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विकसित भारत की पुनर्कल्पना

15 अगस्त 2023 को लाल किले से राष्ट्र को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2047 तक भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने का सपना देश के सामने रखा था। तब से “विकसित भारत” सरकार की लगभग हर बड़ी पहल का केंद्रीय विषय बन गया है। सरकारी योजनाएं, नीति दस्तावेज और प्रचार अभियान सभी इसी लक्ष्य के इर्द-गिर्द बुने जा रहे हैं। किंतु तीन वर्ष बीत जाने के बाद भी इस बात का गंभीर मूल्यांकन बहुत कम हुआ है कि हम इस लक्ष्य की ओर वास्तव में कितना आगे बढ़े हैं। सबसे बुनियादी प्रश्न यह है कि “विकसित” होने का अर्थ क्या है। क्या केवल ऊंची आय और तेज आर्थिक वृद्धि ही विकास है, या इसका संबंध लोगों के स्वस्थ, शिक्षित और गरिमापूर्ण जीवन से भी है?

विकसित देश की परिभाषा: आर्थिक कसौटियों का वर्चस्व

विकसित देश की कोई एक सर्वमान्य परिभाषा नहीं है। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं ने अपनी-अपनी कसौटियां तय की हैं, जिनमें अधिकतर आर्थिक मानदंडों पर आधारित हैं। इनमें प्रमुख हैं:

  1. संयुक्त राष्ट्र का आर्थिक और सामाजिक मामलों का विभाग (UNDESA)
  2. विश्व बैंक
  3. विकास सहायता समिति (DAC)
  4. अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF)
  5. पेरिस क्लब
  6. संयुक्त राष्ट्र औद्योगिक विकास संगठन (UNIDO)

इन सभी की सूचियों में काफी हद तक समानता पाई जाती है। विश्व बैंक अपने 189 सदस्य देशों को प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय (GNI) के आधार पर चार श्रेणियों में बांटता है: निम्न आय, निम्न-मध्यम आय, उच्च-मध्यम आय और उच्च आय। यह वर्गीकरण हर वर्ष 1 जुलाई को अद्यतन किया जाता है।

आंकड़ों का गणित: 2047 का लक्ष्य कितना दूर?

वित्त वर्ष 2027 के लिए विश्व बैंक ने उच्च आय वाली अर्थव्यवस्था की सीमा प्रति व्यक्ति 14,375 अमेरिकी डॉलर से अधिक GNI तय की है। इसकी तुलना में भारत की प्रति व्यक्ति GNI लगभग 2,760 डॉलर है, यानी हम इस सीमा से बहुत पीछे हैं।

गणितीय दृष्टि से देखें तो 2047 तक उच्च आय वाली अर्थव्यवस्था बनने के लिए भारत की प्रति व्यक्ति GNI को हर वर्ष लगातार लगभग 10 प्रतिशत की दर से बढ़ना होगा। परंतु वास्तविक प्रदर्शन इस अपेक्षा से काफी कम रहा है:

  1. 2022-23: 5.51 प्रतिशत वृद्धि
  2. 2023-24: 2.41 प्रतिशत वृद्धि
  3. 2024-25: 8.41 प्रतिशत वृद्धि

स्पष्ट है कि वृद्धि दर में न तो निरंतरता है और न ही वह आवश्यक स्तर तक पहुंच पाई है। यह भी ध्यान रखना होगा कि उच्च आय की सीमा स्वयं हर वर्ष ऊपर खिसकती रहती है, इसलिए लक्ष्य एक चलती हुई रेखा के समान है।

जीडीपी को लेकर राष्ट्रीय जुनून और उसका विवाद

  • विकसित राष्ट्र बनने पर सरकार के निरंतर जोर का स्वाभाविक परिणाम यह हुआ है कि जीडीपी वृद्धि दर लगभग एक राष्ट्रीय जुनून बन गई है।
  • हाल ही में वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही की जीडीपी वृद्धि दर को लेकर उठे विवाद में देश का लगभग हर प्रमुख अर्थशास्त्री किसी न किसी पक्ष में खड़ा दिखाई दिया।
  • एक पक्ष का मानना था कि अर्थव्यवस्था वास्तव में 7.8 प्रतिशत की दर से बढ़ी है।
  • दूसरा पक्ष, जिसमें एक पूर्व वित्त सचिव और एक पूर्व रिज़र्व बैंक गवर्नर भी शामिल थे, विभिन्न अपस्फीतिकारकों (deflators) और सांख्यिकीय समायोजनों पर विस्तार से तर्क देकर यह निष्कर्ष निकाल रहा था कि वास्तविक वृद्धि दर सरकारी दावे से काफी कम है।

इस बहस में कई ठोस शंकाएं उठाई गईं:

  1. यदि भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था है, तो विश्व अर्थव्यवस्थाओं में हमारी रैंकिंग क्यों खिसक रही है?
  2. विदेशी पूंजी अभूतपूर्व गति से देश से बाहर क्यों जा रही है?
  3. रुपये का मूल्य लगातार क्यों गिर रहा है?

