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गेब्रियल आल्मंड एवं सिडनी वर्बा का राजनीतिक संस्कृति सिद्धांत

बीसवीं शताब्दी के मध्य तक तुलनात्मक राजनीति (Comparative Politics) का अध्ययन मुख्यतः संवैधानिक व्यवस्थाओं, सरकारी संस्थाओं और औपचारिक राजनीतिक संरचनाओं तक सीमित था। यह माना जाता था कि किसी देश की राजनीतिक व्यवस्था को समझने के लिए उसके संविधान, विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका का अध्ययन पर्याप्त है। किंतु द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद अनेक नवस्वतंत्र देशों के अनुभवों ने स्पष्ट किया कि समान संवैधानिक संस्थाएँ होने के बावजूद विभिन्न देशों में लोकतंत्र की सफलता और असफलता अलग-अलग रही। इससे राजनीतिक वैज्ञानिकों का ध्यान उन सामाजिक और मनोवैज्ञानिक कारकों की ओर गया जो नागरिकों के राजनीतिक व्यवहार को प्रभावित करते हैं।

इसी पृष्ठभूमि में व्यवहारवादी उपागम (Behavioural Approach) का विकास हुआ, जिसने राजनीतिक संस्थाओं के साथ-साथ व्यक्तियों के राजनीतिक व्यवहार, दृष्टिकोण, विश्वास, मूल्य और अभिमुखीकरण के अध्ययन पर बल दिया। इस उपागम के अंतर्गत राजनीतिक संस्कृति (Political Culture) की अवधारणा विकसित हुई, जिसने तुलनात्मक राजनीति को एक नया आयाम प्रदान किया।

गेब्रियल आल्मंड एवं सिडनी वर्बा : परिचय

गेब्रियल अब्राहम आल्मंड (1911–2002) अमेरिका के प्रसिद्ध राजनीतिक वैज्ञानिक थे। उन्होंने तुलनात्मक राजनीति, राजनीतिक विकास, संरचनात्मक-कार्यात्मक उपागम (Structural-Functional Approach) तथा राजनीतिक संस्कृति के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। वे आधुनिक तुलनात्मक राजनीति के प्रमुख प्रवर्तकों में गिने जाते हैं।

सिडनी वर्बा (1932–2019) भी अमेरिकी राजनीतिक वैज्ञानिक थे, जिन्होंने राजनीतिक सहभागिता, लोकतंत्र, नागरिक संस्कृति तथा राजनीतिक व्यवहार पर व्यापक शोध किया। उन्होंने आल्मंड के साथ मिलकर राजनीतिक संस्कृति के सिद्धांत को विकसित किया।

दोनों विद्वानों ने 1959–1960 के दौरान पाँच देशों—संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, पश्चिम जर्मनी, इटली और मेक्सिको—में व्यापक सर्वेक्षण किया। इस अध्ययन का उद्देश्य यह समझना था कि लोकतंत्र की सफलता के पीछे नागरिकों की राजनीतिक मानसिकता और सांस्कृतिक अभिमुखीकरण की क्या भूमिका होती है। इसी शोध के आधार पर 1963 में The Civic Culture प्रकाशित हुई, जिसने राजनीतिक संस्कृति को तुलनात्मक राजनीति की केंद्रीय अवधारणा बना दिया।

राजनीतिक संस्कृति की अवधारणा

राजनीतिक संस्कृति से आशय उन विश्वासों, मूल्यों, भावनाओं, अभिवृत्तियों तथा मान्यताओं से है, जिनके आधार पर नागरिक राजनीतिक व्यवस्था को समझते हैं, उसका मूल्यांकन करते हैं तथा उसमें भाग लेते हैं।

आल्मंड और वर्बा के अनुसार राजनीतिक संस्कृति केवल राजनीतिक ज्ञान तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें नागरिकों की भावनात्मक प्रतिबद्धता, राजनीतिक विश्वास, सत्ता के प्रति दृष्टिकोण तथा लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं में भागीदारी की प्रवृत्ति भी सम्मिलित होती है। दूसरे शब्दों में, राजनीतिक संस्कृति किसी समाज की सामूहिक राजनीतिक चेतना का स्वरूप है।

राजनीतिक संस्कृति किसी राष्ट्र के ऐतिहासिक अनुभवों, सामाजिक संरचना, शिक्षा, धर्म, परंपराओं, आर्थिक विकास तथा राजनीतिक समाजीकरण की प्रक्रियाओं से निर्मित होती है। इसलिए दो देशों की राजनीतिक संस्थाएँ समान होने पर भी उनकी राजनीतिक संस्कृति भिन्न हो सकती है।

