख्य चुनाव आयुक्त के त्यागपत्र की माँग कर रहे नागरिकों पर कठोर बल प्रयोग किया गया था।
  • पत्र में आरोप लगाया गया कि छात्रों की मनमानी गिरफ्तारी, मेट्रो स्टेशनों को बंद करने, रेलगाड़ियों को रद्द करने और प्रमुख मार्गों पर अवरोधक लगाने से राजधानी में घेराबंदी जैसा वातावरण निर्मित हो गया है।

11 अक्टूबर का विस्तृत अभ्यावेदन

अगले दिन राहुल गांधी ने एक दूसरा और अधिक विस्तृत अभ्यावेदन भेजा। इसके मुख्य बिंदु इस प्रकार थे:

  • उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय को संविधान का संरक्षक तथा प्रत्येक नागरिक के मताधिकार का रक्षक बताया।
  • लोकसभा में विपक्ष के नेता के रूप में उन्होंने मतदाता सूची की शुचिता को लेकर चिंतित करोड़ों मतदाताओं की ओर से पक्ष रखा।
  • उन्होंने उल्लेख किया कि वे मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 की धारा 7 के अंतर्गत गठित चयन समिति के सदस्य हैं।
  • उन्होंने 17 फरवरी 2025 को हुई समिति की बैठक में ज्ञानेश कुमार के चयन की प्रक्रिया पर औपचारिक असहमति पत्र (dissent note) दर्ज कराया था।
  • अभ्यावेदन में मुख्य चुनाव आयुक्त पर SIR के दौरान शक्ति के मनमाने और एकपक्षीय प्रयोग का आरोप लगाया गया।

माँगे गए उपचार

राहुल गांधी ने मुख्य न्यायाधीश से आग्रह किया कि इस अभ्यावेदन को जनहित में पत्र याचिका (letter petition) के रूप में स्वीकार किया जाए। उनकी प्रमुख माँगें थीं:

  • निर्वाचन आयोग के पास उपलब्ध SIR संबंधी सभी अभिलेखों का पूर्ण प्रकटीकरण।
  • सर्वोच्च न्यायालय के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में एक स्वतंत्र समिति का गठन, जो SIR के दौरान लिए गए निर्णयों की समीक्षा करे और मतदाताओं के नाम हटाए जाने का अंकेक्षण करे।
  • स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए SIR प्रक्रिया पर अंतरिम रोक।

मुख्य न्यायाधीश की प्रतिक्रिया

12 अक्टूबर को मुख्य न्यायाधीश ने 10 अक्टूबर के अनुरोध का उत्तर दिया, जिसमें 11 अक्टूबर के अभ्यावेदन का कोई प्रत्यक्ष उल्लेख नहीं था। दोनों नेताओं को संबोधित इस दो पृष्ठीय उत्तर में उन्होंने अपराह्न 4 से 5 बजे के बीच ज्ञापन सौंपने हेतु समय देने से इनकार कर दिया। उत्तर के प्रमुख तर्क इस प्रकार थे:

  • विचाराधीन विषय: मुख्य चुनाव आयुक्त, निर्वाचन आयोग, मनमानी गिरफ्तारियों और रेलगाड़ियों के रद्दीकरण आदि से जुड़े मुद्दे पहले से ही न्यायालय के समक्ष विचाराधीन हैं।
  • संवैधानिक बाधा: ऐसे लंबित मामलों पर चर्चा हेतु बैठक बुलाना शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का स्पष्ट उल्लंघन होगा, जो संविधान के मूल ढाँचे का अभिन्न अंग है। यह स्थापित नैतिकता और न्यायिक औचित्य के भी प्रतिकूल होगा।
  • प्रशासनिक बनाम न्यायिक शक्ति: संविधान सर्वोच्च न्यायालय को पत्र में उठाए गए मुद्दों से प्रशासनिक स्तर पर निपटने की शक्ति प्रदान नहीं करता। किंतु न्यायिक पक्ष पर नागरिकों को प्रभावित करने वाले गंभीर मुद्दों पर विचार करना न्यायालय का कर्तव्य है।
  • मौलिक अधिकारों के प्रति प्रतिबद्धता: मुख्य न्यायाधीश ने दोहराया कि न्यायालय प्रत्येक नागरिक के मौलिक अधिकारों की रक्षा के लिए प्रतिबद्ध है और नागरिक विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के माध्यम से किसी भी समय इनके प्रवर्तन की माँग कर सकते हैं।
  • उचित मार्ग का सुझाव: उन्होंने परामर्श दिया कि प्रशासनिक पक्ष पर ज्ञापन सौंपने के बजाय सर्वोच्च न्यायालय की न्यायिक शक्तियों का आह्वान करना अधिक उपयुक्त होगा।

