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संसद का घटता प्रभाव

भारतीय संसद संविधान द्वारा स्थापित वह प्रतिनिधि संस्था है जिसे कानून बनाने, कार्यपालिका को जवाबदेह ठहराने और राष्ट्रीय महत्व के विषयों पर विचार विमर्श करने का दायित्व सौंपा गया है। हाल के मॉनसून सत्र की विफलता को यदि केवल किसी एक दल या सरकार की असफलता के रूप में देखा जाए तो यह विश्लेषण अधूरा रह जाएगा। वास्तविकता यह है कि संसद की कार्यक्षमता में यह गिरावट पिछले तीन दशकों की एक क्रमिक और निरंतर प्रवृत्ति है, जो सत्ता में रहे विभिन्न दलों और गठबंधनों के कार्यकाल में समान रूप से दिखाई देती है। इस लेख का उद्देश्य इस मुद्दे को दलीय राजनीति से परे, संवैधानिक संस्था के क्षरण के रूप में समझना है।

2014 से पूर्व एवं पश्चात की तुलना: आंकड़ों की सच्चाई

  • संसद की बैठकों की संख्या और कार्यशील समय में गिरावट कोई नई घटना नहीं है, परंतु इसकी गति में तीव्रता आई है।
  • 1952 से 1990 के दौरान संसद द्वारा वर्ष में औसतन पासित विधेयकों की संख्या 65 थी, जो 1991 से 2023 के बीच 48 रह गई।
  • यह गिरावट उदारीकरण के बाद के दौर में गठबंधन राजनीति के उभार के साथ शुरू हुई थी।
  • तेरहवीं और चौदहवीं लोकसभा, जो क्रमशः 1999 से 2004 और 2004 से 2009 तक कार्यरत रही, अपेक्षाकृत उच्च उत्पादकता वाली रही।
  • इन दोनों लोकसभाओं ने क्रमशः 91% और 87% उत्पादकता दर्ज की । इसके विपरीत, यूपीए द्वितीय के कार्यकाल की पंद्रहवीं लोकसभा का प्रदर्शन कमजोर रहा, जिसमें लोकसभा 61% और राज्यसभा 66% ही कार्यरत रह सकी।
  • यह अवधि 2010 के शीतकालीन सत्र और 2013 के शीतकालीन सत्र की भारी बाधाओं के लिए विशेष रूप से स्मरणीय है, जब क्रमशः दूरसंचार स्पेक्ट्रम आवंटन विवाद और आंध्र प्रदेश के विभाजन को लेकर सदन बुरी तरह बाधित रहा।
  • 2014 के पश्चात की सोलहवीं लोकसभा में कार्यशील घंटों में सुधार हुआ, परंतु सत्रहवीं लोकसभा में स्थिति फिर बिगड़ी।
  • सत्रहवीं लोकसभा (2019 से 2024) लोकसभा में 88% और राज्यसभा में 73% निर्धारित समय तक ही कार्यरत रह सकी, जो कोविड महामारी के कारण 1952 के बाद किसी भी पूर्ण कालावधि वाली लोकसभा की सबसे कम बैठकों वाली अवधि रही।
  • इस वर्तमान मॉनसून सत्र की स्थिति और भी गंभीर है, जहां लोकसभा की उत्पादकता 2024 में 95% से घटकर 2025 में 29% हो गई और 2026 के मॉनसून सत्र में यह मात्र 15% पर आ गई, जो 2016 के शीतकालीन सत्र के बाद सबसे निचला स्तर है।
  • यह आंकड़े स्पष्ट करते हैं कि गिरावट किसी विशेष दल तक सीमित नहीं, बल्कि यह प्रवृत्ति किसी एक दल या युग तक सीमित नहीं है।

संसदीय बहसों में गुणात्मक कमी

केवल बैठकों की संख्या ही महत्वपूर्ण नहीं, बल्कि विधेयकों पर चर्चा की गुणवत्ता भी उतनी ही आवश्यक है।

सत्रहवीं लोकसभा में एक सौ बहत्तर विधेयकों में से लोकसभा में छियासी और राज्यसभा में एक सौ तीन विधेयकों पर दो घंटे से भी कम चर्चा हुई, और केवल सोलह विधेयकों की लोकसभा तथा ग्यारह की राज्यसभा में बहस में तीस से अधिक सांसदों ने भाग लिया।

