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अमेरिका-रूस निकटता और भारत के लिए तीन सबक

भारतीय रणनीतिक समुदाय में बहुत कम विचार उतनी गहरी बेचैनी पैदा करते हैं, जितनी ‘G2’ की अवधारणा। सामान्यतः यह शब्द अमेरिका और चीन की ऐसी साझेदारी की आशंका जगाता है, जो एशिया पर दो महाशक्तियों का भू-राजनीतिक वर्चस्व स्थापित कर दे। किंतु आज नई दिल्ली को एक अन्य G2 पर भी विचार करना चाहिए: अमेरिका और रूस के बीच संभावित रणनीतिक सामंजस्य। प्रख्यात सामरिक विश्लेषक सी. राजा मोहन का तर्क है कि इस दूसरे G2 से भारत को अपेक्षाकृत कम भय होना चाहिए, यद्यपि यह अपने साथ कुछ जटिलताएँ अवश्य लाएगा।

राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा हाल ही में रूसी डीज़ल पर लगे प्रतिबंधों में ढील देने के निर्णय ने इस संभावना को, भले ही वह अभी दूर हो, पुनः चर्चा के केंद्र में ला दिया है।

G2 की अवधारणा: पृष्ठभूमि

‘G2’ शब्द का प्रयोग सबसे पहले अमेरिकी अर्थशास्त्री सी. फ्रेड बर्गस्टन ने 2005 के आसपास अमेरिका-चीन आर्थिक संबंधों के संदर्भ में किया था। बाद में 2009 में ज़बिग्न्यू ब्रेज़िंस्की जैसे रणनीतिकारों ने इसे लोकप्रिय बनाया, जब ओबामा प्रशासन के आरंभिक वर्षों में दोनों देशों के बीच वैश्विक मुद्दों के संयुक्त प्रबंधन की बात उठी। अक्टूबर 2025 में दक्षिण कोरिया के बुसान में शी जिनपिंग से भेंट से पूर्व स्वयं ट्रंप ने इस बैठक को ‘G2’ की संज्ञा दी थी, जिससे भारत सहित अनेक एशियाई देशों की चिंता बढ़ी।

भारत के लिए अमेरिका-चीन G2 इसलिए चिंताजनक है क्योंकि चीन भारत का प्रत्यक्ष सामरिक प्रतिद्वंद्वी है और ऐसा कोई भी समझौता एशिया में शक्ति-संतुलन को भारत के प्रतिकूल कर सकता है। इसके विपरीत अमेरिका-रूस निकटता का स्वरूप भिन्न है, क्योंकि दोनों ही भारत के साझेदार हैं।

ट्रंप का निर्णय: रूसी डीज़ल प्रतिबंधों में ढील

लेख के अनुसार, रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ टेलीफोन वार्ता के पश्चात ट्रंप ने अमेरिकी और वैश्विक बाज़ारों के लिए रूसी आपूर्ति की घोषणा की। वाशिंगटन ने अप्रैल 2027 तक रूसी डीज़ल के आयात को अधिकृत कर दिया है।

इस निर्णय के पीछे के घरेलू कारण स्पष्ट हैं:

  • अमेरिका में डीज़ल की कीमत 6 डॉलर प्रति गैलन से ऊपर पहुँच चुकी है।
  • 3 नवंबर को होने वाले कांग्रेस के मध्यावधि चुनावों से पहले महँगाई का प्रश्न राजनीतिक रूप से संवेदनशील बना हुआ है।
  • किसानों और ट्रक चालकों के लिए सस्ता डीज़ल ट्रंप की तात्कालिक राजनीतिक प्राथमिकता है।

नीति का विरोधाभास

इसमें विडंबना स्पष्ट है। कुछ ही सप्ताह पूर्व ट्रंप ने ऐसे विधेयक पर हस्ताक्षर किए थे, जो उन्हें रूसी तेल खरीदने वाले भारत जैसे देशों पर 100 प्रतिशत तक टैरिफ लगाने का व्यापक अधिकार देता है। क्या यह पाखंड है? निस्संदेह। किंतु पाखंड अंतरराष्ट्रीय राजनीति का अभिन्न अंग है। बड़ी शक्तियाँ वैश्विक मुद्दों पर कितनी भी ऊँची बातें करें, अंततः राजनीति स्थानीय ही होती है।

