संयुक्त राज्य अमेरिका के इंडो–पैसिफिक कमांड (INDOPACOM) का नाम बदलकर पुनः पैसिफिक कमांड (PACOM) करना केवल एक प्रशासनिक परिवर्तन नहीं है, बल्कि इसके पीछे महत्वपूर्ण भू-राजनीतिक संकेत छिपे हैं।
2018 में “इंडो–पैसिफिक” शब्द को अपनाने का उद्देश्य भारत, हिंद महासागर और क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखने में भारत की बढ़ती भूमिका को स्वीकार करना था। अब PACOM नाम पर लौटना अमेरिकी रणनीतिक प्राथमिकताओं में बदलाव का संकेत देता है और यह प्रश्न उठाता है कि बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की भूमिका क्या होगी।
यह परिवर्तन विशेष रूप से तीन क्षेत्रों में दिखाई देता है:
- इंडो-पैसिफिक
- पश्चिम एशिया
- दक्षिण एशिया
PACOM का नाम बदलने का वास्तविक संकेत क्या है?
- “इंडो–पैसिफिक” शब्दावली का गायब होना: अमेरिकी रक्षा मंत्री पीट हेगसेथ (Pete Hegseth) के 2025 के शांग्री-ला भाषण में “इंडो-पैसिफिक” शब्द का 30 से अधिक बार उल्लेख हुआ था, जबकि 2026 के भाषण में इसका उल्लेख नहीं किया गया।
- जिम्मेदारी का क्षेत्र (Area of Responsibility) वही है: PACOM के नाम बदलने से उसके संचालन क्षेत्र में कोई बदलाव नहीं हुआ है। इसका अधिकार क्षेत्र अभी भी अमेरिका के पश्चिमी तट से लेकर भारत की पश्चिमी सीमा तक फैला हुआ है। इसलिए यह भौगोलिक नहीं, बल्कि रणनीतिक दृष्टिकोण (Strategic Framing) में बदलाव है।
- अमेरिका–चीन संबंधों में नरमी का संकेत: यह नाम परिवर्तन ट्रंप प्रशासन के उस प्रयास का प्रतीक माना जा रहा है, जिसमें चीन के साथ तनाव कम करने की कोशिश की जा रही है। चीन लंबे समय से क्वाड (Quad) और इंडो–पैसिफिक अवधारणा का विरोध करता रहा है।
अमेरिका की चीन के प्रति बढ़ती पहल (Outreach) ने क्वाड को कैसे कमजोर किया है?
- ट्रंप की “G-2” अवधारणा: ट्रंप द्वारा “G-2” (अमेरिका-चीन केंद्रित वैश्विक व्यवस्था) का उल्लेख ऐसी विश्व व्यवस्था का संकेत देता है, जो एशिया में भारत के बहुध्रुवीय (Multipolar) दृष्टिकोण के विपरीत है।
- कूटनीतिक मेल–मिलाप के संकेत: ट्रंप की बीजिंग यात्रा और शी चिनफिंग की प्रस्तावित अमेरिका यात्रा यह दर्शाती है कि दोनों देश प्रतिस्पर्धा को नियंत्रित रखते हुए सहयोग बढ़ाने की दिशा में बढ़ रहे हैं।
- अमेरिकी राष्ट्रीय रक्षा रणनीति में क्वाड का उल्लेख नहीं: जनवरी 2026 की अमेरिकी राष्ट्रीय रक्षा रणनीति (National Defense Strategy) में क्वाड का उल्लेख नहीं किया गया, जिससे इसकी रणनीतिक और नीतिगत महत्ता कम होती दिखाई देती है।
- क्वाड का सीमित एजेंडा:
अब क्वाड का सहयोग मुख्य रूप से निम्न क्षेत्रों तक सीमित रह गया है:- समुद्री सुरक्षा (Maritime Security)
- आर्थिक समृद्धि (Economic Prosperity)
- महत्वपूर्ण खनिज (Critical Minerals)
- आपदा प्रतिक्रिया (Disaster Response)
- तकनीकी सहयोग में आंतरिक बाधाएँ: अमेरिका द्वारा Anthropic के AI मॉडलों पर लगाए गए प्रतिबंधों ने Pax Silica और Critical Minerals Initiative Framework जैसी पहलों के बावजूद क्वाड के प्रौद्योगिकी सहयोग को कमजोर किया है।
- भारत को क्वाड शिखर सम्मेलन की मेजबानी नहीं मिलना: भारत 2024 से क्वाड शिखर सम्मेलन की मेजबानी करने की इच्छा जता रहा है, लेकिन अभी तक उसे यह अवसर नहीं मिला। इससे आशंका है कि क्वाड भविष्य में केवल विदेश मंत्रियों के स्तर के मंच तक सीमित हो सकता है।
- समुद्री सुरक्षा से जुड़े घटनाक्रम: IRIS Dena से संबंधित घटनाओं तथा भारतीय नागरिकों को ले जा रहे जहाजों पर हुए हमलों ने यह दिखाया कि क्वाड के भीतर Maritime Domain Awareness (समुद्री क्षेत्रीय निगरानी और सूचना–साझाकरण) में अभी भी महत्वपूर्ण कमियाँ मौजूद हैं।
