प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आगामी जी-7 शिखर सम्मेलन में भाग लेने के लिए फ्रांस जा रहे हैं। यह केवल एक नियमित कूटनीतिक यात्रा नहीं है, बल्कि वैश्विक मंच पर भारत की बढ़ती भूमिका और बदलती अंतरराष्ट्रीय स्थिति का प्रतीक भी है। एक समय ऐसा था जब भारत को जी-7 बैठकों में केवल आमंत्रित अतिथि के रूप में बुलाया जाता था, लेकिन आज भारत इस समूह के लिए एक अनिवार्य रणनीतिक साझेदार बन चुका है। यह परिवर्तन भारत की आर्थिक शक्ति, कूटनीतिक सक्रियता, तकनीकी प्रगति और वैश्विक दक्षिण के नेतृत्व की क्षमता का परिणाम है।
जी-7 से भारत का जुड़ाव : एक संक्षिप्त पृष्ठभूमि
भारत और जी-7 के बीच औपचारिक संपर्क की शुरुआत वर्ष 2003 में हुई थी, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी को फ्रांस में आयोजित जी-8 सम्मेलन में आमंत्रित किया गया था। इसके बाद प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को भी पाँच बार आमंत्रित किया गया।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में भारत की उपस्थिति और अधिक सशक्त हुई। 2019 के बाद से लगभग प्रत्येक वर्ष भारत को जी-7 शिखर सम्मेलन में आमंत्रित किया गया है। यह इस तथ्य को दर्शाता है कि विश्व की प्रमुख औद्योगिक अर्थव्यवस्थाएँ भारत को वैश्विक मामलों में एक महत्वपूर्ण भागीदार के रूप में देखने लगी हैं।
जी-7 का विकास और बदलता वैश्विक परिदृश्य
जी-7 का गठन मूलतः विश्व की प्रमुख विकसित अर्थव्यवस्थाओं के समूह के रूप में हुआ था।
जी-7 के सदस्य
- संयुक्त राज्य अमेरिका
- यूनाइटेड किंगडम
- जर्मनी
- फ्रांस
- इटली
- जापान
- कनाडा
1975 में यह समूह जी-6 के रूप में शुरू हुआ था। 1976 में कनाडा के जुड़ने से यह जी-7 बना। 1998 में रूस को शामिल कर इसे जी-8 बनाया गया, किंतु 2014 में क्रीमिया के विलय के बाद रूस को बाहर कर दिया गया और समूह पुनः जी-7 बन गया।
एक समय था जब जी-8 वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) के लगभग दो-तिहाई हिस्से का प्रतिनिधित्व करता था। परंतु पिछले दो दशकों में वैश्विक आर्थिक संतुलन में बड़ा बदलाव आया है।
वैश्विक शक्ति-संतुलन में परिवर्तन
- चीन एक प्रमुख आर्थिक शक्ति बनकर उभरा।
- भारत विश्व की अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल हुआ।
- आसियान देशों का महत्व बढ़ा।
- इंडोनेशिया जैसे देशों ने वैश्विक आर्थिक संरचना में नई जगह बनाई।
इन परिवर्तनों के कारण वैश्विक GDP में जी-7 की हिस्सेदारी घटकर लगभग 40 प्रतिशत के आसपास रह गई है।
फिर भी जी-7 का प्रभाव आज भी अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह समूह निम्न क्षेत्रों में अग्रणी है—
- उन्नत प्रौद्योगिकी
- रक्षा क्षमता
- हरित नवाचार
- साइबर सुरक्षा
- वैश्विक वित्तीय संस्थाएँ
भारत क्यों बन रहा है जी-7 का अनिवार्य साझेदार?