उल्लेखनीय है कि अगस्त 2025 में अमेरिका ने रूसी तेल की खरीद को आधार बनाकर भारत पर 25 प्रतिशत अतिरिक्त दंडात्मक शुल्क लगाया था, जिससे कुल शुल्क 50 प्रतिशत हो गया था। अक्टूबर 2025 में अमेरिका ने रूस की प्रमुख तेल कंपनियों रोसनेफ्ट और लुकोइल पर भी प्रतिबंध लगाए थे। ऐसे में अपने बाज़ार के लिए रूसी डीज़ल को छूट देना अमेरिकी नीति के दोहरे मापदंड को उजागर करता है।

भारत के लिए अवसर और आशंकाएँ

  • नई दिल्ली के लिए अमेरिका-रूस संबंधों में सुधार उस तनाव को कम कर सकता है, जो भारत की रूसी साझेदारी के कारण वाशिंगटन के साथ उत्पन्न होता रहा है।
  • तात्कालिक राहत: अनेक लोग आशा करेंगे कि अपने लिए डीज़ल पर छूट लेने के बाद ट्रंप भारत पर नए तेल प्रतिबंध लगाने में संकोच करेंगे।
  • दीर्घकालिक संभावना: इससे भी अधिक रोचक है वाशिंगटन और मॉस्को के बीच उस ‘आंतांत’ (मैत्रीपूर्ण समझ) की संभावना, जिसके ट्रंप लंबे समय से पक्षधर रहे हैं।

रूस के प्रति ट्रंप का दीर्घकालिक आकर्षण

रूस के साथ बेहतर संबंधों की ट्रंप की इच्छा कोई रहस्य नहीं है। उनके पहले कार्यकाल के कुछ उदाहरण इसे स्पष्ट करते हैं:

  • G8 में वापसी की माँग: ट्रंप ने रूस को G8 में पुनः शामिल करने पर बल दिया था। 2014 में क्रीमिया के विलय के बाद रूस को इस समूह से निलंबित कर दिया गया था, जिसके बाद यह G7 रह गया।
  • हेलसिंकी शिखर सम्मेलन (2018): फ़िनलैंड की राजधानी में पुतिन से भेंट के दौरान ट्रंप ने रूस को विरोधी बताने से इनकार कर दिया था।
  • ऐतिहासिक उदाहरण: ट्रंप ने बार-बार द्वितीय विश्वयुद्ध के अमेरिकी-सोवियत गठबंधन को नई साझेदारी के एक व्यावहारिक पूर्व उदाहरण के रूप में प्रस्तुत किया है।

अमेरिकी आंतरिक राजनीति: सबसे बड़ी बाधा

  • ट्रंप के पहले कार्यकाल ने यह भी दिखाया कि रूस के साथ संबंध सुधारने हेतु अमेरिका के भीतर सहमति बनाना कितना कठिन है।
  • डेमोक्रेटिक विरोध: डेमोक्रेट्स ने ट्रंप को ‘पुतिन की कठपुतली’ के रूप में चित्रित करने और यह तर्क देने में भारी ऊर्जा लगाई कि रूसी हस्तक्षेप ने उन्हें व्हाइट हाउस तक पहुँचाया। 2019 में प्रतिनिधि सभा पर नियंत्रण पाने के बाद उन्होंने ट्रंप के रूसी संबंधों की जाँच आरंभ की।
  • भविष्य की आशंका: यदि डेमोक्रेट्स कांग्रेस के किसी एक सदन पर भी पुनः नियंत्रण पा लेते हैं, तो वे जाँच, प्रतिबंध संबंधी कानून और खर्च पर नियंत्रण के माध्यम से मॉस्को के साथ मेल-मिलाप में बाधा डाल सकते हैं।
  • रिपब्लिकन असहमति: पुतिन को रियायतें देने का विरोध रिपब्लिकन पार्टी के भीतर भी गहराई से जड़ें जमाए हुए है।
  • ईसाई दक्षिणपंथ का समर्थन: अमेरिका का ईसाई दक्षिणपंथ पुतिन से संबंधों का पक्षधर है, क्योंकि वह उन्हें उदारवादी सांस्कृतिक अतिवाद के विरुद्ध पारंपरिक पश्चिमी मूल्यों का रक्षक मानता है। किंतु यह समर्थन व्यापक विरोध पर भारी नहीं पड़ सकता।

