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भारतीय संविधान में निवारक निरोध का विकास

विधि की सीमा, राज्य की शक्ति और नागरिक स्वतंत्रता का संतुलन

लोकतंत्र में असहमति की आवाज़ और राज्य की कानून-व्यवस्था बनाए रखने की ज़िम्मेदारी के बीच तनाव कोई नई बात नहीं है। हाल में दिल्ली की घटना ने इस तनाव को फिर उजागर किया। दिल्ली पुलिस ने 5,000 से अधिक प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया, जो मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफ़े और विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को वापस लेने की माँग लेकर जंतर-मंतर की ओर जा रहे थे।

विरोध से पहले के दिनों में देशभर में प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की व्यापक कार्रवाई हुई। हिरासत में लिए गए और कथित रूप से दुर्व्यवहार के शिकार लोगों में विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता, पूर्व मुख्यमंत्री, विपक्ष के नेता, वकील, पत्रकार, छात्र और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल थे। कुछ ऐसे लोग भी पकड़े गए जो विरोध का हिस्सा ही नहीं थे। अनेक जनप्रतिनिधियों को प्रदर्शन शुरू होने से पहले ही उनके आवास पर या रास्ते में रोक लिया गया। अंततः सर्वोच्च न्यायालय ने 11 अक्टूबर को केंद्र और दिल्ली पुलिस को निर्देश दिया कि वे “कानून और व्यवस्था के अधीन” लोगों की मुक्त आवाजाही सुनिश्चित करें।

इस घटनाक्रम ने यह प्रश्न सामने रखा कि निवारक निरोध क्या है, इसे कब लगाया जा सकता है और इसकी संवैधानिक मर्यादाएँ क्या हैं।

निवारक निरोध क्या है?

निवारक निरोध का अर्थ है किसी व्यक्ति को न्यायालय में मुकदमा चलाए बिना या दोषसिद्धि के बिना हिरासत में रखना। इसका मूल उद्देश्य किसी व्यक्ति को अतीत में किए गए अपराध के लिए दंडित करना नहीं, बल्कि भविष्य में संभावित अपराध करने से उसे रोकना है।

यह शक्ति अधिकारियों द्वारा लोक व्यवस्था, राज्य की सुरक्षा तथा कानून और व्यवस्था के आधार पर प्रयोग की जा सकती है।

राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (NSA), 1980 के अंतर्गत यदि सरकार संतुष्ट हो कि किसी व्यक्ति की गतिविधियाँ भारत की रक्षा, विदेशी शक्तियों से संबंधों या भारत की सुरक्षा के लिए हानिकारक हैं, तो उसे निवारक रूप से निरुद्ध किया जा सकता है।

दंडात्मक और निवारक निरोध में अंतर:

दंडात्मक निरोध किसी अपराध के घटित हो जाने के बाद मुकदमे और दोषसिद्धि के उपरांत दिया जाता है, जबकि निवारक निरोध केवल आशंका और प्रशासनिक संतुष्टि पर आधारित होता है। यही कारण है कि इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सबसे गंभीर प्रतिबंधों में गिना जाता है।

निषेधाज्ञा: BNSS की धारा 163

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 ने अपनी पूर्ववर्ती दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 144 की मूल भावना को बनाए रखा है।

प्रमुख प्रावधान:

  • जिला मजिस्ट्रेट, उप-जिला मजिस्ट्रेट या राज्य सरकार द्वारा विशेष रूप से सशक्त कोई अन्य कार्यपालक मजिस्ट्रेट आदेश जारी कर सकता है।
  • आदेश तभी दिया जा सकता है जब कार्यवाही के लिए पर्याप्त आधार हो और तत्काल रोकथाम या शीघ्र उपचार वांछनीय हो।
  • इसका उद्देश्य वैध रूप से कार्यरत व्यक्ति के प्रति बाधा, क्षोभ या क्षति, मानव जीवन, स्वास्थ्य या सुरक्षा के लिए खतरा, सार्वजनिक शांति में विघ्न, दंगा या बलवा रोकना है।
  • आपात स्थिति में यह आदेश प्रभावित पक्षों को पूर्व सूचना दिए बिना भी जारी किया जा सकता है।
  • सामान्यतः ऐसा आदेश दो माह तक प्रभावी रहता है; मानव जीवन या लोक शांति पर खतरे की स्थिति में राज्य सरकार इसे अधिकतम छह माह तक बढ़ा सकती है।
  • यह प्रावधान अपनी प्रकृति में निवारक है, जिसका लक्ष्य संभावित हानि को टालना है, न कि अतीत के कृत्यों को दंडित करना। यह एक असाधारण शक्ति है, जो उन परिस्थितियों के लिए है जहाँ कानून प्रवर्तन की सामान्य प्रक्रिया तत्काल हानि रोकने में बहुत धीमी सिद्ध हो। आदेश में उन तथ्यों का स्पष्ट उल्लेख आवश्यक है जिन पर वह आधारित है, ताकि पारदर्शिता बनी रहे और उसे चुनौती देने का आधार उपलब्ध हो।
  • धारा 163 के आदेश उच्च न्यायालयों के पुनरीक्षण क्षेत्राधिकार में न्यायिक समीक्षा के अधीन हैं। बाबूलाल पराते बनाम महाराष्ट्र राज्य (1961) और मधु लिमये बनाम उप-मंडल मजिस्ट्रेट जैसे मामलों में सर्वोच्च न्यायालय लगातार कहता रहा है कि ये शक्तियाँ विवेकपूर्वक, आनुपातिक ढंग से और केवल आसन्न खतरे की स्थिति में प्रयोग हों, सामान्य प्रशासनिक उपाय के रूप में नहीं।

निवारक निरोध बनाम निषेधाज्ञा: मूल अंतर

  • लक्ष्य: निवारक निरोध किसी विशिष्ट व्यक्ति की स्वतंत्रता छीनता है, जबकि निषेधाज्ञा किसी क्षेत्र में सामूहिक गतिविधियों जैसे जमावड़े पर रोक लगाती है।
  • आधार: निरोध व्यक्ति की संभावित गतिविधियों पर अधिकारी की संतुष्टि पर टिका है, जबकि निषेधाज्ञा किसी क्षेत्र में आसन्न अशांति की आशंका पर।
  • विधिक स्रोत: निरोध के लिए NSA, COFEPOSA जैसे विशेष कानून और अनुच्छेद 22 के सुरक्षा उपाय लागू होते हैं, जबकि निषेधाज्ञा BNSS की धारा 163 से संचालित है।
  • समानता: दोनों ही निवारक प्रकृति के हैं और दोनों न्यायिक समीक्षा के अधीन हैं।

निवारक निरोध का ऐतिहासिक विकास

भारत में निवारक निरोध एक औपनिवेशिक उपकरण के रूप में आरंभ हुआ, जिसका उपयोग राजनीतिक असहमति दबाने के लिए होता था। धीरे-धीरे यह राष्ट्रीय सुरक्षा और लोक व्यवस्था की रक्षा का वैधानिक तंत्र बन गया।

औपनिवेशिक काल:

  • रॉलेट एक्ट, 1919 और भारत रक्षा अधिनियम, 1939 ने अधिकारियों को बिना मुकदमे के व्यक्तियों को निरुद्ध करने की शक्ति दी।
  • इनका निशाना प्रायः स्वतंत्रता सेनानी और राजनीतिक विरोधी होते थे।

स्वतंत्रता के बाद:

  • निवारक निरोध अधिनियम, 1950 लाया गया, जो 1969 तक प्रभावी रहा।
  • आंतरिक सुरक्षा अनुरक्षण अधिनियम (MISA), 1971 ने निरोध की शक्तियों का और विस्तार किया। आपातकाल (1975-77) के दौरान राजनीतिक विरोधियों के विरुद्ध इसका व्यापक प्रयोग हुआ। 1978 में इसे निरस्त कर दिया गया।
  • राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम, 1980 ने निवारक निरोध के लिए एक स्थायी विधिक ढाँचा स्थापित किया।
  • विदेशी मुद्रा संरक्षण एवं तस्करी निवारण अधिनियम (COFEPOSA), 1974 जैसे अन्य कानूनों ने भी निरोध की अनुमति दी।
  • विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम (UAPA), 1967 में संशोधनों ने आतंकवाद और विधिविरुद्ध गतिविधियों से निपटने हेतु राज्य की शक्तियाँ बढ़ाईं।

