भारतीय राजनीतिक चिंतन के इतिहास में बाल गंगाधर तिलक का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। वे केवल स्वतंत्रता आंदोलन के एक प्रमुख राष्ट्रवादी नेता नहीं थे, बल्कि ऐसे राजनीतिक चिंतक भी थे जिन्होंने भारतीय राष्ट्रवाद को स्वराज, राजनीतिक अधिकार, जन–सक्रियता, सांस्कृतिक चेतना और औपनिवेशिक शासन के प्रतिरोध से जोड़ा। तिलक के राजनीतिक विचारों ने भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन को उदारवादी संवैधानिक राजनीति की सीमाओं से आगे बढ़ाकर अधिक सक्रिय और जन-आधारित राजनीति की दिशा में ले जाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
तिलक का राजनीतिक चिंतन उस ऐतिहासिक समय में विकसित हुआ जब ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन भारत में राजनीतिक प्रभुत्व के साथ-साथ आर्थिक और सामाजिक नियंत्रण भी स्थापित कर चुका था। भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारंभिक दौर में उदारवादी नेताओं द्वारा संवैधानिक तरीकों, प्रार्थनाओं, याचिकाओं और ब्रिटिश सरकार के समक्ष मांग रखने की रणनीति अपनाई जा रही थी। तिलक ने इस दृष्टिकोण की सीमाओं को महसूस किया और भारतीय जनता को केवल शासन से सुधारों की मांग करने के बजाय अपने राजनीतिक अधिकारों के लिए सक्रिय रूप से संघर्ष करने का आह्वान किया।
तिलक का जीवन और राजनीतिक पृष्ठभूमि
- बाल गंगाधर तिलक का जन्म 23 जुलाई 1856 को रत्नागिरी, महाराष्ट्र में हुआ था। उन्होंने पुणे के डेक्कन कॉलेज से शिक्षा प्राप्त की और बाद में कानून का अध्ययन किया। शिक्षा, पत्रकारिता और सार्वजनिक जीवन से जुड़े अनुभवों ने उनके राजनीतिक चिंतन को आकार दिया। वर्ष 1920 में मुंबई में उनका निधन हुआ।
- तिलक का प्रारंभिक जीवन शिक्षा और सामाजिक प्रश्नों से जुड़ा रहा, लेकिन धीरे-धीरे उनका ध्यान औपनिवेशिक शासन और भारतीय राजनीतिक अधिकारों की ओर केंद्रित हुआ। उन्होंने शिक्षा और पत्रकारिता को राजनीतिक जागरूकता का माध्यम बनाया और भारतीय जनता में राष्ट्रीय चेतना विकसित करने का प्रयास किया।
- यही कारण है कि तिलक को केवल एक राजनीतिक नेता के रूप में नहीं, बल्कि राजनीतिक शिक्षक और जन–जागरण के महत्वपूर्ण प्रवर्तक के रूप में भी देखा जाता है।
तिलक और स्वराज की अवधारणा
- तिलक के राजनीतिक चिंतन का सबसे केंद्रीय विचार स्वराज था। उनका प्रसिद्ध कथन “स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूँगा” भारतीय राष्ट्रवादी आंदोलन के सबसे प्रभावशाली राजनीतिक नारों में से एक बन गया।
- तिलक के लिए स्वराज का अर्थ केवल ब्रिटिश शासन से मुक्ति नहीं था। स्वराज का व्यापक अर्थ था कि भारत की जनता को अपने राजनीतिक जीवन पर नियंत्रण प्राप्त होना चाहिए। सरकार जनता की इच्छा पर आधारित होनी चाहिए और शासन जनता के प्रति उत्तरदायी होना चाहिए।
इस दृष्टि से तिलक के स्वराज में तीन प्रमुख तत्व दिखाई देते हैं: स्वशासन, उत्तरदायी शासन और जनसत्ता।