दूसरे कार्यकाल में कूटनीतिक सक्रियता

  • वाशिंगटन के सुविदित प्रतिरोध के बावजूद ट्रंप ने दूसरे कार्यकाल में रूस से संबंध सुधारने में समय नहीं गँवाया:
  • फरवरी 2025: सऊदी अरब के रियाद में हुई वार्ता ने उच्च-स्तरीय संवाद पुनः आरंभ किया।
  • निवेश प्रस्ताव: पुतिन के निवेश दूत किरिल दमित्रियेव ने ऊर्जा, आर्कटिक विकास और खनिज क्षेत्रों में अवसरों की पेशकश की।
  • अगस्त 2025, अलास्का शिखर सम्मेलन: इसने दोनों राष्ट्रपतियों को आमने-सामने बिठाया, परंतु युद्ध समाप्त कराने में विफल रहा।
  • पिछला महीना: ट्रंप के दूत स्टीव विटकॉफ़ और जेरेड कुशनर ने मॉस्को में पुतिन से भेंट की।

आगामी संभावनाएँ

ट्रंप नवंबर में चीन के शेनझेन में होने वाले APEC सम्मेलन में पुतिन से मिल सकते हैं, जहाँ क्रेमलिन ने चीन के शी जिनपिंग सहित एक बैठक का विचार रखा है। ट्रंप दिसंबर में मियामी में होने वाले G20 शिखर सम्मेलन में भी पुतिन की मेज़बानी कर सकते हैं, यद्यपि मॉस्को ने अभी यह आमंत्रण स्वीकार नहीं किया है। कोई भी भेंट सुनिश्चित नहीं है, पर कूटनीतिक संभावनाएँ विस्तृत हो रही हैं।

वाणिज्य: ट्रंप की रणनीति का केंद्र

ट्रंप की रूस नीति के केंद्र में वाणिज्य है। वे चाहते हैं कि आर्थिक सहयोग शांति का मार्ग खोले, न कि समझौते के बाद आए। उनका मानना है कि लाभदायक सौदे राजनीतिक शत्रुता को नरम कर सकते हैं। रूसी ऊर्जा और खनिजों तक अमेरिकी पहुँच बेहतर संबंधों के पक्ष में एक हितधारक वर्ग तैयार कर सकती है। ट्रंप यूक्रेन युद्ध को व्यापार की बाधा के रूप में भी देखते हैं और उन्होंने कीव पर रूसी रिफाइनरियों पर हमले रोकने का दबाव डाला है।

पुतिन के लिए सौदे का आकर्षण

पुतिन के पास भी समझौते के ठोस कारण हैं:

  • प्रतिबंधों में राहत से राजस्व, निवेश और प्रौद्योगिकी की प्राप्ति।
  • वाशिंगटन से संवाद रूस की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा पुनर्स्थापित करता है।
  • चीन पर बढ़ती निर्भरता में कमी।
  • रूसी क्षेत्रीय उपलब्धियों को मान्यता देने वाला समझौता उन्हें देश में विजय का दावा करने देगा।

किंतु इन साझा हितों को ठोस परिणामों में बदलना कठिन सिद्ध हुआ है। यूक्रेन ऐसे किसी भी सौदे का विरोध करेगा जो आक्रमण को पुरस्कृत करे या उसकी सुरक्षा से समझौता करे। जिस प्रकार एशियाई देश अमेरिका-चीन समझौते से आशंकित रहते हैं, उसी प्रकार यूरोपीय देशों को भय है कि ट्रंप-पुतिन सौदा उन्हें रूस की भू-राजनीतिक आक्रामकता के समक्ष असुरक्षित छोड़ देगा।