उदाहरण के लिए, संसदीय शासन प्रणाली ब्रिटेन और भारत दोनों में है, किंतु दोनों देशों की राजनीतिक संस्कृति, राजनीतिक सहभागिता तथा राजनीतिक व्यवहार में उल्लेखनीय अंतर दिखाई देता है। यही कारण है कि राजनीतिक संस्कृति राजनीतिक व्यवस्था के वास्तविक संचालन को समझने का महत्वपूर्ण माध्यम बन जाती है।

राजनीतिक संस्कृति की प्रमुख विशेषताएँ:

  • यह राजनीतिक व्यवस्था के प्रति नागरिकों की मानसिक एवं मनोवैज्ञानिक अभिवृत्तियों का समुच्चय है।
  • इसमें ज्ञान (Knowledge), भावना (Emotion) तथा मूल्यांकन (Evaluation) तीनों तत्व सम्मिलित होते हैं।
  • यह प्रत्येक समाज के ऐतिहासिक एवं सामाजिक अनुभवों से विकसित होती है।
  • राजनीतिक संस्कृति स्थिर नहीं होती, बल्कि समय, शिक्षा, संचार, आर्थिक विकास तथा राजनीतिक परिवर्तनों के साथ बदलती रहती है।
  • यह राजनीतिक संस्थाओं की कार्यक्षमता तथा लोकतंत्र की स्थिरता को प्रभावित करती है।
  • यह राजनीतिक समाजीकरण की प्रक्रिया के माध्यम से एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतरित होती है।
  • किसी देश की राजनीतिक संस्कृति उसकी राजनीतिक स्थिरता, नागरिक सहभागिता तथा शासन की वैधता को प्रभावित करती है।

आल्मंड और वर्बा के अनुसार राजनीतिक संस्कृति के आधारभूत तत्व:

  1. राजनीतिक ज्ञान
  2. राजनीतिक भावनाएँ
  3. राजनीतिक मूल्य

इन्हीं तीनों के आधार पर नागरिक किसी राजनीतिक व्यवस्था के प्रति अपना दृष्टिकोण विकसित करते हैं।

राजनीतिक अभिमुखीकरण (Political Orientation)

आल्मंड और वर्बा के सिद्धांत का सबसे महत्वपूर्ण भाग Political Orientation है। उनके अनुसार नागरिकों की राजनीतिक संस्कृति को समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि वे राजनीतिक व्यवस्था के प्रति किस प्रकार अभिमुख (Orient) हैं।उन्होंने राजनीतिक अभिमुखीकरण को तीन भागों में विभाजित किया—

1. संज्ञानात्मक अभिमुखीकरण (Cognitive Orientation)

  • संज्ञानात्मक अभिमुखीकरण से आशय राजनीतिक व्यवस्था के संबंध में नागरिकों के ज्ञान, सूचना तथा समझ से है।
  • इसमें नागरिकों का संविधान, सरकार, संसद, न्यायपालिका, चुनाव, राजनीतिक दल, सार्वजनिक नीतियों तथा प्रशासनिक संस्थाओं के बारे में ज्ञान सम्मिलित होता है।
  • यदि नागरिकों को राजनीतिक संस्थाओं की पर्याप्त जानकारी है तो उनका संज्ञानात्मक अभिमुखीकरण उच्च माना जाएगा। इसके विपरीत, राजनीतिक जानकारी का अभाव निम्न संज्ञानात्मक अभिमुखीकरण को दर्शाता है।
  • उदाहरण के लिए, यदि कोई नागरिक यह जानता है कि संसद कानून बनाती है, निर्वाचन आयोग चुनाव कराता है तथा सर्वोच्च न्यायालय संविधान का संरक्षक है, तो उसका संज्ञानात्मक अभिमुखीकरण विकसित माना जाएगा।

2. भावात्मक अभिमुखीकरण (Affective Orientation)

  • भावात्मक अभिमुखीकरण से आशय नागरिकों की राजनीतिक व्यवस्था के प्रति भावनात्मक प्रतिक्रिया से है।
  • यह बताता है कि नागरिक सरकार, संविधान, राष्ट्रीय प्रतीकों, लोकतांत्रिक संस्थाओं तथा राजनीतिक नेतृत्व के प्रति सम्मान, विश्वास, गर्व, निष्ठा अथवा असंतोष जैसी भावनाएँ रखते हैं।
  • यदि नागरिक लोकतांत्रिक संस्थाओं पर विश्वास करते हैं तथा उन्हें अपनी राजनीतिक व्यवस्था पर गर्व है, तो उनका भावात्मक अभिमुखीकरण सकारात्मक माना जाएगा। इसके विपरीत, यदि नागरिक राजनीतिक व्यवस्था के प्रति अविश्वास, भय या निराशा अनुभव करते हैं, तो यह नकारात्मक भावात्मक अभिमुखीकरण का संकेत है।