- स्वराज का अर्थ यह नहीं था कि केवल शासक की राष्ट्रीयता बदल जाए। वास्तविक स्वराज तभी संभव था जब जनता राजनीतिक रूप से जागरूक हो, शासन में भाग ले और अपने अधिकारों के प्रति सचेत हो।
- इसलिए तिलक का स्वराज एक प्रकार से राजनीतिक आत्मनिर्णय की अवधारणा भी था।
स्वराज: राजनीतिक और नैतिक स्वतंत्रता
- तिलक की स्वराज की अवधारणा का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि इसे केवल राजनीतिक स्वतंत्रता तक सीमित नहीं किया जा सकता। उनके राजनीतिक चिंतन पर भारतीय दार्शनिक परंपरा, विशेषकर भगवद्गीता और कर्मयोग का गहरा प्रभाव था।
- उनके लिए वास्तविक स्वतंत्रता में व्यक्ति की आंतरिक स्वतंत्रता, आत्म–नियंत्रण और कर्तव्य–बोध भी महत्वपूर्ण थे। इसलिए उनके स्वराज को बाहरी राजनीतिक स्वतंत्रता और आंतरिक नैतिक स्वतंत्रता के संयोजन के रूप में समझा जा सकता है।
- यहीं तिलक का राजनीतिक चिंतन पश्चिमी राजनीतिक स्वतंत्रता की अवधारणाओं से अलग एक विशिष्ट भारतीय दार्शनिक आयाम प्राप्त करता है।
तिलक का राष्ट्रवाद
- तिलक के राष्ट्रवाद का आधार केवल राजनीतिक स्वतंत्रता की मांग नहीं था। वे भारतीयों में एक ऐसी राष्ट्रीय चेतना विकसित करना चाहते थे जो उन्हें एक साझा राजनीतिक उद्देश्य के लिए संगठित कर सके।
- उनका मानना था कि यदि भारतीय जनता राजनीतिक रूप से निष्क्रिय बनी रहेगी, तो स्वतंत्रता प्राप्त करना कठिन होगा। इसलिए उन्होंने राष्ट्रवाद को जनता की सक्रिय भागीदारी से जोड़ा।
- तिलक के राष्ट्रवाद में राष्ट्रीय गौरव, ऐतिहासिक चेतना, सांस्कृतिक पहचान और राजनीतिक संघर्ष एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।
- वे भारतीयों को अपने इतिहास और सांस्कृतिक विरासत के प्रति गौरव की भावना विकसित करने के लिए प्रेरित करते थे। उनका उद्देश्य ऐसी राष्ट्रीय पहचान का निर्माण करना था जो औपनिवेशिक शासन की मानसिक और राजनीतिक श्रेष्ठता की धारणा को चुनौती दे सके।
सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और तिलक
- तिलक के राष्ट्रवाद की सबसे विशिष्ट विशेषताओं में से एक उनका सांस्कृतिक राष्ट्रवाद था। उन्होंने भारतीय संस्कृति, इतिहास और धार्मिक प्रतीकों को राजनीतिक जागरूकता और जन-संगठन का माध्यम बनाया।
- उन्होंने गणपति उत्सव को सार्वजनिक रूप प्रदान किया और इसे धार्मिक आयोजन के साथ-साथ सामाजिक तथा राजनीतिक एकत्रीकरण के अवसर में बदल दिया। इसी प्रकार उन्होंने शिवाजी उत्सव के माध्यम से शिवाजी को राजनीतिक स्वाभिमान, प्रतिरोध और राष्ट्रीय गौरव के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया।
- इस प्रकार तिलक ने संस्कृति को केवल अतीत की विरासत के रूप में नहीं देखा, बल्कि उसे वर्तमान राजनीतिक संघर्ष के लिए सामूहिक लामबंदी के संसाधन के रूप में इस्तेमाल किया।
यहाँ तिलक के राजनीतिक चिंतन को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण सूत्र सामने आता है:
सांस्कृतिक प्रतीक → राष्ट्रीय चेतना → जन–संगठन → राजनीतिक सक्रियता
- हालाँकि, तिलक के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की आलोचना भी हुई। कुछ आलोचकों ने धार्मिक और हिंदू सांस्कृतिक प्रतीकों के राजनीतिक उपयोग को सांप्रदायिक विभाजन की संभावना से जोड़ा।
उदारवादियों से तिलक का मतभेद
- भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के प्रारंभिक चरण में कांग्रेस के उदारवादी नेताओं का विश्वास संवैधानिक तरीकों में था। वे ब्रिटिश शासन के भीतर सुधारों, प्रशासनिक परिवर्तन और भारतीयों की राजनीतिक भागीदारी का विस्तार चाहते थे।
- तिलक इससे अधिक सक्रिय राजनीतिक रणनीति के समर्थक थे। उनका मानना था कि केवल याचिकाओं और प्रार्थनाओं के माध्यम से राजनीतिक अधिकार प्राप्त करना कठिन है।
- इसलिए उन्होंने स्वदेशी, बहिष्कार, राष्ट्रीय शिक्षा और प्रत्यक्ष राजनीतिक कार्रवाई पर जोर दिया।
- यहीं से कांग्रेस में Moderates और Extremists के बीच वैचारिक और रणनीतिक अंतर अधिक स्पष्ट हुआ।
- तिलक उग्रवादी राष्ट्रवादी धारा के प्रमुख नेताओं में शामिल हुए। आपके स्रोत में भी उन्हें कांग्रेस के उग्रवादी गुट के प्रमुख नेता के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
उग्र राष्ट्रवाद का अर्थ
- तिलक के संदर्भ में “उग्रवाद” का अर्थ सीधे हिंसा या आतंकवाद नहीं समझना चाहिए। उनके उग्र राष्ट्रवाद का मुख्य आधार था कि भारतीय जनता को सक्रिय राजनीतिक प्रतिरोध के लिए तैयार किया जाए।
- वे राजनीतिक अधिकारों के लिए दबाव बनाने हेतु बहिष्कार, स्वदेशी, जनसभाओं, सार्वजनिक उत्सवों और राजनीतिक संगठन जैसे साधनों का उपयोग करते थे।
- उनका विश्वास था कि राजनीतिक अधिकार केवल शासक से मांगने से नहीं मिलते; जनता को अपनी राजनीतिक शक्ति का प्रदर्शन भी करना चाहिए।
स्वदेशी और बहिष्कार की राजनीति
- तिलक के राष्ट्रवादी कार्यक्रम में स्वदेशी और बहिष्कार का महत्वपूर्ण स्थान था।
- स्वदेशी का अर्थ था देश में निर्मित वस्तुओं को प्राथमिकता देना और भारतीय उत्पादन को प्रोत्साहित करना। दूसरी ओर, बहिष्कार का उद्देश्य ब्रिटिश वस्तुओं और औपनिवेशिक आर्थिक हितों को चुनौती देना था।
- इस प्रकार आर्थिक गतिविधि को राजनीतिक संघर्ष का माध्यम बनाया गया।
इसे इस सूत्र से समझा जा सकता है:
स्वदेशी = आर्थिक आत्मनिर्भरता
बहिष्कार = औपनिवेशिक आर्थिक हितों पर राजनीतिक दबाव
इस प्रकार तिलक का राष्ट्रवाद केवल राजनीतिक नहीं बल्कि आर्थिक राष्ट्रवाद भी था।
राष्ट्रीय शिक्षा का विचार
- तिलक शिक्षा को राष्ट्र निर्माण का महत्वपूर्ण साधन मानते थे। उनके लिए शिक्षा का उद्देश्य केवल सरकारी नौकरियों के लिए युवाओं को तैयार करना नहीं था।
- वे ऐसी शिक्षा चाहते थे जो भारतीयों में राष्ट्रीय चेतना, आत्मविश्वास, राजनीतिक जागरूकता और सामाजिक उत्तरदायित्व उत्पन्न करे।
