भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी चुनावी व्यवस्था मानी जाती है। विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र में नियमित, शांतिपूर्ण और व्यापक चुनावों का सफल आयोजन केवल प्रशासनिक उपलब्धि नहीं, बल्कि संवैधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता का भी प्रमाण है। इसी कारण भारत का निर्वाचन आयोग केवल एक प्रशासनिक संस्था नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक संरचना का केंद्रीय स्तंभ माना जाता है। किंतु हाल के वर्षों में मुख्य निर्वाचन आयुक्त (CEC) और अन्य निर्वाचन आयुक्तों (ECs) की नियुक्ति प्रक्रिया को लेकर उत्पन्न विवाद ने इस संस्था की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर गंभीर बहस को जन्म दिया है।
हाल ही में Supreme Court of India में हुई सुनवाई के दौरान न्यायालय ने केंद्र सरकार की प्रमुख भूमिका पर प्रश्न उठाते हुए कहा कि स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव तभी संभव हैं, जब Election Commission of India वास्तव में स्वतंत्र हो तथा उसकी स्वतंत्रता केवल वास्तविक ही नहीं बल्कि दृश्य रूप में भी दिखाई दे। यह टिप्पणी “मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त (नियुक्ति, सेवा की शर्तें और कार्यकाल) अधिनियम, 2023” की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई के दौरान की गई।
यह विवाद केवल नियुक्ति प्रक्रिया का प्रशासनिक प्रश्न नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की उस मूल अवधारणा से जुड़ा है, जिसके केंद्र में निष्पक्ष चुनाव, संवैधानिक संतुलन और संस्थागत स्वतंत्रता निहित है।
निर्वाचन आयोग : संवैधानिक स्थिति और भूमिका
भारतीय संविधान के भाग XV में अनुच्छेद 324 से 329 तक चुनाव संबंधी प्रावधान दिए गए हैं। अनुच्छेद 324 विशेष रूप से निर्वाचन आयोग की स्थापना और उसके अधिकारों का आधार प्रदान करता है। इसके अनुसार संसद, राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति तथा राज्य विधानमंडलों के चुनावों का “पर्यवेक्षण, निर्देशन और नियंत्रण” निर्वाचन आयोग के अधीन होगा।
संविधान निर्माताओं ने निर्वाचन आयोग को एक स्वतंत्र संस्था के रूप में परिकल्पित किया था, ताकि चुनाव प्रक्रिया कार्यपालिका के प्रभाव से मुक्त रह सके। संविधान सभा की बहसों में डॉ. भीमराव आंबेडकर ने स्पष्ट किया था कि लोकतंत्र की सफलता निष्पक्ष चुनावों पर निर्भर करती है और निष्पक्ष चुनाव तभी संभव हैं जब चुनाव कराने वाली संस्था राजनीतिक प्रभाव से मुक्त हो।
हालांकि संविधान में निर्वाचन आयोग की स्थापना और शक्तियों का उल्लेख तो किया गया, किंतु नियुक्ति प्रक्रिया के संबंध में केवल इतना कहा गया कि संसद कानून बनाकर इस विषय को विनियमित कर सकती है। अनुच्छेद 324(2) के अनुसार मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाएगी, “संसद द्वारा बनाए गए कानून के अधीन”।
यहीं से समस्या की शुरुआत होती है। संविधान लागू होने के सात दशकों से अधिक समय तक संसद ने नियुक्ति प्रक्रिया को स्पष्ट करने वाला कोई कानून नहीं बनाया। परिणामस्वरूप नियुक्तियाँ व्यावहारिक रूप से कार्यपालिका की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती रहीं।
नियुक्ति प्रक्रिया पर उठते प्रश्न
स्वतंत्र भारत के शुरुआती दशकों में निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर गंभीर प्रश्न अपेक्षाकृत कम उठे। सुकुमार सेन, टी.एन. शेषन और जे.एम. लिंगदोह जैसे निर्वाचन आयुक्तों ने संस्था की साख को मजबूत किया। विशेष रूप से T. N. Seshan ने 1990 के दशक में चुनाव सुधारों को नई दिशा दी और यह स्थापित किया कि निर्वाचन आयोग राजनीतिक दलों से ऊपर एक स्वतंत्र संवैधानिक संस्था है।
किंतु समय के साथ चुनाव आयोग की निष्पक्षता को लेकर संदेह बढ़ने लगे। विभिन्न विपक्षी दलों और नागरिक संगठनों ने आरोप लगाया कि आयोग कई मामलों में सत्तारूढ़ दल के प्रति नरम रवैया अपनाता है। आचार संहिता उल्लंघन, चुनावी भाषणों पर कार्रवाई, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों पर विवाद तथा चुनाव कार्यक्रमों की घोषणा जैसे मुद्दों पर आयोग की निष्पक्षता पर लगातार बहस होती रही।