भारत के लिए तीन सबक

1- पहला सबक: अमेरिका-रूस संबंध स्थिर नहीं हैं

  • अमेरिका और रूस के बीच टकराव स्थायी नहीं है। नई दिल्ली को अमेरिका-रूस सहयोग से उत्पन्न अवसरों का उतनी ही सावधानी से आकलन करना चाहिए, जितना शत्रुता की कीमतों का। दोनों के बीच तनाव में कमी भारत की रूसी ऊर्जा खरीद और रक्षा संबंधों पर अमेरिकी दबाव को घटा सकती है।
  • ध्यातव्य है कि रूस से S-400 प्रणाली की खरीद के कारण भारत पर अमेरिकी कानून CAATSA (2017) के अंतर्गत प्रतिबंधों की आशंका लंबे समय तक बनी रही।

2- दूसरा सबक: रूस अमेरिका से टकराव को वैचारिक दायित्व नहीं मानता

  • मॉस्को अमेरिका से टकराव को कोई ‘पवित्र वैचारिक दायित्व’ नहीं मानता, जैसा दिल्ली में कुछ लोग समझते हैं। रूस अमेरिका के साथ संबंध को एक महाशक्ति समकक्ष के रूप में महत्त्व देता है, भले ही आर्थिक दृष्टि से वह उसका समकक्ष न हो।
  • 1990 के दशक के आरंभ में अमेरिका से संबंध बनाने की रूसी उत्सुकता ने भारत को मॉस्को की प्राथमिकताओं में नीचे धकेल दिया था। राष्ट्रपति येल्तसिन के काल में 1993 में अमेरिकी दबाव के कारण रूस ने भारत को क्रायोजेनिक इंजन प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण से पीछे हटने का निर्णय लिया था। दिल्ली को यह अनुभव स्मरण रखना चाहिए।

3- तीसरा सबक: यूरोप में भारत के बढ़ते हित

यूरोप में भारत के हित नाटकीय रूप से बढ़े हैं। व्यापार, प्रौद्योगिकी, निवेश और रक्षा सहयोग ने दिल्ली को यूरोपीय स्थिरता में प्रत्यक्ष हितधारक बना दिया है। भले ही ट्रंप और पुतिन सौदा कर लें, यूरोप के साथ रूस का टकराव जारी रह सकता है। अतः अमेरिका-रूस समझौता भारत की आवश्यकताओं को केवल आंशिक रूप से पूरा करेगा।

भारत की भूमिका क्या हो?

  • यूक्रेन में शांति हेतु जहाँ भी संभव हो, योगदान देना चाहिए।
  • यूक्रेन युद्ध की समाप्ति हेतु रूस और यूरोप के बीच प्रत्यक्ष संवाद को प्रोत्साहित करना चाहिए।
  • यूरोप और व्यापक यूरेशिया में स्थायी सुरक्षा व्यवस्था के निर्माण में सहभागी बनना चाहिए।
  • भारत की ‘रणनीतिक स्वायत्तता’ और बहु-संरेखण (मल्टी-अलाइनमेंट) की नीति इस भूमिका के अनुकूल है, क्योंकि भारत उन गिने-चुने देशों में है जिनके रूस, अमेरिका और यूरोप तीनों से विश्वसनीय संबंध हैं। प्रधानमंत्री मोदी का यह कथन कि ‘यह युद्ध का युग नहीं है’ इसी संतुलित दृष्टिकोण को दर्शाता है।

निष्कर्ष

अमेरिका-रूस G2 अभी एक दूर की संभावना है, जिसके मार्ग में अमेरिकी घरेलू राजनीति, यूक्रेन का प्रतिरोध और यूरोपीय आशंकाएँ जैसी गंभीर बाधाएँ हैं। फिर भी भारत को इसे भय की दृष्टि से नहीं, बल्कि अवसर और सतर्कता के संतुलित दृष्टिकोण से देखना चाहिए। इतिहास बताता है कि महाशक्तियों के संबंध परिवर्तनशील होते हैं और अपने हितों को सर्वोपरि रखते हैं। भारत की सफलता इसी में है कि वह किसी एक समीकरण पर निर्भर न रहकर बहुध्रुवीय विश्व में अपने हितों का स्वतंत्र रूप से संवर्धन करे।

