in , ,

राजद्रोह कानून : न्यायपालिका, संविधान और नागरिक स्वतंत्रता

SC’s revival of Section 124A for consenting accused brings back a colonial law the country did not want- The Hindu

मई 2026 में सर्वोच्च न्यायालय ने Kamran v. State of Madhya Pradesh मामले में यह स्पष्ट किया कि भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124A के अंतर्गत लंबित मुकदमों और अपीलों की सुनवाई निचली अदालतें आगे बढ़ा सकती हैं, यदि आरोपी स्वयं सहमति दें। इस निर्णय ने राजद्रोह कानून की प्रासंगिकता, संवैधानिकता और लोकतांत्रिक प्रभावों पर पुनः राष्ट्रीय बहस को जन्म दिया।

संविधान में नागरिकों को विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

  • भारत का संविधान नागरिकों को विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है, जो किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की आधारशिला मानी जाती है।
  • लोकतंत्र में सरकार की आलोचना, विरोध और असहमति को नागरिक अधिकारों का आवश्यक भाग माना जाता है। किंतु दूसरी ओर राज्य की संप्रभुता, अखंडता और सार्वजनिक व्यवस्था की रक्षा करना भी शासन का अनिवार्य दायित्व है। इसी कारण अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के मध्य संतुलन बनाए रखने की आवश्यकता सदैव बनी रहती है।
  • राजद्रोह कानून इसी संतुलन से जुड़ा सबसे विवादास्पद विषय रहा है। भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 124A, जिसे सामान्यतः ‘राजद्रोह कानून’ कहा जाता है, मूलतः ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन द्वारा भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को दबाने के लिए लागू की गई थी।
  • स्वतंत्रता के बाद भी यह कानून भारतीय विधि व्यवस्था में बना रहा और समय-समय पर पत्रकारों, सामाजिक कार्यकर्ताओं, छात्रों तथा राजनीतिक विरोधियों के विरुद्ध इसके उपयोग को लेकर गंभीर प्रश्न उठते रहे।

राजद्रोह कानून का ऐतिहासिक विकास

  • राजद्रोह कानून की उत्पत्ति ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन की उस मानसिकता से हुई थी जिसका उद्देश्य भारतीय जनता के राजनीतिक विरोध को नियंत्रित करना था।
  • 1837 में लॉर्ड मैकॉले द्वारा भारतीय दंड संहिता का प्रारूप तैयार किया गया, जिसमें राजद्रोह संबंधी प्रावधान सम्मिलित थे। हालांकि 1860 में जब भारतीय दंड संहिता लागू हुई तब यह प्रावधान उसमें शामिल नहीं किया गया।
  • बाद में 1890 में ब्रिटिश सरकार ने बढ़ते राष्ट्रवादी आंदोलनों और स्वतंत्रता की मांग को दबाने के लिए धारा 124A को IPC में सम्मिलित किया।
  • धारा 124A के अनुसार यदि कोई व्यक्ति सरकार के प्रति ‘घृणा’, ‘असंतोष’ या ‘अवमानना’ उत्पन्न करने का प्रयास करता है, तो उसे राजद्रोह का दोषी माना जा सकता था। इस अपराध के लिए कठोर दंड का प्रावधान था, जिसमें आजीवन कारावास तक शामिल था।
  • ब्रिटिश सरकार ने इस कानून का व्यापक उपयोग राजनीतिक नेताओं, पत्रकारों और स्वतंत्रता सेनानियों के विरुद्ध किया।
  • राजद्रोह कानून की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि इसमें ‘असंतोष’ (disaffection) जैसे अस्पष्ट शब्दों का प्रयोग किया गया था। इससे सरकार को अत्यधिक विवेकाधिकार प्राप्त हो गया और सामान्य राजनीतिक आलोचना को भी राजद्रोह माना जाने लगा।
  • यही कारण था कि यह कानून औपनिवेशिक दमन का प्रतीक बन गया। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी इस कानून का बने रहना भारतीय लोकतंत्र में औपनिवेशिक विरासत की निरंतरता को दर्शाता है।