- औपनिवेशिक शिक्षा व्यवस्था की आलोचना करते हुए राष्ट्रवादी नेताओं ने राष्ट्रीय शिक्षा को स्वतंत्र राजनीतिक चेतना के निर्माण से जोड़ा। तिलक भी इसी व्यापक राष्ट्रवादी शिक्षा परियोजना के महत्वपूर्ण समर्थक थे।
इस प्रकार उनके राजनीतिक कार्यक्रम में:
स्वराज + स्वदेशी + बहिष्कार + राष्ट्रीय शिक्षा
एक-दूसरे से जुड़े हुए थे।
तिलक और पत्रकारिता
- तिलक ने पत्रकारिता को राजनीतिक जागरण का महत्वपूर्ण माध्यम बनाया। उन्होंने “केसरी” और “मराठा” जैसे समाचार पत्रों के माध्यम से ब्रिटिश शासन की आलोचना और राष्ट्रवादी विचारों का प्रचार किया।
- केसरी मुख्यतः मराठी भाषा का समाचार पत्र था, जबकि मराठा अंग्रेजी भाषा में प्रकाशित होता था।
- इन समाचार पत्रों के माध्यम से तिलक ने राजनीतिक मुद्दों को शिक्षित अभिजात वर्ग तक सीमित रखने के बजाय व्यापक जनता तक पहुँचाने का प्रयास किया। आपके स्रोत में भी दोनों समाचार पत्रों को उनके राष्ट्रवादी विचारों और राजनीतिक जागरूकता के प्रसार के महत्वपूर्ण माध्यम के रूप में प्रस्तुत किया गया है।
इस दृष्टि से तिलक की पत्रकारिता को तीन भूमिकाओं में समझा जा सकता है:
राजनीतिक शिक्षा + औपनिवेशिक आलोचना + राष्ट्रवादी लामबंदी
तिलक और भगवद्गीता
- तिलक के राजनीतिक चिंतन को समझने के लिए उनकी प्रसिद्ध रचना “गीता रहस्य” अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- तिलक ने भगवद्गीता की व्याख्या में कर्मयोग को विशेष महत्व दिया। उनके अनुसार जीवन से पलायन या निष्क्रियता के बजाय व्यक्ति को अपने कर्तव्य का सक्रिय रूप से पालन करना चाहिए।
- यदि राष्ट्र संकट में है, तो नागरिक का कर्तव्य केवल व्यक्तिगत मोक्ष या निजी जीवन तक सीमित नहीं हो सकता। उसे समाज और राष्ट्र के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वहन करना चाहिए।
कर्मयोग और राजनीतिक सक्रियता
- तिलक की सबसे महत्वपूर्ण दार्शनिक विशेषता यह थी कि उन्होंने भगवद्गीता के कर्मयोग को राजनीतिक सक्रियता के साथ जोड़ा।
- उनके लिए कर्म का अर्थ केवल व्यक्तिगत गतिविधि नहीं था। व्यक्ति को अपने कर्तव्य का पालन सामूहिक कल्याण की भावना के साथ करना चाहिए।
- यही कारण है कि तिलक के राजनीतिक दर्शन में निष्क्रियता के स्थान पर सक्रिय प्रतिरोध का महत्व दिखाई देता है।
- यहाँ उनका चिंतन भारतीय दार्शनिक परंपरा को आधुनिक राजनीतिक संघर्ष से जोड़ता है।
तिलक और आर्थिक शोषण
- तिलक ने ब्रिटिश शासन के आर्थिक पक्ष की भी आलोचना की। वे भारतीय अर्थव्यवस्था पर औपनिवेशिक नीतियों के प्रभाव को लेकर चिंतित थे।
- उन्होंने भूमि राजस्व, आर्थिक शोषण, भारतीय उद्योगों की कमजोर स्थिति और ब्रिटिश प्रशासन से जुड़े आर्थिक प्रश्नों पर आवाज उठाई।
- उन्होंने दादाभाई नौरोजी की Drain Theory का समर्थन किया और यह समझने का प्रयास किया कि किस प्रकार औपनिवेशिक शासन भारत की आर्थिक संपदा को ब्रिटेन की ओर प्रवाहित कर रहा था।
- इससे तिलक के राष्ट्रवाद का आर्थिक आयाम स्पष्ट होता है।
तिलक और सामाजिक सुधार