इसी पृष्ठभूमि में नियुक्ति प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और बहु-सदस्यीय बनाने की मांग तेज हुई।
अनूप बरनवाल मामला : न्यायपालिका का हस्तक्षेप
वर्ष 2023 में Anoop Baranwal vs Union of India Judgment भारतीय संवैधानिक इतिहास का एक महत्वपूर्ण निर्णय बनकर सामने आया। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कहा कि जब तक संसद इस विषय पर कानून नहीं बनाती, तब तक मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति एक समिति की सिफारिश पर की जाएगी, जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता तथा भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल होंगे।
न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता संविधान की मूल संरचना (Basic Structure) से जुड़ी हुई है। यदि नियुक्ति प्रक्रिया पूरी तरह कार्यपालिका के नियंत्रण में होगी, तो आयोग की स्वतंत्रता प्रभावित हो सकती है।
इस निर्णय में न्यायालय ने कई पूर्ववर्ती निर्णयों का उल्लेख किया, जिनमें लोकतंत्र और स्वतंत्र चुनावों को संविधान की आधारभूत विशेषता माना गया था। विशेष रूप से इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण (1975) तथा केशवानंद भारती मामला (1973) में न्यायालय ने लोकतंत्र और विधि के शासन को संविधान की मूल संरचना का हिस्सा माना था।
अनूप बरनवाल निर्णय को व्यापक रूप से चुनाव सुधारों की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना गया। किंतु इसके कुछ ही महीनों बाद संसद ने “मुख्य निर्वाचन आयुक्त और अन्य निर्वाचन आयुक्त अधिनियम, 2023” पारित कर दिया।
2023 का अधिनियम और नया विवाद
2023 के अधिनियम के तहत नियुक्ति समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और प्रधानमंत्री द्वारा नामित एक केंद्रीय मंत्री को शामिल किया गया। अर्थात् मुख्य न्यायाधीश को समिति से बाहर कर दिया गया।
यहीं से नया विवाद प्रारंभ हुआ। आलोचकों का कहना है कि इस व्यवस्था में तीन में से दो सदस्य कार्यपालिका से होंगे, जिससे सरकार का प्रभाव स्वाभाविक रूप से बढ़ जाएगा। विपक्षी दलों और कई संवैधानिक विशेषज्ञों ने इसे निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता के लिए खतरा बताया।
हाल ही में सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति Justice Dipankar Datta ने टिप्पणी की कि चयन समिति में “एक भी पूर्णतः तटस्थ व्यक्ति” नहीं है। न्यायालय ने यह भी पूछा कि क्या विपक्ष के नेता की उपस्थिति केवल औपचारिक बनकर रह जाएगी, क्योंकि नियुक्तियाँ बहुमत के आधार पर हो सकती हैं।
न्यायालय की यह टिप्पणी अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह केवल कानूनी वैधता का प्रश्न नहीं उठाती, बल्कि लोकतांत्रिक नैतिकता और संस्थागत विश्वास की भी चर्चा करती है।
कार्यपालिका बनाम संस्थागत स्वतंत्रता
केंद्र सरकार की ओर से उपस्थित अटॉर्नी जनरल R. Venkataramani ने तर्क दिया कि संसद सर्वोच्च विधायी संस्था है और न्यायालय संसद का “दूसरा सदन” नहीं बन सकता। उनके अनुसार न्यायालय यह निर्देश नहीं दे सकता कि संसद किस प्रकार का कानून बनाए।
यह तर्क संवैधानिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है। भारतीय संविधान शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) के सिद्धांत पर आधारित है, जिसके अंतर्गत विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास किया गया है। संसद को कानून बनाने का अधिकार है, जबकि न्यायपालिका कानूनों की संवैधानिकता की समीक्षा करती है।
किंतु प्रश्न यह है कि यदि संसद ऐसा कानून बनाए जिससे किसी संवैधानिक संस्था की स्वतंत्रता प्रभावित हो, तो क्या न्यायपालिका हस्तक्षेप कर सकती है? भारतीय संवैधानिक व्यवस्था में इसका उत्तर “हाँ” है।
यही कारण है कि न्यायालय ने बार-बार यह कहा है कि स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव संविधान की मूल संरचना का हिस्सा हैं। यदि चुनाव प्रक्रिया ही निष्पक्ष न रहे, तो लोकतंत्र केवल औपचारिकता बनकर रह जाएगा।
निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता क्यों आवश्यक है?
