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‘पूर्ण न्याय’ की संवैधानिक शक्ति: अनुच्छेद 142

सड़क सुरक्षा को मौलिक अधिकार घोषित करने वाला ऐतिहासिक फैसला

हाल ही में भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी असाधारण शक्तियों का उपयोग करते हुए राष्ट्रीय राजमार्गों पर सुरक्षित यात्रा के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित किया। न्यायालय ने कहा कि सुरक्षित और सुगम सड़कें नागरिकों के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन के अधिकार (Right to Life) का अभिन्न हिस्सा हैं।

यह फैसला नवंबर 2025 में राजस्थान के फलोदी क्षेत्र में हुई दो भीषण सड़क दुर्घटनाओं के बाद दिया गया, जिनमें 34 लोगों की मृत्यु हुई थी। म्ममला था: Phalodi Accident vs. National Highways Authority of India and Others (2025)

सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सुरक्षित सड़कें उपलब्ध कराना केवल सरकारी नीति का विषय नहीं, बल्कि राज्य का संवैधानिक दायित्व है।

अनुच्छेद 142 क्या है?

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 142 सर्वोच्च न्यायालय को यह शक्ति देता है कि वह किसी भी लंबित मामले में पूर्ण न्याय (Complete Justice) सुनिश्चित करने हेतु आवश्यक आदेश या डिक्री पारित कर सके।जो उसके समक्ष लंबित किसी भी मामले या मामलों में पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने के लिये आवश्यक हो।
  • यह शक्ति असाधारण (Extraordinary) और अवशिष्ट (Residuary) प्रकृति की है, जिसका उद्देश्य उन परिस्थितियों में न्याय सुनिश्चित करना है जहाँ सामान्य कानून या प्रक्रियाएँ पर्याप्त नहीं होतीं।
  • अनुच्छेद 142 के विकास के शुरुआती वर्षों में आम जनता और वकीलों दोनों नेसमाज के विभिन्न वंचित वर्गों को पूर्ण न्याय दिलाने या पर्यावरण की रक्षा करने के प्रयासों के लिये सर्वोच्च न्यायालय की सराहना की थी।
  • ताजमहल की सफाई और अनेक विचाराधीन कैदियों कोन्याय दिलाने में इस अनुच्छेद का महत्त्वपूर्ण योगदान है।

अनुच्छेद 142 का महत्व

  1. संवैधानिक सुरक्षा वाल्व (Constitutional Safety Valve)
  • अनुच्छेद 142 न्यायपालिका को ऐसी परिस्थितियों में हस्तक्षेप की अनुमति देता है जहाँ कानून पर्याप्त समाधान प्रदान नहीं करता।
  • यह न्यायालय को विधायी शून्यता (Legislative Vacuum) भरने में सक्षम बनाता है।
  • इसका उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया को केवल तकनीकी सीमाओं तक सीमित न रखना है।
  • यह ‘पूर्ण न्याय’ सुनिश्चित करने का संवैधानिक माध्यम है।
  • न्यायालय इसका उपयोग विशेष परिस्थितियों में करता है।

अंतर्निहित एवं अवशिष्ट शक्ति (Inherent and Residuary Power)

  • यह शक्ति किसी साधारण कानून से नहीं बल्कि सीधे संविधान से प्राप्त होती है।
  • सर्वोच्च न्यायालय संविधान का संरक्षक होने के कारण इस विशेष शक्ति का उपयोग करता है।
  • इसका उद्देश्य न्याय के साथ होने वाली स्पष्ट अन्यायपूर्ण स्थिति को रोकना है।
  • न्यायालय प्रक्रिया संबंधी तकनीकी बाधाओं से ऊपर उठ सकता है।
  • यह न्यायिक विवेकाधिकार (Judicial Discretion) का सर्वोच्च उदाहरण है।

साधारण कानूनों पर सर्वोच्चता

दिल्ली ज्यूडिशियल सर्विस एसोसिएशन बनाम गुजरात राज्य (1991)

  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 142 की शक्तियाँ साधारण कानूनों से सीमित नहीं की जा सकतीं।
  • यह संवैधानिक शक्ति है, इसलिए संसद द्वारा बनाए गए सामान्य कानून इसकी सीमा तय नहीं कर सकते।
  • न्यायालय ने इसे ‘विशिष्ट गुणवत्ता वाली शक्ति’ कहा।
  • इसका उद्देश्य न्यायिक स्वतंत्रता बनाए रखना है।
  • यह संविधान की सर्वोच्चता को दर्शाता है।

प्राकृतिक न्याय को प्राथमिकता

केनरा बैंक बनाम देबासिस दास (2003)

  • न्यायालय ने कहा कि जब औपचारिक कानूनी न्याय पर्याप्त न हो, तब प्राकृतिक न्याय (Natural Justice) को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
  • अनुच्छेद 142 का उद्देश्य वास्तविक न्याय सुनिश्चित करना है।
  • यह निष्पक्षता और न्यायसंगत प्रक्रिया पर बल देता है।
  • न्यायालय तकनीकी कमियों के बावजूद न्याय प्रदान कर सकता है।
  • ‘Substantive Justice’ को प्राथमिकता दी गई।

उच्च न्यायालयों की सीमाएँ

अनिल कुमार जैन बनाम माया जैन (2009)

  • सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उच्च न्यायालयों की शक्तियाँ अनुच्छेद 226 के अंतर्गत आती हैं।
  • ये शक्तियाँ अनुच्छेद 142 जितनी व्यापक नहीं हैं।
  • उच्च न्यायालय कानून की सीमाओं के भीतर कार्य करते हैं।
  • वे सामान्यतः वैधानिक प्रावधानों को दरकिनार नहीं कर सकते।
  • अनुच्छेद 142 की अवशिष्ट शक्ति केवल सर्वोच्च न्यायालय को प्राप्त है।

सड़क सुरक्षा पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी

राष्ट्रीय राजमार्गों पर अधिक दुर्घटनाएँ

  • भारत की कुल सड़क नेटवर्क का केवल 2% हिस्सा राष्ट्रीय राजमार्ग हैं।
  • लेकिन कुल सड़क दुर्घटना मौतों में लगभग 30% हिस्सेदारी इन्हीं की है।
  • यह सड़क सुरक्षा की गंभीर स्थिति को दर्शाता है। न्यायालय ने इसे ‘राष्ट्रीय चिंता’ बताया।
  • खराब सड़क प्रबंधन को राज्य की विफलता माना गया।
  1. सड़क सुरक्षा अब नीति नहीं, संवैधानिक दायित्व
  • पहले सड़क सुरक्षा को केवल प्रशासनिक नीति माना जाता था।
  • अब इसे अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार से जोड़ा गया।
  • सुरक्षित सड़कें उपलब्ध कराना राज्य की संवैधानिक जिम्मेदारी है।
  • सड़क रखरखाव में लापरवाही को अधिकारों का उल्लंघन माना जा सकता है।
  • इससे नागरिकों को न्यायिक संरक्षण मिलेगा।

सरकार की 4Es’ रणनीति को बल

सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप से सरकार की सड़क सुरक्षा नीति को गति मिलेगी।

4Es Framework:

  • Education (शिक्षा)
  • Engineering (सड़क एवं वाहन इंजीनियरिंग)
  • Enforcement (कानून प्रवर्तन)
  • Emergency Medical Services (आपात चिकित्सा सेवाएँ)

उद्देश्य: 2030 तक सड़क दुर्घटनाओं में 50% कमी लाना।

अनुच्छेद 142 से संबंधित चिंताएँ

  1. शक्तियों के पृथक्करण पर खतरा
  • आलोचकों के अनुसार न्यायपालिका कई बार कार्यपालिका एवं विधायिका के क्षेत्र में हस्तक्षेप करती है।
  • इससे Separation of Powers प्रभावित होता है।
  • न्यायालय नीति निर्माण जैसे कार्य करने लगता है।
  • लोकतांत्रिक संतुलन पर प्रश्न उठते हैं।
  • इसे न्यायिक सक्रियता (Judicial Activism) कहा जाता है।
  1. न्यायिक अतिक्रमण (Judicial Overreach)
  • अनुच्छेद 142 के तहत न्यायालय व्यापक दिशा-निर्देश जारी करता है।
  • कई बार यह कानून निर्माण जैसा प्रतीत होता है।
  • पर्यावरण, सड़क सुरक्षा और प्रशासनिक सुधारों में ऐसा देखा गया।
  • आलोचक इसे ‘De facto Legislature’ की भूमिका मानते हैं।
  • इससे संस्थागत टकराव की संभावना बढ़ती है।
  1. न्यायिक सक्रियता के पक्ष में तर्क
  • समर्थकों के अनुसार बदलती सामाजिक परिस्थितियों में न्यायपालिका का सक्रिय होना आवश्यक है।
  • जब कानून अपर्याप्त हो, तब न्यायालय को हस्तक्षेप करना चाहिए।
  • यह मौलिक अधिकारों की रक्षा का माध्यम है।
  1. सावधानी की आवश्यकता

हितेश भटनागर बनाम दीपा भटनागर (2011)

  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 142 का प्रयोग अत्यधिक सावधानी के साथ होना चाहिए।
  • यह शक्ति असाधारण है, इसलिए इसका दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।
  • न्यायालय को संवैधानिक मर्यादा बनाए रखनी चाहिए।
  • प्रत्येक मामले में ‘पूर्ण न्याय’ की आवश्यकता का परीक्षण जरूरी है।
  • न्यायिक संयम (Judicial Restraint) महत्वपूर्ण है।

निष्कर्ष

अनुच्छेद 142 भारतीय संविधान की उन विशेष व्यवस्थाओं में से एक है जो न्यायपालिका को केवल कानून की व्याख्या तक सीमित नहीं रखती, बल्कि वास्तविक और पूर्ण न्याय सुनिश्चित करने की शक्ति प्रदान करती है।

हालिया सड़क सुरक्षा संबंधी फैसला यह दर्शाता है कि सुप्रीम कोर्ट बदलती सामाजिक आवश्यकताओं के अनुरूप संविधान की व्यापक व्याख्या कर रहा है।

हालाँकि, इस शक्ति का प्रयोग संवैधानिक मर्यादा और संस्थागत संतुलन बनाए रखते हुए किया जाना आवश्यक है, ताकि न्यायपालिका की सक्रियता लोकतांत्रिक ढाँचे को मजबूत करे, कमजोर नहीं।


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