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नए एक-दलीय प्रभुत्व का उदय: भारतीय लोकतंत्र में सत्ता का केंद्रीकरण

एक-दलीय प्रभुत्व’ (One-Party Dominance)- BJP

भारत को लंबे समय तक बहुदलीय लोकतंत्र और क्षेत्रीय विविधताओं वाला देश माना जाता रहा है, जहाँ राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दल मिलकर राजनीति की दिशा तय करते थे। लेकिन हाल के वर्षों में भारतीय राजनीति में एक नई प्रवृत्ति उभरकर सामने आई है, जिसे कई राजनीतिक विश्लेषक ‘एक-दलीय प्रभुत्व’ (One-Party Dominance) का नया दौर मानते हैं। यह स्थिति पहले कांग्रेस के समय दिखाई देती थी, और अब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेतृत्व में पुनः उभरती हुई दिखाई दे रही है। Outlook पत्रिका के अनुसार, भाजपा ने 2014 के बाद भारत की राजनीतिक संरचना को इस प्रकार बदला है कि क्षेत्रीय दलों का प्रभाव लगातार कम होता जा रहा है।

  • भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी विशेषता उसकी बहुलता, विविधता और बहुदलीय राजनीतिक व्यवस्था रही है। स्वतंत्रता के बाद भारत ने लंबे समय तक कांग्रेस के नेतृत्व में ‘एक-दलीय प्रभुत्व’ (One-Party Dominance) का दौर देखा, लेकिन 1989 के बाद गठबंधन राजनीति और क्षेत्रीय दलों के उभार ने इस संरचना को बदल दिया। उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और ओडिशा जैसे राज्यों में क्षेत्रीय दल लोकतांत्रिक शक्ति के केंद्र बन गए।
  • 2014 के बाद भारतीय राजनीति में एक नया परिवर्तन दिखाई देता है। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने केवल केंद्र की सत्ता प्राप्त नहीं की, बल्कि उसने धीरे-धीरे क्षेत्रीय दलों के प्रभाव को भी कमजोर करना शुरू किया।

एकदलीय व्यवस्था की अवधारणा

  • एक-दलीय व्यवस्था का अर्थ यह नहीं होता कि देश में केवल एक ही राजनीतिक दल मौजूद हो। इसका वास्तविक अर्थ ऐसी राजनीतिक स्थिति से है जहाँ एक दल इतना प्रभावशाली बन जाए कि विपक्ष और क्षेत्रीय दल उसकी तुलना में कमजोर पड़ जाएँ।
  • राजनीतिक वैज्ञानिक राजनी कोठारी ने इसे ‘Congress System’ कहा था, जहाँ कांग्रेस केवल एक दल नहीं बल्कि सम्पूर्ण राजनीतिक व्यवस्था का केंद्र बन गई थी। आज कई विश्लेषक मानते हैं कि भाजपा उसी प्रकार की केंद्रीय राजनीतिक शक्ति बनती जा रही है।

क्षेत्रीय दलों का उभार

1980 और 1990 के दशक में भारतीय राजनीति में बड़ा बदलाव आया। मंडल आयोग की सिफारिशों के बाद पिछड़ी जातियों और क्षेत्रीय पहचानों की राजनीति मजबूत हुई।

  • उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी उभरी।
  • बिहार में राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल (यू) मजबूत हुए।
  • पश्चिम बंगाल में वामपंथ और बाद में तृणमूल कांग्रेस प्रभावशाली बनी।
  • तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति का वर्चस्व कायम रहा।

इस दौर में केंद्र की सरकारें गठबंधन पर निर्भर रहने लगीं। भाजपा और कांग्रेस दोनों को क्षेत्रीय दलों के समर्थन की आवश्यकता पड़ती थी। इससे भारतीय संघवाद और क्षेत्रीय आकांक्षाओं को बल मिला।

2014 के बाद भाजपा का विस्तार

नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा ने 2014 में ऐतिहासिक जीत हासिल की। इसके बाद पार्टी ने राष्ट्रीय राजनीति को नई दिशा दी। भाजपा ने केवल हिंदी पट्टी तक सीमित रहने के बजाय पूर्वी और दक्षिणी भारत में भी अपना विस्तार किया।