हाल के सत्रों में यह प्रवृत्ति और गहरी हुई है, जहां कई महत्वपूर्ण विधेयक मिनटों में पारित किए गए।

प्रश्नकाल: जवाबदेही का क्षरण

  • प्रश्नकाल संसद की जवाबदेही सुनिश्चित करने का सबसे प्रत्यक्ष माध्यम है, परंतु इसकी स्थिति निरंतर बिगड़ती गई है।
  • 2014 के बजट सत्र में प्रश्नकाल लोकसभा में सतासी प्रतिशत समय तक कार्यरत रहा, जबकि राज्यसभा में यह केवल चालीस प्रतिशत तक ही सीमित रहा।
  • 2016 के शीतकालीन सत्र में स्थिति और बिगड़ी, जहां राज्यसभा में केवल दो सौ तीस सूचीबद्ध प्रश्नों में से दो का मौखिक उत्तर मिल सका, और लोकसभा में यह अनुपात मात्र ग्यारह प्रतिशत रहा।
  • हाल के सत्रों में स्थिति और गंभीर हुई, जब एक मॉनसून सत्र में लोकसभा में प्रश्नकाल तेईस प्रतिशत और राज्यसभा में मात्र छह प्रतिशत समय तक ही चल सका। इस बार के सत्र में तो यह अनुपात और भी न्यून रहा।

शून्यकाल की उपेक्षा

  • शून्यकाल, जिसके माध्यम से सांसद अपने क्षेत्र और तात्कालिक सार्वजनिक महत्व के मुद्दे उठाते हैं, भी इसी संकट का हिस्सा बन गया है।
  • 2020 में जब संसद ने कोविड प्रतिबंधों के बीच सत्र आयोजित किया, तब सरकार ने प्रश्नकाल को स्थगित कर शून्यकाल को केवल तीस मिनट तक सीमित करने का निर्णय लिया, जिसके विरोध में आठ सौ से अधिक शिक्षाविदों, कार्यकर्ताओं और छात्रों ने लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति को पत्र लिखकर प्रश्नकाल बहाल करने और शून्यकाल को पूरे एक घंटे तक चलाने की मांग की।
  • यह घटना दर्शाती है कि कार्यपालिका के प्रति जवाबदेही सुनिश्चित करने वाले संवैधानिक उपकरणों को प्रशासनिक कारणों से भी सीमित किया जा सकता है, जिसका दीर्घकालिक प्रभाव संसदीय निगरानी की क्षमता पर पड़ता है।

संसदीय समितियों का क्रमिक पतन

  • विभागीय संबद्ध स्थायी समितियां किसी भी विधेयक की गहन तकनीकी और विशेषज्ञ जांच सुनिश्चित करती हैं। इस व्यवस्था का क्षरण सबसे चिंताजनक संकेतकों में से एक है।
  • चौदहवीं लोकसभा में साठ प्रतिशत विधेयक समितियों को भेजे गए, जो पंद्रहवीं लोकसभा में इक्कहत्तर प्रतिशत तक बढ़े, परंतु सोलहवीं लोकसभा में यह अनुपात मात्र पच्चीस प्रतिशत रह गया।
  • यह गिरावट सत्रहवीं लोकसभा में और तीव्र हुई, जहां बयासी प्रतिशत विधेयक बिना समिति संवीक्षा के ही पारित कर दिए गए, और यह अनुपात मात्र सोलह प्रतिशत तक सीमित रहा।
  • हाल में यह प्रवृत्ति और गहरी हुई है, जहां 2025 के शीतकालीन सत्र में केवल दस में से दो विधेयक ही समिति के पास भेजे गए।
  • यह ध्यान देने योग्य है कि तीन कृषि कानून, जिन्हें बाद में निरस्त करना पड़ा, तथा जम्मू कश्मीर के विशेष प्रावधानों को समाप्त करने वाला विधेयक, दोनों ही किसी संसदीय समिति की जांच के बिना पारित हुए थे।
  • समिति व्यवस्था की यह उपेक्षा किसी भी सरकार के लिए विधायी गुणवत्ता के जोखिम को बढ़ाती है, चाहे वह किसी भी दल की हो।