दूसरी ओर, सरकार के पक्षधरों ने बढ़ते जीएसटी और आयकर संग्रह तथा कारों जैसी महंगी वस्तुओं की बढ़ती बिक्री को अपने तर्क के समर्थन में रखा। आम नागरिक के लिए इस विवाद से केवल इतना समझ आया कि जीडीपी की गणना सीधे नहीं होती, बल्कि उसका अनुमान लगाया जाता है, और इस अनुमान में आकलनकर्ता के पास काफी गुंजाइश रहती है।

जीडीपी विकास का अंतिम पैमाना नहीं

चाहे जो भी आंकड़ा सही हो, जीडीपी को विकास का अंतिम पैमाना नहीं माना जा सकता। मनुष्य केवल रोटी के सहारे नहीं जीता। एक सीमा के बाद आय में होने वाली वृद्धि जीवन स्तर में उसी अनुपात में सुधार नहीं लाती, क्योंकि अतिरिक्त धन प्रायः खर्च होने की बजाय बचत में चला जाता है।

कहा जा सकता है कि एक लंबा और स्वस्थ जीवन, ज्ञान से संपन्न होना और गरिमापूर्ण जीवन स्तर, ढेर सारा पैसा होने से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। इसी विचार पर आधारित होकर संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (UNDP) ने मानव विकास सूचकांक (HDI) तैयार किया, ताकि यह स्थापित किया जा सके कि किसी देश के विकास की अंतिम कसौटी उसकी जनता और उनकी क्षमताएं होनी चाहिए, न कि केवल आर्थिक वृद्धि।

इस सूचकांक की वैचारिक जड़ें पाकिस्तानी अर्थशास्त्री महबूब-उल-हक और भारतीय अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन के “क्षमता दृष्टिकोण” (Capability Approach) में हैं। 1990 में पहली मानव विकास रिपोर्ट के साथ यह सूचकांक सामने आया। सेन का मानना था कि विकास का अर्थ लोगों की वास्तविक स्वतंत्रताओं और विकल्पों का विस्तार है।

मानव विकास सूचकांक: संरचना और कार्यप्रणाली

HDI मानव विकास के तीन प्रमुख आयामों में औसत उपलब्धि का एक सारांश माप है:

जीवन स्तर

प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय (GNI)

आय के आयाम में GNI का लघुगणक (logarithm) लिया जाता है, ताकि यह दर्शाया जा सके कि आय बढ़ने के साथ उसका महत्व क्रमशः घटता जाता है। तीनों आयामों के अंकों को ज्यामितीय माध्य (geometric mean) के माध्यम से एक संयुक्त सूचकांक में बदला जाता है।

HDI और समृद्धि का संबंध

  • जिस देश का HDI 0.8 से अधिक है, उसे “बहुत उच्च मानव विकास” वाला देश माना जाता है।
  • आर्थिक कसौटियों पर विकसित माने जाने वाले अधिकांश देशों का HDI भी ऊंचा है।
  • किंतु कई आर्थिक रूप से पिछड़े देश भी ऊंचा HDI रखते हैं।
  • इसके उलट, कतर जैसे देश, जहां प्रति व्यक्ति आय दुनिया में सबसे अधिक (लगभग 88,000 डॉलर) है, विशाल आय असमानता और शैक्षिक अवसरों की कमी के कारण HDI पर उतना अच्छा प्रदर्शन नहीं कर पाते।
  • ऊंचे HDI का सबसे अधिक लाभ समाज के गरीब वर्गों को मिलता है, क्योंकि तब सभी नागरिक बेहतर स्वास्थ्य, शिक्षा और सम्मानजनक जीवन स्तर का लाभ उठा पाते हैं। निःसंकोच कहा जा सकता है कि असमान रूप से बंटी संपत्ति पर आधारित ऊंची जीडीपी की तुलना में ऊंचा HDI कहीं बेहतर है।

