भारत जैसे बहु-आयामी समाज में क्षेत्रवाद (Regionalism) और अलगाववाद (Secessionism) को समझना केवल राजनीतिक अध्ययन का विषय नहीं है, बल्कि यह राष्ट्र-निर्माण, पहचान, और सत्ता-संरचना की जटिल प्रक्रियाओं को समझने का माध्यम भी है।
Sanjib Baruah अपने अध्याय ‘Regionalism and Secessionism’ में इस पूरे विमर्श को एक गहरे सैद्धांतिक और व्यावहारिक दृष्टिकोण से प्रस्तुत करते हैं। उनका मुख्य उद्देश्य यह समझाना है कि भारत जैसे बहुलतावादी समाज में क्षेत्रवाद और अलगाववाद केवल विघटनकारी शक्तियाँ नहीं हैं, बल्कि वे लोकतांत्रिक और संघीय ढाँचे के भीतर विकसित होने वाली राजनीतिक प्रक्रियाएँ हैं। अंत: वह तर्क देते है कि भारत की स्थिरता ‘nation-building’ से अधिक ‘federation-building’ पर आधारित है, जहाँ विविध क्षेत्रीय पहचानों को समायोजित किया जाता है।

सैद्धांतिक रूपरेखा (Theoretical Framework)
- Baruah का दृष्टिकोण मुख्यतः constructivist है, जिसके अनुसार ‘region’ और ‘nation’ दोनों ही प्राकृतिक या स्थायी इकाइयाँ नहीं हैं, बल्कि वे ऐतिहासिक और राजनीतिक प्रक्रियाओं के माध्यम से निर्मित होती हैं।
- इस दृष्टिकोण के अनुसार, पहचान (identity) स्थिर नहीं होती, बल्कि समय, संदर्भ और सत्ता-संबंधों के अनुसार बदलती रहती है। इस प्रकार, क्षेत्रीय और राष्ट्रीय पहचान के बीच टकराव को एक स्वाभाविक या अनिवार्य संघर्ष के रूप में नहीं, बल्कि दो अलग-अलग राजनीतिक निर्माणों के बीच अंतःक्रिया के रूप में समझा जाना चाहिए।
क्षेत्रीय पहचान का निर्माण (Construction of Regional Identity)
- Baruah के अनुसार, क्षेत्रीय पहचान का निर्माण ‘territorialization of political life’ की प्रक्रिया के माध्यम से होता है। इसका अर्थ यह है कि लोग अपनी सांस्कृतिक, ऐतिहासिक और सामाजिक पहचान को एक विशेष भू-भाग से जोड़ते हैं।
- हालाँकि, यह प्रक्रिया एकरूप नहीं होती। किसी भी क्षेत्र के भीतर कई उप-पहचानें मौजूद होती हैं, जिन्हें Baruah ‘ethnic groups within ethnic groups’ के रूप में वर्णित करते हैं। उदाहरण के लिए, असम में असमिया पहचान के साथ-साथ बोडो और अन्य जनजातीय समूहों की अलग पहचान भी मौजूद है।
- इस प्रकार, क्षेत्रीय पहचान हमेशा बहुस्तरीय (multi-layered) और विवादित (contested) होती है।
भाषा, संस्कृति और क्षेत्रवाद (Language, Culture and Regionalism)
- भारत में भाषा को क्षेत्रीय पहचान का एक महत्वपूर्ण आधार माना गया है, विशेष रूप से राज्यों के भाषाई पुनर्गठन के बाद। लेकिन Baruah यह स्पष्ट करते हैं कि भाषा केवल एक कारक है।
- कई मामलों में धर्म, जातीयता, ऐतिहासिक अनुभव और आर्थिक कारक भी क्षेत्रीय पहचान को प्रभावित करते हैं। तमिलनाडु का उदाहरण यह दर्शाता है कि भाषा-आधारित पहचान समय के साथ बदल सकती है और अलगाववादी प्रवृत्तियों से लोकतांत्रिक राजनीति की ओर स्थानांतरित हो सकती है।
राष्ट्र–निर्माण और क्षेत्रीय तनाव (Nation-Building vs Regional Identity)
- Baruah यह तर्क देते हैं कि राष्ट्र-निर्माण और क्षेत्रीय पहचान के बीच एक अंतर्निहित तनाव मौजूद है। Partition इसका एक प्रमुख उदाहरण है, जहाँ पंजाब की क्षेत्रीय पहचान धर्म के आधार पर विभाजित हो गई।
- यह दर्शाता है कि राष्ट्रीय परियोजनाएँ कई बार क्षेत्रीय एकता को कमजोर कर देती हैं। इस प्रकार, राष्ट्र और क्षेत्र के बीच संबंध सहयोगात्मक न होकर अक्सर संघर्षपूर्ण होते हैं।
भारतीय राज्य की भूमिका (Role of the Indian State)