पीठासीन अधिकारियों की भूमिका और तटस्थता का प्रश्न

  • लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा सभापति संविधान के अनुसार सदन की तटस्थ संरक्षक भूमिका निभाने वाले पदाधिकारी हैं, परंतु व्यवहार में उनकी भूमिका बार-बार विवादों के केंद्र में रही है।
  • 2023 के शीतकालीन सत्र में एक ही सत्र में एक सौ छियालीस विपक्षी सांसदों का निलंबन इस बात का उदाहरण है कि सदन की मर्यादा बनाए रखने के नाम पर लिए गए निर्णय कितने व्यापक प्रभाव डाल सकते हैं।
  • इसी सत्र के अंत में लोकसभा अध्यक्ष ने चौहत्तर प्रतिशत और राज्यसभा सभापति ने उन्तासी प्रतिशत उत्पादकता की घोषणा की, परंतु दोनों पीठासीन अधिकारियों ने विपक्ष के व्यवहार को अनुशासनहीन और व्यवधानों को हथियार के रूप में उपयोग किए जाने की आलोचना करते हुए स्पष्ट रूप से केवल एक पक्ष, अर्थात सरकार पक्ष, का दृष्टिकोण प्रस्तुत किया।
  • यह घटना पीठासीन अधिकारियों की तटस्थता को लेकर उठने वाले प्रश्नों को रेखांकित करती है, चाहे यह अध्यक्ष किसी भी कार्यकाल में रहे हों।

नेता प्रतिपक्ष का पद: दशक भर का शून्य

  • लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष का पद संवैधानिक निगरानी व्यवस्था का महत्वपूर्ण अंग है, क्योंकि केंद्रीय जांच ब्यूरो के निदेशक, केंद्रीय सतर्कता आयुक्त और लोकपाल जैसी संस्थाओं के चयन में इस पद की भागीदारी अनिवार्य है।
  • 2014 से 2019 तक, अर्थात संपूर्ण सोलहवीं लोकसभा के दौरान, यह पद रिक्त रहा, और 2019 से 2024 तक सत्रहवीं लोकसभा में भी यह पद पुनः रिक्त रहा, जिससे यह पद कुल दस वर्ष तक खाली रहा।
  • इसका आधार यह परंपरा थी कि 1977 के अधिनियम के अनुसार यह पद विपक्ष के सबसे बड़े दल के नेता को मिलना चाहिए, परंतु लोकसभा अध्यक्षों ने पहले लोकसभा अध्यक्ष जी वी मावलंकर द्वारा स्थापित परंपरा के आधार पर दस प्रतिशत सीटों की अनौपचारिक शर्त का हवाला देकर यह पद देने से इनकार किया।
  • विशेषज्ञों का यह मानना है कि दस प्रतिशत सीटों की यह शर्त किसी विधि द्वारा स्थापित नहीं, बल्कि एक व्यावहारिक परंपरा मात्र है, जिसे कड़ाई से लागू करना विपक्ष की संवैधानिक भूमिका को कमजोर करता है।

यह मुद्दा किसी दल विशेष का न होकर, संस्था के रूप में विपक्ष की निगरानी क्षमता से जुड़ा हुआ है।

उपाध्यक्ष पद की निरंतर रिक्तता

  • अनुच्छेद 93 के अनुसार लोकसभा को यथासंभव शीघ्रता से अपना उपाध्यक्ष चुनना आवश्यक है, परंतु 2019 से ही यह पद रिक्त है।
  • यह पद परंपरागत रूप से विपक्ष के किसी सदस्य को दिया जाता रहा है, जैसा कि सोलहवीं लोकसभा में हुआ था, परंतु सत्रहवीं लोकसभा में यह पद पूरे कार्यकाल रिक्त रहा।
  • यह संवैधानिक प्रावधान की अवहेलना का ऐसा उदाहरण है जो संस्थागत संतुलन बनाए रखने की व्यवस्था में आई कमी को स्पष्ट करता है।