3. मूल्यांकनात्मक अभिमुखीकरण (Evaluative Orientation)

  • मूल्यांकनात्मक अभिमुखीकरण का अर्थ है कि नागरिक राजनीतिक व्यवस्था का मूल्यांकन अपने नैतिक मूल्यों, आदर्शों, अनुभवों तथा अपेक्षाओं के आधार पर किस प्रकार करते हैं।
  • इसमें नागरिक यह निर्णय लेते हैं कि सरकार की नीतियाँ उचित हैं या नहीं, शासन उत्तरदायी है या नहीं, न्यायपालिका निष्पक्ष है या नहीं तथा लोकतांत्रिक संस्थाएँ प्रभावी ढंग से कार्य कर रही हैं या नहीं।
  • यह अभिमुखीकरण नागरिकों के राजनीतिक निर्णयों, मतदान व्यवहार तथा शासन के प्रति समर्थन या विरोध को प्रभावित करता है।

तीनों अभिमुखीकरणों का पारस्परिक संबंध:

आल्मंड और वर्बा के अनुसार ये तीनों अभिमुखीकरण एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। यदि किसी नागरिक को राजनीतिक व्यवस्था का पर्याप्त ज्ञान है (संज्ञानात्मक), वह उसके प्रति सकारात्मक भावना रखता है (भावात्मक) और उसका संतुलित मूल्यांकन करता है (मूल्यांकनात्मक), तो उसकी राजनीतिक संस्कृति अधिक परिपक्व एवं लोकतांत्रिक मानी जाती है।

इसी प्रकार यदि किसी समाज के अधिकांश नागरिकों में इन तीनों प्रकार के अभिमुखीकरण संतुलित रूप से विकसित हों, तो वहाँ लोकतंत्र की सफलता की संभावना अधिक होती है।

राजनीतिक वस्तुएँ (Political Objects)

राजनीतिक अभिमुखीकरण (Political Orientation) को समझने के लिए केवल यह जानना पर्याप्त नहीं है कि नागरिकों का ज्ञान, भावना और मूल्यांकन किस स्तर का है। यह भी आवश्यक है कि उनका यह अभिमुखीकरण किसके प्रति है। आल्मंड एवं वर्बा ने इन्हें Political Objects (राजनीतिक वस्तुएँ/राजनीतिक संदर्भ बिंदु) कहा है।

राजनीतिक वस्तुओं से आशय राजनीतिक व्यवस्था के उन घटकों से है जिनके प्रति नागरिक अपनी राजनीतिक धारणाएँ विकसित करते हैं। इनके आधार पर यह समझा जा सकता है कि नागरिक राजनीतिक व्यवस्था को किस सीमा तक जानते हैं, उससे भावनात्मक रूप से जुड़े हैं तथा उसका मूल्यांकन कैसे करते हैं।

आल्मंड एवं वर्बा ने राजनीतिक वस्तुओं को चार प्रमुख वर्गों में विभाजित किया है—

1. राजनीतिक व्यवस्था (Political System)

यह संपूर्ण राजनीतिक व्यवस्था का प्रतिनिधित्व करती है। इसमें संविधान, राज्य, शासन प्रणाली, राष्ट्रीय प्रतीक, राजनीतिक परंपराएँ तथा राष्ट्रीय पहचान सम्मिलित होती हैं।

यदि नागरिक अपने संविधान, लोकतांत्रिक व्यवस्था तथा राष्ट्रीय संस्थाओं के प्रति सम्मान और विश्वास रखते हैं, तो यह राजनीतिक व्यवस्था के प्रति सकारात्मक अभिमुखीकरण को दर्शाता है।

2. निवेश संरचनाएँ (Input Objects)

इनसे आशय उन संस्थाओं एवं प्रक्रियाओं से है जिनके माध्यम से नागरिक अपनी माँगों, हितों तथा अपेक्षाओं को राजनीतिक व्यवस्था तक पहुँचाते हैं।इनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं—

  • राजनीतिक दल
  • हित समूह (Interest Groups)
  • दबाव समूह (Pressure Groups)
  • चुनाव
  • जनमत
  • मीडिया
  • सामाजिक आंदोलन

लोकतांत्रिक व्यवस्था में इन संस्थाओं की प्रभावशीलता नागरिकों की राजनीतिक सहभागिता को बढ़ाती है।

3. निर्गत संरचनाएँ (Output Objects)

ये वे संस्थाएँ हैं जो राजनीतिक निर्णयों को लागू करती हैं तथा नागरिकों तक नीतियों का क्रियान्वयन सुनिश्चित करती हैं।इनमें शामिल हैं—

