भारत का जल संकट केवल जल की कमी का संकट नहीं है, बल्कि यह एक गहन प्रशासनिक, सामाजिक, आर्थिक और पारिस्थितिक चुनौती का प्रतिबिंब है। विश्व की लगभग 18 प्रतिशत जनसंख्या को सहारा देने वाला भारत वैश्विक मीठे जल संसाधनों का मात्र 4 प्रतिशत हिस्सा रखता है। प्रतिवर्ष लगभग 4,000 बिलियन क्यूबिक मीटर (BCM) वर्षा होने के बावजूद, भंडारण, वितरण, भूगर्भीय सीमाओं और पारिस्थितिक अवरोधों के कारण केवल लगभग 1,100 BCM जल ही उपयोग योग्य रह जाता है।
- स्वतंत्रता के समय प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता 5,000 घन मीटर से अधिक थी, किंतु आज यह घटकर लगभग 1,400 घन मीटर तक पहुँच गई है, जो जल संकट की गंभीरता को दर्शाती है।
- इसी पृष्ठभूमि में भारत का जल शासन पारंपरिक ‘बांध और नहर आधारित इंजीनियरिंग मॉडल’ से आगे बढ़कर एक समग्र, सहभागी और सतत शासन प्रणाली की ओर परिवर्तित हो रहा है।
- यह परिवर्तन केवल तकनीकी नहीं, बल्कि वैचारिक भी है, क्योंकि अब जल को केवल संसाधन नहीं बल्कि ‘सार्वजनिक विश्वास’ (Public Trust) और ‘पारिस्थितिक पूंजी’ के रूप में देखा जा रहा है।
भारत का सतत जल शासन की ओर परिवर्तन
नदी बेसिन प्रबंधन और ‘हाइड्रोलॉजिकल फेडरलिज्म’ का उदय
- भारत लंबे समय तक नदियों को प्रशासनिक सीमाओं के भीतर नियंत्रित करने का प्रयास करता रहा, जिसके कारण अंतरराज्यीय जल विवाद बढ़ते गए।
- अब सरकार ‘Hydrological Federalism’ की अवधारणा की ओर बढ़ रही है, जिसमें नदी बेसिनों को प्राकृतिक पारिस्थितिक इकाइयों के रूप में देखा जाता है।
- National Hydrology Project और River Basin Management Scheme जैसी पहलों के माध्यम से नदी बेसिन स्तर पर जल प्रबंधन को वैज्ञानिक आधार प्रदान किया जा रहा है।
- GIS आधारित बेसिन मैपिंग, वास्तविक समय जल डेटा प्रणाली तथा निर्णय समर्थन तंत्र के माध्यम से राज्यों के बीच समन्वय को मजबूत करने का प्रयास किया जा रहा है।
- यह दृष्टिकोण इस विचार पर आधारित है कि जल का प्रवाह राजनीतिक सीमाओं से नियंत्रित नहीं होता, इसलिए उसका प्रबंधन भी केवल प्रशासनिक दृष्टिकोण से संभव नहीं है। बेसिन स्तर की योजना जल आवंटन को अधिक न्यायसंगत और वैज्ञानिक बना सकती है, जिससे जल विवादों में कमी आएगी और पर्यावरणीय प्रवाह (Environmental Flows) की सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी।
डिजिटलीकरण और ‘Digital Twin’ तकनीक का प्रयोग
- भारत जल शासन में डिजिटल तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) का उपयोग तेजी से बढ़ा रहा है। ‘Digital Twin’ तकनीक के माध्यम से नदियों और जलाशयों का एक आभासी मॉडल तैयार किया जा रहा है, जो वास्तविक समय के आंकड़ों के आधार पर बाढ़, सूखा और जल प्रवाह का पूर्वानुमान लगाने में सक्षम है।
- IIT दिल्ली और National Mission for Clean Ganga द्वारा गंगा नदी बेसिन का पहला Digital Twin विकसित किया जा रहा है।
- इसी प्रकार चेन्नई ने Real-Time Flood Forecasting and Spatial Decision Support System लागू किया है, जिससे शहरी बाढ़ प्रबंधन को अधिक प्रभावी बनाया गया है।
- यह तकनीक केवल आपदा प्रबंधन तक सीमित नहीं है, बल्कि जल संसाधनों के वैज्ञानिक उपयोग, जलाशयों के अनुकूल संचालन और जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के आकलन में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।
Circular Water Economy की ओर संक्रमण