भारत की स्थिति: प्रगति के बावजूद लंबी दूरी

  • भारत का HDI स्कोर कुछ वर्ष पहले 0.633 था और वह 192 देशों में 132वें स्थान पर था।
  • UNDP की नवीनतम मानव विकास रिपोर्ट 2025 के अनुसार भारत का HDI मूल्य बढ़कर 0.685 हो गया है और वह 193 देशों में 130वें स्थान पर है।
  • भारत अब भी “मध्यम मानव विकास” श्रेणी में है, यद्यपि “उच्च मानव विकास” की सीमा (0.700) के निकट पहुंच गया है। उल्लेखनीय है कि असमानता के कारण भारत के HDI में लगभग 30.7 प्रतिशत की कमी आ जाती है, जो क्षेत्र में सबसे ऊंची हानियों में से एक है।
  • इस स्थिति का बड़ा कारण यह है कि हमने लगभग पूरा ध्यान आर्थिक विकास पर केंद्रित कर दिया और मानव विकास की काफी हद तक उपेक्षा की।
  • खराब सड़कें, बदहाल सार्वजनिक परिवहन और घटिया स्कूल सभी नागरिकों के कल्याण को घटाते हैं। विकसित देशों की पंक्ति में हमें तभी स्थान मिल सकता है जब हम सार्वजनिक बुनियादी ढांचे और सामाजिक उत्थान, विशेषकर स्वास्थ्य और शिक्षा पर, कहीं अधिक जोर दें।

स्वास्थ्य: लंबी आयु, पर स्वस्थ जीवन नहीं

उपलब्धियां

  • चूंकि जीवन प्रत्याशा अच्छे स्वास्थ्य से गहराई से जुड़ी है और इसे मापना भी आसान है, इसलिए HDI में स्वास्थ्य का आकलन इसी के आधार पर होता है। इस क्षेत्र में भारत ने 1950 से लंबी यात्रा तय की है:
  • जीवन प्रत्याशा 41 वर्ष से बढ़कर 72 वर्ष हो गई है।
  • मातृ एवं नवजात देखभाल, टीकाकरण, पोषण, स्वच्छता और स्वास्थ्य सेवाओं की बढ़ी पहुंच ने मातृ मृत्यु दर और शिशु मृत्यु दर में भारी कमी की है।
  • 1950 से 2026 के बीच शिशु मृत्यु दर (पहले वर्ष में बच्चे की मृत्यु का जोखिम) लगभग 90 प्रतिशत घटी है।

प्राथमिक स्वास्थ्य की कमजोरियां

भारत में दुनिया के कुछ सर्वश्रेष्ठ अस्पताल हैं, पर प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा बहुत पीछे है। सेंटर फॉर सोशल एंड इकोनॉमिक प्रोग्रेस के 2024 के कार्य-पत्र “भारत में प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा का सुदृढ़ीकरण” के अनुसार इस व्यवस्था में चार प्रमुख कमियां हैं:

  • इनपुट की कमी: कर्मचारियों और आपूर्ति का अभाव
  • प्रेरणा की कमी: ज्ञान और व्यवहार के बीच अंतर, जांच में लापरवाही, प्रति मरीज बेहद कम समय, अनुपस्थिति
  • नियामक कमियां: प्रोटोकॉल का सीमित पालन, जरूरत से ज्यादा दवाएं लिखना, समय-समय पर मान्यता का अभाव
  • जवाबदेही की कमी: अप्रभावी शिकायत निवारण और जवाबदेही तंत्र

नागरिक बुनियादी ढांचा और मिलावट

इसके साथ ही नागरिक बुनियादी ढांचे की स्थिति भी चिंताजनक है। अधिकांश नगरपालिकाएं दूषित पानी की आपूर्ति करती हैं, खुली नालियां बनी हुई हैं, कचरा निपटान व्यवस्था कमजोर है और लगभग हर वर्ग किलोमीटर में कम से कम एक झुग्गी बस्ती है। अमीर तो अपने लिए वैकल्पिक और बेहतर व्यवस्था कर लेते हैं, पर गरीब इसकी कीमत चुकाते हैं। खाद्य पदार्थों और दवाओं में मिलावट जोड़ दें, तो स्पष्ट हो जाता है कि नागरिकों पर स्वास्थ्य का कितना बोझ उन कारणों से है जिन्हें सरकार को दूर करना चाहिए था।