  • विधायिका
  • कार्यपालिका
  • न्यायपालिका
  • प्रशासनिक तंत्र
  • सार्वजनिक नीतियाँ

यदि नागरिक सरकार की नीतियों, न्यायपालिका की निष्पक्षता तथा प्रशासन की कार्यक्षमता पर विश्वास रखते हैं, तो निर्गत संरचनाओं के प्रति उनका सकारात्मक अभिमुखीकरण माना जाता है।

4. स्वयं एक राजनीतिक अभिनेता के रूप में (Self as a Political Actor)

यह आल्मंड एवं वर्बा के सिद्धांत का अत्यंत महत्वपूर्ण पक्ष है।

इसका आशय यह है कि नागरिक स्वयं को राजनीतिक प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार मानते हैं या नहीं।यदि नागरिक यह अनुभव करते हैं कि—

  • उनका मत (Vote) महत्वपूर्ण है,
  • वे सरकार को प्रभावित कर सकते हैं,
  • वे राजनीतिक निर्णयों में भाग ले सकते हैं,
  • लोकतंत्र उनके अधिकारों की रक्षा करता है,

तो उनका “Self as Political Actor” अभिमुखीकरण विकसित माना जाता है।यही लोकतांत्रिक नागरिक संस्कृति (Civic Culture) का आधार बनता है।

राजनीतिक संस्कृति के प्रकार:

आल्मंड एवं वर्बा ने राजनीतिक संस्कृति को नागरिकों की राजनीतिक सहभागिता तथा राजनीतिक अभिमुखीकरण के आधार पर तीन प्रकारों में वर्गीकृत किया है।

1. पारोचियल राजनीतिक संस्कृति (Parochial Political Culture)

यह राजनीतिक संस्कृति का सबसे प्रारंभिक एवं अविकसित रूप है।

इस प्रकार की संस्कृति में नागरिकों का राजनीतिक व्यवस्था से बहुत कम या लगभग कोई संबंध नहीं होता। उन्हें सरकार, संविधान, चुनाव, राजनीतिक दल या प्रशासनिक संस्थाओं के बारे में पर्याप्त जानकारी नहीं होती।

उनकी पहचान मुख्यतः परिवार, जनजाति, जाति, कबीले या स्थानीय समुदाय तक सीमित रहती है।

प्रमुख विशेषताएँ:

  • राजनीतिक जागरूकता अत्यंत कम।
  • राष्ट्रीय राजनीति में रुचि का अभाव।
  • राजनीतिक सहभागिता नगण्य।
  • स्थानीय परंपराओं का प्रभुत्व।
  • आधुनिक राजनीतिक संस्थाओं के प्रति उदासीनता।

उदाहरण:

आल्मंड एवं वर्बा ने इस प्रकार की संस्कृति को मुख्यतः पारंपरिक एवं जनजातीय समाजों से जोड़ा, जहाँ आधुनिक राज्य व्यवस्था का प्रभाव सीमित होता है।

2. सब्जेक्ट राजनीतिक संस्कृति (Subject Political Culture)

इस प्रकार की संस्कृति में नागरिक राजनीतिक व्यवस्था के अस्तित्व से परिचित होते हैं, परंतु वे स्वयं को राजनीतिक प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार नहीं मानते।

वे सरकार के निर्णयों को स्वीकार करते हैं, कानूनों का पालन करते हैं, कर देते हैं, किंतु नीति-निर्माण या राजनीतिक निर्णयों को प्रभावित करने का प्रयास कम करते हैं।

इस संस्कृति में नागरिक “शासित” (Subjects) की भूमिका निभाते हैं।

प्रमुख विशेषताएँ

  • राजनीतिक व्यवस्था का पर्याप्त ज्ञान।
  • सरकार के प्रति आज्ञाकारिता।
  • सीमित राजनीतिक सहभागिता।
  • अधिकारों की अपेक्षा कर्तव्यों पर अधिक बल।
  • निर्णयों को प्रभावित करने की सीमित क्षमता।

उदाहरण:

आल्मंड एवं वर्बा ने इस प्रकार की संस्कृति को केंद्रीकृत एवं नौकरशाही प्रधान व्यवस्थाओं से जोड़ा।

3. प्रतिभागी राजनीतिक संस्कृति (Participant Political Culture)

यह राजनीतिक संस्कृति का सबसे विकसित रूप है।

इसमें नागरिक स्वयं को राजनीतिक प्रक्रिया का सक्रिय भागीदार मानते हैं। वे केवल मतदान ही नहीं करते, बल्कि राजनीतिक दलों, नागरिक संगठनों, आंदोलनों, सार्वजनिक विमर्श तथा नीति-निर्माण में भी भाग लेते हैं।