न्यायिक व्याख्या का विकास:

  • ए.के. गोपालन बनाम मद्रास राज्य (1950) में न्यायालय ने अनुच्छेद 21 की संकीर्ण व्याख्या की थी।
  • आपातकाल में ए.डी.एम. जबलपुर (1976) मामले ने स्वतंत्रता को और सीमित किया, जिसे बाद में पुट्टास्वामी (2017) में खारिज किया गया।
  • मेनका गांधी बनाम भारत संघ (1978) ने निर्णायक मोड़ दिया और स्थापित किया कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता सीमित करने वाली प्रक्रिया न्यायसंगत, उचित और युक्तियुक्त होनी चाहिए।
  • फिर भी लंबे समय तक बिना मुकदमे के निरोध, अपर्याप्त न्यायिक निगरानी और दुरुपयोग की आशंकाएँ राष्ट्रीय सुरक्षा और मौलिक अधिकारों के बीच संतुलन पर प्रश्न उठाती रही हैं।

11 अक्टूबर को सर्वोच्च न्यायालय ने क्या कहा?

दिल्ली के विरोध प्रदर्शनों के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय ने रविवार को एक “असाधारण” सुनवाई की और केंद्र सरकार व दिल्ली पुलिस को अवैध हिरासतें रोकने का निर्देश दिया।

प्रमुख निर्देश:

  • लोगों और यातायात की सुचारु आवाजाही तथा मेट्रो और रेल सेवाओं का सामान्य संचालन सुनिश्चित हो, परंतु “कानून और व्यवस्था के अधीन”।
  • इंटरनेट सेवाएँ कानून के अनुसार उपलब्ध रहें।
  • लोगों और वाहनों की आवाजाही अनावश्यक रूप से बाधित न हो; बैरिकेडिंग की समीक्षा कानून-व्यवस्था और यातायात की आवश्यकताओं के आधार पर हो।
  • कोई अवैध हिरासत न हो और प्रत्येक हिरासत विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार हो।
  • शांतिपूर्ण सभाओं की अनुमति कानून के अनुसार हो, सिवाय उन क्षेत्रों के जहाँ धारा 163 BNSS के अंतर्गत निषेधाज्ञा लागू है।
  • सर्वोच्च न्यायालय और अन्य अदालतों के पास धारा 163 के प्रतिबंधों की घोषणा करने वाले सूचना-पट्ट, यदि लगे हों, हटाए जाएँ और अदालतों तक पहुँच सुनिश्चित की जाए।
  • न्यायालय ने यह आश्वासन भी दर्ज किया कि वकीलों, पत्रकारों और अन्य पेशेवरों को उनके कर्तव्य निभाने से नहीं रोका जाएगा।
  • अवमानना और बंदी प्रत्यक्षीकरण: न्यायालय ने 9 अक्टूबर के आदेश के उल्लंघन के आरोप में अवमानना की कार्यवाही पर नोटिस जारी किया और अधिकारियों को 13 अक्टूबर तक अनुपालन रिपोर्ट देने को कहा, जिसमें मेट्रो प्रतिबंधों और रेलवे परामर्शों का विवरण भी हो। सामूहिक हिरासत का आरोप लगाने वाली बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिकाएँ भी 13 अक्टूबर को मुख्य मामले के साथ सुनी जानी थीं। राज्य को हिरासतों की परिस्थितियाँ, तरीका और विधिक औचित्य स्पष्ट करना होगा। यह अनुच्छेद 32 के अंतर्गत मौलिक अधिकारों के संरक्षण और प्रवर्तन के न्यायालय के कर्तव्य को रेखांकित करता है।

