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Conference of the Parties (COP) का 17वाँ सत्र/सम्मेलन

(संयुक्त राष्ट्र मरुस्थलीकरण रोकथाम अभिसमय)

 UNCCD COP17 का 17वाँ सत्र मंगोलिया के उलानबटार में आयोजित हुआ, जिसमें सरकारों, वैज्ञानिकों, नागरिक समाज और पशुपालक समुदायों ने मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखे से जुड़ी परस्पर संबद्ध चुनौतियों पर चर्चा की। अगला COP18 वर्ष 2028 में मिस्र के शर्म अलशेख में आयोजित किया जाएगा।

UNCCD COP17 का मुख्य फोकस मरुस्थलीकरण, भूमि क्षरण और सूखे से निपटना था। इसमें चरागाहों, पशुपालक समुदायों, सूखालचीलापन, प्रकृतिआधारित समाधान और नवीन वित्तपोषण पर विशेष जोर दिया गया।

भारत ने समुदाय आधारित और विज्ञान आधारित भूमि पुनर्स्थापन, पूर्वानुमेय जलवायु वित्त तथा खुले प्राकृतिक पारितंत्रों (Open Natural Ecosystems) के संरक्षण पर जोर दिया और Land Degradation Neutrality (LDN) के प्रयासों को आगे बढ़ाया।

UNCCD COP17 की प्रमुख उपलब्धियाँ

विषय एवं प्राथमिकता: UNCCD COP17 का आयोजन “Restoring Land. Restoring Hope.” अर्थातभूमि की पुनर्स्थापना, आशा की पुनर्स्थापना विषय के अंतर्गत हुआ।

  • इसमें यह स्पष्ट किया गया कि भूमि पुनर्स्थापना केवल पर्यावरणीय मुद्दा नहीं है, बल्कि यह खाद्य सुरक्षा, आजीविका सृजन और जबरन मानव विस्थापन की रोकथाम से भी जुड़ी हुई है।
  • COP17 का आयोजन संयुक्त राष्ट्र अंतरराष्ट्रीय चरागाह एवं पशुपालक वर्ष 2026 (IYRP 2026) के साथ हुआ। मंगोलिया ने इस पहल में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। सम्मेलन में उन पशुपालक समुदायों की आवश्यकताओं पर विशेष ध्यान दिया गया जो सीधे इन पारितंत्रों पर निर्भर हैं।

वैश्विक भूमि क्षरण का पैमाना: सम्मेलन में वैश्विक भूमि संसाधनों की गंभीर स्थिति पर प्रकाश डाला गया। वर्तमान में भूमि क्षरण विश्व के लगभग 40% भूमि क्षेत्र को प्रभावित करता है, जिससे जल उपलब्धता और आर्थिक स्थिरता पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।

मंगोलिया की पहल: मंगोलिया उन देशों में शामिल है जो भूमि क्षरण से सबसे अधिक प्रभावित हैं। देश की लगभग 77% भूमि क्षरित हो चुकी है।

  • मंगोलिया ने वर्ष 2021 मेंBillion Trees Campaign” शुरू किया, जिसका लक्ष्य वर्ष 2030 तक एक अरब पेड़ लगाना है।

प्रकृतिआधारित समाधान: COP17 में Nature-Based Solutions (NbS) और Ecosystem-based Adaptation (EbA) को बढ़ावा देने पर जोर दिया गया।

  • इसका उद्देश्य पारितंत्र-आधारित उपायों को राष्ट्रीय योजना और अवसंरचना विकास में शामिल करना तथा इनके लिए पर्याप्त वित्त उपलब्ध कराना है।

Drought Resilience Index: Drought Resilience Index (DRI) को विश्व के पहले व्यापक तकनीकी उपकरण के रूप में लॉन्च किया गया।

  • यह AI-आधारित विश्लेषण और vulnerability mapping के माध्यम से देशों की सूखे की स्थिति का पूर्वानुमान लगाने, तैयारी करने और उसके अनुकूलन की क्षमता का आकलन करता है।
  • इससे सूखे के बाद राहत देने की बजाय पूर्वसक्रिय तैयारी और डेटाआधारित निवेश को बढ़ावा मिलता है।

Drought Resilience Investment Facility: Drought Resilience Investment Facility (DRIF) को UNCCD और लक्ज़मबर्ग द्वारा शुरू किया गया।

  • यह विश्व का पहला वैश्विक catalytic financing platform है, जो सार्वजनिक धन के माध्यम से निवेश के जोखिम को कम करता है और सूखा-लचीलापन, जल सुरक्षा, जलवायु-लचीली कृषि तथा भूमि पुनर्स्थापना के लिए निजी एवं संस्थागत वित्त जुटाने में सहायता करता है।

सूखालचीलेपन के लिए वित्त: सम्मेलन में भूमि पुनर्स्थापना और सूखा-लचीलेपन को बढ़ाने के लिए 1.3 अरब अमेरिकी डॉलर के नए एवं प्रस्तावित वित्तपोषण की घोषणा की गई।