सरकार की भूमिका और विपक्ष के अधिकार का संतुलन

  • संसद की कार्य सूची कार्य मंत्रणा समिति द्वारा निर्धारित होती है, जिसकी अध्यक्षता पीठासीन अधिकारी करते हैं, परंतु व्यावहारिक रूप में सरकार का बहुमत इस प्रक्रिया पर निर्णायक प्रभाव रखता है।
  • संसदीय कार्य मंत्री की भूमिका इस संतुलन को बनाए रखने में केंद्रीय होती है, क्योंकि वे ही सरकार और विपक्ष के मध्य कार्य सूची पर सहमति बनाने का प्रयास करते हैं।
  • दूसरी ओर, विपक्ष का सदन के भीतर असहमति और विरोध व्यक्त करने का अधिकार भी संसदीय लोकतंत्र की मौलिक विशेषता है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब यह अधिकार केवल स्थगन और व्यवधान तक सीमित रह जाता है, और सरकार भी बहुमत के बल पर बहस से बचने का मार्ग चुनती है।
  • दोनों पक्षों के मध्य यह जिम्मेदारी का दायरा स्पष्ट नहीं रह गया है, जिसका परिणाम है कि उत्पादकता के आंकड़े ऊंचे दिखाई देने पर भी वास्तविक विचार विमर्श की गुणवत्ता निरंतर घटती जा रही है।

निष्कर्ष

संसद की कार्यक्षमता में यह गिरावट किसी एक सरकार या दल की उपज नहीं, बल्कि संस्थागत क्षरण की एक दीर्घकालिक प्रक्रिया है, जो प्रश्नकाल, शून्यकाल, समिति व्यवस्था, नेता प्रतिपक्ष और उपाध्यक्ष जैसे संवैधानिक पदों और प्रक्रियाओं में समान रूप से दिखाई देती है। इस संकट का समाधान किसी एक दल के सत्ता में आने या जाने से नहीं, बल्कि प्रश्नकाल की अनिवार्य सुरक्षा, समिति संवीक्षा को बाध्यकारी बनाने, तथा संवैधानिक पदों की समय पर नियुक्ति सुनिश्चित करने जैसे संरचनात्मक सुधारों से ही संभव है। यह विषय भारतीय लोकतंत्र की संस्थागत परिपक्वता के लिए एक गंभीर चुनौती है, जिस पर दलीय सीमाओं से परे जाकर विचार करना आवश्यकप है।

संसदीय शब्दावली

सत्र आहूत करना (Summoning)

  • राष्ट्रपति द्वारा संसद के सत्र को बुलाने की औपचारिक प्रक्रिया।
  • अनुच्छेद 85 के अनुसार राष्ट्रपति दोनों सदनों को समय समय पर अधिवेशन हेतु आमंत्रित करते हैं।
  • वास्तविक निर्णय मंत्रिमंडल की सलाह पर लिया जाता है, राष्ट्रपति केवल औपचारिक स्वीकृति देते हैं।
  • दो सत्रों के बीच छह महीने से अधिक का अंतराल नहीं होना चाहिए।

सत्रावसान (Prorogation)

  • किसी सत्र की औपचारिक समाप्ति, जो राष्ट्रपति द्वारा घोषित की जाती है।
  • सत्रावसान के साथ सदन के पास लंबित सभी विधेयक और कार्य समाप्त नहीं होते, वे अगले सत्र में जारी रह सकते हैं।
  • केवल लंबित संकल्प और नोटिस निरस्त हो जाते हैं।
  • सत्रावसान के बाद और नए सत्र के आहूत होने तक के मध्य की अवधि को अवकाश काल कहा जाता है।

विघटन (Dissolution)

  • यह केवल लोकसभा पर लागू होता है, राज्यसभा स्थायी सदन होने के कारण कभी विघटित नहीं होती।
  • लोकसभा का पूर्ण रूप से समाप्त हो जाना, जिसके बाद नए सिरे से आम चुनाव होते हैं।
  • विघटन के साथ लोकसभा में लंबित सभी विधेयक और कार्य समाप्त हो जाते हैं, चाहे वे किसी भी स्तर पर हों।
  • विघटन पांच वर्ष का कार्यकाल पूरा होने पर स्वाभाविक रूप से या राष्ट्रपति द्वारा समय से पूर्व भी किया जा सकता है।

