भारत का संविधान केवल शासन संचालन का दस्तावेज़ नहीं, बल्कि एक ऐसे राष्ट्र-निर्माण का खाका है जो भाषाई, सांस्कृतिक, धार्मिक और क्षेत्रीय विविधताओं से परिपूर्ण है। स्वतंत्रता प्राप्ति के समय संविधान निर्माताओं के सामने सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न था क्या भारत एकात्मक (Unitary) राज्य होगा या संघीय (Federal) व्यवस्था अपनाएगा? संविधान सभा में इस विषय पर व्यापक और गंभीर बहस हुई।
इन बहसों का परिणाम भारतीय संघवाद के उस अनूठे मॉडल के रूप में सामने आया, जिसमें एक सशक्त केंद्र और स्वायत्त राज्यों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास किया गया।
भारत में संघवाद की आवश्यकता क्यों थी?
- स्वतंत्रता के समय भारत एक अत्यंत विविधतापूर्ण समाज था। विभिन्न भाषाएँ, संस्कृतियाँ, जातीय समूह और पूर्व रियासतें भारतीय भूभाग का हिस्सा थीं। ऐसी स्थिति में एक पूर्णतः एकात्मक शासन प्रणाली न तो व्यावहारिक थी और न ही लोकतांत्रिक।
- संविधान सभा के अनेक सदस्यों का मत था कि भारत की विविधता को ध्यान में रखते हुए राज्यों को पर्याप्त स्वायत्तता दी जानी चाहिए।
- कांग्रेस के वरिष्ठ नेता जे. बी. कृपलानी ने भी इस बात पर बल दिया कि संविधान संघीय स्वरूप का हो तथा राज्यों को अधिकतम स्वायत्तता प्रदान की जाए।
विभाजन के बाद बदली परिस्थितियाँ
- संविधान निर्माण की प्रक्रिया के दौरान भारत का विभाजन हुआ। विभाजन ने राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा से जुड़े गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए।
- परिणामस्वरूप संविधान सभा में यह भावना प्रबल हुई कि देश की अखंडता बनाए रखने के लिए एक मजबूत केंद्र आवश्यक है।
- फिर भी संविधान सभा ने पूर्ण एकात्मक व्यवस्था को स्वीकार नहीं किया। सदस्यों का मानना था कि भारत जैसे विशाल और बहुविविध देश में संघीय व्यवस्था ही सबसे उपयुक्त विकल्प है।
संघवाद की अवधारणा पर संविधान सभा का दृष्टिकोण
- संविधान सभा के सदस्यों ने संघवाद की अवधारणा को पश्चिमी देशों से प्रेरित होकर अपनाया, लेकिन उसे भारतीय परिस्थितियों के अनुरूप ढाला।
- अमेरिका और सोवियत संघ जैसे देशों की संघीय व्यवस्थाओं का अध्ययन किया गया। हालांकि भारतीय नेताओं ने अमेरिकी संघवाद को अधिक उपयुक्त माना क्योंकि वह लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित था।
एन. गोपालस्वामी अयंगार का दृष्टिकोण
- संविधान सभा के प्रमुख सदस्य एन. गोपालस्वामी अयंगार ने संघवाद की व्याख्या करते हुए कहा कि संघीय संविधान का मूल सिद्धांत यह है कि केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन हो तथा दोनों अपने-अपने क्षेत्र में स्वतंत्र और समन्वित रूप से कार्य करें।
- किन्तु उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि भारत का संघवाद पारंपरिक या कठोर संघवाद नहीं होगा। भारतीय परिस्थितियों में केंद्र और राज्यों को परस्पर सहयोग तथा निर्भरता के आधार पर कार्य करना होगा।
उनके अनुसार भारत की सबसे बड़ी चुनौती विभिन्न रियासतों और प्रांतों को एक राजनीतिक इकाई में संगठित करना था, जो अमेरिका जैसे देशों की ऐतिहासिक परिस्थितियों से भिन्न थी।
डॉ. भीमराव आंबेडकर और भारतीय संघवाद
संविधान के प्रमुख शिल्पकार डॉ. बी. आर. आंबेडकर ने भारतीय संघवाद की विशिष्ट प्रकृति को स्पष्ट करते हुए कहा- “भारतीय संविधान समय और परिस्थितियों की आवश्यकता के अनुसार संघीय भी है और एकात्मक भी।”
- उन्होंने बताया कि सामान्य परिस्थितियों में संविधान संघीय ढंग से कार्य करेगा, लेकिन युद्ध, राष्ट्रीय आपातकाल अथवा असाधारण परिस्थितियों में यह एकात्मक स्वरूप ग्रहण कर सकता है।
- यही कारण है कि संविधान में आपातकालीन प्रावधानों को शामिल किया गया, जिनके माध्यम से केंद्र को व्यापक शक्तियाँ प्राप्त होती हैं।
‘संघ’ शब्द का प्रयोग क्यों किया गया?