कानूनी रूप से बाध्यकारी सूखा समझौता: देश कानूनी रूप से बाध्यकारी वैश्विक सूखा संधि पर सहमति बनाने में असफल रहे।

  • बढ़ते सूखे और लगभग 278 अरब डॉलर के वार्षिक resilience finance gap के बावजूद इस मुद्दे को अगली वार्ताओं तक टाल दिया गया।
  • COP17 ने यह निर्णय लिया कि COP18 से सूखे को एक स्वतंत्र एजेंडा आइटम के रूप में शामिल किया जाएगा।

UNCCD COP17 में भारत का पक्ष

  1. Open Natural Ecosystems पर पहला गाइड
  • भारत ने “Guide to Grasslands and Other Open Natural Ecosystems (ONEs)” का पहला संस्करण जारी किया।
  • इसका उद्देश्य सवाना, बीहड़, रेगिस्तान, थार, बन्नी लैंडस्केप और दक्कन के सवाना जैसे क्षेत्रों के संरक्षण को मुख्यधारा में लाना है।
  • ऐसे क्षेत्रों को केवल पेड़ों की कमी के आधार पर “wastelands” मानने की पुरानी धारणा को बदलने पर जोर दिया गया।
  1. भूमि पुनर्स्थापना लक्ष्य
  • Bonn Challenge के तहत भारत ने अब तक 76 मिलियन हेक्टेयर क्षरित एवं वनों से वंचित भूमि को पुनर्स्थापना के अंतर्गत लाया है।
  • भारत का लक्ष्य वर्ष 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर भूमि की पुनर्स्थापना करना है।
  1. पूर्वानुमेय वित्त
  • भारत ने भूमि पुनर्स्थापना के लिए पर्याप्त, पूर्वानुमेय और सतत अंतरराष्ट्रीय वित्त की मांग की।
  • इसके साथ भारत ने Sovereign Green Bonds और Green Credit Programme जैसी घरेलू पहलों पर भी प्रकाश डाला।
  1. विज्ञानआधारित चरागाह पुनर्स्थापना
  • भारत ने पशुपालकों को भूमि एवं पारितंत्र के संरक्षक (custodians) के रूप में मान्यता देने और उनके चराई अधिकारों को सुरक्षित करने की वकालत की।
  • भारत ने पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक विज्ञान के साथ जोड़ने पर जोर दिया तथा राजस्थान के Orans का उदाहरण दिया। ये समुदाय द्वारा संरक्षित पवित्र वन क्षेत्र हैं जो जैव-विविधता, वनस्पति और जल संसाधनों के संरक्षण में योगदान देते हैं।

भूमि क्षरण एवं सूखे से निपटने में प्रमुख चुनौतियाँ

  1. पारिस्थितिक एवं भूदृश्य संबंधी चुनौतियाँ
  • गलत तरीके से किया गया वनीकरण, मृदा क्षरण और लवणीयता प्रमुख समस्याएँ हैं।
  • Grasslands और Scrublands जैसे Open Natural Ecosystems (ONEs) को “wastelands” मानकर अनुचित वृक्षारोपण करने से स्थानीय जैव-विविधता, भूजल और पशुपालक आजीविका को नुकसान हो सकता है।
  1. चरागाहों का क्षरण
  • UNCCD की 2024 की रिपोर्ट के अनुसार लगभग 40–45% वैश्विक चरागाह क्षेत्र क्षरित है।
  • इससे वैश्विक खाद्य आपूर्ति के लगभग एकछठे हिस्से और पृथ्वी के लगभग एकतिहाई कार्बन भंडार पर खतरा है।
  • भारत में चरागाहों का क्षेत्र लगभग 21 मिलियन वर्ग किमी है, जबकि 5% से भी कम grasslands संरक्षित हैं।
  1. कृषि एवं बाजार संबंधी कमजोरियाँ
  • कृषि प्रोत्साहन कई बार स्थानीय पारिस्थितिकी के अनुरूप नहीं होते। इसके कारण जल-संकट वाले क्षेत्रों में धान और गन्ने जैसी जलगहन फसलों की खेती बढ़ती है, जिससे भूजल का अत्यधिक दोहन होता है।
  • साथ ही Common Property Resources (CPRs) जैसे Gochars और Orans का अतिक्रमण तथा सिकुड़ना चराई दबाव और भूमि क्षरण को बढ़ाता है।
  1. संस्थागत एवं शासन संबंधी कमियाँ
  • वन, कृषि, जल और ग्रामीण विकास विभागों के बीच जिम्मेदारियों के बंटवारे के कारण कई बार प्रयास खंडित और असंगठित हो जाते हैं।
  • आपदा प्रबंधन भी मुख्यतः प्रतिक्रियात्मक बना हुआ है और सूखे के बाद राहत पर अधिक ध्यान देता है, जबकि पूर्व-सक्रिय लचीलापन निर्माण पर कम।
  1. वैश्विक वित्त एवं जलवायु चुनौतियाँ
  • भूमि क्षरण और सूखे के लिए उपलब्ध वैश्विक वित्त, जलवायु परिवर्तन और जैव-विविधता से संबंधित पहलों की तुलना में अपर्याप्त है।
  • निजी निवेश में लंबी अवधि, भूमि-अधिकार संबंधी जटिलताएँ और कमजोर Measurement, Reporting and Verification (MRV) प्रणालियाँ बाधा उत्पन्न करती हैं।