वन लाइनर फैक्ट्स फॉर रिवीजन

  • ‘G2’ शब्द का प्रयोग सर्वप्रथम सी. फ्रेड बर्गस्टन ने अमेरिका-चीन संदर्भ में किया।
  • अमेरिका ने रूसी डीज़ल आयात को अप्रैल 2027 तक अधिकृत किया है।
  • अमेरिकी कांग्रेस के मध्यावधि चुनाव 3 नवंबर 2026 को निर्धारित हैं।
  • क्रीमिया विलय (2014) के बाद रूस को G8 से निलंबित किया गया।
  • ट्रंप-पुतिन हेलसिंकी शिखर सम्मेलन 2018 में फ़िनलैंड में हुआ।
  • फरवरी 2025 में रियाद (सऊदी अरब) में अमेरिका-रूस उच्च-स्तरीय वार्ता हुई।
  • ट्रंप-पुतिन अलास्का शिखर सम्मेलन अगस्त 2025 में हुआ।
  • किरिल दमित्रियेव पुतिन के निवेश दूत हैं।
  • APEC 2026 सम्मेलन चीन के शेनझेन में आयोजित होगा।
  • G20 शिखर सम्मेलन 2026 की मेज़बानी अमेरिका (मियामी) करेगा।
  • अक्टूबर 2025 में अमेरिका ने रोसनेफ्ट और लुकोइल पर प्रतिबंध लगाए।
  • CAATSA अमेरिकी कानून 2017 में पारित हुआ।
  • भारत-रूस संबंध 2010 से ‘विशेष एवं विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी’ कहलाते हैं।
  • 1993 में रूस ने अमेरिकी दबाव में भारत को क्रायोजेनिक प्रौद्योगिकी हस्तांतरण रोका।

अभ्यास प्रश्न

1. रूस को G8 समूह से किस घटना के पश्चात निलंबित किया गया था?

(a) जॉर्जिया युद्ध, 2008

(b) क्रीमिया का विलय, 2014

(c) सीरिया में सैन्य हस्तक्षेप, 2015

(d) यूक्रेन पर आक्रमण, 2022

2. निम्नलिखित युग्मों पर विचार कीजिए:

  1. हेलसिंकी शिखर सम्मेलन : फ़िनलैंड
  2. APEC 2026 : चीन
  3. G20 शिखर सम्मेलन 2026 : दक्षिण अफ्रीका

उपर्युक्त में से कौन-से युग्म सही सुमेलित हैं?

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2 और 3

(c) केवल 1 और 3

(d) 1, 2 और 3

3. CAATSA के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. यह संयुक्त राज्य अमेरिका का घरेलू कानून है।
  2. यह ईरान, उत्तर कोरिया और रूस को लक्षित करता है।
  3. यह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद द्वारा अनुमोदित प्रतिबंध व्यवस्था है।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

(a) केवल 1 और 2

(b) केवल 2 और 3

(c) केवल 1 और 3

(d) 1, 2 और 3

4. भारत और रूस के संबंधों को ‘विशेष एवं विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी’ का दर्जा किस वर्ष दिया गया?

(a) 2000

(b) 2005

(c) 2010

(d) 2014

5. अंतरराष्ट्रीय संबंधों के संदर्भ में ‘G2’ शब्द का प्रारंभिक प्रयोग किन दो देशों के लिए किया गया था?

(a) अमेरिका और रूस

(b) अमेरिका और चीन

(c) अमेरिका और जापान

(d) चीन और रूस

6. निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. अगस्त 2025 में ट्रंप और पुतिन के बीच शिखर सम्मेलन अलास्का में हुआ।
  2. फरवरी 2025 में अमेरिका-रूस उच्च-स्तरीय वार्ता रियाद में हुई।

उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

(a) केवल 1

(b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों

(d) न तो 1 और न ही 2

7. रोसनेफ्ट और लुकोइल, जो हाल में अमेरिकी प्रतिबंधों के कारण चर्चा में रहीं, किस देश की कंपनियाँ हैं?

(a) कज़ाखस्तान

(b) ईरान

(c) रूस

(d) अज़रबैजान

उत्तर

(b) 2. (a) 3. (a) 4. (c) 5. (b) 6. (c) 7. (c)


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