भाजपा की सफलता के पीछे कई कारण थे:-

  1. मजबूत नेतृत्व और व्यक्तित्व राजनीति
  • नरेंद्र मोदी को एक निर्णायक, मजबूत और विकासोन्मुख नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया।
  • गुजरात मॉडल, विकास, राष्ट्रवाद और मजबूत नेतृत्व की छवि ने भाजपा को राष्ट्रीय स्तर पर लोकप्रिय बनाया।
  • मोदी की राजनीति ने चुनावों को स्थानीय मुद्दों से हटाकर राष्ट्रीय नेतृत्व के इर्द-गिर्द केंद्रित कर दिया। परिणामस्वरूप क्षेत्रीय नेताओं का प्रभाव कम होने लगा।
  1. हिंदुत्व और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद
  • भाजपा ने हिंदुत्व को केवल धार्मिक विचारधारा के रूप में नहीं बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के रूप में प्रस्तुत किया।
  • इस रणनीति ने कई जातीय विभाजनों को कमजोर किया और व्यापक हिंदू पहचान को मजबूत किया। पश्चिम बंगाल, असम और उत्तर प्रदेश में भाजपा ने धार्मिक ध्रुवीकरण और सांस्कृतिक पहचान को राजनीतिक समर्थन में बदल दिया।

उदाहरण के लिए;

  • बंगाल में ‘बंगाली हिंदू अस्मिता’
  • असम में ‘मिया’ राजनीति
  • उत्तर प्रदेश में ‘हिंदू एकता’

इन सभी ने भाजपा को नए सामाजिक गठबंधन बनाने में मदद की।

  1. मंडल राजनीति का माइक्रोमंडलीकरण
  • भाजपा की सबसे बड़ी राजनीतिक रणनीति जातीय राजनीति को नए ढंग से पुनर्गठित करना थी।
  • समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल जैसे दल मुख्यतः यादव वोट बैंक पर निर्भर थे, जबकि बसपा जाटव दलितों पर आधारित थी। भाजपा ने गैर-यादव पिछड़ी जातियों और गैर-जाटव दलितों को अपने साथ जोड़ने का प्रयास किया।
  • उत्तर प्रदेश में निषाद, राजभर, कुर्मी, मौर्य, पासी जैसे समुदाय भाजपा के नए सामाजिक गठबंधन का हिस्सा बने।
  • इस रणनीति को कई विश्लेषक ‘Subaltern Hindutva’ कहते हैं, जिसमें छोटे जातीय समूहों को व्यापक हिंदू पहचान के अंतर्गत संगठित किया गया।
  1. कल्याणकारी राजनीति (Welfare Politics)

भाजपा ने विकास और राष्ट्रवाद के साथ-साथ कल्याणकारी योजनाओं को भी अपनी राजनीति का केंद्र बनाया।

  • मुख्य योजनाएँ; प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि, उज्ज्वला योजना, मुफ्त राशन योजना, आयुष्मान भारत, प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) इन योजनाओं ने गरीब, महिलाओं और ग्रामीण वर्ग में भाजपा का समर्थन बढ़ाया।
  • पहले ‘फ्रीबी’ राजनीति क्षेत्रीय दलों की ताकत मानी जाती थी, लेकिन भाजपा ने उससे भी बड़े स्तर पर कल्याणकारी योजनाएँ लागू कर उनकी राजनीतिक बढ़त को चुनौती दी।
  1. संगठनात्मक शक्ति

भाजपा की सफलता के पीछे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) का मजबूत संगठनात्मक नेटवर्क भी महत्वपूर्ण रहा।

  • बूथ स्तर तक कार्यकर्ता
  • सोशल मीडिया का प्रभावी उपयोग
  • चुनावी प्रबंधन
  • डेटा आधारित रणनीति

इन सबने भाजपा को अन्य दलों से अधिक संगठित और प्रभावी बनाया।

क्षेत्रीय दलों का पतन

भाजपा के उदय के साथ कई क्षेत्रीय दल कमजोर होने लगे। इसके पीछे उनके आंतरिक संकट भी जिम्मेदार थे।

