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दल-बदल कानून और दलों का विलय : 10वीं अनुसूची के नजरिए से

एक संवैधानिक विश्लेषण

जून 2026 में भारतीय राजनीति में एक असाधारण घटना घटी। तृणमूल कांग्रेस के लगभग 20 सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला को सूचित किया कि वे त्रिपुरा की एक छोटी-सी पंजीकृत पार्टी — नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया के साथ विलय कर रहे हैं। इस विलय के पीछे का असली मकसद था दल-बदल विरोधी कानून यानी दसवीं अनुसूची के प्रावधानों से बचाव। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या केवल दो-तिहाई सांसदों की संख्या से कोई वैध विलय हो सकता है? क्या संविधान की दसवीं अनुसूची इसकी अनुमति देती है? इन्हीं प्रश्नों का उत्तर खोजना इस लेख का उद्देश्य है।

दसवीं अनुसूची का जन्म: एक ऐतिहासिक जरूरत

दसवीं अनुसूची को संविधान में 52वें संशोधन अधिनियम, 1985 के माध्यम से जोड़ा गया था। इसे आम बोलचाल में “दल-बदल विरोधी कानून” कहा जाता है। इस कानून के पीछे एक गहरी ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। 1967 के आम चुनावों के बाद कई राज्य सरकारें दल-बदलू विधायकों की वजह से पलट गई थीं। जनता किसी पार्टी की विचारधारा और कार्यक्रम को देखकर वोट देती है। जब कोई विधायक चुनाव जीतने के बाद अपनी पार्टी बदल लेता है, तो वह मतदाता के जनादेश को ही उलट देता है। यह लोकतंत्र की आत्मा पर सीधा प्रहार है।

सर्वोच्च न्यायालय ने किहोतो होल्लोहन बनाम ज़ाचिल्हू (1992) के मामले में दसवीं अनुसूची की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा और लोकतांत्रिक स्थिरता में इसकी भूमिका को रेखांकित किया। न्यायालय ने यह भी कहा कि राजनीतिक दल भारतीय लोकतंत्र की धुरी हैं और दल-बदल कानून इस ढाँचे की रक्षा करता है।

अनुच्छेद 2: अयोग्यता के प्रावधान

दसवीं अनुसूची के अनुच्छेद 2 के अनुसार, किसी सदन का सदस्य अयोग्य घोषित हो सकता है यदि वह स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ दे, या पार्टी व्हिप के विपरीत मतदान करे अथवा मतदान से अनुपस्थित रहे।

यहाँ एक महत्वपूर्ण बात यह है कि “स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ना” का अर्थ केवल औपचारिक इस्तीफा नहीं है। रवि एस. नाइक बनाम भारत संघ (1994) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी सदस्य का आचरण भी यह संकेत दे सकता है कि उसने अपनी पार्टी छोड़ दी है, भले ही उसने औपचारिक इस्तीफा न दिया हो। अर्थात् यदि कोई सांसद अपनी पार्टी के विरुद्ध काम करने लगे, तो वह भी अयोग्यता का आधार बन सकता है।

अनुच्छेद 4: विलय का अपवाद

दसवीं अनुसूची का अनुच्छेद 4 विलय के मामले में एक संकीर्ण अपवाद प्रदान करता है। इस प्रावधान के अनुसार, यदि किसी राजनीतिक दल का किसी अन्य दल में विलय होता है और विधायक दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य उस विलय से सहमत हों, तो ऐसे सदस्यों पर अयोग्यता का प्रावधान लागू नहीं होगा।

91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 से पहले एक-तिहाई सदस्यों द्वारा दल-बदल को भी “विभाजन” मानकर संरक्षण दिया जाता था। लेकिन इस संशोधन ने उस “विभाजन” वाले अपवाद को समाप्त कर दिया। यहीं से असली संवैधानिक पेंच शुरू होता है।

राजनीतिक दल और विधायक दल: दो अलग अवधारणाएँ

दसवीं अनुसूची में एक बुनियादी भेद किया गया है, राजनीतिक दल और विधायक दल के बीच। अनुच्छेद 1(ख) में विधायक दल को सदन के उन सदस्यों के समूह के रूप में परिभाषित किया गया है जो किसी राजनीतिक दल से संबंधित हों। यानी विधायक दल, राजनीतिक दल का एक अंग है, उसके बराबर नहीं।