- भारत अब ‘Used Water’ की अवधारणा को मुख्यधारा में ला रहा है, जिसमें अपशिष्ट जल को समस्या नहीं बल्कि संसाधन के रूप में देखा जाता है। यह परिवर्तन सर्कुलर अर्थव्यवस्था (Circular Economy) के सिद्धांत पर आधारित है, जहाँ जल का पुनः उपयोग कर प्राकृतिक मीठे जल पर निर्भरता कम की जाती है।
- National Framework for Reuse of Treated Wastewater के अंतर्गत तापीय विद्युत संयंत्रों को शोधन किए गए सीवेज जल का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
- मई 2026 तक भारत की उपचारित अपशिष्ट जल क्षमता 31,841 MLD तक पहुँच चुकी थी, जो इस दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति को दर्शाती है।
- गुजरात इस क्षेत्र में अग्रणी राज्य के रूप में उभरा है, जिसने औद्योगिक उपयोग हेतु उपचारित जल पुनर्चक्रण की व्यापक नीति लागू की है।
- यह मॉडल न केवल जल संरक्षण में सहायक है, बल्कि उद्योगों और नगरों के बीच संसाधन साझेदारी का भी उदाहरण प्रस्तुत करता है।
भूजल शासन में जनभागीदारी
- भारत का अधिकांश ग्रामीण और कृषि क्षेत्र भूजल पर निर्भर है, किंतु दशकों तक इसका प्रबंधन केंद्रीकृत और नियंत्रण आधारित रहा। ‘Atal Bhujal Yojana 2.0’ ने इस दृष्टिकोण को बदलते हुए जल शासन को ‘जन भागीदारी’ पर आधारित बनाया है।
- अब ग्राम पंचायतें स्वयं ‘Water Security Plans’ तैयार कर रही हैं और डिजिटल piezometers के माध्यम से भूजल स्तर की निगरानी की जा रही है। 8,200 से अधिक गाँवों में सामुदायिक भूजल बजटिंग लागू की जा चुकी है।
- यह मॉडल इस विचार को मजबूत करता है कि स्थानीय समुदाय अपने जल संसाधनों के सबसे प्रभावी संरक्षक हो सकते हैं। जब समुदाय स्वयं recharge, extraction और consumption का संतुलन तय करते हैं, तब जल प्रबंधन अधिक टिकाऊ और उत्तरदायी बनता है।
कृषि क्षेत्र में Demand-Side Water Management
- भारत का कृषि क्षेत्र देश के कुल मीठे जल का लगभग 80-89 प्रतिशत उपयोग करता है। लंबे समय तक सिंचाई नीति ‘Supply-Side Approach’ पर आधारित रही, जिसमें अधिक बांध, नहरें और जल आपूर्ति बढ़ाने पर जोर दिया गया।
- अब भारत ‘Demand-Side Management’ की ओर बढ़ रहा है, जिसका उद्देश्य जल उपयोग दक्षता बढ़ाना है। ‘Per Drop More Crop’ जैसी योजनाओं के माध्यम से ड्रिप सिंचाई, स्प्रिंकलर और fertigation को बढ़ावा दिया जा रहा है।
- कृषि मंत्रालय ने 2025-30 के बीच अतिरिक्त 100 लाख हेक्टेयर भूमि को Micro-Irrigation के अंतर्गत लाने का लक्ष्य निर्धारित किया है। यह परिवर्तन इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि जल-गहन फसलों की खेती और मुफ्त बिजली जैसी नीतियों ने भूजल दोहन को अत्यधिक बढ़ा दिया है।
- Demand-side approach कृषि उत्पादकता को जल की मात्रा से अलग करते हुए ‘कम जल में अधिक उत्पादन’ की अवधारणा को प्रोत्साहित करता है।
Sponge City और शहरी जल सहनशीलता
- तेजी से शहरीकरण ने प्राकृतिक जल निकासी तंत्र, wetlands और recharge क्षेत्रों को नष्ट कर दिया है, जिसके परिणामस्वरूप शहर एक साथ बाढ़ और जल संकट दोनों का सामना कर रहे हैं।
- ‘Sponge City’ मॉडल इस समस्या का समाधान प्रस्तुत करता है। इस मॉडल में permeable pavements, wetlands restoration और artificial aquifer recharge जैसी तकनीकों का उपयोग किया जाता है, ताकि वर्षा जल का स्थानीय स्तर पर अवशोषण और पुनर्भरण हो सके।