मरुस्थलीकरण एवं भूमि क्षरण से निपटने के लिए भारत की पहल

National Action Plan to Combat Desertification (NAPCD)

  • इसे वर्ष 2001 में शुरू किया गया तथा 2023 में संशोधित किया गया।
  • यह भूमि पुनर्स्थापना और मरुस्थलीकरण से निपटने के लिए विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों के समन्वय हेतु एक व्यापक ढाँचा है।

PMKSY एवं Watershed Development: यह वर्षा जल संचयन, मृदा नमी संरक्षण और वनस्पति पुनर्जीवन को बढ़ावा देता है तथा सूखे के प्रति लचीलापन मजबूत करता है।

Green India Mission: यह National Action Plan on Climate Change (NAPCC) के अंतर्गत एक मिशन है, जिसका उद्देश्य वन पुनर्स्थापना और carbon sequestration को बढ़ाना है।

Soil Health Card Scheme: इसके माध्यम से किसानों को फसल-विशिष्ट पोषक तत्व एवं उर्वरक संबंधी सुझाव दिए जाते हैं, जिससे मृदा क्षरण को रोकने और मृदा स्वास्थ्य सुधारने में सहायता मिलती है।

Space Technology: ISRO का Desertification and Land Degradation Atlas of India remote sensing और GIS का उपयोग करके क्षरित भूमि की मैपिंग करता है और लक्षित पुनर्स्थापना में सहायता करता है।

Mission Amrit Sarovar: इसका उद्देश्य जल निकायों का निर्माण या पुनर्जीवन करना है ताकि भूजल पुनर्भरण, जल उपलब्धता और सूखालचीलापन बढ़ाया जा सके।

Aravalli Green Wall Initiative: इसका उद्देश्य अरावली पर्वतमाला के क्षरित भूदृश्यों का पुनर्स्थापन और मरुस्थलीकरण से मुकाबला करना है।

भूमि पुनर्स्थापना एवं सूखालचीलापन मजबूत करने के उपाय

  1. नीतिगत एवं संस्थागत सुधार
  • Agro-Ecological Zoning (AEZ) को अपनाया जाना चाहिए ताकि सब्सिडी, MSP और बिजली सहायता को स्थानीय रूप से उपयुक्त फसलों के अनुरूप किया जा सके।
  • सूखा आने के बाद राहत देने के बजाय trigger-based anticipatory financing को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, जिसमें satellite और soil-moisture data के आधार पर सूखा गंभीर होने से पहले वित्त उपलब्ध कराया जाए।
  1. पारिस्थितिक पुनर्स्थापना एवं टिकाऊ कृषि
  • Grasslands, savannas और scrublands को अलगअलग पारितंत्रों के रूप में मान्यता दी जानी चाहिए।
  • अंधाधुंध वृक्षारोपण की जगह स्थानीय प्रजातियों को प्राथमिकता तथा invasive species को हटाने पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
  • इसके साथ regenerative agriculture, biochar, soil-carbon restoration और drought-resilient farming को बढ़ावा देना चाहिए।
  1. प्रौद्योगिकी एवं डेटा आधारित प्रबंधन
  • Satellite data, IoT soil sensors और AI-based early-warning systems को एकीकृत करके स्थानीय स्तर पर सूखे की भविष्यवाणी, precision irrigation और समय पर फसल योजना को बेहतर बनाया जा सकता है।
  1. नवीन वित्त एवं बाजार तंत्र
  • Blended finance और public de-risking mechanisms के माध्यम से भूमि पुनर्स्थापना, टिकाऊ agroforestry और सूखा-लचीली कृषि में निजी निवेश को आकर्षित किया जाना चाहिए।

निष्कर्ष

UNCCD COP17 ने स्पष्ट किया कि भूमि पुनर्स्थापना केवल पर्यावरण संरक्षण का विषय नहीं है, बल्कि यह पारिस्थितिक, आर्थिक और मानव सुरक्षा से भी जुड़ी हुई है।

भारत द्वारा समुदायआधारित एवं विज्ञानआधारित भूमि पुनर्स्थापना, Open Natural Ecosystems के संरक्षण तथा Land Degradation Neutrality (LDN) की दिशा में किए जा रहे प्रयास यह दर्शाते हैं कि भूमि क्षरण और सूखे से निपटने के लिए वैश्विक सहयोग, जलवायु वित्त और टिकाऊ भूमि प्रबंधन आवश्यक हैं।


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