सर्वोच्च न्यायालय ने यह तर्क खारिज कर दिया कि “राजनीतिक दल” को “विधायक दल” के रूप में पढ़ा जाए, और कहा कि ऐसी व्याख्या से दसवीं अनुसूची के प्रावधान निरर्थक हो जाएंगे।

सुभाष देसाई बनाम प्रधान सचिव, महाराष्ट्र के राज्यपाल (2023) में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा कि राजनीतिक दल और विधायक दल दो अलग-अलग संस्थाएँ हैं। केवल विधायी संख्या बल के आधार पर मूल राजनीतिक दल की पहचान तय नहीं की जा सकती। यह निर्णय अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि इसी के आधार पर तृणमूल कांग्रेस के विद्रोही सांसदों के दावे को चुनौती दी जा सकती है।

तृणमूल-एनसीपीआई प्रकरण: एक कानूनी युक्ति

जून 2026 में तृणमूल कांग्रेस के विद्रोही सांसदों ने लोकसभा अध्यक्ष से मुलाकात की और घोषणा की कि वे नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया के साथ विलय कर रहे हैं और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का समर्थन करेंगे। यह पार्टी त्रिपुरा की एक पंजीकृत लेकिन गैर-मान्यता प्राप्त दल है, जिसकी कोई उल्लेखनीय राजनीतिक उपस्थिति नहीं है। 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में इस पार्टी के उम्मीदवार नोटा से भी पीछे रह गए थे।

विद्रोही गुट का तर्क था कि चूँकि वे तृणमूल कांग्रेस के कुल लोकसभा सांसदों के दो-तिहाई हैं, इसलिए वे दसवीं अनुसूची के अनुच्छेद 4 के तहत संरक्षण के हकदार हैं।

लेकिन तृणमूल कांग्रेस के संसदीय दल के नेता अभिषेक बनर्जी ने इस तर्क को सिरे से खारिज किया। उन्होंने अध्यक्ष को लिखे पत्र में महाराष्ट्र राजनीतिक संकट पर सर्वोच्च न्यायालय के संविधान पीठ के 2023 के निर्णय का हवाला दिया और कहा कि 91वें संशोधन के बाद वैध विलय के लिए दो शर्तें एक साथ पूरी होनी चाहिए। पहली, राजनीतिक दल का विलय हो और दूसरी, विधायक दल के दो-तिहाई सदस्य उससे सहमत हों।

दो शर्तें: दोनों एक साथ जरूरी

यह पूरे विवाद की धुरी है। क्या दसवीं अनुसूची का अनुच्छेद 4 केवल दो-तिहाई संख्या पर आधारित है, या पार्टी-स्तरीय निर्णय भी जरूरी है?

अनुच्छेद 4 का सावधानी से पठन करने पर यह स्पष्ट होता है कि “जहाँ उसके मूल राजनीतिक दल का विलय होता है” ये शब्द इंगित करते हैं कि विलय की बुनियाद राजनीतिक दल में ही होनी चाहिए। दो-तिहाई की शर्त केवल यह तय करती है कि कितने सदस्य उस संरक्षण के लाभार्थी होंगे।

राजेंद्र सिंह राणा बनाम स्वामी प्रसाद मौर्य (2007) में सर्वोच्च न्यायालय ने “दो टोपी सिद्धांत” को खारिज किया था, जिसके अनुसार विधायक एक साथ राजनीतिक दल और विधायक दल दोनों का प्रतिनिधित्व कर सकते थे। न्यायालय ने कहा था कि वैध विभाजन के लिए मूल राजनीतिक दल में विभाजन जरूरी है। यही तर्क विलय पर भी लागू होता है। यदि विभाजन केवल विधायकों की संख्या से नहीं होता था, तो विलय भी केवल संख्या से नहीं हो सकता।