वे सरकार से उत्तरदायित्व और पारदर्शिता की अपेक्षा रखते हैं तथा लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा में सक्रिय रहते हैं।

प्रमुख विशेषताएँ

  • उच्च राजनीतिक जागरूकता।
  • सक्रिय राजनीतिक सहभागिता।
  • मतदान एवं जनभागीदारी।
  • सरकार की जवाबदेही की अपेक्षा।
  • लोकतांत्रिक संस्थाओं में विश्वास।
  • नागरिक अधिकारों के प्रति सजगता।

उदाहरण:

आधुनिक लोकतांत्रिक देशों में इस प्रकार की संस्कृति अपेक्षाकृत अधिक विकसित मानी जाती है।

नागरिक संस्कृति (Civic Culture)

आल्मंड एवं वर्बा का सबसे महत्वपूर्ण योगदान Civic Culture (नागरिक संस्कृति) की अवधारणा है।उनका तर्क था कि लोकतंत्र केवल प्रतिभागी राजनीतिक संस्कृति पर आधारित नहीं हो सकता। यदि प्रत्येक नागरिक हर समय अत्यधिक सक्रिय राजनीतिक भूमिका निभाने लगे, तो राजनीतिक अस्थिरता और निरंतर संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हो सकती है।

दूसरी ओर, यदि नागरिक केवल निष्क्रिय या उदासीन रहें, तो लोकतंत्र कमजोर हो जाएगा।इसलिए उन्होंने ऐसी मिश्रित राजनीतिक संस्कृति का समर्थन किया जिसमें—

  • नागरिक लोकतांत्रिक संस्थाओं का सम्मान करें,
  • आवश्यक होने पर सक्रिय राजनीतिक भागीदारी करें,
  • सामान्य परिस्थितियों में संस्थाओं पर विश्वास बनाए रखें,
  • अधिकारों और कर्तव्यों के बीच संतुलन बनाए रखें।

इसी संतुलित संस्कृति को उन्होंने Civic Culture कहा।

Civic Culture की प्रमुख विशेषताएँ

  • लोकतांत्रिक मूल्यों में विश्वास।
  • संविधान एवं कानून का सम्मान।
  • उच्च राजनीतिक सहिष्णुता।
  • नागरिक सहभागिता।
  • उत्तरदायी सरकार की अपेक्षा।
  • राजनीतिक स्थिरता एवं परिवर्तन के बीच संतुलन।
  • संवाद एवं सहमति की संस्कृति।
  • नागरिक स्वतंत्रताओं का संरक्षण।

लोकतंत्र एवं Civic Culture:

आल्मंड एवं वर्बा के अनुसार लोकतंत्र की स्थिरता निम्न कारकों पर निर्भर करती है—

  • नागरिकों का लोकतांत्रिक संस्थाओं पर विश्वास।
  • राजनीतिक सहभागिता और राजनीतिक संयम के बीच संतुलन।
  • राजनीतिक सहिष्णुता।
  • विरोधी विचारों का सम्मान।
  • शांतिपूर्ण सत्ता परिवर्तन की स्वीकृति।
  • कानून के शासन (Rule of Law) में विश्वास।

उनके अनुसार यही संतुलन लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था को दीर्घकालिक स्थिरता प्रदान करता है।

पाँच देशों का तुलनात्मक अध्ययन

अपनी पुस्तक The Civic Culture में आल्मंड एवं वर्बा ने पाँच देशों—संयुक्त राज्य अमेरिका, ब्रिटेन, पश्चिम जर्मनी, इटली और मेक्सिको—का तुलनात्मक अध्ययन किया। उन्होंने सर्वेक्षण के माध्यम से नागरिकों के राजनीतिक दृष्टिकोण, सहभागिता और लोकतांत्रिक मूल्यों का विश्लेषण किया।

अध्ययन का मुख्य निष्कर्ष यह था कि ब्रिटेन और संयुक्त राज्य अमेरिका में नागरिक संस्कृति अपेक्षाकृत अधिक विकसित थी, जहाँ लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति विश्वास और नागरिक सहभागिता के बीच संतुलन पाया गया। पश्चिम जर्मनी संक्रमण की अवस्था में था, जहाँ लोकतांत्रिक संस्कृति विकसित हो रही थी। इटली में क्षेत्रीय असमानताओं और सामाजिक विभाजनों के कारण नागरिक संस्कृति अपेक्षाकृत कमजोर दिखाई दी, जबकि मेक्सिको में राजनीतिक व्यवस्था के प्रति नागरिकों का झुकाव अधिकतर अधीनस्थ (Subject) संस्कृति की ओर था।

