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गोरखालैंड मुद्दा: क्षेत्रीय पहचान, संघवाद और क्षेत्रीय अखंडता

Gorkhaland Issue: Regional Identity, Federalism, and Territorial Integrity

गोरखालैंड मुद्दा भारत में क्षेत्रीय पहचान, भाषायी अस्मिता, संघवाद, स्वायत्तता और राष्ट्रीय क्षेत्रीय अखंडता के बीच संतुलन की चुनौती को दर्शाता है। यह मुख्यतः पश्चिम बंगाल के दार्जिलिंग पहाड़ी क्षेत्र और उससे जुड़े तराई तथा डुआर्स क्षेत्रों में रहने वाली नेपाली भाषी गोरखा आबादी की लंबे समय से चली आ रही राजनीतिक आकांक्षाओं से संबंधित है। गोरखा समुदाय के एक बड़े हिस्से की मांग अलग गोरखालैंड राज्य के गठन की रही है, जबकि पश्चिम बंगाल सरकार तथा राज्य के व्यापक राजनीतिक विमर्श में राज्य के विभाजन का विरोध किया जाता रहा है।

  • 25 अगस्त 2026 को केंद्रीय गृह मंत्रालय द्वारा पश्चिम बंगाल सरकार और गोरखा समुदाय के नेताओं के साथ त्रिपक्षीय बैठक आयोजित की गई। इसके बाद केंद्र सरकार ने पंकज कुमार सिंह की अध्यक्षता में एक समिति गठित की, जिसका उद्देश्य भारतीय संविधान के दायरे में गोरखा मुद्दे का एक “स्थायी राजनीतिक समाधान” तैयार करना तथा उसके क्रियान्वयन की रूपरेखा निर्धारित करना है। समिति शासन व्यवस्था, वित्तीय सहायता और 11 गोरखा समुदायों को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की दिशा में संभावित उपायों का भी परीक्षण करेगी।

गोरखालैंड मुद्दा क्या है?

  • गोरखालैंड की मांग दार्जिलिंग पहाड़ियों में रहने वाली नेपाली भाषी गोरखा आबादी की राजनीतिक प्रतिनिधित्व, सांस्कृतिक पहचान और प्रशासनिक स्वायत्तता की मांग से विकसित हुई है। इसकी प्रमुख मांग दार्जिलिंग पहाड़ियों तथा उससे लगे तराई और डुआर्स क्षेत्रों को मिलाकर एक अलग राज्य बनाने की रही है।
  • इस मांग के पीछे कई सामाजिक, ऐतिहासिक, आर्थिक और राजनीतिक कारण हैं।

भाषायी और सांस्कृतिक पहचान

  • गोरखालैंड आंदोलन का सबसे महत्वपूर्ण आधार जातीय और भाषायी पहचान है। दार्जिलिंग पहाड़ियों में नेपाली भाषा का व्यापक प्रयोग होता है और क्षेत्र की सांस्कृतिक परंपराएँ पश्चिम बंगाल के बंगाली बहुल मैदानी क्षेत्रों से अलग दिखाई देती हैं।
  • गोरखा समुदाय के समर्थकों का तर्क है कि अलग प्रशासनिक इकाई मिलने से उनकी भाषा, संस्कृति और विशिष्ट पहचान को बेहतर राजनीतिक संरक्षण प्राप्त होगा।
  • नेपाली भाषी भारतीय नागरिकों को कभी-कभी उनकी शारीरिक बनावट और भाषा के कारण विदेशी या नेपाली नागरिक समझ लिया जाता है। ऐसी सामाजिक धारणाओं ने गोरखा समुदाय के बीच पहचान की असुरक्षा को बढ़ाया है और भारतीय नागरिक के रूप में अपनी विशिष्ट पहचान को राजनीतिक रूप से स्थापित करने की मांग को मजबूत किया है।

