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राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्षता

भारतीय राष्ट्र-निर्माण के दो आधार स्तंभ

भारत जैसे विशाल, विविधतापूर्ण और बहुलतावादी देश में राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्षता केवल राजनीतिक शब्दावली नहीं हैं, बल्कि वे उस सामाजिक-सांस्कृतिक चेतना का प्रतिबिंब हैं जिसने सदियों से भारतीय समाज को एक सूत्र में पिरोए रखा है। जब हम आधुनिक भारत की नींव की बात करते हैं तो यह स्पष्ट हो जाता है कि इसके दो प्रमुख आधार स्तंभ रहे हैं, पहला राष्ट्रवाद और दूसरा धर्मनिरपेक्षता। भारत का राष्ट्रवाद पश्चिमी देशों से भिन्न प्रकृति का रहा है क्योंकि यह उपनिवेशवाद विरोध से उपजा और अपने चरित्र में शुरू से ही समावेशी तथा धर्मनिरपेक्ष रहा।

औपनिवेशिक पृष्ठभूमि और राष्ट्रवाद का उदय

भारत में राष्ट्रवाद की भावना ब्रिटिश उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष के दौरान पनपी। यह कोई संयोग नहीं था कि जिस समय भारतीय जनमानस अपनी सांस्कृतिक, भाषाई, धार्मिक और भौगोलिक विविधताओं को स्वीकार करते हुए एक राष्ट्र के रूप में संगठित हो रहा था, ठीक उसी समय उपनिवेशवाद इस एकता को शोषणकारी और प्रशासनिक दृष्टि से भंग करने का प्रयास कर रहा था। स्वतंत्रता संग्राम केवल राजनीतिक सत्ता हासिल करने की लड़ाई नहीं थी, बल्कि यह एक ऐसे भारत की परिकल्पना थी जिसमें सभी वर्गों, चाहे वे मजदूर हों या किसान, को समान भागीदारी मिले। भारतीय बुद्धिजीवी वर्ग ने इस राष्ट्रवादी और देशभक्ति की भावना को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

स्वतंत्रता के पश्चात भारत एक विकासशील राष्ट्र के रूप में उभरा। आज भारत व्यापार, वाणिज्य, उद्योग, विज्ञान, प्रौद्योगिकी, अंतरिक्ष विज्ञान और खेलों के क्षेत्र में अपनी प्रतिष्ठा और गौरव बढ़ाने का प्रयास कर रहा है। जब भारत अंतरिक्ष में यान भेजता है या क्रिकेट विश्व कप जीतता है, तब यह राष्ट्रवाद की भावना और अधिक प्रबल होती दिखाई देती है। यह ध्यान रखना आवश्यक है कि भारत में राष्ट्रवाद कभी भी किसी विशेष क्षेत्र, समुदाय या वर्ग की बपौती नहीं रहा। यह किसी एक क्षेत्र, भाषा, धर्म या जाति से जुड़ा हुआ नहीं है, बल्कि बहुलतावाद में इसकी जड़ें गहरी हैं।

भारतीय धर्मनिरपेक्षता की विशिष्ट प्रकृति

धर्मनिरपेक्षता इस राष्ट्र की सबसे मजबूत नींवों में से एक रही है। विषमता और सहिष्णुता के इतिहास ने ही भारत में धर्मनिरपेक्षता को जन्म दिया। भारत जिस प्रकार की धर्मनिरपेक्षता को अपनाता है, वह पश्चिमी अवधारणा से भिन्न है। पश्चिम में धर्मनिरपेक्षता का अर्थ प्रायः राज्य और धर्म का पूर्ण पृथक्करण माना जाता है, जबकि भारत में इसका स्वरूप सर्वधर्म समभाव पर आधारित है। भारतीय संस्कृति में समावेशी और सर्वग्राही चरित्र अंतर्निहित रहा है। यह देश हिंदुओं, बौद्धों, जैनों, पारसियों, मुस्लिमों और सिखों सहित अनेक धर्मों का घर रहा है।

वेदों ने ही उस मार्ग को प्रशस्त किया जिसे आज हिंदू धर्म कहा जाता है। बौद्ध धर्म और जैन धर्म भारतीय समाज में प्रमुख हो गए और भारत में जीवित रहे। प्रत्येक धार्मिक समुदाय ने भारत के बहुधार्मिक परिवेश में अपनी अलग पहचान बनाए रखने में सफलता पाई। अशोक के शासनकाल में धार्मिक सहिष्णुता की यह भावना देखी जा सकती है। रामानंद, नानक, चैतन्य और सोलहवीं शताब्दी की कवयित्री मीरा बाई जैसे विचारकों के विचारों में यह अंतर्धार्मिक सहिष्णुता एक महत्वपूर्ण घटक रही है।