- Mission Amrit Sarovar 2.0 के अंतर्गत 80,000 से अधिक जल निकायों का पुनर्जीवन किया गया है। चेन्नई की ‘Blue-Green Master Plan’ ने शहर की flood-retention capacity में 20 प्रतिशत वृद्धि की है।
- यह मॉडल दर्शाता है कि शहरी जल प्रबंधन केवल पाइपलाइन और ड्रेनेज का प्रश्न नहीं, बल्कि पारिस्थितिक योजना का विषय भी है।
वैश्विक सहयोग और जल कूटनीति
- भारत इज़राइल और डेनमार्क जैसे देशों के साथ जल प्रबंधन में तकनीकी साझेदारी बढ़ा रहा है। India-Israel Water Cooperation के अंतर्गत ड्रिप सिंचाई, desalination और wastewater recycling तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है।
- इसी प्रकार India-Denmark Green Strategic Partnership स्मार्ट जल प्रबंधन और ऊर्जा-कुशल शहरी जल प्रणालियों को बढ़ावा दे रही है।
- इन सहयोगों के माध्यम से भारत आधुनिक जल प्रबंधन तकनीकों को अपनाने के साथ-साथ जल उपयोग दक्षता में सुधार कर रहा है।
सतत जल शासन के समक्ष प्रमुख चुनौतियाँ
- भारत का जल शासन अभी भी कई गंभीर चुनौतियों से घिरा हुआ है। संघीय ढाँचे में अस्पष्टता के कारण जल विवाद राजनीतिक संघर्ष का रूप ले लेते हैं। मेकेदातु और यमुना जल विवाद इसके प्रमुख उदाहरण हैं।
- कृषि क्षेत्र में MSP और मुफ्त बिजली जैसी नीतियाँ शुष्क क्षेत्रों में भी धान और गन्ने जैसी जल-गहन फसलों को बढ़ावा देती हैं, जिससे ‘Virtual Water Export’ की स्थिति उत्पन्न होती है।
- भूजल शासन में सबसे बड़ी समस्या यह है कि Easement Act के कारण जल अधिकार भूमि स्वामित्व से जुड़े हुए हैं, जिसके कारण अनियंत्रित दोहन बढ़ता है। भारत विश्व का सबसे बड़ा भूजल उपभोक्ता है और प्रतिवर्ष 230 BCM से अधिक भूजल निकालता है।
- जलवायु परिवर्तन ने इस संकट को और गंभीर बना दिया है। मानसून की अनिश्चितता, अत्यधिक वर्षा, सूखा और हिमालयी ग्लेशियरों का पिघलना भविष्य की जल सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन चुके हैं।
आगे की राह
- भारत को सतत जल शासन के लिए बहुआयामी रणनीति अपनानी होगी। भूजल को ‘Common Pool Resource’ मानते हुए Public Trust Doctrine लागू करना आवश्यक है।
- River Basin Authorities का गठन कर नदी प्रबंधन को वैज्ञानिक और पारिस्थितिक आधार प्रदान किया जाना चाहिए। कृषि नीति को जल उपलब्धता के अनुरूप पुनर्गठित करते हुए MSP को agro-climatic suitability से जोड़ा जाना चाहिए।
- Urban planning में Blue-Green Infrastructure और Sponge City मॉडल को अनिवार्य बनाया जाना चाहिए। साथ ही, Open Digital Hydro Data और National Water Informatics Centre जैसी व्यवस्थाएँ जल शासन को अधिक पारदर्शी और वैज्ञानिक बना सकती हैं।
निष्कर्ष
भारत का सतत जल शासन की ओर परिवर्तन केवल नीतिगत बदलाव नहीं, बल्कि विकास की एक नई वैचारिक दिशा का संकेत है। यह परिवर्तन जल को केवल उपभोग की वस्तु नहीं बल्कि पारिस्थितिक संतुलन, सामाजिक न्याय और दीर्घकालिक विकास के आधार के रूप में स्वीकार करता है।
यदि भारत सामुदायिक भागीदारी, तकनीकी नवाचार, जल पुनर्चक्रण और जलवायु-अनुकूल नीतियों को प्रभावी ढंग से लागू करता है, तो वह जल संकट को जल सुरक्षा में परिवर्तित कर सकता है।
अंततः भारत के लिए जल शासन का भविष्य केवल बड़े बांधों और परियोजनाओं में नहीं, बल्कि ‘Hydro-Solidarity’, पारिस्थितिक संवेदनशीलता और सहभागी शासन की भावना में निहित है।
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