आल्मंड एवं वर्बा ने निष्कर्ष निकाला कि लोकतंत्र की सफलता केवल संविधान या चुनावों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि नागरिकों की राजनीतिक संस्कृति और लोकतांत्रिक मूल्यों पर भी समान रूप से निर्भर करती है।

राजनीतिक संस्कृति सिद्धांत की प्रमुख विशेषताएँ

गेब्रियल आल्मंड एवं सिडनी वर्बा का राजनीतिक संस्कृति सिद्धांत तुलनात्मक राजनीति के इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जाता है। इस सिद्धांत ने राजनीतिक संस्थाओं के अध्ययन को नागरिकों के राजनीतिक व्यवहार, दृष्टिकोण तथा मूल्यों से जोड़कर राजनीति विज्ञान के अध्ययन को अधिक व्यापक और अनुभवजन्य (Empirical) बनाया।इस सिद्धांत की प्रमुख विशेषताएँ निम्नलिखित हैं—

1. व्यवहारवादी दृष्टिकोण पर आधारित: यह सिद्धांत व्यवहारवादी क्रांति (Behavioural Revolution) का परिणाम है। इसमें राजनीतिक संस्थाओं की अपेक्षा नागरिकों के वास्तविक राजनीतिक व्यवहार, अभिवृत्तियों और मनोवैज्ञानिक प्रवृत्तियों को अध्ययन का आधार बनाया गया।

2. अनुभवजन्य (Empirical) अध्ययन: आल्मंड एवं वर्बा ने राजनीतिक संस्कृति की अवधारणा को केवल सैद्धांतिक रूप में प्रस्तुत नहीं किया, बल्कि पाँच देशों में व्यापक सर्वेक्षण (Survey Research) के आधार पर विकसित किया। इस कारण यह सिद्धांत अनुभवजन्य अनुसंधान का उत्कृष्ट उदाहरण माना जाता है।प

3. तुलनात्मक राजनीति को नया आयाम: इस सिद्धांत ने विभिन्न देशों की राजनीतिक व्यवस्थाओं की तुलना केवल संवैधानिक ढाँचों के आधार पर नहीं, बल्कि नागरिकों की राजनीतिक संस्कृति के आधार पर भी करना संभव बनाया।

4. लोकतंत्र की सफलता का सांस्कृतिक आधार: आल्मंड एवं वर्बा का मानना था कि लोकतंत्र की स्थिरता केवल संस्थागत व्यवस्था पर निर्भर नहीं करती, बल्कि नागरिकों के लोकतांत्रिक मूल्यों, राजनीतिक विश्वास और सहभागिता पर भी निर्भर करती है।

5. राजनीतिक समाजीकरण का महत्व: यह सिद्धांत स्वीकार करता है कि परिवार, विद्यालय, मीडिया, धर्म, मित्र समूह तथा राजनीतिक दल नागरिकों की राजनीतिक संस्कृति के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

6. राजनीतिक विकास की व्याख्या: यह सिद्धांत यह समझाने का प्रयास करता है कि कुछ देशों में लोकतंत्र क्यों सफल होता है जबकि समान संस्थागत व्यवस्था होने के बावजूद अन्य देशों में वह सफल नहीं हो पाता।

राजनीतिक संस्कृति सिद्धांत की आलोचनाएँ:

यद्यपि यह सिद्धांत अत्यंत प्रभावशाली रहा है, फिर भी अनेक विद्वानों ने इसकी विभिन्न आधारों पर आलोचना की है।

1. अवधारणा की अस्पष्टता

  • राजनीतिक संस्कृति की अवधारणा अत्यधिक व्यापक है। इसमें विश्वास, मूल्य, भावनाएँ, दृष्टिकोण, राजनीतिक व्यवहार तथा परंपराएँ सभी सम्मिलित हैं। परिणामस्वरूप इसकी स्पष्ट सीमाएँ निर्धारित करना कठिन हो जाता है।
  • Lucian W. Pye ने भी स्वीकार किया कि राजनीतिक संस्कृति की अवधारणा बहुआयामी है और विभिन्न विद्वानों द्वारा अलग-अलग अर्थों में प्रयुक्त की गई है।

2. कारण और परिणाम का प्रश्न

  • आलोचकों का तर्क है कि आल्मंड एवं वर्बा यह स्पष्ट नहीं कर सके कि लोकतंत्र राजनीतिक संस्कृति को जन्म देता है या राजनीतिक संस्कृति लोकतंत्र को।
  • अर्थात् दोनों के बीच कारणात्मक (Causal) संबंध पूरी तरह स्पष्ट नहीं है।

3. पश्चिम-केंद्रित (Eurocentric/Western Bias)