- भारतीय राज्य ने क्षेत्रवाद को दबाने के बजाय उसे समायोजित करने की नीति अपनाई है। राज्यों का भाषाई आधार पर पुनर्गठन और संघीय ढाँचे का विकास इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम रहे हैं।
- Baruah के अनुसार, भारत की सफलता ‘nation-building’ में नहीं बल्कि ‘federation-building’ में निहित है। संघवाद विभिन्न क्षेत्रों को स्वायत्तता प्रदान करता है और उन्हें राष्ट्रीय ढाँचे के भीतर बनाए रखता है।
अलगाववाद का विश्लेषण (Analysis of Secessionism)
- अलगाववाद क्षेत्रवाद का चरम रूप है, जहाँ कोई क्षेत्र स्वतंत्र राष्ट्र बनने की मांग करता है।
- Baruah के अनुसार, इसके पीछे कई कारण होते हैं, जैसे ऐतिहासिक असंतोष, सांस्कृतिक पहचान का संकट, आर्थिक उपेक्षा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व की कमी।
- इसके अतिरिक्त, अंतरराष्ट्रीय कारक भी अलगाववादी आंदोलनों को प्रभावित करते हैं। बांग्लादेश का निर्माण इसका एक प्रमुख उदाहरण है।
क्षेत्रीय आंदोलनों का विकास (Evolution of Regional Movements)
- Baruah क्षेत्रीय आंदोलनों को एक गतिशील प्रक्रिया के रूप में देखते हैं। वे ‘inverse U-curve’ का सिद्धांत प्रस्तुत करते हैं, जिसके अनुसार आंदोलन प्रारंभ में पहचान-आधारित होते हैं, फिर उग्र होकर अलगाववादी बन सकते हैं, और अंततः या तो समाहित हो जाते हैं या कमजोर पड़ जाते हैं।
- तमिल आंदोलन इसका एक महत्वपूर्ण उदाहरण है, जो समय के साथ मुख्यधारा की राजनीति में शामिल हो गया।
क्षेत्रीय पार्टियाँ और लोकतंत्र (Regional Parties and Democracy)
- समकालीन भारत में क्षेत्रीय पार्टियाँ लोकतांत्रिक व्यवस्था का अभिन्न हिस्सा बन चुकी हैं। वे राष्ट्रीय राजनीति में भागीदारी करती हैं और सत्ता-साझेदारी में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
- Baruah के अनुसार, ये पार्टियाँ भारत को कमजोर नहीं करतीं, बल्कि संघीय ढाँचे को मजबूत बनाती हैं, क्योंकि वे स्थानीय हितों को राष्ट्रीय स्तर पर प्रस्तुत करती हैं।
निष्कर्ष (Conclusion)
क्षेत्रवाद और अलगाववाद को केवल विघटनकारी शक्तियों के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वे लोकतांत्रिक राजनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो पहचान, प्रतिनिधित्व और संसाधनों के वितरण से जुड़े हुए हैं।
भारत ने क्षेत्रवाद को समाप्त नहीं किया है, बल्कि उसे सफलतापूर्वक ‘manage’ किया है। संघीय ढाँचा और लोकतांत्रिक संस्थाएँ इस प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
अतः, भारत की एकता उसकी विविधता को दबाने में नहीं, बल्कि उसे स्वीकार करने और समायोजित करने की क्षमता में निहित है।
महत्वपूर्ण तथ्य
- संजीव बरुआह के अनुसार क्षेत्र (Region) एक निर्मित (constructed) और विवादित (contested) इकाई है।
- बरुआह का दृष्टिकोण संरचनावादी (Constructivist Approach) पर आधारित है।
- ‘Region is not natural but politically produced’ – बरुआह का प्रमुख कथन है।
- ‘Ethnic groups within ethnic groups’ – एक ही क्षेत्र में कई पहचानें मौजूद होती हैं।
- क्षेत्रीय आंदोलन गतिशील (dynamic) होते हैं, स्थिर नहीं।
- बरुआह के अनुसार, क्षेत्रीय आंदोलन inverse U-curve का पालन करते हैं।
- अलगाववाद (Secession) को बरुआह ने state-shattering demand कहा है।
- भारत को ‘holding together federation’ कहा जाता है।
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