उन्होंने यह भी बताया कि समान मुद्दे उठाने वाली याचिकाएँ 13 अक्टूबर को सुनवाई हेतु सूचीबद्ध हैं और विधिक परामर्श के आधार पर नेता 12 अक्टूबर को याचिका दायर कर सकते हैं, जिसकी यथाशीघ्र सुनवाई विधि के अनुसार की जाएगी। तत्पश्चात राहुल गांधी ने 12 अन्य विपक्षी नेताओं के साथ रिट याचिका दायर की, जो विधिवत पंजीकृत और क्रमांकित होकर न्यायिक सुनवाई हेतु तैयार हो गई।

विधि क्या कहती है?

मुख्य न्यायाधीश के उत्तर के मूल में चार तत्व निहित हैं: शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत, विचाराधीन मामलों के नियम, न्यायिक औचित्य तथा बैंगलोर सिद्धांत।

शक्तियों का पृथक्करण

यह सिद्धांत शासन को विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच विभाजित करता है और संविधान के मूल ढाँचे का अपरिवर्तनीय अंग है। इसके निहितार्थ इस प्रकार हैं:

  • न्यायालय एक निष्पक्ष मध्यस्थ है, जिसका स्पष्ट दायित्व विवादों का निष्पक्ष निर्णय करना, विधियों को लागू करना और विधायी या कार्यकारी कृत्यों की समीक्षा केवल स्थापित न्यायिक कार्यवाही के माध्यम से करना है।
  • न्यायपालिका के पास शासन या नीति संबंधी माँगों में एकपक्षीय हस्तक्षेप करने की कार्यकारी या प्रशासनिक निगरानी शक्ति नहीं है।
  • संवैधानिक आधार की दृष्टि से अनुच्छेद 50 (राज्य के नीति निदेशक तत्व) राज्य को लोक सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक करने का निर्देश देता है।
  • राम जवाया कपूर बनाम पंजाब राज्य (1955) में सर्वोच्च न्यायालय ने माना था कि भारत में यह सिद्धांत कठोर रूप में नहीं अपनाया गया है,किंतु इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण (1975) में इसे मूल ढाँचे का भाग स्वीकार किया गया।

विचाराधीन मामले और प्राकृतिक न्याय

न्यायालय के बाहर होने वाली समानांतर बैठक विशेष रूप से इसलिए अनुचित मानी गई क्योंकि मुख्य न्यायाधीश ही CEC से संबंधित मामलों की सुनवाई करने वाली पीठ का नेतृत्व करते हैं। ऐसी बैठक प्रक्रियात्मक निष्पक्षता की भावना के प्रतिकूल होती। न्यायालय कक्ष के बाहर किसी राजनीतिक पक्ष की व्यक्तिगत बात सुनना न्यायिक निष्पक्षता को क्षति पहुँचाता है और पक्षपात की धारणा उत्पन्न करता है। प्राकृतिक न्याय की माँग है कि विवादों का निपटारा खुले न्यायालय में, पारदर्शी ढंग से, ऐसी कार्यवाही में हो जहाँ विरोधी पक्षों को समान अवसर मिले। विधिशास्त्र की प्रसिद्ध उक्ति है कि न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखना भी चाहिए।

बैंगलोर सिद्धांत और भारतीय आचार संहिता

बैंगलोर न्यायिक आचरण सिद्धांत न्यायाधीशों के लिए नैतिक मानदंड निर्धारित करते हैं, जिनमें किसी भी अनुचित कृत्य से बचना शामिल है, जो न्यायिक तटस्थता के प्रति जनता की धारणा को प्रभावित कर सकता है।

इन्हें 2001 में न्यायिक सत्यनिष्ठा सुदृढ़ीकरण समूह ने बैंगलोर में तैयार किया और 2002 में हेग में आयोजित मुख्य न्यायाधीशों की गोलमेज बैठक में अंतिम रूप दिया गया।