  • यह इस सिद्धांत की सबसे प्रमुख आलोचनाओं में से एक है।
  • आलोचकों के अनुसार आल्मंड एवं वर्बा ने पश्चिमी उदार लोकतंत्रों—विशेषकर ब्रिटेन और अमेरिका—को आदर्श मानते हुए नागरिक संस्कृति की अवधारणा विकसित की। परिणामस्वरूप विकासशील देशों की ऐतिहासिक, सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया।

4. सामाजिक-आर्थिक कारकों की उपेक्षा

मार्क्सवादी विद्वानों का मत है कि राजनीतिक संस्कृति को केवल मनोवैज्ञानिक दृष्टिकोण से नहीं समझा जा सकता।उनके अनुसार

  • वर्ग संबंध
  • आर्थिक असमानता
  • उत्पादन संबंध
  • राजनीतिक शक्ति का वितरण

राजनीतिक व्यवहार को अधिक गहराई से प्रभावित करते हैं।

इसलिए केवल राजनीतिक संस्कृति के आधार पर लोकतंत्र की व्याख्या अधूरी मानी जाती है।

5. संरचनात्मक असमानताओं की उपेक्षा

इस सिद्धांत में जाति, वर्ग, नस्ल, लिंग, क्षेत्रीय असमानता तथा आर्थिक विषमता जैसे संरचनात्मक कारकों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया गया है।

विशेषकर विकासशील देशों में ये कारक राजनीतिक व्यवहार को गहराई से प्रभावित करते हैं।

6. सर्वेक्षण पद्धति की सीमाएँ

आल्मंड एवं वर्बा का अध्ययन मुख्यतः सर्वेक्षण (Survey) पर आधारित था।

आलोचकों का मत है कि—

  • उत्तरदाता हमेशा वास्तविक विचार व्यक्त नहीं करते।
  • सांस्कृतिक अवधारणाओं को प्रश्नावली के माध्यम से पूरी तरह नहीं मापा जा सकता।
  • विभिन्न भाषाओं और संस्कृतियों में प्रश्नों का अर्थ बदल सकता है।
  • इस कारण सर्वेक्षण के निष्कर्ष पूर्णतः सार्वभौमिक नहीं माने जा सकते।

7. राजनीतिक संस्कृति परिवर्तनशील होती है

आल्मंड एवं वर्बा का अध्ययन 1959–60 के राजनीतिक वातावरण पर आधारित था।इसके बाद—

  • वैश्वीकरण
  • सूचना प्रौद्योगिकी
  • सोशल मीडिया
  • नई सामाजिक आंदोलनों
  • डिजिटल लोकतंत्र

इन सभी ने राजनीतिक संस्कृति में व्यापक परिवर्तन किए हैं।

इसलिए उनके निष्कर्षों को सभी कालों में समान रूप से लागू नहीं किया जा सकता।

सिद्धांत का महत्व

इन आलोचनाओं के बावजूद राजनीतिक संस्कृति सिद्धांत आज भी तुलनात्मक राजनीति की सबसे प्रभावशाली अवधारणाओं में गिना जाता है।इसका महत्व निम्न कारणों से बना हुआ है—

  • राजनीतिक व्यवहार को समझने में सहायक।
  • लोकतंत्र की स्थिरता की व्याख्या करता है।
  • राजनीतिक समाजीकरण के अध्ययन को प्रोत्साहित करता है।
  • तुलनात्मक राजनीति में अनुभवजन्य अनुसंधान को बढ़ावा देता है।
  • राजनीतिक विकास एवं लोकतंत्रीकरण के अध्ययन का आधार प्रदान करता है।
  • समकालीन लोकतंत्रों में नागरिक सहभागिता के विश्लेषण के लिए उपयोगी है।

भारत के संदर्भ में राजनीतिक संस्कृति सिद्धांत की प्रासंगिकता

  • भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहाँ भाषाई, धार्मिक, जातीय और सांस्कृतिक विविधता अत्यधिक व्यापक है। ऐसी स्थिति में राजनीतिक संस्कृति की अवधारणा भारतीय राजनीति को समझने के लिए विशेष रूप से उपयोगी सिद्ध होती है।
  • भारतीय राजनीतिक संस्कृति में एक ओर लोकतांत्रिक मूल्यों, संविधान और सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के प्रति व्यापक स्वीकृति दिखाई देती है, वहीं दूसरी ओर जाति, धर्म, क्षेत्रीय पहचान तथा व्यक्तित्व-आधारित राजनीति का प्रभाव भी स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है।
  • स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव, निर्वाचन आयोग की भूमिका, पंचायती राज संस्थाओं का विस्तार, महिलाओं एवं वंचित वर्गों की बढ़ती राजनीतिक भागीदारी तथा नागरिक समाज की सक्रियता भारत में प्रतिभागी राजनीतिक संस्कृति (Participant Political Culture) के विकास को दर्शाती है।
  • इसके साथ ही कई क्षेत्रों में राजनीतिक उदासीनता, धनबल एवं बाहुबल का प्रभाव, पहचान-आधारित मतदान और लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति घटते विश्वास जैसी प्रवृत्तियाँ यह संकेत देती हैं कि भारतीय राजनीतिक संस्कृति अभी भी मिश्रित स्वरूप की है।
  • इस दृष्टि से भारत आल्मंड एवं वर्बा की “नागरिक संस्कृति” की अवधारणा का एक रोचक उदाहरण प्रस्तुत करता है, जहाँ परोचियल, सब्जेक्ट और प्रतिभागी—तीनों प्रकार की राजनीतिक संस्कृतियाँ विभिन्न स्तरों पर सह-अस्तित्व में दिखाई देती हैं।