विश्व की स्थिर लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं और तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में भारत का विशेष स्थान है।
भारत की प्रमुख शक्तियाँ हैं—
- विशाल और युवा जनसंख्या
- मजबूत तकनीकी क्षमता
- कुशल मानव संसाधन
- तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था
- डिजिटल नवाचार
- वैश्विक दक्षिण की आवाज़ के रूप में उभरती भूमिका
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत स्वयं को “ग्लोबल साउथ” के प्रतिनिधि के रूप में स्थापित करने में सफल रहा है। यही कारण है कि जी-7 के लिए भारत का महत्व लगातार बढ़ रहा है।
यूरोपीय संघ (EU) की उपस्थिति भी भारत के लिए विशेष महत्व रखती है। जी-7 में शामिल चार यूरोपीय देशों के अतिरिक्त यूरोपीय संघ की भागीदारी यूरोप को सम्मेलन में और अधिक प्रभावशाली बनाती है। इसलिए भारत-यूरोप संबंधों को नई गति मिली है।
भारत-यूरोप संबंधों का नया आयाम : इंडो-मेडिटरेनियन दृष्टिकोण
पिछले एक दशक में भारत की विदेश नीति में उल्लेखनीय परिवर्तन आया है। इसका सबसे महत्वपूर्ण आयाम यूरोप के प्रति भारत की नई रणनीतिक सोच है।
इस नई सोच का केंद्र है—
“इंडो-मेडिटरेनियन” अवधारणा
यह एक उभरता हुआ भू-रणनीतिक ढाँचा है जो:
- हिंद महासागर को यूरोप से जोड़ता है।
- व्यापार, ऊर्जा और संपर्क को नई दिशा देता है।
- भारत और यूरोप के बीच रणनीतिक एकीकरण को बढ़ाता है।
इस अवधारणा को 2023 में विशेष बल मिला जब भारत, जी-20 और यूरोपीय देशों ने मिलकर इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC) की शुरुआत की।
रोम यात्रा और इंडो-मेडिटरेनियन विचार का विस्तार
मई 2025 में प्रधानमंत्री मोदी ने रोम की यात्रा के दौरान इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के साथ एक संयुक्त लेख लिखा।
उस लेख में उन्होंने कहा कि विश्व एक नए “इंडो-मेडिटरेनियन युग” के उदय का साक्षी बन रहा है।
यह क्षेत्र निम्न कारणों से महत्वपूर्ण माना गया—
- व्यापार के लिए प्रमुख गलियारा
- प्रौद्योगिकी सहयोग का केंद्र
- ऊर्जा आपूर्ति का माध्यम
- डेटा और डिजिटल संपर्क का नेटवर्क
- हिंद महासागर और यूरोप को जोड़ने वाला रणनीतिक पुल
इतिहास भी इस अवधारणा को मजबूत आधार प्रदान करता है। भारत के भूमध्यसागरीय और अरब जगत से प्राचीन काल से व्यापारिक तथा सांस्कृतिक संबंध रहे हैं।
ऐतिहासिक संबंधों के प्रमुख आधार
- मसालों का व्यापार
- वस्त्रों का निर्यात
- बहुमूल्य रत्नों का आदान-प्रदान
- समुद्री संपर्क
- सांस्कृतिक आदान-प्रदान
इंडो-मेडिटरेनियन अवधारणा को इन ऐतिहासिक संबंधों का आधुनिक रूप माना जा सकता है।
भारत और यूरोप की परस्पर आवश्यकताएँ
भारत को यूरोप की आवश्यकता क्यों है?
प्रधानमंत्री मोदी आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना को आगे बढ़ा रहे हैं। विशेष रूप से:
- डीप-टेक क्षेत्र का विकास
- उच्च स्तरीय विनिर्माण
- औद्योगीकरण का विस्तार
- रोजगार सृजन
इन लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए भारत को आवश्यकता है—
- पूंजी निवेश
- अत्याधुनिक तकनीक
- नवाचार सहयोग
- अनुसंधान एवं विकास साझेदारी
यूरोप इन सभी क्षेत्रों में भारत का महत्वपूर्ण सहयोगी बन सकता है।
यूरोप को भारत की आवश्यकता क्यों है?