विभाजन का अपवाद: अब इतिहास की बात

91वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2003 से पहले एक-तिहाई सदस्यों द्वारा किया गया विभाजन अयोग्यता से मुक्त था। लेकिन इस अपवाद को हटा दिए जाने के बाद अब केवल विलय का रास्ता बचा है। चूँकि विभाजन का अपवाद समाप्त हो चुका है, इसलिए अलग गुट बनाना अब अयोग्यता को आमंत्रित कर सकता है। यही कारण है कि विद्रोही सांसदों ने एक पंजीकृत पार्टी के साथ विलय का रास्ता चुना।

शिव सेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के विद्रोह की तरह, तृणमूल कांग्रेस के विद्रोही सांसदों ने शुरू में “असली तृणमूल कांग्रेस” होने का दावा नहीं किया, बल्कि उन्होंने एक अलग पार्टी के साथ विलय का रास्ता अपनाया। यह भारतीय राजनीति में दल-बदल की एक नई और चतुर रणनीति है।

न्यायिक दृष्टिकोण: सर्वोच्च न्यायालय के महत्वपूर्ण निर्णय

दसवीं अनुसूची पर न्यायालय ने समय-समय पर महत्वपूर्ण व्याख्याएँ दी हैं।

किहोतो होल्लोहन (1992) के निर्णय में कहा गया कि दसवीं अनुसूची संवैधानिक रूप से वैध है और लोकतांत्रिक स्थिरता की रक्षा करती है।

राजेंद्र सिंह राणा (2007) में न्यायालय ने स्पष्ट किया कि अध्यक्ष को अयोग्यता याचिकाओं पर वस्तुनिष्ठ संवैधानिक मानकों के आधार पर फैसला करना होगा और वे अनिश्चित काल तक इसे टाल नहीं सकते।

कीशम मेघचंद्र सिंह (2020) में न्यायालय ने दल-बदल मामलों में देरी पर चिंता व्यक्त की और कहा कि अध्यक्ष को सामान्यतः तीन महीने के भीतर फैसला करना चाहिए।

सुभाष देसाई (2023) में न्यायालय ने राजनीतिक दल और विधायक दल के बीच स्पष्ट भेद किया और कहा कि 91वें संशोधन के बाद विभाजन का अपवाद पूरी तरह समाप्त हो चुका है।

दसवीं अनुसूची की कमजोरियाँ और सुधार की जरूरत

दसवीं अनुसूची में कई खामियाँ हैं। यह राजनीतिक दलों को दल-बदल के लिए प्रोत्साहित करने या दल-बदलुओं को स्वीकार करने पर कोई दंड नहीं देती। यह कानून विधायकों की वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को बाधित करता है और उन्हें जनता के प्रति नहीं बल्कि पार्टी नेतृत्व के प्रति जवाबदेह बनाता है। इसके अतिरिक्त, अयोग्यता मामलों के निपटान के लिए कोई स्पष्ट समय-सीमा नहीं है और अध्यक्ष राजनीतिक दबाव में आकर मामलों में देरी कर सकते हैं।

विद्वानों का सुझाव है कि अनुच्छेद 4 के विलय प्रावधान की समीक्षा की जानी चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि यह वास्तविक राजनीतिक पुनर्संरेखण को सुगम बनाए, न कि सामूहिक दल-बदल की आड़ बने। इसके साथ ही, विलय की पहचान के लिए स्पष्ट कानूनी दिशानिर्देश भी जरूरी हैं।

निष्कर्ष: विलय संख्या से नहीं, दल के निर्णय से होता है

दसवीं अनुसूची एक सरल लेकिन गहरे सिद्धांत पर टिकी है। जिस पार्टी की विचारधारा और कार्यक्रम पर जनता ने वोट दिया है, उस राजनीतिक निष्ठा को बाद में कैजुअली नहीं छोड़ा जा सकता।

अनुच्छेद 4 एक संकीर्ण अपवाद है। वह तब लागू होता है जब राजनीतिक दल स्वयं किसी संरचनात्मक परिवर्तन से गुजरता है। यदि विधायकों की बड़ी संख्या को ही विलय का आधार माना जाए, तो दसवीं अनुसूची की पूरी भावना पलट जाएगी। यह कानून दल-बदल रोकने के लिए बना था, लेकिन तब यह दल-बदल का सबसे परिष्कृत माध्यम बन जाएगा।

