in , ,

भारत के दल-बदल विरोधी कानून में सुधार: लोकतांत्रिक जनादेश और जवाबदेही की पुनर्स्थापना

Reforming India’s Anti-Defection Law: Restoring the Democratic Mandate and Accountability

भारत के दल-बदल विरोधी कानून में सुधार: लोकतांत्रिक जनादेश और जवाबदेही की पुनर्स्थापना

भारत में दल-बदल विरोधी कानून को लागू हुए लगभग चार दशक हो चुके हैं। इसका उद्देश्य राजनीतिक अवसरवाद पर रोक लगाना और मतदाताओं के जनादेश की रक्षा करना था। लेकिन आज यह प्रश्न पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो गया है कि क्या यह कानून वास्तव में अपने उद्देश्य को पूरा कर पा रहा है? संसद के हालिया मानसून सत्र में कई सांसदों के दल बदलने की घटनाओं ने इस बहस को फिर से केंद्र में ला दिया है।

जब जनादेश बदल जाता है, लेकिन जनप्रतिनिधि नहीं

लोकतंत्र में मतदाता किसी व्यक्ति को केवल उसके व्यक्तित्व के आधार पर नहीं चुनता, बल्कि उस राजनीतिक दल की विचारधारा, घोषणापत्र और नीतियों पर भरोसा करके अपना मत देता है। इसलिए जब कोई सांसद या विधायक चुनाव जीतने के बाद अपनी पार्टी छोड़ देता है, तो प्रश्न केवल उसके राजनीतिक भविष्य का नहीं, बल्कि मतदाता के विश्वास और जनादेश का भी होता है।

यही चुनौती भारत के दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) के सामने खड़ी है। कानून का उद्देश्य राजनीतिक खरीद-फरोख्त रोकना था, लेकिन व्यवहार में यह कई बार स्वयं राजनीतिक रणनीतियों का उपकरण बन गया है।

दलबदल विरोधी कानून की शुरुआत क्यों हुई?

1980 के दशक तक भारत में राजनीतिक दल-बदल इतनी सामान्य घटना बन चुकी थी कि सरकारों की स्थिरता पर लगातार संकट मंडराने लगा। “आया राम, गया राम” भारतीय राजनीति का प्रतीक बन गया था।

इसी पृष्ठभूमि में 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 के माध्यम से संविधान में दसवीं अनुसूची (Tenth Schedule) जोड़ी गई।

इस कानून का उद्देश्य था

  • व्यक्तिगत लाभ के लिए होने वाले दल-बदल पर रोक लगाना।
  • निर्वाचित सरकारों को स्थिरता प्रदान करना।
  • मतदाताओं के जनादेश की रक्षा करना।

बाद में 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 ने कानून को और कठोर बनाया। एक-तिहाई सदस्यों द्वारा किए गए विभाजन को मान्यता समाप्त कर दी गई और केवल दो-तिहाई सदस्यों के समर्थन वाले विलय को वैध माना गया।

फिर भी कानून प्रभावी क्यों नहीं बन पाया?

कागज़ पर यह व्यवस्था मजबूत दिखाई देती है, लेकिन व्यवहार में इसकी कई कमजोरियाँ सामने आई हैं।

सबसे बड़ी समस्या यह है कि किसी सांसद या विधायक की अयोग्यता का निर्णय लोकसभा या विधानसभा के अध्यक्ष (Speaker) तथा राज्यसभा या विधान परिषद के सभापति (Chairman) के हाथ में होता है। चूँकि ये पदाधिकारी स्वयं किसी न किसी राजनीतिक दल से जुड़े होते हैं, इसलिए उनकी निष्पक्षता को लेकर समय-समय पर प्रश्न उठते रहे हैं।

स्थिति तब और गंभीर हो जाती है जब अयोग्यता संबंधी याचिकाएँ महीनों या कई बार पूरे कार्यकाल तक लंबित रहती हैं। तब तक दल-बदल करने वाला सदस्य अपने पद का लाभ उठाता रहता है और कानून का उद्देश्य समाप्त हो जाता है।

सर्वोच्च न्यायालय ने भी जताई चिंता

  • Kihoto Hollohan बनाम Zachillhu (1992) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने दसवीं अनुसूची की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखते हुए यह स्पष्ट किया कि अध्यक्ष के निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन होंगे।
  • बाद में Keisham Meghachandra Singh बनाम Speaker, Manipur (2020) में न्यायालय ने कहा कि दल-बदल से जुड़ी याचिकाओं का निर्णय सामान्यतः तीन महीने के भीतर कर दिया जाना चाहिए।

इसके बावजूद वास्तविकता यह है कि आज भी अनेक मामलों में निर्णय वर्षों तक लंबित रहते हैं।

कानून ने नया रास्ता खोल दिया सामूहिक दलबदल

  • विडंबना यह है कि जिस कानून को व्यक्तिगत दल-बदल रोकने के लिए बनाया गया था, उसी ने सामूहिक दल-बदल को बढ़ावा दे दिया।
  • अब राजनीतिक दल किसी एक विधायक या सांसद को अपने साथ लाने के बजाय पूरे समूह को साथ लाने की रणनीति अपनाते हैं ताकि दो-तिहाई सदस्यों का आँकड़ा पूरा किया जा सके और अयोग्यता से बचा जा सके।

इस प्रकार राजनीतिक अवसरवाद समाप्त नहीं हुआ, बल्कि उसने अधिक संगठित और योजनाबद्ध रूप ले लिया।

क्या समाधान केवल कानून को और कठोर बनाना है?