स्थगन (Adjournment)

  • सदन की बैठक को कुछ समय, एक दिन, या असीमित अवधि (sine die) के लिए रोकना।
  • पीठासीन अधिकारी द्वारा किया जाता है और इसका सत्र या सदन की सदस्यता पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।
  • व्यवधान या हंगामे की स्थिति में सबसे अधिक उपयोग होने वाला उपकरण।

प्रश्नकाल (Question Hour)

  • सदन की बैठक का प्रथम एक घंटा, जिसमें सांसद मंत्रियों से सरकारी कामकाज पर प्रश्न पूछते हैं।
  • यह कार्यपालिका को प्रत्यक्ष रूप से जवाबदेह बनाने का सबसे प्रभावी संसदीय उपकरण है।
  • प्रश्न दो प्रकार के होते हैं, तारांकित प्रश्न जिनका मौखिक उत्तर और पूरक प्रश्न संभव है, तथा अतारांकित प्रश्न जिनका केवल लिखित उत्तर दिया जाता है।
  • प्रश्नकाल का स्थगन होने पर सरकार की जवाबदेही की प्रक्रिया बाधित हो जाती है।

शून्यकाल (Zero Hour)

  • प्रश्नकाल के तुरंत बाद का समय, जिसमें सांसद बिना पूर्व सूचना के तात्कालिक सार्वजनिक महत्व के विषय उठाते हैं।
  • यह संसदीय नियमावली में औपचारिक रूप से परिभाषित नहीं है, यह एक विकसित परंपरा है।
  • इसका नाम इस कारण पड़ा क्योंकि यह प्रायः दोपहर बारह बजे शुरू होता है।
  • इसकी अवधि निश्चित नहीं होती और सदन की कार्यवाही के अनुसार घट या बढ़ सकती है।

शीघ्र लोक महत्व का विषय (Calling Attention)

  • कोई सांसद मंत्री का ध्यान किसी अत्यंत आवश्यक और तात्कालिक सार्वजनिक मुद्दे की ओर आकर्षित कर सकता है।
  • मंत्री को उस विषय पर तुरंत वक्तव्य देना होता है, जिसके पश्चात संक्षिप्त चर्चा भी हो सकती है।

व्हिप (Whip)

  • राजनीतिक दल द्वारा अपने सांसदों को जारी किया जाने वाला लिखित निर्देश, जिसमें किसी विशेष विषय पर सदन में उपस्थित रहने या विशेष प्रकार से मतदान करने का आदेश होता है।
  • इसे दल का मुख्य सचेतक जारी करता है और यह तीन प्रकार का होता है, एक पंक्ति वाला (सूचनात्मक), दो पंक्ति वाला (उपस्थिति हेतु) और तीन पंक्ति वाला (सबसे सख्त, अनिवार्य उपस्थिति एवं मतदान)।
  • तीन पंक्ति वाले व्हिप का उल्लंघन दल बदल विरोधी कानून की दसवीं अनुसूची के अंतर्गत सदस्यता समाप्ति का आधार बन सकता है।
  • व्हिप की कोई संवैधानिक या विधिक परिभाषा नहीं है, यह पूर्णतः राजनीतिक दलों की आंतरिक अनुशासन व्यवस्था का हिस्सा है।

कोरम

  • सदन की कार्यवाही चलाने के लिए आवश्यक न्यूनतम सदस्य संख्या।
  • लोकसभा और राज्यसभा दोनों में यह सदन की कुल सदस्य संख्या का दसवां भाग निर्धारित है।
  • कोरम पूरा न होने पर पीठासीन अधिकारी सदन की कार्यवाही स्थगित कर सकते हैं।

गणपूर्ति की अनुपस्थिति में स्थगन और सत्र की उत्पादकता:

  • सत्र में सदन के निर्धारित कार्यकारी समय में से वास्तव में कितना समय उपयोग हो सका, इसका प्रतिशत मापन।
  • इसकी गणना पीआरएस लेजिस्लेटिव रिसर्च जैसी संस्थाएं तथा स्वयं संसद सचिवालय करता है।

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