आर्थिक और विकासात्मक उपेक्षा

  • दार्जिलिंग क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में चाय, पर्यटन, वानिकी और बागवानी का महत्वपूर्ण योगदान है। गोरखालैंड समर्थकों का आरोप रहा है कि क्षेत्र से पर्याप्त आर्थिक संसाधन प्राप्त होने के बावजूद स्थानीय स्तर पर विकास, रोजगार, आधारभूत संरचना और वित्तीय संसाधनों का पर्याप्त वितरण नहीं हुआ।
  • इस प्रकार आंदोलन केवल सांस्कृतिक पहचान का प्रश्न नहीं है, बल्कि विकास और संसाधनों के न्यायपूर्ण वितरण से भी जुड़ा हुआ है।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि

  • दार्जिलिंग क्षेत्र का इतिहास जटिल रहा है। इसके विभिन्न हिस्सों का ऐतिहासिक संबंध सिक्किम और भूटान से रहा तथा बाद में यह ब्रिटिश नियंत्रण में आया। ब्रिटिश शासन के दौरान चाय उद्योग और प्रशासनिक विस्तार के साथ नेपाल से बड़ी संख्या में लोगों का आगमन हुआ, जिससे क्षेत्र में नेपाली भाषी आबादी का विस्तार हुआ।
  • गोरखा राजनीतिक स्वायत्तता की मांग का इतिहास 20वीं सदी के आरंभ तक जाता है। 1907 में दार्जिलिंग हिलमेन एसोसिएशन ने मिंटो मॉर्ले सुधार समिति के समक्ष दार्जिलिंग और जलपाईगुड़ी को बंगाल से अलग करने की मांग रखी।
  • इसके बाद गोरखा अधिकारियों के संगठनों तथा कुर्सियांग गोरखा लाइब्रेरी जैसी संस्थाओं ने भी इस मांग को आगे बढ़ाया। 1929 में साइमन कमीशन के समक्ष भी दार्जिलिंग क्षेत्र की अलग राजनीतिक स्थिति का प्रश्न उठाया गया।
  • 1947 के आसपास अविभाजित भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी द्वारा जवाहरलाल नेहरू और लियाकत अली खान के समक्ष “गोरखास्थान” की मांग से संबंधित ज्ञापन प्रस्तुत किया गया था।
  • 1980 के दशक में सुभाष घीसिंग के नेतृत्व में गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (GNLF) गोरखालैंड आंदोलन की प्रमुख राजनीतिक शक्ति बन गया। 1980 के दशक का आंदोलन अत्यंत तीव्र था और इसने केंद्र तथा राज्य सरकार को राजनीतिक समाधान की दिशा में आगे बढ़ने के लिए बाध्य किया।
  • समय के साथ आंदोलन का स्वरूप भी बदला। प्रारंभिक दौर में कुछ मांगें अधिक पृथकतावादी स्वरूप की थीं, लेकिन बाद में आंदोलन की मुख्य मांग भारतीय संघ के भीतर एक अलग राज्य के गठन के रूप में सामने आई।

संस्थागत समाधान के प्रयास

दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल, 1988

  • 1980 के दशक के आंदोलन के बाद 1988 में दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल (DGHC) का गठन किया गया। इसका उद्देश्य क्षेत्र को प्रशासनिक स्वायत्तता प्रदान करना था।
  • हालाँकि इसकी सीमित विधायी शक्तियाँ और पर्याप्त वित्तीय स्वायत्तता का अभाव इसकी प्रभावशीलता में बाधा बना। इससे यह स्पष्ट हुआ कि केवल प्रशासनिक परिषद बनाना पर्याप्त नहीं है; वास्तविक राजनीतिक और वित्तीय विकेंद्रीकरण भी आवश्यक है।

गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन, 2011

  • 2011 में गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (GTA) की स्थापना की गई। इसे DGHC की तुलना में अधिक प्रशासनिक, कार्यकारी और वित्तीय शक्तियाँ प्रदान की गईं।
  • फिर भी GTA को कई व्यावहारिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। राज्य सरकार और GTA के बीच अधिकार क्षेत्र का overlap, वित्तीय संसाधनों का अपर्याप्त हस्तांतरण तथा विधायी शक्तियों का अभाव इसकी प्रमुख समस्याएँ रहीं। जिला मजिस्ट्रेट जैसे राज्य सरकार द्वारा नियुक्त अधिकारियों के पास भी महत्वपूर्ण प्रशासनिक नियंत्रण बना रहा।
  • इससे यह प्रश्न सामने आया कि स्वायत्तता तभी प्रभावी हो सकती है जब उसके साथ वास्तविक शक्ति, वित्तीय संसाधन और जवाबदेह संस्थागत ढाँचा उपलब्ध हो।