समकालीन संदर्भ

इक्कीसवीं शताब्दी में राजनीतिक संस्कृति का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। डिजिटल मीडिया, सोशल मीडिया, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ऑनलाइन जनमत, डिजिटल चुनाव अभियान तथा नागरिकों की बढ़ती राजनीतिक जागरूकता ने राजनीतिक सहभागिता के नए रूप विकसित किए हैं।

इसके बावजूद लोकतांत्रिक मूल्यों, नागरिक उत्तरदायित्व, राजनीतिक सहिष्णुता तथा संस्थागत विश्वास जैसे तत्व आज भी किसी भी लोकतंत्र की सफलता के लिए उतने ही महत्वपूर्ण हैं जितने आल्मंड एवं वर्बा ने छह दशक पहले बताए थे। इसलिए उनका सिद्धांत आज भी राजनीतिक विज्ञान के अध्ययन में प्रासंगिक बना हुआ है।

निष्कर्ष

गेब्रियल आल्मंड एवं सिडनी वर्बा का राजनीतिक संस्कृति सिद्धांत तुलनात्मक राजनीति के विकास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। इस सिद्धांत ने यह स्थापित किया कि लोकतंत्र की सफलता केवल संवैधानिक संस्थाओं पर निर्भर नहीं करती, बल्कि नागरिकों की राजनीतिक मान्यताओं, मूल्यों, विश्वासों और सहभागिता की प्रकृति पर भी निर्भर करती है।

यद्यपि पश्चिम-केंद्रित दृष्टिकोण, अवधारणात्मक अस्पष्टता तथा सामाजिक-आर्थिक कारकों की उपेक्षा जैसी आलोचनाएँ इस सिद्धांत पर की गई हैं, फिर भी लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था के सांस्कृतिक आधार को समझने में इसका महत्व आज भी बना हुआ है। समकालीन लोकतंत्रों में नागरिक सहभागिता, राजनीतिक समाजीकरण और लोकतांत्रिक स्थिरता के अध्ययन के लिए यह सिद्धांत एक आधारभूत संदर्भ के रूप में स्वीकार किया जाता है।

One-Liner Revision Points

  1. 1963 में Gabriel Almond एवं Sidney Verba ने The Civic Culture में राजनीतिक संस्कृति का सिद्धांत प्रस्तुत किया।
  2. राजनीतिक संस्कृति से आशय नागरिकों की राजनीतिक व्यवस्था के प्रति विश्वास, मूल्य, अभिवृत्तियों और अभिमुखीकरण से है।
  3. राजनीतिक संस्कृति के तीन अभिमुखीकरण हैं—Cognitive, Affective और Evaluative Orientation।
  4. राजनीतिक अभिमुखीकरण चार राजनीतिक वस्तुओं—Political System, Input, Output और Self—के प्रति होता है।
  5. Parochial Political Culture में नागरिकों की राजनीतिक जागरूकता और सहभागिता अत्यंत कम होती है।
  6. Subject Political Culture में नागरिक राजनीतिक व्यवस्था से परिचित होते हैं, लेकिन सक्रिय भागीदारी नहीं करते।
  7. Participant Political Culture में नागरिक सक्रिय राजनीतिक सहभागिता करते हैं और स्वयं को राजनीतिक प्रक्रिया का भाग मानते हैं।
  8. Civic Culture, Parochial, Subject और Participant संस्कृतियों का संतुलित मिश्रण है, जो लोकतंत्र के लिए सर्वाधिक उपयुक्त है।
  9. आल्मंड एवं वर्बा ने अमेरिका, ब्रिटेन, पश्चिम जर्मनी, इटली और मेक्सिको का तुलनात्मक सर्वेक्षण किया।
  10. इस सिद्धांत की प्रमुख आलोचनाएँ पश्चिम-केंद्रित दृष्टिकोण, अवधारणात्मक अस्पष्टता और सामाजिक-आर्थिक कारकों की उपेक्षा हैं।

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