विदेश नीति में, नए अवसरों की तलाश करते हुए भी विश्वसनीय साझेदारियों को मजबूत बनाए रखने का कोई विकल्प नहीं होता।
प्रधानमंत्री मोदी का इस सप्ताह यूरोप जाते समय संयुक्त अरब अमीरात में संक्षिप्त प्रवास ऐसे समय में हुआ है, जब अमेरिका और ईरान के बीच नाज़ुक युद्धविराम को लेकर अनिश्चितता बढ़ रही है।
अबू धाबी में उनकी उपस्थिति सुदृढ़ कूटनीति के एक स्थायी सिद्धांत को रेखांकित करती है:
जब आपके साझेदारों को आपकी आवश्यकता हो, तब उनके साथ खड़े रहें।
असाधारण अंतरराष्ट्रीय उथल-पुथल के दौर में भारत का मार्गदर्शन करने वाले पाँच सिद्धांत
1. पारस्परिकता (Reciprocity)
- यूएई ने कश्मीर और सीमा-पार आतंकवाद सहित भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दों पर लगातार भारत का समर्थन किया है।
- प्रधानमंत्री की यह यात्रा संकेत देती है कि भारत भी ऐसे समय में अमीरात के साथ खड़ा है, जब उसकी सुरक्षा पर खतरा बढ़ गया है।
2. विविधीकरण (Diversification)
- प्रधानमंत्री की यूरोप यात्रा यह दर्शाती है कि यूरोप के साथ भारत की भागीदारी कितनी विकसित हो चुकी है।
- शीत युद्ध के दौरान, भारत का यूरोप के प्रति दृष्टिकोण अक्सर सोवियत संघ के साथ उसके घनिष्ठ संबंधों से प्रभावित रहता था।
- अब यूरोप भारत के लिए निर्यात बाज़ार, पूंजी, उन्नत तकनीक और हरित ऊर्जा साझेदारियों की खोज का एक केंद्रीय क्षेत्र बन चुका है।
- यूरोपीय संघ तथा यूरोपीय मुक्त व्यापार संघ के साथ व्यापार समझौतों का निष्कर्ष भारत द्वारा यूरोप के प्रति विकसित नई रणनीतिक समझ का प्रतीक है।
3. रणनीतिक लचीलापन (Strategic Flexibility)
- यूरोप के प्रति भारत की सक्रियता ऐसे समय में हो रही है, जब महाशक्ति राजनीति की वापसी हो रही है और अमेरिका, यूरोप, रूस तथा चीन के बीच संबंधों में तीव्र पुनर्गठन चल रहा है।
- भारत के सामने चुनौती है कि वह अपने हितों की रक्षा करे, नकारात्मक प्रभावों को सीमित करे और नए अवसरों का लाभ उठाए।
- भारत के लिए मुख्य ज़ोर व्यावहारिक हित-साधना पर बना रहना चाहिए।

4. रणनीतिक विस्तार (Strategic Expansion)
- महीने के अंत में होने वाला भारत-अफ्रीका शिखर सम्मेलन ऐसे क्षेत्र को रेखांकित करता है, जिसका महत्व आने वाले दशकों में भारत के लिए लगातार बढ़ेगा।
- अफ्रीका वैश्विक अर्थव्यवस्था के भविष्य का केंद्र है। उसकी युवा आबादी, विस्तृत बाज़ार और महत्वपूर्ण खनिज संसाधनों की प्रचुरता विश्व की प्रमुख शक्तियों का ध्यान आकर्षित कर रही है।
- महाद्वीप के कुछ हिस्से भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा के महत्वपूर्ण केंद्र भी बनते जा रहे हैं।
- अब इस संबंध को व्यापार, निवेश, संपर्क व्यवस्था और सुरक्षा सहयोग पर अधिक रणनीतिक ध्यान देने की आवश्यकता है।
5. घरेलू पुनर्नवीकरण (Domestic Renewal)
- भू-राजनीतिक अस्थिरता के प्रभावों, वैश्विक व्यापार के पुनर्गठन और विघटनकारी प्रौद्योगिकियों के उदय का सामना करने के लिए तीव्र आंतरिक सुधार आवश्यक हैं।
- परिवर्तन के प्रति नौकरशाही प्रतिरोध और यथास्थिति के प्रति राजनीतिक सहजता अभी भी बड़े अवरोध बने हुए हैं।
निष्कर्ष
भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता, आर्थिक अनिश्चितता, तकनीकी बदलाव और बदलते वैश्विक समीकरणों के इस युग में भारत की विदेश नीति को व्यावहारिक और बहुआयामी दृष्टिकोण द्वारा निर्देशित होना चाहिए।
अंततः, विकसित हो रही अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को आकार देने और उससे लाभ प्राप्त करने की भारत की क्षमता केवल विदेशों में कूटनीतिक सक्रियता पर ही नहीं, बल्कि देश के भीतर निरंतर आर्थिक और संस्थागत परिवर्तन पर भी निर्भर करेगी।
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