गोरखा समुदाय की विशेषता

  • “गोरखा” शब्द किसी एक समान जातीय समूह को नहीं दर्शाता। इसमें गुरूंग, मगर, राई, लिम्बू और अन्य हिमालयी समुदाय शामिल हैं। ऐतिहासिक रूप से गोरखा पहचान का संबंध पश्चिमी नेपाल के गोरखा राज्य से रहा है।
  • राजा पृथ्वी नारायण शाह ने नेपाल के एकीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई और गोरखा शक्ति का विस्तार किया।
  • गोरखाओं की सैन्य परंपरा भी प्रसिद्ध रही है। 1814 से 1816 के एंग्लो नेपाली युद्ध के बाद ब्रिटिश भारतीय सेना में गोरखा सैनिकों की भर्ती बढ़ी। स्वतंत्र भारत में भी गोरखा रेजिमेंट भारतीय सेना का महत्वपूर्ण हिस्सा बनी रही है।
  • इसलिए गोरखा पहचान को केवल विदेशी या नेपाली पहचान के रूप में देखना ऐतिहासिक रूप से गलत है। भारत में बड़ी संख्या में गोरखा समुदाय लंबे समय से भारतीय सामाजिक, राजनीतिक और सैन्य जीवन का अभिन्न हिस्सा रहा है।

गोरखालैंड मुद्दे के समाधान की प्रमुख चुनौतियाँ

उपराष्ट्रीयताओं का संघर्ष: भारत में संघवाद अनेक क्षेत्रीय और सांस्कृतिक पहचानों को राजनीतिक अभिव्यक्ति प्रदान करता है। लेकिन गोरखालैंड की मांग का सामना पश्चिम बंगाल की क्षेत्रीय अखंडता और बंगाली उपराष्ट्रीयता से होता है।

  • इसलिए यह केवल गोरखा बनाम राज्य सरकार का प्रश्न नहीं है, बल्कि दो अलग क्षेत्रीय आकांक्षाओं के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती है।
  • सिलीगुड़ी कॉरिडोर का सामरिक महत्व
  • दार्जिलिंग क्षेत्र का सामरिक महत्व अत्यधिक है। यह सिलीगुड़ी कॉरिडोर, जिसे सामान्यतः “चिकन नेक” कहा जाता है, के निकट स्थित है। यह संकीर्ण भूभाग भारत के मुख्य भूभाग को पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ने वाला अत्यंत महत्वपूर्ण स्थल है।
  • क्षेत्र की सीमाएँ नेपाल और भूटान से लगती हैं तथा बांग्लादेश भी निकट है। इसलिए राजनीतिक अस्थिरता, हिंसा या प्रशासनिक संकट का प्रभाव केवल स्थानीय स्तर तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा और पूर्वोत्तर संपर्क व्यवस्था पर भी पड़ सकता है।

राजनीतिक नेतृत्व का विखंडन: गोरखा राजनीति एकसमान नहीं है। गोरखा जनमुक्ति मोर्चा (GJM), GNLF और अन्य क्षेत्रीय संगठन अलग-अलग रणनीतियों और राजनीतिक प्राथमिकताओं के साथ सक्रिय रहे हैं।

  • इसलिए “स्थायी समाधान” पर सभी पक्षों की सहमति बनाना कठिन है। कुछ संगठन पूर्ण राज्य की मांग करते हैं, जबकि अन्य अधिक स्वायत्तता या वैकल्पिक प्रशासनिक व्यवस्था को स्वीकार कर सकते हैं।

वित्तीय व्यवहार्यता: यदि अलग राज्य, केंद्रशासित प्रदेश या अधिक शक्तिशाली स्वायत्त परिषद जैसी कोई व्यवस्था बनाई जाती है, तो उसके लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन आवश्यक होंगे।