यूरोप के सामने भी कई रणनीतिक चुनौतियाँ हैं।
यूरोप को चाहिए—
- बड़ा और गतिशील बाजार
- विश्वसनीय साझेदार
- वैश्विक दक्षिण से संपर्क
- हिंद महासागर क्षेत्र में सहयोग
भारत इन सभी आवश्यकताओं को पूरा करने की क्षमता रखता है।
IMEC और पश्चिम एशिया का महत्व
इंडिया-मिडिल ईस्ट-यूरोप इकोनॉमिक कॉरिडोर (IMEC) की सफलता काफी हद तक पश्चिम एशिया की स्थिरता पर निर्भर करती है।
इस परियोजना के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण हैं—
- संयुक्त अरब अमीरात (UAE)
- सऊदी अरब
हालाँकि क्षेत्रीय भू-राजनीतिक परिस्थितियाँ चुनौतियाँ भी प्रस्तुत करती हैं।

संभावित चुनौतियाँ
- पाकिस्तान की भूमिका
- सऊदी अरब की क्षेत्रीय प्राथमिकताएँ
- तुर्की की रणनीतिक महत्वाकांक्षाएँ
- मिस्र की भू-राजनीतिक स्थिति
यदि ये देश वैकल्पिक व्यवस्थाएँ विकसित करते हैं तो IMEC की प्रगति प्रभावित हो सकती है।
बेल्ट एंड रोड पहल के विकल्प के रूप में इंडो-मेडिटरेनियन दृष्टि
चीन की बेल्ट एंड रोड पहल (BRI) वर्तमान वैश्विक संपर्क परियोजनाओं में सबसे प्रभावशाली पहलों में से एक रही है।
इंडो-मेडिटरेनियन दृष्टिकोण को इसके संभावित विकल्प के रूप में देखा जा रहा है क्योंकि यह—
- बहुपक्षीय सहयोग पर आधारित है।
- लोकतांत्रिक देशों को जोड़ता है।
- भारत और यूरोप की संयुक्त भागीदारी को बढ़ावा देता है।
- हिंद महासागर से अटलांटिक तक एक विस्तृत रणनीतिक क्षेत्र की कल्पना करता है।
दीर्घकाल में यह पहल एक ऐसे “इंडो-अटलांटिक” रणनीतिक क्षेत्र की नींव रख सकती है जो वैश्विक शक्ति-संतुलन और भू-राजनीतिक समीकरणों को पुनर्परिभाषित कर सके।
जी-7 में भारत की उपस्थिति का वास्तविक महत्व
भारत की लगातार जी-7 बैठकों में भागीदारी केवल प्रतीकात्मक उपलब्धि नहीं है।
यह दर्शाती है कि:
- भारत अब वैश्विक व्यवस्था का परिधीय देश नहीं रहा।
- भारत उभरती विश्व व्यवस्था का केंद्रीय खिलाड़ी बन चुका है।
- वैश्विक आर्थिक और राजनीतिक निर्णयों में भारत की भूमिका बढ़ रही है।
- भारत वैश्विक दक्षिण और विकसित देशों के बीच सेतु का कार्य कर रहा है।
- भारत नई भू-राजनीतिक संरचनाओं के निर्माण में सक्रिय भागीदार है।
निष्कर्ष
जी-7 में भारत की यात्रा एक आमंत्रित अतिथि से रणनीतिक साझेदार बनने की कहानी है। यह परिवर्तन केवल आर्थिक वृद्धि का परिणाम नहीं, बल्कि भारत की परिपक्व विदेश नीति, वैश्विक नेतृत्व क्षमता, तकनीकी उन्नति और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में उसकी बढ़ती भूमिका का प्रमाण है। इंडो-मेडिटरेनियन दृष्टिकोण, IMEC जैसी परियोजनाएँ और यूरोप के साथ गहराते संबंध इस बात का संकेत हैं कि आने वाले वर्षों में भारत केवल क्षेत्रीय शक्ति नहीं रहेगा, बल्कि वैश्विक भू-राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था को आकार देने वाली प्रमुख शक्तियों में से एक होगा।
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