भारत विभिन्न संस्कृतियों का संगमस्थल रहा है, चाहे वे भीतर से उत्पन्न हुई हों या बाहर से आई हों। भारत की विशिष्टता उसकी सांस्कृतिक विविधता में निहित है, जो विभिन्न भाषाई, धार्मिक और सांस्कृतिक धाराओं के सह-अस्तित्व और एकीकरण से बनी है। धर्मनिरपेक्षता भारत की एक विशेष विशेषता है। भारत में धर्मनिरपेक्षता उपनिवेशवाद विरोध की एक विचारधारा के रूप में उभरी और राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया का एक अभिन्न अंग बन गई।

यह तर्क दिया जाता है कि उपनिवेशकालीन भारतीय नेताओं द्वारा प्रतिपादित धर्मनिरपेक्षता कहीं न कहीं पश्चिमी विचारों का प्रतिबिंब है। परंतु यह मान लेना भ्रामक होगा कि भारतीय धर्मनिरपेक्षता का पहले की परंपराओं और लेखन से कोई संबंध नहीं है। भारत ऐसी धर्मनिरपेक्ष भावना का उद्गम स्थल रहा है और उसने सदियों से इसका पोषण किया है। यह प्राचीन काल से सभी धर्मों के प्रति सम्मान दिखाने की समन्वयवादी अवधारणा की विरासत को आज भी वहन कर रहा है।

भारत की सनातन बहुसांस्कृतिक परंपरा

भारत की सनातन संस्कृति बहुसंस्कृतिवाद की बात करती है, जहां एक हिंदू स्वयं को हिंदू होने पर गर्व कर सकता है और साथ ही सिख होने या बौद्ध धर्म अपनाने पर भी उतना ही गर्व महसूस कर सकता है। धर्मनिरपेक्षता का अर्थ किसी विशेष धर्म का अपमान करना और दूसरे को प्रसन्न करना नहीं है। इसे ही छद्म धर्मनिरपेक्षता कहा जाता है, जो राज्य को भ्रमित करती है। यदि कोई हिंदू स्वयं को हिंदू कहता है या हिंदुत्व की महिमा पर गर्व महसूस करता है तो इसमें कुछ भी गलत नहीं है। इसका यह अर्थ कदापि नहीं है कि वह अन्य धर्मों के प्रति असहिष्णु है या धर्मनिरपेक्ष नहीं है।

प्रसिद्ध वैज्ञानिक और विज्ञान के इतिहासकार पीसी रे ने वैज्ञानिक परंपराओं और प्राचीन भारत की उपलब्धियों पर ध्यान आकर्षित करते हुए एक महत्वपूर्ण बात कही थी कि आज के हिंदू अपने पूर्वजों की गौरवगाथाओं पर उतना ही गर्व कर सकते हैं जितना कोई अन्य समुदाय। इस प्रकार का दावा किसी को भी किसी विशेष धर्म से घृणा करने के लिए प्रेरित नहीं करेगा। यदि प्रत्येक समुदाय शांति के साथ अपने धर्म का पालन करे और दूसरों के अधिकार क्षेत्र में हस्तक्षेप न करे, तो समाज में शांति बनी रहेगी। इसके विपरीत यदि यह अतिक्रमण होता है तो धार्मिक संघर्ष उत्पन्न होगा। प्रत्येक धर्म उदारवाद और मानवतावाद की बात करता है, केवल कट्टरपंथी ही किसी विशेष धर्म के मन में विषाक्त भावना भरते हैं।

संविधान में नागरिकता और धर्मनिरपेक्षता के प्रावधान

इस पूरे विमर्श को संवैधानिक दृष्टि से समझना विद्यार्थियों के लिए अत्यंत आवश्यक है। भारतीय संविधान का भाग दो, अनुच्छेद पांच से लेकर अनुच्छेद ग्यारह तक, नागरिकता से संबंधित प्रावधानों को परिभाषित करता है। संविधान निर्माताओं ने यह स्पष्ट किया कि भारतीय नागरिकता का आधार धर्म, जाति, भाषा या क्षेत्र नहीं, बल्कि जन्म, वंश, अधिवास और पंजीकरण जैसे धर्मनिरपेक्ष मानदंड होंगे। इसी भावना को आगे बढ़ाते हुए संसद ने 1955 में नागरिकता अधिनियम पारित किया, जो समय-समय पर संशोधित होता रहा है। यह इस बात का प्रमाण है कि भारतीय राष्ट्रवाद की परिकल्पना धार्मिक पहचान पर आधारित राष्ट्र-राज्य की नहीं, बल्कि नागरिक-आधारित समावेशी राष्ट्र की रही है, जो पड़ोसी देश से मौलिक रूप से भिन्न है।