  • दार्जिलिंग की अर्थव्यवस्था चाय और पर्यटन जैसे क्षेत्रों पर काफी निर्भर है। इसलिए किसी भी नई प्रशासनिक व्यवस्था को स्थायी राजस्व आधार, केंद्रीय वित्तीय सहायता और आर्थिक विविधीकरण की आवश्यकता होगी।

समाधान की दिशा

संवैधानिक स्वायत्तता का विस्तार

  • गोरखालैंड समस्या का समाधान केवल राज्य निर्माण तक सीमित नहीं होना चाहिए। भारतीय संविधान के भीतर अर्थपूर्ण स्वायत्तता का विकल्प भी तलाशा जा सकता है।
  • नेपाली भाषा को 71वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1992 द्वारा संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल किया गया। इससे भाषायी पहचान को संवैधानिक मान्यता मिली।
  • इसी प्रकार, अनुच्छेद 244 के अंतर्गत छठी अनुसूची जैसी व्यवस्था पर विचार किया जा सकता है। इससे जनजातीय क्षेत्रों में स्वायत्त प्रशासन, सांस्कृतिक संरक्षण और स्थानीय स्तर पर निर्णय लेने की क्षमता मजबूत हो सकती है। हालांकि दार्जिलिंग क्षेत्र में ऐसी व्यवस्था लागू करने के लिए संवैधानिक, राजनीतिक और स्थानीय सहमति के प्रश्नों पर सावधानीपूर्वक विचार आवश्यक होगा।

वित्तीय विकेंद्रीकरण

  • DGHC और GTA के अनुभव से स्पष्ट है कि केवल संस्थागत ढाँचा बनाना पर्याप्त नहीं है। स्थानीय संस्थाओं को स्वतंत्र राजस्व जुटाने की क्षमता, पर्याप्त अनुदान और स्पष्ट वित्तीय अधिकार देने होंगे।
  • पंकज कुमार सिंह समिति द्वारा तैयार किए जाने वाले प्रस्ताव में वित्तीय स्वायत्तता को केंद्रीय महत्व दिया जाना चाहिए।

समावेशी आर्थिक विकास

  • राजनीतिक समाधान के साथ आर्थिक पुनरुत्थान भी आवश्यक है। दार्जिलिंग क्षेत्र में चाय उद्योग का आधुनिकीकरण, जैविक कृषि, बागवानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, पर्यटन और डिजिटल अवसंरचना को बढ़ावा दिया जा सकता है।
  • इको टूरिज्म, स्थानीय हस्तशिल्प और उच्च शिक्षा संस्थानों के विकास से युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा किए जा सकते हैं। इससे आंदोलन के पीछे मौजूद आर्थिक असंतोष को भी कम किया जा सकेगा।

बहुस्तरीय संवाद

  • केंद्र और राज्य सरकार के साथ केवल प्रमुख राजनीतिक दलों को शामिल करना पर्याप्त नहीं होगा। स्थानीय समुदाय, पहाड़ी राजनीतिक संगठन, नागरिक समाज, युवाओं, महिलाओं और आर्थिक हितधारकों को भी संवाद प्रक्रिया में शामिल करना आवश्यक है।
  • इससे समाधान अधिक भागीदारीपूर्ण और वैध बन सकता है।

गोरखालैंड और भारतीय संघवाद

  • गोरखालैंड मुद्दा भारतीय संघवाद की प्रकृति को समझने के लिए महत्वपूर्ण उदाहरण है। भारत का संघवाद केवल केंद्र और राज्यों के बीच शक्ति-विभाजन तक सीमित नहीं है। इसमें क्षेत्रीय आकांक्षाओं को राजनीतिक और संवैधानिक संस्थाओं के माध्यम से समायोजित करने की क्षमता भी शामिल है।
  • भारत में नए राज्यों का निर्माण कई बार क्षेत्रीय पहचान और प्रशासनिक सुविधा के आधार पर हुआ है। इसलिए अलग राज्य की मांग को स्वतः राष्ट्रविरोधी या अलगाववादी मानना उचित नहीं होगा। यदि मांग भारतीय संविधान और लोकतांत्रिक प्रक्रिया के भीतर रखी जाती है, तो उसका समाधान भी संवैधानिक संवाद द्वारा खोजा जाना चाहिए।
  • साथ ही, प्रत्येक क्षेत्रीय मांग को राज्य निर्माण के माध्यम से हल करना भी व्यावहारिक नहीं है। इससे प्रशासनिक विखंडन, वित्तीय समस्याएँ और नई क्षेत्रीय मांगों का विस्तार हो सकता है। इसलिए सहकारी संघवाद, प्रतिस्पर्धी संघवाद और असममित संघवाद के बीच उपयुक्त संतुलन आवश्यक है।