इनमें छह मूल्य हैं: स्वतंत्रता, निष्पक्षता, सत्यनिष्ठा, औचित्य, समानता तथा सक्षमता एवं तत्परता।

संयुक्त राष्ट्र आर्थिक एवं सामाजिक परिषद (ECOSOC) ने 2006 में इन्हें समर्थन प्रदान किया।

भारत में सर्वोच्च न्यायालय की पूर्ण पीठ ने 7 मई 1997 को “न्यायिक जीवन के मूल्यों का पुनर्कथन” (Restatement of Values of Judicial Life) अपनाया था, जो न्यायाधीशों से सार्वजनिक आचरण में संयम और दूरी की अपेक्षा करता है।

जेपीसी का समान उदाहरण

वरिष्ठ अधिवक्ता सी.यू. सिंह ने इस निर्णय को उचित ठहराते हुए स्मरण कराया कि कुछ समय पूर्व “एक राष्ट्र, एक चुनाव” विधेयक पर गठित संयुक्त संसदीय समिति (JPC) ने सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों से भेंट का प्रस्ताव रखा था। बार के सदस्यों ने तब प्रश्न उठाया था कि जब स्वयं विधेयक विचाराधीन है, तब सांसद न्यायाधीशों से कैसे मिल सकते हैं, क्योंकि इससे बनने वाला कानून भविष्य में न्यायालय के समक्ष चुनौती के रूप में आ सकता है। सिंह के अनुसार, जेपीसी पर जो मानदंड लागू हुआ, वही राहुल गांधी से भेंट पर लागू करना सैद्धांतिक रूप से उचित है।

न्यायिक औचित्य कब-कब प्रश्नों के घेरे में आया?

इतिहास बताता है कि न्यायाधीशों और राजनीतिक नेताओं के बीच निकटता ने अनेक बार न्यायिक तटस्थता पर चिंताएँ उत्पन्न की हैं:

  • गणेश चतुर्थी पूजा (2024): प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश डी.वाई. चंद्रचूड़ के आवास पर पूजा में सम्मिलित होना कार्यपालिका और न्यायपालिका की निकटता की धारणा के कारण सार्वजनिक आलोचना का विषय बना।
  • न्यायमूर्ति पी.एन. भगवती: 1980 में इंदिरा गांधी के सत्ता में लौटने पर उन्होंने बधाई पत्र भेजा था।
  • न्यायमूर्ति एम.आर. शाह: उन्होंने कथित रूप से प्रधानमंत्री मोदी को आदर्श और नायक बताया था।
  • न्यायमूर्ति अरुण मिश्रा: उन्होंने सार्वजनिक रूप से प्रधानमंत्री को बहुमुखी प्रतिभा का धनी और वैश्विक सोच के साथ स्थानीय स्तर पर कार्य करने वाला अंतरराष्ट्रीय ख्यातिप्राप्त दूरदर्शी कहा था।
  • न्यायमूर्ति रंजन गोगोई: मुख्य न्यायाधीश रहते हुए उनके निमंत्रण पर प्रधानमंत्री बिम्सटेक (BIMSTEC) सम्मेलन के अवसर पर सर्वोच्च न्यायालय परिसर आए। सेवानिवृत्ति के बाद गोगोई को राज्यसभा के लिए मनोनीत किया गया। विडंबना यह है कि गोगोई उन चार वरिष्ठ न्यायाधीशों में थे जिन्होंने जनवरी 2018 में अभूतपूर्व प्रेस वार्ता कर तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश दीपक मिश्रा के कार्यकाल में मामलों के आवंटन में कार्यपालिका के प्रभाव की आशंका व्यक्त की थी। अन्य तीन न्यायाधीश जे. चेलमेश्वर, मदन बी. लोकुर और कुरियन जोसेफ थे।

ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य: न्यायपालिका और राजनीति का तनाव