समग्र स्वास्थ्य की कसौटी

  • विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) स्वास्थ्य को केवल रोग के अभाव के रूप में नहीं, बल्कि पूर्ण शारीरिक, मानसिक और सामाजिक कल्याण की अवस्था के रूप में परिभाषित करता है। इस दृष्टि से देखें तो भारतीय अधिक समय तक जी तो रहे हैं, पर अधिक स्वस्थ जीवन नहीं जी रहे।
  • जन्म के समय जीवन प्रत्याशा लगभग 72 वर्ष है।
  • जबकि स्वस्थ जीवन प्रत्याशा (HALE) केवल 58-59 वर्ष है।
  • अर्थात औसत भारतीय लगभग 13 से 14 वर्ष बीमारी, विकलांगता या शारीरिक-मानसिक कमजोरी से जूझते हुए बिताता है।
  • हृदय रोग, मधुमेह, उच्च रक्तचाप, कैंसर, दीर्घकालिक गुर्दा रोग, श्वसन संबंधी विकार, गठिया और तंत्रिका संबंधी रोग करोड़ों भारतीयों को कमजोर कर रहे हैं। इससे कार्यबल की भागीदारी और उत्पादकता घटती है तथा परिवारों और सरकार दोनों का स्वास्थ्य व्यय बढ़ता है। हर भारतीय के लिए लंबा और रोगमुक्त जीवन सुनिश्चित करने हेतु एक व्यापक स्वास्थ्य नीति की आवश्यकता है।
  • राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 ने सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय को जीडीपी के 2.5 प्रतिशत तक ले जाने का लक्ष्य रखा था, किंतु यह अब भी इस लक्ष्य से नीचे बना हुआ है।

शिक्षा: उपेक्षित आधारशिला

विकसित देश की एक और पहचान अच्छी शिक्षा व्यवस्था होती है, जो ऐसे युवाओं को तैयार करती है जो विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, उद्योगों और सरकारी संस्थाओं को सक्षम मानव संसाधन दे सकें। किंतु भारत में शिक्षा एक उपेक्षित क्षेत्र बना हुआ है। सरकार स्कूलों और कॉलेजों को केवल उतना ही धन दे रही है जिससे वे किसी तरह चलते रहें।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 शैक्षिक सुधार का एक संपूर्ण रोडमैप प्रस्तुत करती है और शिक्षा पर सार्वजनिक व्यय को जीडीपी के 6 प्रतिशत तक ले जाने की बात करती है। परंतु इसके लिए आवश्यक भारी प्रयास और व्यय ने सरकार को इसे अक्षरशः और मूल भावना के साथ लागू करने से रोक रखा है। औसत स्कूली शिक्षा के वर्षों और अपेक्षित स्कूली वर्षों के बीच का अंतर बताता है कि नई पीढ़ी तो स्कूल पहुंच रही है, पर गुणवत्ता और निरंतरता की चुनौती बनी हुई है।

आगे की राह: विकास की नई परिभाषा

विकसित भारत के लक्ष्य को सार्थक बनाने के लिए दृष्टिकोण में कुछ मूलभूत बदलाव आवश्यक हैं:

  • मानव विकास में निवेश: केवल कारखानों में नहीं, बल्कि लोगों के स्वास्थ्य, शिक्षा और कौशल में निवेश को प्राथमिकता देना।
  • सार्वजनिक बुनियादी ढांचा: अच्छे सरकारी स्कूल, कुशल सार्वजनिक परिवहन, स्वच्छ पेयजल और व्यवस्थित कचरा प्रबंधन।
  • प्राथमिक स्वास्थ्य का सुदृढ़ीकरण: कर्मचारियों की कमी दूर करना, जवाबदेही तय करना और गैर-संचारी रोगों की रोकथाम पर ध्यान।
  • असमानता में कमी: वृद्धि का लाभ समाज के अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाना, ताकि असमानता के कारण HDI में होने वाली हानि घटे।
  • मूल्यांकन की पारदर्शी व्यवस्था: विकसित भारत की प्रगति को केवल जीडीपी से नहीं, बल्कि HDI, स्वस्थ जीवन प्रत्याशा और शिक्षा की गुणवत्ता जैसे संकेतकों से नियमित रूप से मापना।
  • विश्वसनीय आंकड़े: राष्ट्रीय आय के आकलन की पद्धति को अधिक पारदर्शी बनाना, ताकि आंकड़ों पर उठने वाले विवाद कम हों।

निष्कर्ष

विकसित राष्ट्र का सच्चा प्रमाण यह है कि उसका सार्वजनिक बुनियादी ढांचा इतना अच्छा हो कि हर वर्ग का नागरिक उसका उपयोग करे। कोलंबिया के राष्ट्रपति रहे अर्थशास्त्री गुस्तावो फ्रांसिस्को पेत्रो उर्रेगो ने इस विचार को बड़े सटीक ढंग से व्यक्त किया था: विकसित देश वह नहीं है जहां गरीबों के पास कारें हों, बल्कि वह है जहां अमीर भी सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करें।

विकसित भारत 2047 का सपना तभी साकार होगा जब हम विकास को केवल डॉलर और प्रतिशत की भाषा में न देखकर लोगों के जीवन की गुणवत्ता के रूप में देखें। अब समय आ गया है कि विकसित भारत की पुनर्कल्पना की जाए, जिसमें केंद्र में आंकड़े नहीं, मनुष्य हो।


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