धर्मनिरपेक्षता को संविधान में स्पष्ट रूप से व्यक्त करने वाले अनेक अनुच्छेद हैं। अनुच्छेद चौदह विधि के समक्ष समानता का अधिकार देता है, अनुच्छेद पंद्रह धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध करता है, और अनुच्छेद सोलह लोक नियोजन के मामलों में अवसर की समानता सुनिश्चित करता है। इससे भी महत्वपूर्ण अनुच्छेद पच्चीस से अट्ठाईस तक हैं, जो अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता प्रदान करते हैं। बयालीसवें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 के माध्यम से संविधान की प्रस्तावना में धर्मनिरपेक्ष शब्द औपचारिक रूप से जोड़ा गया, हालांकि यह मूल्य संविधान की आत्मा में शुरू से ही विद्यमान था। इस प्रकार भारतीय संविधान राज्य को किसी भी धर्म से समान दूरी बनाए रखने का निर्देश देता है, न कि धर्म से पूर्णतः विरत रहने का।

सरदार पटेल और श्यामाप्रसाद मुखर्जी का योगदान

1947 के पश्चात भारत एक संप्रभु लोकतांत्रिक गणराज्य के रूप में उभरा, परंतु भारत को एकीकृत करने की प्रक्रिया में अनेक चुनौतियां थीं। पांच सौ से अधिक रियासतों का विलय, भाषाई पुनर्गठन का प्रश्न और सांप्रदायिक तनाव जैसी समस्याएं उस समय के नेतृत्व के समक्ष खड़ी थीं। ऐसे कठिन समय में सरदार वल्लभभाई पटेल, श्यामाप्रसाद मुखर्जी और अन्य नेताओं ने विविधता में राष्ट्रीय एकता बनाए रखने के लिए कड़ा संघर्ष किया। सरदार पटेल की दूरदर्शिता और दृढ़ता के कारण ही रियासतों का भारतीय संघ में सफल विलय संभव हो सका, जिसके फलस्वरूप आज का एकीकृत भारत अस्तित्व में है। इन नेताओं का यह दृढ़ विश्वास था कि राष्ट्रवाद किसी एक क्षेत्र, भाषा, धर्म या जाति से नहीं जुड़ा होना चाहिए। वे बहुलवाद में विश्वास करते थे और यही धर्मनिरपेक्षता का मूल तत्व भी है।

समकालीन चुनौतियां और आगे की राह

भारत ने राजनीतिक, आर्थिक और भावनात्मक रूप से एकता को सुदृढ़ करने में सफलता प्राप्त की है और राष्ट्र-निर्माण की प्रक्रिया को निरंतर आगे बढ़ाया है। राजनीतिक अस्थिरता और गरीबी जैसी आर्थिक समस्याओं के बावजूद भारत अपनी राष्ट्रीय एकता और लोकतांत्रिक व्यवस्था का गौरव प्राप्त कर सकता है। परंतु आश्चर्यजनक बात यह है कि जितना अधिक हम धर्मनिरपेक्षता की बात करते हैं, उतना ही अधिक हमारा समाज सांप्रदायिक होता जाता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हम प्रत्येक वर्ग को प्रसन्न करने का प्रयास करते हैं, जिसके परिणामस्वरूप कोई भी पूर्ण रूप से संतुष्ट नहीं हो पाता। तुष्टीकरण की यह नीति बहस का विषय बनी हुई है। सरकारें कभी-कभी चुनावी लाभ हेतु किसी विशेष समुदाय के दबाव में आकर रियायतें और समझौते करती हैं, जो जटिलताओं को और बढ़ा देता है। यह इसलिए होता है क्योंकि राजनेता सामान्यतः दीर्घकालिक हितों की अपेक्षा अल्पकालिक राजनीतिक स्वार्थों को प्राथमिकता देते हैं।

धर्म एक व्यक्तिगत मामला है और राजनीति से इसका कोई संबंध नहीं होना चाहिए। सरदार पटेल ने 1950 में कहा था कि भारत एक धर्मनिरपेक्ष राज्य है और हम पाकिस्तान की भांति अपनी नीतियां या आचरण नहीं बना सकते। हमें यह सुनिश्चित करना होगा कि हमारे धर्मनिरपेक्ष आदर्श व्यवहार में वास्तव में उतारे जाएं। यहां प्रत्येक मुस्लिम को यह अनुभव होना चाहिए कि वह भारतीय नागरिक है और उसे भारतीय के रूप में समान अधिकार प्राप्त हैं। यदि हम उसे ऐसा अनुभव नहीं करा पाते, तो हम अपनी विरासत और अपने देश के योग्य नहीं होंगे।