राजनीतिक सत्ता और न्यायपालिका के संबंधों का इतिहास कई बार असहज रहा है। केशवानंद भारती मामले (24 अप्रैल 1973) में 13 न्यायाधीशों की पीठ ने 7:6 के बहुमत से मूल ढाँचे का सिद्धांत प्रतिपादित किया, जिसने संसद की संशोधन शक्ति को सीमित कर दिया। इसके अगले ही दिन इंदिरा गांधी सरकार ने वरिष्ठता की परंपरा तोड़ते हुए न्यायमूर्ति जे.एम. शेलत, के.एस. हेगड़े और ए.एन. ग्रोवर की वरिष्ठता की उपेक्षा कर न्यायमूर्ति ए.एन. रे को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया। इसके विरोध में तीनों न्यायाधीशों ने तत्काल त्यागपत्र दे दिया।

दशकों बाद, न्यायिक नियुक्तियों को कार्यपालिका के प्रभाव से मुक्त रखने की आवश्यकता ने कॉलेजियम प्रणाली को जन्म दिया, जिसकी नींव द्वितीय न्यायाधीश मामले (1993) में पड़ी और तृतीय न्यायाधीश मामले (1998) में इसका विस्तार हुआ। 2015 में सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (NJAC) को असंवैधानिक घोषित कर इसी स्वतंत्रता की पुनः पुष्टि की। बैंगलोर सिद्धांतों को अपनाना भी इसी व्यापक प्रक्रिया का अंग रहा।

चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति का संदर्भ

यह प्रकरण निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता से भी गहराई से जुड़ा है। अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ (मार्च 2023) में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने निर्देश दिया था कि संसद द्वारा कानून बनाए जाने तक CEC और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और मुख्य न्यायाधीश की समिति की सलाह पर हो। तत्पश्चात संसद ने 2023 का अधिनियम पारित किया, जिसकी धारा 7 के अंतर्गत चयन समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता तथा प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री शामिल हैं। मुख्य न्यायाधीश को इस समिति से बाहर रखे जाने पर विपक्ष ने आयोग की निष्पक्षता को लेकर आपत्ति जताई थी। संविधान का अनुच्छेद 324 चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की शक्ति निर्वाचन आयोग को सौंपता है।

समालोचनात्मक मूल्यांकन

इस प्रकरण में दो वैध चिंताएँ आमने-सामने हैं। एक ओर विपक्ष की चिंता है कि मतदाता सूची की शुचिता और नागरिकों का मताधिकार लोकतंत्र की आत्मा हैं, और जब संवैधानिक संस्थाओं पर संदेह हो, तब सर्वोच्च न्यायालय अंतिम आश्रय है। दूसरी ओर संस्थागत मर्यादा का प्रश्न है, क्योंकि यदि मुख्य न्यायाधीश किसी विचाराधीन मामले के एक पक्ष से न्यायालय के बाहर मिलते, तो इससे एक ऐसी परंपरा स्थापित होती जो भविष्य में किसी भी राजनीतिक दल द्वारा दुरुपयोग की जा सकती थी।

मुख्य न्यायाधीश के उत्तर की विशेषता यह रही कि उसने विपक्ष के लिए न्याय के द्वार बंद नहीं किए, बल्कि उचित संवैधानिक मार्ग की ओर संकेत किया। अनुच्छेद 32 के अंतर्गत संवैधानिक उपचार का अधिकार स्वयं एक मौलिक अधिकार है, जिसे डॉ. भीमराव अंबेडकर ने संविधान का हृदय और आत्मा कहा था। याचिका का पंजीकृत होना और सुनवाई हेतु सूचीबद्ध होना यह दर्शाता है कि संस्थागत मर्यादा और न्याय तक पहुँच परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक हैं।

निष्कर्ष

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत का निर्णय न्यायपालिका की निष्पक्षता की उस परंपरा को पुष्ट करता है, जिसमें न्यायाधीश अपने निर्णयों के माध्यम से बोलते हैं, व्यक्तिगत भेंटों के माध्यम से नहीं। न्यायपालिका की वैधता उसकी शक्ति से अधिक जनता के विश्वास पर टिकी होती है, और यह विश्वास तभी अक्षुण्ण रहता है जब न्यायालय प्रत्येक पक्ष से समान दूरी बनाए रखे। साथ ही, यह प्रकरण निर्वाचन आयोग जैसी संस्थाओं की विश्वसनीयता सुदृढ़ करने की आवश्यकता की ओर भी संकेत करता है, ताकि राजनीतिक दलों को न्यायपालिका के समक्ष असाधारण अनुरोध करने की आवश्यकता ही न पड़े।