अमेरिका–चीन संबंधों में बदलाव
- हाल के वर्षों में डोनाल्ड ट्रंप और शी चिनफिंग के बीच कूटनीतिक संपर्क यह संकेत देते हैं कि दोनों देश टकराव बढ़ाने के बजाय तनाव को नियंत्रित करना चाहते हैं।
- ताइवान मुद्दे पर अपेक्षाकृत कम जोर और संभावित G-2 व्यवस्था की चर्चाएँ यह संभावना दर्शाती हैं कि विश्व प्रमुख शक्तियों के प्रभाव क्षेत्रों में विभाजित हो सकता है, जहाँ एशिया में चीन की भूमिका और मजबूत हो सकती है।
- यह स्थिति भारत के बहुध्रुवीय एशिया (Multipolar Asia) के दृष्टिकोण के लिए चुनौती बन सकती है।
क्वाड की कमजोर होती भूमिका
भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया का समूह क्वाड (Quad) चीन के बढ़ते प्रभाव के जवाब में सक्रिय हुआ था, लेकिन अब इसकी प्रासंगिकता कम होती दिखाई दे रही है।
- हाल के अमेरिकी रणनीतिक दस्तावेजों में क्वाड का सीमित उल्लेख।
- सहयोग का दायरा मुख्यतः समुद्री सुरक्षा, आर्थिक समृद्धि, महत्वपूर्ण खनिज और आपदा प्रबंधन तक सीमित।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) और तकनीकी सहयोग की पहल में अपेक्षित प्रगति नहीं।
- भविष्य के क्वाड शिखर सम्मेलनों को लेकर अनिश्चितता।
भारत के लिए रणनीतिक निहितार्थ
भारत अब केवल क्वाड पर निर्भर नहीं रह सकता। उसे:
- ऑस्ट्रेलिया-भारत-जापान त्रिपक्षीय सहयोग को मजबूत करना,
- समुद्री सुरक्षा साझेदारियों का विस्तार करना,
- और वैकल्पिक रणनीतिक व्यवस्थाओं को विकसित करना चाहिए।
अमेरिका–ईरान समझौता और पश्चिम एशिया की नई परिस्थितियाँ
बदलता शक्ति संतुलन
- अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम तथा बाद का इस्लामाबाद समझौता (MoU) पश्चिम एशिया में अमेरिकी नीति के पुनर्संतुलन का संकेत देता है।
- यह दर्शाता है कि अमेरिका लंबे सैन्य हस्तक्षेपों के बजाय कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता दे रहा है।
समझौते की प्रमुख विशेषताएँ
- ईरान के निकट क्षेत्रों से अमेरिकी सेनाओं की वापसी।
- हॉर्मुज़ जलडमरूमध्य पर ईरान का बढ़ता प्रभाव।
- ईरान के पुनर्निर्माण के लिए लगभग 300 अरब डॉलर की प्रतिबद्धता।
इन परिवर्तनों से ईरान की क्षेत्रीय स्थिति मजबूत होती है और सऊदी अरब, इज़राइल, ओमान तथा क़तर जैसे देशों की रणनीतियों पर प्रभाव पड़ता है।
भारत पर प्रभाव
भारत को ईरान, इज़राइल और खाड़ी देशों के साथ अपने संतुलित संबंधों का पुनर्मूल्यांकन करना होगा। प्रमुख चिंताएँ हैं:
- ऊर्जा सुरक्षा,
- ईरानी तेल तक पहुँच,
- चाबहार बंदरगाह का रणनीतिक महत्व,
- क्षेत्रीय संपर्क और व्यापार मार्ग।
दक्षिण एशिया में अमेरिका का बढ़ता प्रभाव
क्षेत्रीय सक्रियता
- सर्जियो गोर की भारत में अमेरिकी राजदूत और दक्षिण एवं मध्य एशिया के विशेष दूत के रूप में नियुक्ति इस क्षेत्र में अमेरिका की बढ़ती रुचि को दर्शाती है।
- नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और श्रीलंका के साथ बढ़ता अमेरिकी संपर्क यह दिखाता है कि वाशिंगटन केवल भारत तक सीमित नहीं रहना चाहता।
चीन के साथ रणनीतिक प्रतिस्पर्धा
- दक्षिण एशिया अब अमेरिका और चीन के बीच प्रतिस्पर्धा का प्रमुख क्षेत्र बन गया है।
- चीन ने विभिन्न क्षेत्रीय सहयोग तंत्रों और अवसंरचना परियोजनाओं के माध्यम से अपनी उपस्थिति मजबूत की है, जबकि भारत की क्षेत्रीय संस्थागत पकड़ अपेक्षाकृत कमजोर हुई है।
अमेरिका–चीन प्रतिस्पर्धा भारत के पड़ोस के लिए सबसे बड़ा खतरा कहाँ पैदा करती है?