निष्कर्ष

  • गोरखालैंड मुद्दा भारत की लोकतांत्रिक और संघीय व्यवस्था के सामने एक जटिल परीक्षा है। इसमें पहचान की राजनीति, क्षेत्रीय विकास, राजनीतिक प्रतिनिधित्व, वित्तीय स्वायत्तता और राष्ट्रीय सुरक्षा सभी आपस में जुड़े हुए हैं।
  • एक स्थायी समाधान के लिए केवल प्रशासनिक परिषद का गठन या आर्थिक पैकेज पर्याप्त नहीं होगा। समाधान ऐसा होना चाहिए जो गोरखा समुदाय की विशिष्ट पहचान और राजनीतिक आकांक्षाओं को सम्मान दे, पश्चिम बंगाल की क्षेत्रीय अखंडता और अन्य समुदायों के हितों को ध्यान में रखे तथा सिलीगुड़ी कॉरिडोर के सामरिक महत्व को सुरक्षित रखे।
  • अतः गोरखालैंड समस्या का सबसे उपयुक्त रास्ता संवैधानिकता, संवाद, वास्तविक विकेंद्रीकरण, वित्तीय स्वायत्तता और समावेशी आर्थिक विकास के संयोजन में निहित है। यदि केंद्र, राज्य और गोरखा प्रतिनिधियों के बीच सहमति से ऐसा ढाँचा विकसित किया जाता है जो पर्याप्त स्वायत्तता और विकास सुनिश्चित करे, तो यह केवल गोरखालैंड विवाद का समाधान नहीं होगा, बल्कि भारतीय संघवाद की क्षेत्रीय आकांक्षाओं को लोकतांत्रिक ढंग से समायोजित करने की क्षमता का भी महत्वपूर्ण उदाहरण बनेगा।

महत्वपूर्ण MCQs

  1. गोरखालैंड की मांग मुख्यतः किस क्षेत्र से संबंधित है?
  2. असम की बराक घाटी
    B. पश्चिम बंगाल का दार्जिलिंग पहाड़ी क्षेत्र
    C. सिक्किम का पूर्वी क्षेत्र
    D. बिहार का सीमावर्ती क्षेत्र

उत्तर: B. पश्चिम बंगाल का दार्जिलिंग पहाड़ी क्षेत्र

  1. गोरखालैंड आंदोलन का प्रमुख आधार क्या रहा है?
  2. धार्मिक पहचान
    B. भाषायी, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय पहचान
    C. समुद्री संसाधनों पर अधिकार
    D. औद्योगिक विकास

उत्तर: B. भाषायी, सांस्कृतिक और क्षेत्रीय पहचान

  1. 1907 में दार्जिलिंग हिलमेन एसोसिएशन ने किस मांग को उठाया था?
  2. दार्जिलिंग को असम में मिलाने की
    B. दार्जिलिंग और जलपाईगुड़ी को बंगाल से अलग करने की
    C. दार्जिलिंग को नेपाल में मिलाने की
    D. स्वतंत्र गोरखास्थान की

उत्तर: B. दार्जिलिंग और जलपाईगुड़ी को बंगाल से अलग करने की

  1. गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (GNLF) का नेतृत्व किसने किया था?
  2. बिमल गुरुंग
    B. सुभाष घीसिंग
    C. विनय तमांग
    D. अनित थापा

उत्तर: B. सुभाष घीसिंग

  1. दार्जिलिंग गोरखा हिल काउंसिल (DGHC) की स्थापना किस वर्ष हुई थी?
  2. 1972
    B. 1980
    C. 1988
    D. 1992

उत्तर: C. 1988

  1. गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (GTA) की स्थापना किस वर्ष हुई?
  2. 2005
    B. 2008
    C. 2011
    D. 2014