वन लाइनर फैक्ट्स फॉर रिवीजन

  1. मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने CEC ज्ञानेश कुमार के विरुद्ध आरोपों पर विपक्ष से भेंट करने से इनकार किया।
  2. विपक्ष का संयुक्त पत्र 10 अक्टूबर को और राहुल गांधी का विस्तृत अभ्यावेदन 11 अक्टूबर को भेजा गया।
  3. मुख्य न्यायाधीश ने 12 अक्टूबर को दो पृष्ठीय उत्तर दिया।
  4. राहुल गांधी ने 12 अन्य विपक्षी नेताओं के साथ रिट याचिका दायर की।
  5. CEC चयन समिति का प्रावधान 2023 अधिनियम की धारा 7 में है।
  6. ज्ञानेश कुमार के चयन हेतु बैठक 17 फरवरी 2025 को हुई थी।
  7. चयन समिति: प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित कैबिनेट मंत्री।
  8. अनूप बरनवाल मामला (2023) ने अंतरिम रूप से CJI को चयन समिति में शामिल किया था।
  9. अनुच्छेद 50 न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक करने का निदेशक तत्व है।
  10. अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को चुनावों का अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण सौंपता है।
  11. बैंगलोर न्यायिक आचरण सिद्धांत 2002 में अंतिम रूप से स्वीकृत हुए; इनमें छह मूल्य हैं।
  12. ECOSOC ने 2006 में बैंगलोर सिद्धांतों का समर्थन किया।
  13. “न्यायिक जीवन के मूल्यों का पुनर्कथन” 7 मई 1997 को अपनाया गया।
  14. केशवानंद भारती (1973) में 13 न्यायाधीशों की पीठ ने 7:6 से मूल ढाँचा सिद्धांत दिया।
  15. 1973 में ए.एन. रे की नियुक्ति के लिए शेलत, हेगड़े और ग्रोवर की वरिष्ठता की उपेक्षा हुई।
  16. जनवरी 2018 की प्रेस वार्ता में चेलमेश्वर, गोगोई, लोकुर और कुरियन जोसेफ शामिल थे।
  17. NJAC को 2015 में असंवैधानिक घोषित किया गया।

अभ्यास प्रश्न

प्रश्न 1. न्यायिक आचरण के बैंगलोर सिद्धांतों के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-से मूल्य इनमें सम्मिलित हैं?

  1. स्वतंत्रता
  2. निष्पक्षता
  3. पारदर्शिता
  4. औचित्य

(a) केवल 1, 2 और 3

(b) केवल 1, 2 और 4

(c) केवल 2, 3 और 4

(d) 1, 2, 3 और 4

उत्तर: (b)

प्रश्न 2. मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा शर्तें और पदावधि) अधिनियम, 2023 के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. चयन समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश सदस्य हैं।
  2. चयन समिति में लोकसभा में विपक्ष के नेता सदस्य हैं।
  3. चयन समिति में प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री सदस्य होता है।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2 और 3

(c) केवल 1 और 3

(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (b)

प्रश्न 3. भारतीय संविधान का कौन-सा अनुच्छेद राज्य को लोक सेवाओं में न्यायपालिका को कार्यपालिका से पृथक करने के लिए कदम उठाने का निर्देश देता है?

(a) अनुच्छेद 44

(b) अनुच्छेद 48

(c) अनुच्छेद 50

(d) अनुच्छेद 51

उत्तर: (c)

प्रश्न 4. 1973 में न्यायमूर्ति ए.एन. रे को भारत का मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करते समय निम्नलिखित में से किन न्यायाधीशों की वरिष्ठता की उपेक्षा की गई थी?

  1. जे.एम. शेलत
  2. के.एस. हेगड़े
  3. ए.एन. ग्रोवर
  4. एच.आर. खन्ना

नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

(a) केवल 1, 2 और 3

(b) केवल 2, 3 और 4

(c) केवल 1 और 4

(d) 1, 2, 3 और 4

उत्तर: (a)

प्रश्न 5. केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मामले के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. इस मामले की सुनवाई 13 न्यायाधीशों की पीठ ने की थी।
  2. इसमें मूल ढाँचे का सिद्धांत 7:6 के बहुमत से प्रतिपादित हुआ।

उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1 और न ही 2

उत्तर: (c)


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