न्यायालयों का दृष्टिकोण: प्रमुख निर्णय

  • बाबूलाल पराते बनाम महाराष्ट्र राज्य (1961): धारा 144 की संवैधानिक वैधता बरकरार रखी गई, परंतु कहा गया कि इसका प्रयोग केवल आपात स्थितियों में विशिष्ट खतरों को रोकने के लिए हो। यह शक्ति न “असीमित” है, न “अनियंत्रित”।
  • खुदीराम दास बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1975): निरोध के आधारों की सूचना देना मनमानी के विरुद्ध एक सुरक्षा कवच है। प्राधिकारी किसी व्यक्ति को अपनी मर्ज़ी से उठाकर सलाखों के पीछे नहीं डाल सकता। उसके पास ठोस आधार होने चाहिए और वे बंदी को बताए जाने चाहिए, ताकि वह जान सके कि किन तथ्यों के आधार पर उसकी स्वतंत्रता छीनी गई, न्यायिक समीक्षा का सहारा ले सके और निरोध आदेश के विरुद्ध अभ्यावेदन दे सके।
  • रामलीला मैदान प्रकरण (2012): यूपीए सरकार के विरुद्ध आंदोलन के दौरान सोती हुई भीड़ पर धारा 144 लगाने की सर्वोच्च न्यायालय ने आलोचना की। न्यायालय ने कहा कि ऐसा प्रावधान केवल लोक शांति बनाए रखने की गंभीर परिस्थितियों में प्रयोग हो; आपात स्थिति अचानक उत्पन्न हुई हो और उसके परिणाम पर्याप्त रूप से गंभीर हों।
  • मज़दूर किसान शक्ति संगठन बनाम भारत संघ (2018): जंतर-मंतर मार्ग पर विरोध प्रदर्शनों पर प्रतिबंध लगाने वाला राष्ट्रीय हरित अधिकरण का आदेश निरस्त किया गया। न्यायालय ने पूर्ण प्रतिबंध को अत्यधिक माना और कहा कि समाधान प्रदर्शनों पर पूरी तरह रोक लगाना नहीं है। प्रदर्शनों के नियमन और अनुमति देने हेतु एक व्यवस्था बनाने का निर्देश दिया गया।
  • शेख नाज़नीन बनाम तेलंगाना राज्य (2022): निवारक निरोध की शक्तियाँ असाधारण हैं, जो व्यक्ति की स्वतंत्रता पर सीधा आघात करती हैं; इनका प्रयोग असाधारण परिस्थितियों में ही हो, नियमित ढंग से नहीं।
  • अमीना बेगम बनाम तेलंगाना राज्य (2023): निवारक निरोध की बेड़ियाँ खोलने हेतु आवश्यक है कि अनुच्छेद 14, 19 और 21 से बने “स्वर्णिम त्रिभुज” के सुरक्षा उपाय निष्ठापूर्वक लागू हों। अनुच्छेद 14 विधि के समक्ष समानता, अनुच्छेद 19 वाक्, अभिव्यक्ति, सभा और आवागमन की स्वतंत्रता, तथा अनुच्छेद 21 जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की गारंटी देता है।

संवैधानिक सुरक्षा उपाय: अनुच्छेद 22

भारत उन गिने-चुने लोकतंत्रों में है जहाँ शांतिकाल में भी निवारक निरोध को संविधान में स्थान मिला है। इसलिए अनुच्छेद 22 के सुरक्षा उपाय अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।