- तिलक के सामाजिक चिंतन को समझते समय सावधानी आवश्यक है।
- वे शिक्षा और सामाजिक जागरूकता के महत्व को स्वीकार करते थे, लेकिन उनके राजनीतिक चिंतन में राजनीतिक स्वराज को सामाजिक सुधार से प्राथमिकता दी गई।
- यही कारण है कि आधुनिक राजनीतिक चिंतन में तिलक को अक्सर “राजनीतिक रूप से उग्र, लेकिन सामाजिक प्रश्नों पर अपेक्षाकृत रूढ़िवादी” विचारक के रूप में समझा जाता है।
- आपके स्रोत में सामाजिक सुधार, शिक्षा और महिलाओं के अधिकारों के समर्थन का उल्लेख है। लेकिन UGC NET के लिए इसे व्यापक ऐतिहासिक संदर्भ में पढ़ना अधिक उपयुक्त है।
यह तिलक के चिंतन का एक महत्वपूर्ण विरोधाभास है:
Political Radicalism + Social Conservatism
- अर्थात राजनीतिक स्वतंत्रता के प्रश्न पर वे अत्यंत सक्रिय और उग्र थे, जबकि सामाजिक सुधारों के प्रश्न पर उनका दृष्टिकोण अधिक परंपरावादी था।
तिलक और बंगाल विभाजन
- वर्ष 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध ने भारतीय राष्ट्रवाद को एक नए चरण में पहुँचाया।
- तिलक ने बंगाल विभाजन का विरोध किया और इस विरोध को व्यापक राष्ट्रवादी आंदोलन से जोड़ने का प्रयास किया। आपके स्रोत में भी 1905 के बंगाल विभाजन के विरोध में उनकी भूमिका का उल्लेख है।
- बंगाल विभाजन के विरोध ने स्वदेशी और बहिष्कार को राजनीतिक संघर्ष के प्रभावशाली साधनों में बदल दिया।
- इस समय तिलक की राजनीति अधिक स्पष्ट रूप से जन–आधारित उग्र राष्ट्रवाद के रूप में सामने आई।
तिलक और राजद्रोह का मुकदमा
- वर्ष 1908 में तिलक को राजद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर कारावास की सजा दी गई। ब्रिटिश सरकार उनके लेखन और राजनीतिक गतिविधियों को अपने शासन के लिए चुनौती के रूप में देखती थी। आपके स्रोत में भी 1908 के कारावास का उल्लेख किया गया है।
- इस कारावास ने तिलक की राष्ट्रवादी छवि को और मजबूत किया और वे जनता के बीच औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष के प्रतीक बन गए।
तिलक और Home Rule Movement
- वर्ष 1916 में तिलक ने Home Rule आंदोलन को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- Home Rule का मूल उद्देश्य भारत में स्वशासन की मांग को मजबूत करना था। तिलक ने इस आंदोलन के माध्यम से स्वराज की मांग को अधिक संगठित राजनीतिक अभियान में बदलने का प्रयास किया।
- Home Rule Movement की एक महत्वपूर्ण विशेषता यह थी कि इसने स्वशासन के प्रश्न को व्यापक राजनीतिक जनमत का विषय बनाया।
- तिलक की Home Rule राजनीति उनके पहले के उग्र राष्ट्रवाद और बाद की अधिक संगठित राजनीतिक रणनीति के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी थी।
- आपके स्रोत में भी 1916 में Home Rule League की स्थापना और स्वशासन की मांग को बढ़ावा देने का उल्लेख है।
तिलक और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस
- तिलक भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रमुख नेताओं में शामिल थे और कांग्रेस के उग्रवादी गुट का प्रतिनिधित्व करते थे।
- उनकी राजनीति ने कांग्रेस के भीतर यह प्रश्न उठाया कि स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए कौन-सी रणनीति अपनाई जानी चाहिए।
- एक ओर उदारवादी नेता संवैधानिक सुधारों और क्रमिक परिवर्तन पर जोर दे रहे थे, दूसरी ओर तिलक जैसी उग्रवादी धारा जनसक्रियता और प्रत्यक्ष राजनीतिक दबाव को अधिक प्रभावी मानती थी।
- इस प्रकार तिलक कांग्रेस के भीतर रणनीतिक और वैचारिक बहस के प्रमुख प्रतिनिधि बने।
तिलक और राजनीतिक प्रतिरोध
तिलक के राजनीतिक चिंतन में प्रतिरोध का विशेष महत्व था।
- उनके अनुसार यदि शासन अन्यायपूर्ण है, तो केवल इसलिए कि वह कानून के रूप में अस्तित्व में है, उसे नैतिक रूप से न्यायपूर्ण नहीं माना जा सकता।
- इस दृष्टि से तिलक के राजनीतिक चिंतन में कानून और न्याय के बीच अंतर दिखाई देता है।
- उनकी राजनीति का मूल संदेश था कि जनता को अपने राजनीतिक अधिकारों के प्रति जागरूक होकर अन्यायपूर्ण औपनिवेशिक सत्ता का प्रतिरोध करना चाहिए।
तिलक की प्रमुख रचनाएँ
- तिलक केवल राजनीतिक कार्यकर्ता नहीं थे; वे एक गंभीर लेखक और विचारक भी थे।
- उनकी प्रमुख रचनाओं में “गीता रहस्य”, “The Arctic Home in the Vedas” और “The Orion” का विशेष महत्व है।
- इन रचनाओं के माध्यम से उन्होंने भारतीय दर्शन, इतिहास, संस्कृति और वैदिक परंपरा पर अपने विचार प्रस्तुत किए।
- आपके स्रोत में विशेष रूप से The Arctic Home in the Vedas का उल्लेख मिलता है।
तिलक की राजनीतिक विरासत
- तिलक की सबसे बड़ी राजनीतिक विरासत भारतीय राष्ट्रवाद को जन–सक्रियता से जोड़ना थी।
- उन्होंने जनता को यह संदेश दिया कि स्वतंत्रता केवल कुछ शिक्षित नेताओं की मांग नहीं होनी चाहिए। आम जनता को भी राष्ट्र के राजनीतिक भविष्य के निर्माण में सक्रिय भूमिका निभानी चाहिए।
- इसीलिए उन्हें भारतीय राष्ट्रवाद के विकास में एक महत्वपूर्ण संक्रमणकारी व्यक्तित्व माना जाता है।
- उनकी राजनीति ने आगे आने वाली जन-आधारित राष्ट्रवादी राजनीति के लिए महत्वपूर्ण आधार तैयार किया।
तिलक की आलोचना
- तिलक के योगदान के बावजूद उनके विचारों की आलोचना भी हुई।
- सबसे पहली आलोचना उनके सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से जुड़ी है। धार्मिक प्रतीकों और हिंदू सांस्कृतिक परंपराओं के राजनीतिक उपयोग के कारण कुछ आलोचकों ने उन्हें सांप्रदायिक राजनीति को बढ़ावा देने वाला माना।
- दूसरी आलोचना उनके सामाजिक रूढ़िवाद से जुड़ी है। सामाजिक सुधारों की तुलना में राजनीतिक स्वराज को प्राथमिकता देने के कारण उन्हें सामाजिक सुधारवादी विचारकों से अलग माना गया।
- तीसरी आलोचना उनकी उग्र राजनीतिक रणनीति से जुड़ी है। उनके समकालीन उदारवादी नेताओं को उनकी रणनीति अधिक आक्रामक और टकरावपूर्ण प्रतीत होती थी।
- हालाँकि, तिलक के समर्थक यह तर्क देते हैं कि उनका उग्रवाद मुख्यतः राजनीतिक आत्मसम्मान, जन–संगठन और औपनिवेशिक सत्ता के विरुद्ध सक्रिय प्रतिरोध से संबंधित था।