- दक्षिण एशिया प्रतिस्पर्धा का नया केंद्र बन रहा है: अमेरिका, चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने के लिए दक्षिण एशिया में अपनी रणनीतिक और कूटनीतिक भागीदारी का विस्तार कर रहा है।
- दक्षिण एशिया में व्यापक क्षेत्रीय भूमिका की अमेरिकी कोशिश: वाशिंगटन अब केवल भारत-पाकिस्तान संबंधों तक सीमित न रहकर पूरे दक्षिण एशिया में एक व्यापक प्रभाव स्थापित करना चाहता है।
- सर्जियो गोर की यात्राएँ अमेरिकी सक्रियता का संकेत हैं: काठमांडू (नेपाल), थिम्फू (भूटान), ढाका (बांग्लादेश) और कोलंबो (श्रीलंका) की उनकी यात्राएँ दर्शाती हैं कि अमेरिका पूरे क्षेत्र में अपनी उपस्थिति मजबूत करने का प्रयास कर रहा है।
- सार्क (SAARC) और बिम्सटेक (BIMSTEC) की सीमाएँ: पाकिस्तान और बांग्लादेश के साथ राजनीतिक मतभेदों के कारण इन क्षेत्रीय संगठनों की प्रभावशीलता सीमित हो गई है।
- चीन ने पहले ही वैकल्पिक क्षेत्रीय तंत्र विकसित कर लिए हैं: बीजिंग ने ऐसे सहयोग मंच और पहल विकसित किए हैं, जिनसे वह दक्षिण एशिया में अपना प्रभाव बढ़ा रहा है और कई मामलों में भारत को दरकिनार कर रहा है।
- भारत के लिए बहुपक्षीय अवसर: भारत इंडियन ओशन रिम एसोसिएशन (IORA), बिम्सटेक (BIMSTEC), शंघाई सहयोग संगठन (SCO) और पुनर्जीवित सार्क (SAARC) के माध्यम से अपने क्षेत्रीय नेतृत्व को और मजबूत कर सकता है।
भारत की रणनीतिक स्थिति के बारे में यह केंद्रीय तनाव क्या दर्शाता है?
- ऊपरी स्तर की मित्रता के पीछे नीतिगत मतभेद छिपे हैं: भारत और अमेरिका के बीच कूटनीतिक सौहार्द दिखाई देता है, लेकिन अमेरिकी नीतियों में हो रहे बदलाव भारत के हितों को इंडो-पैसिफिक, पश्चिम एशिया और दक्षिण एशिया तीनों क्षेत्रों में प्रभावित कर सकते हैं।
- भारत की रणनीति जिन धारणाओं पर आधारित थी, वे बदल रही हैं: 2018 के बाद भारत ने अमेरिकी इंडो–पैसिफिक प्रतिबद्धता को ध्यान में रखकर अपनी रणनीतिक सोच विकसित की थी, लेकिन अब वही आधार बदलता हुआ दिखाई दे रहा है।
- G-2 विश्व व्यवस्था भारत के बहुध्रुवीय दृष्टिकोण से मेल नहीं खाती: यदि अमेरिका और चीन मिलकर वैश्विक व्यवस्था का नेतृत्व करते हैं, तो एशिया में भारत के स्वतंत्र रणनीतिक विकल्प और प्रभाव सीमित हो सकते हैं।
- भारत को केवल प्रतीकात्मक कूटनीति से आगे बढ़ना होगा: नई दिल्ली को केवल सकारात्मक बयानबाजी पर निर्भर रहने के बजाय बदलती अमेरिकी नीतियों और वैश्विक शक्ति-संतुलन के अनुरूप व्यावहारिक रणनीति अपनानी होगी।
भारत के लिए आगे की राह: क्षेत्रीय नेतृत्व को पुनर्जीवित करना
सार्क (SAARC) और बिम्सटेक (BIMSTEC) जैसी संस्थाएँ राजनीतिक मतभेदों और सीमित प्रभावशीलता के कारण अपेक्षित भूमिका नहीं निभा पा रही हैं।
इस स्थिति में बाहरी शक्तियों के लिए क्षेत्रीय प्रभाव बढ़ाने का अवसर बनता है।
भारत को चाहिए कि वह:
- सार्क को पुनर्जीवित करे,
- बिम्सटेक को मजबूत बनाए,
- इंडियन ओशन रिम एसोसिएशन (IORA) में अपनी भूमिका बढ़ाए,
- तथा शंघाई सहयोग संगठन (SCO) जैसे मंचों के माध्यम से सहयोग को बढ़ावा दे।
निष्कर्ष
INDOPACOM का पुनः PACOM बनना केवल नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि बदलती वैश्विक रणनीति का प्रतीक माना जा सकता है। भारत और अमेरिका के संबंध भले ही सकारात्मक बने रहें, लेकिन दीर्घकालिक भू-राजनीतिक प्रवृत्तियाँ अधिक जटिल और प्रतिस्पर्धी होती जा रही हैं।
भारत के लिए आवश्यक है कि वह:
- संतुलित और स्वायत्त विदेश नीति अपनाए,
- क्षेत्रीय संस्थाओं को मजबूत करे,
- रणनीतिक साझेदारियों में विविधता लाए,
- और बदलते शक्ति-संतुलन के अनुसार स्वयं को ढाले।
Source: TH
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