निष्कर्ष

हमारे राष्ट्रीय नेताओं ने भारत को राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों पर निर्मित होने का स्वप्न देखा था। भारत में विकसित राष्ट्रवाद अपने चरित्र में धर्मनिरपेक्ष है। 1947 के पश्चात भारत को एकीकृत करने की प्रक्रिया में अनेक चुनौतियां आईं, परंतु राष्ट्रवादी नेताओं ने विविधता में राष्ट्रीय एकता बनाए रखने के लिए कठिन परिश्रम किया, जो हमारे राष्ट्रवाद का मूल आदर्श है। विद्यार्थियों को यह समझना चाहिए कि भारतीय राष्ट्रवाद और धर्मनिरपेक्षता कोई पश्चिमी आयातित अवधारणाएं नहीं, बल्कि भारतीय सभ्यता की सहज उपज हैं, जिन्हें हमारे संविधान ने नागरिकता, समानता और धार्मिक स्वतंत्रता के प्रावधानों के माध्यम से एक ठोस कानूनी आधार प्रदान किया है। यही वह संतुलन है जो भारत को विश्व के अन्य राष्ट्रों से अलग और विशिष्ट बनाता है।

धर्मनिरपेक्षता का भारतीय संवैधानिक पक्ष

1- मूल संविधान (1950) में “धर्मनिरपेक्ष” शब्द सम्मिलित नहीं था।

2- 42वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 द्वारा प्रस्तावना में “पंथनिरपेक्ष” शब्द जोड़ा गया।

3- यद्यपि शब्द बाद में जुड़ा, धर्मनिरपेक्षता की भावना संविधान की आत्मा में आरंभ से ही विद्यमान थी।

4. अनुच्छेद 14, विधि के समक्ष समता और विधियों के समान संरक्षण का अधिकार।

5. अनुच्छेद 15, धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर भेदभाव का निषेध।

6. अनुच्छेद 16, लोक नियोजन के विषयों में अवसर की समानता, जिसमें धर्म आधारित भेदभाव वर्जित है।

7. अनुच्छेद 25, अंतःकरण की स्वतंत्रता तथा धर्म को मानने, आचरण करने और प्रचार करने की स्वतंत्रता।

8. अनुच्छेद 26, धार्मिक मामलों के प्रबंधन की स्वतंत्रता, प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय को अपनी संस्थाएं स्थापित करने और उनका प्रबंधन करने का अधिकार।

9. अनुच्छेद 27, किसी विशेष धर्म की उन्नति हेतु कर संदाय के लिए बाध्य न किया जाना।

10. अनुच्छेद 28, कुछ शिक्षण संस्थाओं में धार्मिक शिक्षा या धार्मिक उपासना में उपस्थित होने के बारे में स्वतंत्रता।

11. अनुच्छेद 29, अल्पसंख्यक वर्गों के हितों का संरक्षण, अपनी भाषा, लिपि और संस्कृति बनाए रखने का अधिकार।

12. अनुच्छेद 30, धार्मिक और भाषायी अल्पसंख्यकों को अपनी पसंद की शिक्षण संस्थाएं स्थापित करने और प्रशासित करने का अधिकार।

13. अनुच्छेद 44, राज्य द्वारा समान नागरिक संहिता लागू करने का प्रयास, जो धार्मिक भेद के परे एकरूप कानून की दिशा में एक निदेशक सिद्धांत है।

14. अनुच्छेद 51A(e), नागरिकों का यह मूल कर्तव्य कि वे धार्मिक विविधता से परे भाईचारे की भावना का विकास करें और महिलाओं की गरिमा के अपमानजनक प्रथाओं का त्याग करें।

15. एस.आर. बोम्मई बनाम भारत संघ मामला (1994), उच्चतम न्यायालय ने धर्मनिरपेक्षता को संविधान के मूल ढांचे (Basic Structure) का अंग घोषित किया।

16. केशवानंद भारती मामला (1973) में प्रतिपादित मूल ढांचे के सिद्धांत के अंतर्गत धर्मनिरपेक्षता को संसद संशोधन द्वारा भी नहीं बदला जा सकता।

UGC NET परीक्षा हेतु प्रश्न 

प्रश्न: निम्नलिखित में से भारतीय धर्मनिरपेक्षता की अवधारणा के संबंध में कौन सा कथन सही है?

(A) भारतीय धर्मनिरपेक्षता राज्य और धर्म के पूर्ण पृथक्करण (Wall of Separation) के पश्चिमी सिद्धांत पर आधारित है।

(B) भारतीय धर्मनिरपेक्षता सर्वधर्म समभाव (Principled Distance) के सिद्धांत पर आधारित है, जिसमें राज्य आवश्यकता पड़ने पर धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप भी कर सकता है।

(C) धर्मनिरपेक्षता शब्द मूल संविधान की प्रस्तावना में 1950 से ही सम्मिलित था।

(D) भारतीय संविधान राज्य को किसी भी धार्मिक मामले में हस्तक्षेप करने से पूर्णतः प्रतिबंधित करता है।

उत्तर: (B)


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