दसवीं अनुसूची के तहत विलय का जन्म सदन में नहीं होता, इसकी उत्पत्ति राजनीतिक दल में होनी चाहिए। यही संविधान की मंशा है, यही न्यायालय की व्याख्या है, और यही लोकतंत्र की रक्षा का तकाजा भी।

परीक्षा उपयोगी वन लाइनर

  • दसवीं अनुसूची को 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा संविधान में जोड़ा गया।
  • इसे “दल-बदल विरोधी कानून” के नाम से जाना जाता है।
  • 1967 के चुनावों के बाद विधायकों की दल-बदल की प्रवृत्ति के कारण कई राज्य सरकारें अस्थिर हो गई थीं, यही इसका मूल कारण था।
  • इस कानून को लागू कराने की शक्ति सदन के अध्यक्ष अथवा सभापति को दी गई है।
  • यदि कोई सदस्य स्वेच्छा से अपनी पार्टी की सदस्यता छोड़ दे तो वह अयोग्य हो जाता है।
  • पार्टी व्हिप के विरुद्ध मतदान करना या अनुपस्थित रहना भी अयोग्यता का आधार है।
  • औपचारिक इस्तीफा आवश्यक नहीं, आचरण से भी अयोग्यता सिद्ध हो सकती है — रवि एस. नाइक बनाम भारत संघ (1994)।
  • निर्दलीय सदस्य यदि चुनाव के बाद किसी दल में शामिल हो तो अयोग्य हो जाता है।
  • मनोनीत सदस्य को शपथ के छह माह बाद किसी दल में शामिल होने पर अयोग्यता लागू होती है।
  • विलय की स्थिति में अयोग्यता लागू नहीं होती, बशर्ते दो-तिहाई सदस्य सहमत हों।
  • सदन के पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष/सभापति) को स्वेच्छा से दल-बदल करने पर अयोग्यता नहीं लागू होती।
  • 91वें संशोधन से पूर्व एक-तिहाई सदस्यों द्वारा विभाजन (Split) भी अपवाद था, जिसे 2003 में समाप्त कर दिया गया।
  • वैध विलय के लिए दो शर्तें एक साथ पूरी होनी चाहिए — मूल राजनीतिक दल का विलय हो और विधायक दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य सहमत हों।
  • केवल दो-तिहाई संख्या बल से विलय नहीं होता, राजनीतिक दल का निर्णय भी अनिवार्य है।
  • विलय का जन्म सदन में नहीं, राजनीतिक दल में होना चाहिए।
  • विलय के लिए छोटी या अमान्यता प्राप्त पार्टी के साथ भी विलय किया जा सकता है, किंतु यह न्यायिक परीक्षण के अधीन होगा।
  • राजनीतिक दल और विधायक दल संविधान की दृष्टि में दो अलग-अलग संस्थाएँ हैं।
  • विधायक दल, राजनीतिक दल का अंग है, उसका विकल्प नहीं।
  • विधायी संख्या बल से मूल राजनीतिक दल की पहचान तय नहीं होती — सुभाष देसाई बनाम महाराष्ट्र राज्यपाल (2023)।
  • “राजनीतिक दल” को “विधायक दल” नहीं माना जा सकता — मायावती बनाम मार्कंडेय चंद (1998)।

अभ्यास प्रश्न 

प्रश्न 1.दसवीं अनुसूची के अंतर्गत “राजनीतिक दल” और “विधायक दल” के बीच संवैधानिक भेद को स्पष्ट करते हुए विश्लेषण कीजिए कि विधायक दल के दो-तिहाई सदस्यों का समर्थन मात्र किसी वैध विलय के लिए पर्याप्त क्यों नहीं है।

प्रश्न 2.91वें संविधान संशोधन, 2003 ने दल-बदल विरोधी कानून की प्रकृति को किस प्रकार बदला? “विभाजन से विलय की राजनीति” की ओर हुए बदलाव के संदर्भ में दसवीं अनुसूची की प्रासंगिकता एवं सीमाओं पर विचार कीजिए।

प्रश्न 3.“दसवीं अनुसूची दल-बदल रोकने के लिए बनाई गई थी, परंतु विलय का प्रावधान स्वयं एक परिष्कृत दल-बदल का माध्यम बन गया है।” इस कथन की समालोचनात्मक समीक्षा कीजिए।


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