() परिवारवाद

कई क्षेत्रीय दल परिवार-केंद्रित बन गए;

  • समाजवादी पार्टी – यादव परिवार
  • आरजेडी – लालू परिवार
  • शिवसेना – ठाकरे परिवार
  • डीएमके – करुणानिधि परिवार

इससे नए नेतृत्व का विकास रुक गया।

() भ्रष्टाचार और प्रशासनिक विफलताएँ: कई क्षेत्रीय सरकारों पर भ्रष्टाचार और कुशासन के आरोप लगे। भाजपा ने इसे ‘सुशासन बनाम भ्रष्टाचार’ के रूप में प्रस्तुत किया।

() सीमित सामाजिक आधार: अधिकांश क्षेत्रीय दल केवल कुछ जातियों या समुदायों तक सीमित रहे। भाजपा ने व्यापक सामाजिक गठबंधन बनाकर उन्हें चुनौती दी।

भारतीय संघवाद पर प्रभाव

संघीय ढाँचे पर प्रभाव

  • भारत का संविधान संघीय ढाँचे पर आधारित है, जहाँ राज्यों को महत्वपूर्ण अधिकार प्राप्त हैं। क्षेत्रीय दलों की कमजोरी से यह आशंका बढ़ी है कि केंद्र सरकार अधिक शक्तिशाली हो सकती है। आलोचकों का मानना है कि यदि एक ही दल पूरे देश में अत्यधिक प्रभावी हो जाए, तो लोकतांत्रिक संतुलन और विविधता प्रभावित हो सकती है।
  • हालाँकि भाजपा समर्थकों का तर्क है कि मजबूत केंद्र सरकार नीति-निर्माण और विकास को तेज करती है। ‘डबल इंजन सरकार’ का विचार इसी सोच को दर्शाता है।

क्या विपक्ष समाप्त हो रहा है?

हालाँकि भाजपा का प्रभुत्व बढ़ा है, लेकिन भारतीय लोकतंत्र में विपक्ष पूरी तरह समाप्त नहीं हुआ है।

  • तमिलनाडु में द्रविड़ राजनीति अभी भी प्रभावी है।
  • केरल में वामपंथ मजबूत है।
  • कांग्रेस अभी भी राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुख विपक्षी दल है।
  • क्षेत्रीय पहचान पूरी तरह समाप्त नहीं हुई है।

इसलिए भारत को पूर्ण ‘One-Party State’ कहना उचित नहीं होगा, लेकिन ‘One-Party Dominance’ की प्रवृत्ति अवश्य दिखाई देती है।

लोकतंत्र के लिए चुनौती

भारतीय लोकतंत्र की सफलता संतुलित विपक्ष, स्वतंत्र संस्थाओं और राजनीतिक विविधता पर निर्भर करती है। यदि एक दल अत्यधिक शक्तिशाली हो जाए, तो;

  • आलोचना की जगह कम हो सकती है
  • लोकतांत्रिक संस्थाएँ दबाव में आ सकती हैं
  • चुनाव व्यक्तित्व-केंद्रित हो सकते हैं

इसलिए स्वस्थ लोकतंत्र के लिए मजबूत विपक्ष भी उतना ही आवश्यक है जितनी मजबूत सरकार।

निष्कर्ष

भारत की राजनीति आज एक ऐतिहासिक परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। भाजपा ने राष्ट्रीय राजनीति में ऐसा प्रभुत्व स्थापित किया है जिसने क्षेत्रीय दलों की पारंपरिक राजनीति को चुनौती दी है। हिंदुत्व, कल्याणकारी योजनाएँ, मजबूत नेतृत्व और सूक्ष्म सामाजिक गठबंधनों के माध्यम से भाजपा ने भारतीय राजनीति की नई संरचना तैयार की है।

फिर भी भारत की लोकतांत्रिक आत्मा उसकी विविधता और बहुलता में निहित है। इसलिए भविष्य की राजनीति इस बात पर निर्भर करेगी कि क्या भारत ‘एक-दलीय प्रभुत्व’ की दिशा में आगे बढ़ेगा या फिर बहुदलीय लोकतंत्र अपनी नई ऊर्जा के साथ पुनः संतुलन स्थापित करेगा।


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