संविधान के अनुच्छेद 1 में कहा गया है- “भारत, अर्थात् इंडिया, राज्यों का एक संघ होगा।”
यहाँ “Federation” (महासंघ) के स्थान पर “Union” (संघ) शब्द का प्रयोग किया गया।
इस संबंध में डॉ. आंबेडकर ने संविधान सभा में महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण दिया।
- उन्होंने कहा कि भारत का संघ किसी समझौते या अनुबंध (Agreement) का परिणाम नहीं है। अमेरिकी संघवाद के विपरीत भारतीय राज्यों ने मिलकर संघ का निर्माण नहीं किया है। इसलिए किसी राज्य को संघ से अलग होने या पृथक होने का अधिकार नहीं होगा।
उनके शब्दों में- भारत एक अविभाज्य और अखंड संघ है।
यही कारण है कि भारतीय संघवाद को “Indestructible Union of Destructible States” अर्थात् “अविनाशी संघ और परिवर्तनीय राज्य” कहा जाता है।
भारतीय संघवाद की विशेषताएँ
संविधान सभा की बहसों से भारतीय संघवाद की निम्नलिखित विशेषताएँ उभरकर सामने आती हैं;
- शक्तियों का संवैधानिक विभाजन: संविधान की सातवीं अनुसूची में संघ सूची, राज्य सूची और समवर्ती सूची के माध्यम से शक्तियों का विभाजन किया गया।
- सशक्त केंद्र: राष्ट्रीय एकता और सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए केंद्र को अपेक्षाकृत अधिक शक्तियाँ प्रदान की गईं।
- राज्यों की स्वायत्तता: राज्यों को स्थानीय प्रशासन, कानून-व्यवस्था और क्षेत्रीय विकास जैसे विषयों पर अधिकार दिए गए।
- आपातकालीन परिस्थितियों में एकात्मक स्वरूप: आपातकाल के समय केंद्र राज्यों की शक्तियों का प्रयोग कर सकता है।
- सहकारी संघवाद की भावना: संविधान सभा का उद्देश्य केंद्र और राज्यों के बीच संघर्ष नहीं बल्कि सहयोग की व्यवस्था स्थापित करना था।
समकालीन संदर्भ में संघवाद
आज भारतीय संघवाद अनेक नई चुनौतियों का सामना कर रहा है;
- राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता,
- क्षेत्रीय पहचान की राजनीति,
- नए राज्यों की मांग,
- जीएसटी जैसी साझा संस्थाएँ,
- अंतर-राज्यीय विवाद,
- सहकारी एवं प्रतिस्पर्धी संघवाद।
इन चुनौतियों के बावजूद भारतीय संघवाद ने देश की लोकतांत्रिक एकता को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
निष्कर्ष
संविधान सभा की संघवाद संबंधी बहसें यह दर्शाती हैं कि भारतीय संविधान निर्माताओं ने न तो पूर्णतः अमेरिकी मॉडल अपनाया और न ही पूर्णतः एकात्मक व्यवस्था को स्वीकार किया। उन्होंने भारत की ऐतिहासिक, सामाजिक और राजनीतिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए एक ऐसा संघीय ढाँचा विकसित किया जिसमें विविधता और एकता, दोनों का समन्वय हो सके।
भारतीय संघवाद की सफलता इसी में निहित है कि वह राज्यों की आकांक्षाओं और राष्ट्रीय हितों के बीच संतुलन स्थापित करे। संविधान सभा की दूरदर्शिता ने भारत को एक ऐसा संघीय लोकतंत्र प्रदान किया है जो आज भी राष्ट्र की अखंडता, लोकतंत्र और विकास का आधार बना हुआ है।
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