निष्कर्ष
बाल गंगाधर तिलक भारतीय राजनीतिक चिंतन में ऐसे विचारक हैं जिन्होंने राष्ट्रीय स्वतंत्रता को जनसक्रियता और राजनीतिक अधिकारों के प्रश्न से जोड़ा। उनका स्वराज केवल विदेशी शासन की समाप्ति नहीं था, बल्कि जनता के राजनीतिक आत्मनिर्णय और उत्तरदायी शासन की मांग था।
उनके सांस्कृतिक राष्ट्रवाद ने भारतीय इतिहास और परंपरा को राजनीतिक लामबंदी का माध्यम बनाया, जबकि स्वदेशी और बहिष्कार ने आर्थिक राष्ट्रवाद को राजनीतिक प्रतिरोध से जोड़ा। भगवद्गीता की उनकी कर्मयोग आधारित व्याख्या ने राजनीतिक सक्रियता को नैतिक और दार्शनिक आधार दिया।
हालाँकि उनके सामाजिक दृष्टिकोण और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की आलोचनाएँ भी हुईं, फिर भी भारतीय राष्ट्रवादी विचारधारा के विकास में उनका योगदान अत्यंत महत्वपूर्ण है।
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- निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- तिलक ने स्वराज को भारतीयों के राजनीतिक अधिकार से जोड़ा।
- तिलक केवल संवैधानिक याचिकाओं के माध्यम से स्वतंत्रता प्राप्त करने के समर्थक थे।
- उन्होंने स्वदेशी और बहिष्कार को राजनीतिक संघर्ष के साधन के रूप में महत्व दिया।
उपरोक्त में से कौन-से कथन सही हैं?
- केवल 1
B. केवल 1 और 3
C. केवल 2 और 3
D. 1, 2 और 3
उत्तर: B. केवल 1 और 3
2 . निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- तिलक ने गणपति उत्सव को सार्वजनिक रूप प्रदान किया।
- उन्होंने शिवाजी उत्सव के माध्यम से ऐतिहासिक एवं राष्ट्रीय चेतना को बढ़ावा दिया।
- उनका सांस्कृतिक राष्ट्रवाद भारतीय इतिहास और परंपरा से जुड़ा था।
सही उत्तर चुनिए:
- केवल 1
B. केवल 2
C. 1 और 2
D. 1, 2 और 3
उत्तर: D. 1, 2 और 3
- 3. निम्नलिखित में से किसे तिलक के राजनीतिक प्रतिरोध के सिद्धांत से जोड़ा जा सकता है?
- प्रत्येक कानून स्वतः नैतिक होता है।
B. जनता को अन्यायपूर्ण औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध राजनीतिक प्रतिरोध का अधिकार है।
C. जनता को राजनीति से दूर रहना चाहिए।
D. केवल शासक ही राजनीतिक परिवर्तन कर सकता है।
उत्तर: B. जनता को अन्यायपूर्ण औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध राजनीतिक प्रतिरोध का अधिकार है।
- 4. तिलक के राजनीतिक चिंतन के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन–सा युग्म सही सुमेलित नहीं है?
- तिलक — स्वराज
B. तिलक — गीता रहस्य
C. तिलक — कर्मयोग
D. तिलक — सर्वोदय
उत्तर: D. तिलक – सर्वोदय
- 5. तिलक ने निम्नलिखित में से किन समाचार पत्रों के माध्यम से राष्ट्रवादी विचारों का प्रचार किया?
- यंग इंडिया और हरिजन
B. केसरी और मराठा
C. अमृत बाजार पत्रिका और हिंदू
D. प्रताप और आज
उत्तर: B. केसरी और मराठा
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