स्वतंत्रता आंदोलन और राजद्रोह कानून

  • ब्रिटिश शासन ने राजद्रोह कानून का प्रयोग भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन को कुचलने के लिए किया। लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक पर उनके समाचार पत्र Kesari में प्रकाशित लेखों के कारण कई बार राजद्रोह के मुकदमे चलाए गए।
  • ब्रिटिश सरकार का मानना था कि तिलक के लेख जनता को शासन के विरुद्ध भड़का रहे हैं। तिलक के मुकदमों ने भारतीय समाज में यह भावना उत्पन्न की कि ब्रिटिश शासन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का दमन कर रहा है।
  • 1922 में गांधीजी पर Young India में प्रकाशित लेखों के कारण मुकदमा चलाया गया।
  • गांधीजी ने अदालत में कहा: ‘धारा 124A भारतीय दंड संहिता की राजनीतिक धाराओं का राजकुमार है, जिसका उद्देश्य नागरिक स्वतंत्रता का दमन करना है।’
  • यह कथन आज भी राजद्रोह कानून की आलोचना का सबसे महत्वपूर्ण आधार माना जाता है।
  • स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान राजद्रोह कानून केवल कानूनी प्रावधान नहीं था, बल्कि औपनिवेशिक शासन की राजनीतिक रणनीति का उपकरण था। इसके माध्यम से ब्रिटिश सरकार ने राजनीतिक असहमति को अपराध में परिवर्तित करने का प्रयास किया।
  • यही कारण है कि स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद यह अपेक्षा की गई थी कि ऐसे औपनिवेशिक कानून समाप्त कर दिए जाएंगे। किंतु धारा 124A भारतीय विधि व्यवस्था में बनी रही, जिससे लोकतांत्रिक मूल्यों और औपनिवेशिक कानूनों के मध्य संघर्ष की स्थिति उत्पन्न हुई।

संविधान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता

  • भारतीय संविधान ने नागरिकों को अनुच्छेद 19(1)(a) के अंतर्गत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार प्रदान किया है।
  • यह अधिकार लोकतंत्र के लिए अत्यंत आवश्यक माना जाता है क्योंकि नागरिकों को सरकार की आलोचना करने, वैकल्पिक विचार प्रस्तुत करने और सार्वजनिक नीतियों पर प्रश्न उठाने का अवसर प्रदान करता है।
  • लोकतंत्र में स्वतंत्र प्रेस, राजनीतिक विरोध और सामाजिक आंदोलनों की सफलता इसी अधिकार पर निर्भर करती है।
  • हालांकि संविधान निर्माताओं ने यह भी स्वीकार किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पूर्ण नहीं हो सकती। इसलिए अनुच्छेद 19(2) के अंतर्गत राज्य को कुछ परिस्थितियों में युक्तिसंगत प्रतिबंध लगाने की अनुमति दी गई। इनमें राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था, संप्रभुता एवं अखंडता तथा विदेशी राज्यों के साथ संबंध जैसे आधार शामिल हैं। इसी संवैधानिक प्रावधान के आधार पर राजद्रोह कानून की वैधता को उचित ठहराने का प्रयास किया गया।
  • समस्या यह रही कि धारा 124A का दायरा अत्यंत व्यापक था। सरकार के विरुद्ध असंतोष व्यक्त करना भी राजद्रोह माना जा सकता था। इससे यह प्रश्न उत्पन्न हुआ कि क्या लोकतंत्र में सरकार की आलोचना को अपराध माना जा सकता है।
  • यही कारण है कि स्वतंत्रता के बाद न्यायपालिका को बार-बार इस कानून की संवैधानिकता की समीक्षा करनी पड़ी। राजद्रोह कानून और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच यह संघर्ष भारतीय संवैधानिक विमर्श का महत्वपूर्ण विषय बन गया।

राजद्रोह पर प्रमुख न्यायिक निर्णय

  • स्वतंत्रता के बाद भारतीय न्यायपालिका ने राजद्रोह कानून की सीमाओं को निर्धारित करने का प्रयास किया। Romesh Thapar v. State of Madras (1950) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि सरकार की आलोचना लोकतंत्र का आवश्यक भाग है और केवल असंतोष उत्पन्न करने के आधार पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध नहीं लगाया जा सकता। इस निर्णय ने नागरिक स्वतंत्रता के पक्ष में महत्वपूर्ण संवैधानिक आधार तैयार किया।
  • इसके बाद Kedar Nath Singh v. State of Bihar (1962) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 124A की संवैधानिकता को बरकरार रखा, किंतु उसकी सीमित व्याख्या की। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि केवल सरकार की आलोचना, कठोर भाषण या असंतोष व्यक्त करना राजद्रोह नहीं है। राजद्रोह तभी माना जाएगा जब भाषण या कार्यवाही हिंसा को उकसाए या सार्वजनिक अव्यवस्था उत्पन्न करने का स्पष्ट प्रयास करे। यह निर्णय आज भी राजद्रोह कानून की संवैधानिक व्याख्या का आधार माना जाता है।
  • 1995 के Balwant Singh v. State of Punjab मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि कुछ नारे लगाने मात्र से राजद्रोह नहीं बनता, जब तक कि उससे वास्तविक हिंसा या सार्वजनिक अव्यवस्था उत्पन्न न हो। इसके बाद 2022 में G. Vombatkere v. Union of India मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 124A के उपयोग पर अस्थायी रोक लगाते हुए कहा कि यह कानून औपनिवेशिक शासन की देन है और आधुनिक लोकतांत्रिक समाज के अनुरूप नहीं है। इन निर्णयों से स्पष्ट होता है कि न्यायपालिका ने लगातार अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया है।

भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 और नई बहस

  • भारतीय दंड संहिता को समाप्त कर Bharatiya Nyaya Sanhita (BNS), 2023 लागू की गई। सरकार ने दावा किया कि नए कानून औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त होंगे। इसी क्रम में ‘Sedition’ शब्द को हटा दिया गया। किंतु इसके स्थान पर धारा 152 जोड़ी गई, जो भारत की संप्रभुता, एकता और अखंडता के विरुद्ध गतिविधियों को दंडित करती है।
  • धारा 152 में ‘subversive activities’, ‘secession’ और ‘armed rebellion’ जैसे शब्दों का प्रयोग किया गया है। आलोचकों का मत है कि ये शब्द पर्याप्त रूप से स्पष्ट नहीं हैं और इनकी व्यापक व्याख्या की जा सकती है। इससे आशंका उत्पन्न होती है कि पुराने राजद्रोह कानून की तरह इसका भी दुरुपयोग हो सकता है।
  • समर्थकों का तर्क है कि भारत जैसे विविधतापूर्ण और संवेदनशील देश में राष्ट्रीय सुरक्षा की रक्षा के लिए ऐसे प्रावधान आवश्यक हैं।
  • अलगाववाद, आतंकवाद और उग्रवाद जैसी चुनौतियों से निपटने के लिए राज्य को कानूनी शक्तियों की आवश्यकता होती है।
  • दूसरी ओर आलोचक मानते हैं कि लोकतंत्र में असहमति और राष्ट्र-विरोध के बीच स्पष्ट अंतर होना चाहिए। यदि सरकार की आलोचना को ही राष्ट्र-विरोध मान लिया जाए तो लोकतांत्रिक व्यवस्था कमजोर हो जाएगी। इसलिए BNS की धारा 152 पर भी वही बहस जारी है जो पहले धारा 124A को लेकर थी।

निष्कर्ष

राजद्रोह कानून भारत में लोकतंत्र, नागरिक स्वतंत्रता और राष्ट्रीय सुरक्षा के मध्य संतुलन का प्रश्न है। औपनिवेशिक शासन में यह कानून राजनीतिक विरोध को दबाने का साधन था, किंतु स्वतंत्र भारत में इसकी संवैधानिक वैधता और आवश्यकता पर लगातार प्रश्न उठते रहे हैं। न्यायपालिका ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि सरकार की आलोचना को राष्ट्र-विरोध नहीं माना जा सकता और लोकतंत्र में असहमति का संरक्षण आवश्यक है।

फिर भी यह भी सत्य है कि किसी भी राज्य को अपनी संप्रभुता और अखंडता की रक्षा के लिए कुछ कानूनी शक्तियों की आवश्यकता होती है। इसलिए चुनौती यह है कि ऐसे कानून बनाए जाएँ जो वास्तविक हिंसक या अलगाववादी गतिविधियों पर नियंत्रण रखें, लेकिन शांतिपूर्ण राजनीतिक असहमति को अपराध न बनाएं।

अतः भारत के लिए सबसे उपयुक्त मार्ग वही होगा जिसमें अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लोकतंत्र की आत्मा मानते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए आवश्यक और सीमित कानूनी प्रतिबंध लगाए जाएँ। यही संवैधानिक लोकतंत्र की वास्तविक भावना है।

Source: The Hindu


Discover more from Politics by RK: Ultimate Polity Guide for UPSC and Civil Services

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

What do you think?

NPT सम्मेलन में सहमति का अभाव: परमाणु राजनीति और अंतरराष्ट्रीय तनाव

क्वाड समूह : एक सुरक्षा समूह से बढ़कर