उत्तर: C. 2011

  1. निम्नलिखित में से कौनसी गोरखालैंड क्षेत्र की प्रमुख आर्थिक गतिविधि है?
  2. समुद्री मत्स्य पालन
    B. चाय उत्पादन और पर्यटन
    C. पेट्रोलियम उत्पादन
    D. जहाज निर्माण

उत्तर: B. चाय उत्पादन और पर्यटन

  1. सिलीगुड़ी कॉरिडोर को सामान्यतः किस नाम से जाना जाता है?
  2. गोल्डन नेक
    B. चिकन नेक
    C. सिल्वर कॉरिडोर
    D. रेड कॉरिडोर

उत्तर: B. चिकन नेक

  1. सिलीगुड़ी कॉरिडोर का सामरिक महत्व क्या है?
  2. यह भारत को श्रीलंका से जोड़ता है।
    B. यह भारत के मुख्य भूभाग को पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ता है।
    C. यह भारत को मध्य एशिया से जोड़ता है।
    D. यह भारत का प्रमुख समुद्री मार्ग है।

उत्तर: B. यह भारत के मुख्य भूभाग को पूर्वोत्तर राज्यों से जोड़ता है।

  1. नेपाली भाषा को भारतीय संविधान की आठवीं अनुसूची में किस संविधान संशोधन द्वारा शामिल किया गया?
  2. 42वाँ संशोधन
    B. 52वाँ संशोधन
    C. 71वाँ संशोधन
    D. 73वाँ संशोधन

उत्तर: C. 71वाँ संशोधन

  1. गोरखालैंड मुद्दे के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
  1. गोरखालैंड की मांग मुख्यतः नेपाली भाषी गोरखा समुदाय की क्षेत्रीय पहचान से जुड़ी है।
  2. GTA का गठन 2011 में किया गया था।
  3. GTA को पूर्ण विधायी स्वायत्तता प्राप्त है।

उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

  1. केवल 1
    B. केवल 1 और 2
    C. केवल 2 और 3
    D. 1, 2 और 3

उत्तर: B. केवल 1 और 2

  1. गोरखालैंड मुद्दे के समाधान में निम्नलिखित में से कौनसे तत्व महत्वपूर्ण हैं?
  1. राजनीतिक स्वायत्तता
  2. वित्तीय विकेंद्रीकरण
  3. आर्थिक विकास
  4. क्षेत्रीय सुरक्षा

कूट:

  1. केवल 1 और 2
    B. केवल 2 और 3
    C. केवल 1, 2 और 3
    D. 1, 2, 3 और 4

उत्तर: D. 1, 2, 3 और 4

  1. निम्नलिखित में से कौनसा गोरखालैंड मुद्दे की प्रमुख चुनौती नहीं है?
  2. उपराष्ट्रीयताओं के बीच संघर्ष
    B. सिलीगुड़ी कॉरिडोर का सामरिक महत्व
    C. राजनीतिक नेतृत्व का विखंडन
    D. समुद्री सीमा विवाद

उत्तर: D. समुद्री सीमा विवाद

  1. गोरखालैंड मुद्दा भारतीय संघवाद के किस पहलू को सबसे अधिक दर्शाता है?
  2. केवल केंद्र की सर्वोच्चता
    B. क्षेत्रीय आकांक्षाओं का संवैधानिक समायोजन
    C. न्यायपालिका की स्वतंत्रता
    D. द्विसदनीय संसद की आवश्यकता

उत्तर: B. क्षेत्रीय आकांक्षाओं का संवैधानिक समायोजन

  1. गोरखालैंड मुद्दे के संदर्भ में असममित संघवाद का सबसे उपयुक्त अर्थ क्या है?
  2. सभी राज्यों को समान शक्तियाँ देना
    B. कुछ क्षेत्रों को उनकी विशिष्ट परिस्थितियों के अनुसार विशेष स्वायत्तता प्रदान करना
    C. राज्यों को समाप्त करके केंद्र का शासन स्थापित करना
    D. केवल वित्तीय शक्तियाँ केंद्र को देना

उत्तर: B. कुछ क्षेत्रों को उनकी विशिष्ट परिस्थितियों के अनुसार विशेष स्वायत्तता प्रदान करना


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