निर्वाचन आयोग केवल चुनाव कराने वाली संस्था नहीं है। वह लोकतांत्रिक प्रतिस्पर्धा का संरक्षक है। यदि राजनीतिक दलों को यह विश्वास न हो कि चुनाव निष्पक्ष होंगे, तो लोकतंत्र की वैधता ही कमजोर पड़ जाएगी।
विश्व के अनेक लोकतंत्रों में चुनाव आयोग या निर्वाचन निकायों की नियुक्ति प्रक्रिया को बहु-सदस्यीय और संतुलित बनाया गया है। कई देशों में न्यायपालिका, विपक्ष तथा नागरिक समाज की भागीदारी सुनिश्चित की जाती है, ताकि किसी एक संस्था का प्रभुत्व न हो।
भारत में भी नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG), केंद्रीय सतर्कता आयोग (CVC), लोकपाल तथा सूचना आयोग जैसी संस्थाओं के लिए बहु-सदस्यीय चयन समितियों की व्यवस्था की गई है। ऐसे में निर्वाचन आयोग जैसी अत्यंत महत्वपूर्ण संस्था के लिए संतुलित प्रक्रिया की मांग स्वाभाविक प्रतीत होती है।
न्यायपालिका की भूमिका और सीमाएँ
हालांकि इस पूरे विवाद में न्यायपालिका की भूमिका पर भी बहस हो रही है। कुछ संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि अनूप बरनवाल निर्णय में न्यायालय ने विधायी क्षेत्र में प्रवेश किया। दूसरी ओर समर्थकों का तर्क है कि जब संसद लंबे समय तक कानून बनाने में विफल रही, तब न्यायालय का हस्तक्षेप आवश्यक था।
भारतीय न्यायपालिका ने कई अवसरों पर “संवैधानिक शून्यता” (constitutional vacuum) को भरने के लिए दिशा-निर्देश जारी किए हैं। विशाखा बनाम राजस्थान राज्य (1997) इसका प्रमुख उदाहरण है, जिसमें कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न के संबंध में कानून बनने तक न्यायालय ने दिशानिर्देश जारी किए थे।
इसी प्रकार अनूप बरनवाल निर्णय को भी न्यायालय ने एक “अस्थायी व्यवस्था” के रूप में प्रस्तुत किया था, जब तक संसद कानून न बना दे। किंतु अब विवाद इस बात पर केंद्रित है कि क्या संसद द्वारा बनाया गया नया कानून संविधान की मूल भावना के अनुरूप है या नहीं।
लोकतंत्र का भविष्य और संस्थागत विश्वास
भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण लोकतंत्र में चुनावों की विश्वसनीयता अत्यंत महत्वपूर्ण है। निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता पर उठते प्रश्न केवल कानूनी विवाद नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक विश्वास के संकट का संकेत हैं।
यदि नागरिकों और राजनीतिक दलों को यह महसूस होने लगे कि चुनाव कराने वाली संस्था सरकार के प्रभाव में है, तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया की वैधता कमजोर हो सकती है। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट ने हाल की सुनवाई में कहा कि केवल स्वतंत्र होना पर्याप्त नहीं है, बल्कि संस्था का स्वतंत्र दिखाई देना भी उतना ही आवश्यक है।
भारतीय लोकतंत्र की मजबूती केवल संविधान की लिखित धाराओं पर निर्भर नहीं करती, बल्कि उन संस्थाओं की विश्वसनीयता पर भी निर्भर करती है जो संविधान की रक्षा करती हैं। निर्वाचन आयोग उनमें सबसे महत्वपूर्ण संस्थाओं में से एक है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि नियुक्ति प्रक्रिया ऐसी हो, जिसमें कार्यपालिका, विपक्ष और न्यायपालिका के बीच संतुलन दिखाई दे। इससे न केवल आयोग की वास्तविक स्वतंत्रता मजबूत होगी, बल्कि जनता का विश्वास भी बढ़ेगा।