  • अनुच्छेद 22(1) और 22(2): सामान्य गिरफ्तारी में व्यक्ति को कारण बताने, वकील से परामर्श और 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत करने का अधिकार है। अनुच्छेद 22(3) के अनुसार ये अधिकार शत्रु विदेशी और निवारक निरोध कानून के अंतर्गत निरुद्ध व्यक्ति पर लागू नहीं होते।
  • अनुच्छेद 22(4): किसी व्यक्ति को सामान्यतः तीन माह से अधिक निरुद्ध नहीं रखा जा सकता, जब तक सलाहकार बोर्ड पर्याप्त कारण की राय न दे। बोर्ड में उच्च न्यायालय के न्यायाधीश या न्यायाधीश बनने की योग्यता वाले व्यक्ति होते हैं।
  • अनुच्छेद 22(5): निरोध के आधार यथाशीघ्र बताए जाएँ और अभ्यावेदन का अवसर दिया जाए। आधार ऐसे ढंग से बताए जाएँ कि बंदी प्रभावी रूप से चुनौती दे सके।
  • अनुच्छेद 22(6): लोकहित के विरुद्ध समझे जाने वाले तथ्यों को प्रकट करने से प्राधिकारी इनकार कर सकता है।
  • अनुच्छेद 22(7): संसद अधिकतम निरोध अवधि तथा सलाहकार बोर्ड की प्रक्रिया निर्धारित कर सकती है।
  • विधायी क्षमता: रक्षा, विदेशी मामलों और भारत की सुरक्षा से संबंधित निवारक निरोध संघ सूची (प्रविष्टि 9) में है, जबकि राज्य की सुरक्षा, लोक व्यवस्था और आवश्यक आपूर्ति से संबंधित निरोध समवर्ती सूची (प्रविष्टि 3) में है।
  • 44वाँ संविधान संशोधन (1978): इसने सलाहकार बोर्ड की अवधि तीन से घटाकर दो माह करने का प्रावधान किया, परंतु यह भाग आज तक अधिसूचित नहीं हुआ।
  • NSA के अंतर्गत व्यवस्था: अधिकतम निरोध 12 माह; आधार सामान्यतः 5 दिन में और असाधारण स्थिति में 10 दिन के भीतर बताना अनिवार्य; सलाहकार बोर्ड के समक्ष बंदी को वकील का अधिकार नहीं।
  • न्यायिक समीक्षा: निवारक निरोध के आदेश न्यायिक समीक्षा के अधीन हैं। न्यायालय देखते हैं कि प्राधिकारियों ने कानून का पालन किया या नहीं, प्रासंगिक सामग्री पर विचार किया या नहीं और संवैधानिक सुरक्षा उपायों का अनुपालन हुआ या नहीं। अतः इस शक्ति का प्रयोग सावधानी से होना चाहिए, मनमाने ढंग से नहीं।

आगे की राह

  • निरोध को अपवाद मानते हुए आनुपातिकता के सिद्धांत को कठोरता से लागू किया जाए।
  • शांतिपूर्ण विरोध के लिए स्पष्ट, पारदर्शी अनुमति-तंत्र बने, जैसा 2018 के निर्णय में अपेक्षित था।
  • सलाहकार बोर्डों की स्वतंत्रता बढ़े और 44वें संशोधन के लंबित प्रावधान पर पुनर्विचार हो।
  • हिरासत के आँकड़ों का सार्वजनिक प्रकटीकरण और पुलिस की जवाबदेही सुनिश्चित हो।
  • अंतरराष्ट्रीय नागरिक एवं राजनीतिक अधिकार प्रसंविदा (ICCPR) के अनुच्छेद 9 पर भारत के आरक्षण की समीक्षा पर विमर्श हो।

निष्कर्ष

निवारक निरोध राज्य के हाथ में एक दोधारी तलवार है। यह राष्ट्र की सुरक्षा का उपकरण भी है और स्वतंत्रता के हनन का माध्यम भी बन सकता है। दिल्ली की घटनाओं पर सर्वोच्च न्यायालय का त्वरित हस्तक्षेप याद दिलाता है कि लोकतंत्र में असहमति अपराध नहीं, बल्कि उसकी जीवंतता का प्रमाण है। राज्य की शक्ति तभी वैध है जब वह संविधान की मर्यादा, विधि की प्रक्रिया और “स्वर्णिम त्रिभुज” के मूल्यों के भीतर रहकर प्रयोग की जाए।