एक महत्वपूर्ण सुझाव यह है कि जिस दिन कोई सांसद या विधायक उस दल से इस्तीफा दे, जिसके टिकट पर वह निर्वाचित हुआ था, उसी दिन उसकी सदस्यता स्वतः समाप्त हो जाए।

इसके बाद उसे पूर्ण स्वतंत्रता हो कि

  • वह किसी अन्य राजनीतिक दल में शामिल हो,
  • स्वतंत्र उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़े,
  • अथवा पुनः उसी क्षेत्र की जनता से नया जनादेश प्राप्त करे।

इस व्यवस्था में अंतिम निर्णय किसी अध्यक्ष या न्यायालय का नहीं, बल्कि मतदाता का होगा।

क्या इससे असहमति दब जाएगी?

  • इस प्रस्ताव की आलोचना भी की जाती है। कुछ लोगों का तर्क है कि इससे पार्टी नेतृत्व और अधिक शक्तिशाली हो जाएगा तथा सांसदों और विधायकों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति सीमित हो सकती है।
  • लेकिन यह तर्क पूरी तरह सही नहीं लगता। लोकतंत्र में किसी भी जनप्रतिनिधि को अपनी पार्टी से असहमति रखने, इस्तीफा देने या नई राजनीतिक विचारधारा अपनाने का पूरा अधिकार होना चाहिए। किंतु यदि वह ऐसा करता है, तो यह भी उचित है कि वह मतदाताओं के पास वापस जाकर नया जनादेश प्राप्त करे। लोकतंत्र में सर्वोच्च अधिकार अंततः जनता का ही होना चाहिए।

जनादेश का सम्मान या राजनीतिक सुविधा?

  • आज की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं है कि दल-बदल हो रहा है, बल्कि यह है कि दल-बदल करने के बाद भी जनप्रतिनिधि उसी निर्वाचित पद पर बने रहते हैं, जबकि मतदाताओं ने उन्हें किसी अन्य राजनीतिक दल के प्रतिनिधि के रूप में चुना था।
  • यदि जनादेश का वास्तविक सम्मान करना है, तो राजनीतिक निष्ठा बदलने के साथ-साथ जनता की स्वीकृति प्राप्त करना भी आवश्यक होना चाहिए।

निष्कर्ष: क्या अब निर्णय जनता के हाथ में होना चाहिए?

लगभग चालीस वर्षों के अनुभव ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वर्तमान दलबदल विरोधी कानून अपने मूल उद्देश्य राजनीतिक अवसरवाद पर रोक और मतदाता के जनादेश की रक्षा को पूरी तरह प्राप्त नहीं कर सका है। अध्यक्ष के निर्णयों में देरी, राजनीतिक पक्षपात की आशंका और सामूहिक दल-बदल की बढ़ती प्रवृत्ति ने इसकी प्रभावशीलता को कम कर दिया है।

ऐसे में अब समय आ गया है कि भारत इस कानून पर पुनर्विचार करे। यदि दल छोड़ने के साथ ही निर्वाचित सदस्य की सीट स्वतः रिक्त हो जाए और उसे पुनः जनता के बीच जाकर चुनाव लड़ना पड़े, तो लोकतंत्र का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत जनता ही सर्वोच्च है और अधिक मजबूत होगा।

आख़िरकार, लोकतंत्र में यह निर्णय राजनीतिक दलों या संवैधानिक पदाधिकारियों का नहीं, बल्कि मतदाताओं का होना चाहिए कि उनका प्रतिनिधित्व कौन करे। यही लोकतांत्रिक जवाबदेही की वास्तविक कसौटी है।

दलबदल विरोधी कानून (Anti-Defection Law) – PYQ (MCQ)

प्रश्न 1. भारत के संविधान की दसवीं अनुसूची के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए

  1. यदि कोई निर्वाचित सदस्य स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ देता है, तो उसे अयोग्य घोषित किया जा सकता है।
  2. दल-बदल से संबंधित अयोग्यता का निर्णय संबंधित सदन का अध्यक्ष/सभापति करता है।
  3. अध्यक्ष/सभापति का निर्णय न्यायिक समीक्षा के अधीन नहीं है।

नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a) केवल 1 और 2

प्रश्न 2. भारत के संविधान की दसवीं अनुसूची के अंतर्गत निम्नलिखित में से कौन-सी स्थिति किसी सांसद या विधायक की अयोग्यता का आधार बन सकती है?

  1. स्वेच्छा से अपनी राजनीतिक पार्टी की सदस्यता छोड़ देना।
  2. पार्टी के निर्देश (Whip) के विरुद्ध मतदान करना।
  3. सदन में अनुपस्थित रहना।

नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a) केवल 1 और 2

प्रश्न 3. 91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए

  1. इसने एक-तिहाई सदस्यों के विभाजन (Split) को मिलने वाली छूट समाप्त कर दी।
  2. केवल दो-तिहाई सदस्यों द्वारा समर्थित विलय (Merger) को मान्यता दी गई।
  3. इस संशोधन ने दसवीं अनुसूची को समाप्त कर दिया।

सही उत्तर चुनिए

(a) केवल 1 और 2
(b) केवल 2 और 3
(c) केवल 1 और 3
(d) 1, 2 और 3

उत्तर: (a) केवल 1 और 2


Discover more from Politics by RK: Ultimate Polity Guide for UPSC and Civil Services

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

What do you think?

समकालीन पश्चिमी विचारक और उनकी प्रमुख पुस्तकें

जॉन लॉक की पुस्तक Two Treatises of Government की समीक्षा