अंततः लोकतंत्र केवल चुनाव कराने का नाम नहीं है; लोकतंत्र उस विश्वास का नाम है कि प्रत्येक नागरिक का मत स्वतंत्र, निष्पक्ष और समान रूप से महत्व रखता है। और इस विश्वास की रक्षा के केंद्र में एक स्वतंत्र निर्वाचन आयोग ही खड़ा होता है।
भारत में निर्वाचन और निर्वाचन आयोग से जुड़े प्रमुख संवैधानिक, कानूनी प्रावधानों पर एक नजर:
- भारतीय संविधान का अनुच्छेद 324 निर्वाचन आयोग को चुनावों के “पर्यवेक्षण, निर्देशन और नियंत्रण” की शक्ति प्रदान करता है।
- अनुच्छेद 324(2) के अनुसार मुख्य निर्वाचन आयुक्त एवं अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जाती है।
- अनुच्छेद 324(5) मुख्य निर्वाचन आयुक्त को सुरक्षा प्रदान करता है तथा उन्हें हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश के समान रखता है।
- अनुच्छेद 325 धर्म, जाति, लिंग आदि के आधार पर मतदाता सूची में भेदभाव को प्रतिबंधित करता है।
- अनुच्छेद 326 वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनाव कराने का प्रावधान करता है।
- अनुच्छेद 327 संसद को चुनाव संबंधी कानून बनाने की शक्ति देता है।
- अनुच्छेद 328 राज्य विधानमंडलों को राज्य चुनावों से संबंधित कानून बनाने की शक्ति प्रदान करता है।
- अनुच्छेद 329 चुनाव प्रक्रिया में न्यायालयों के हस्तक्षेप को सीमित करता है।
- जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 निर्वाचन क्षेत्रों के गठन तथा मतदाता सूची से संबंधित प्रावधान करता है।
- जनप्रतिनिधित्व अधिनियम, 1951 चुनाव संचालन, अयोग्यता, भ्रष्ट आचरण तथा चुनाव याचिकाओं से संबंधित प्रावधान करता है।
- चुनाव चिह्न (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश, 1968 राजनीतिक दलों को चुनाव चिह्न आवंटित करने का आधार प्रदान करता है।
- आदर्श आचार संहिता (Model Code of Conduct) चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों एवं उम्मीदवारों के आचरण को नियंत्रित करती है।
- सर्वोच्च न्यायालय ने केशवानंद भारती मामला (1973) में लोकतंत्र को संविधान की मूल संरचना का हिस्सा माना।
- इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण (1975) में स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों को संविधान की मूल संरचना घोषित किया गया।
- Anoop Baranwal vs Union of India Judgment में सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति हेतु बहु-सदस्यीय समिति का प्रावधान किया।
- टी.एन. शेषन बनाम भारत संघ (1995) में सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग की स्वतंत्र संवैधानिक स्थिति को मान्यता दी।
- निर्वाचन आयोग को अनुच्छेद 324 के तहत चुनाव कार्यक्रम घोषित करने और चुनाव स्थगित करने की व्यापक शक्तियाँ प्राप्त हैं।
- मुख्य निर्वाचन आयुक्त को हटाने के लिए संसद में महाभियोग जैसी विशेष प्रक्रिया आवश्यक होती है।
- निर्वाचन आयोग राजनीतिक दलों की मान्यता तथा चुनाव चिह्न संबंधी विवादों का निपटारा करता है।
- स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव भारतीय लोकतंत्र और संविधान की मूल संरचना का अनिवार्य तत्व माने जाते हैं।
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