वन लाइनर फैक्ट्स फॉर रिवीजन

  • निवारक निरोध का उद्देश्य भविष्य के संभावित अपराध को रोकना है, अतीत के अपराध का दंड नहीं।
  • BNSS की धारा 163 ने CrPC की धारा 144 का स्थान लिया है।
  • धारा 163 के आदेश सामान्यतः दो माह तक, विस्तार सहित अधिकतम छह माह तक प्रभावी रह सकते हैं।
  • रॉलेट एक्ट 1919 में और भारत रक्षा अधिनियम 1939 में लागू हुआ।
  • निवारक निरोध अधिनियम, 1950, वर्ष 1969 तक प्रभावी रहा।
  • MISA 1971 में बना और 1978 में निरस्त हुआ।
  • COFEPOSA 1974 में और NSA 1980 में लागू हुआ।
  • NSA के अंतर्गत अधिकतम निरोध अवधि 12 माह है।
  • अनुच्छेद 22(4): सलाहकार बोर्ड की राय के बिना तीन माह से अधिक निरोध नहीं।
  • अनुच्छेद 22(5): निरोध के आधार बताना और अभ्यावेदन का अवसर देना अनिवार्य।
  • बाबूलाल पराते (1961) में धारा 144 की वैधता बरकरार रही।
  • खुदीराम दास (1975) ने आधारों की सूचना को मनमानी के विरुद्ध रक्षा कवच माना।
  • मेनका गांधी (1978): प्रक्रिया न्यायसंगत, उचित और युक्तियुक्त हो।
  • मज़दूर किसान शक्ति संगठन (2018): जंतर-मंतर पर पूर्ण प्रतिबंध अत्यधिक माना गया।
  • अमीना बेगम (2023): अनुच्छेद 14, 19 और 21 को “स्वर्णिम त्रिभुज” कहा गया।
  • रक्षा, विदेश मामले और भारत की सुरक्षा से जुड़ा निवारक निरोध संघ सूची की प्रविष्टि 9 में है।
  • अवैध हिरासत के विरुद्ध बंदी प्रत्यक्षीकरण रिट अनुच्छेद 32 और 226 के अंतर्गत जारी होती है।

 अभ्यास प्रश्न

प्रश्न 1. भारतीय संविधान के अनुच्छेद 22 के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

1-सलाहकार बोर्ड की राय के बिना किसी व्यक्ति को सामान्यतः तीन माह से अधिक निवारक निरोध में नहीं रखा जा सकता।

2-निरोध करने वाला प्राधिकारी लोकहित के विरुद्ध समझे जाने वाले तथ्यों को प्रकट करने से इनकार कर सकता है।

3-संसद निवारक निरोध की अधिकतम अवधि निर्धारित कर सकती है।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

(a) केवल 1 और 2 (b) केवल 2 और 3

(c) केवल 1 और 3 (d) 1, 2 और 3

प्रश्न 2. निम्नलिखित अधिनियमों को उनके लागू होने के कालक्रम में व्यवस्थित कीजिए:

  1. आंतरिक सुरक्षा अनुरक्षण अधिनियम (MISA)
  2. भारत रक्षा अधिनियम
  3. विदेशी मुद्रा संरक्षण एवं तस्करी निवारण अधिनियम (COFEPOSA)
  4. निवारक निरोध अधिनियम

कूट:

(a) 2-4-1-3 (b) 4-2-1-3

(c) 2-4-3-1 (d) 4-2-3-1

प्रश्न 3. भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. यह दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 की धारा 144 के समकक्ष है।
  2. आपात स्थिति में यह आदेश प्रभावित व्यक्तियों को पूर्व सूचना दिए बिना जारी किया जा सकता है।
  3. यह आदेश केवल जिला मजिस्ट्रेट ही जारी कर सकता है।

उपर्युक्त में से कौन-से कथन सही हैं?

(a) केवल 1 (b) केवल 1 और 2

(c) केवल 2 और 3 (d) 1, 2 और 3

प्रश्न 4. सर्वोच्च न्यायालय द्वारा प्रयुक्त “स्वर्णिम त्रिभुज” (Golden Triangle) में संविधान के कौन-से अनुच्छेद सम्मिलित हैं?

(a) अनुच्छेद 14, 19 और 21

(b) अनुच्छेद 14, 21 और 22

(c) अनुच्छेद 19, 21 और 32

(d) अनुच्छेद 14, 19 और 32

प्रश्न 5. निवारक निरोध से संबंधित विधायी शक्तियों के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. भारत की सुरक्षा से संबंधित कारणों हेतु निवारक निरोध संघ सूची का विषय है।
  2. लोक व्यवस्था बनाए रखने से संबंधित कारणों हेतु निवारक निरोध समवर्ती सूची का विषय है।

उपर्युक्त में से कौन-सा/से कथन सही है/हैं?

(a) केवल 1 (b) केवल 2

(c) 1 और 2 दोनों (d) न तो 1, न ही 2

 

उत्तर: 1. (d) 2. (a) 3. (b) 4. (a) 5. (c)


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