हाल के संसदीय घटनाक्रमों ने सांसदों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा की आवश्यकता पर पुनः ध्यान केंद्रित किया है, जो अनुच्छेद 105 के अंतर्गत प्रदत्त एक संवैधानिक विशेषाधिकार है। यद्यपि प्रक्रिया संबंधी नियम बहस को नियंत्रित करते हैं और व्यवस्था बनाए रखते हैं, किंतु यह चिंता व्यक्त की जा रही है कि इनका प्रयोग अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा करने के बजाय उसे सीमित कर रहा है। मूल प्रश्न यह है कि क्या संस्थागत व्यवहार उस संवैधानिक संरक्षण को सुदृढ़ कर रहे हैं, जिसके माध्यम से संसद खुली और निर्भीक चर्चा के आधार पर कार्य करती है, या उसे कमजोर कर रहे हैं।
संसदीय भाषण को नियंत्रित करने वाला संवैधानिक एवं संस्थागत ढाँचा
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की द्विस्तरीय संरचना: अनुच्छेद 19 सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है, जबकि अनुच्छेद 105 और 194 सांसदों एवं विधायकों को विशेष विधायी विशेषाधिकार प्रदान करते हैं।
- उन्नत संवैधानिक संरक्षण: सदन के भीतर दिए गए किसी भाषण या मत के लिए विधायकों को दंडित नहीं किया जा सकता, जिससे उनकी अभिव्यक्ति को सामान्य नागरिकों की अपेक्षा अधिक सशक्त संरक्षण प्राप्त होता है।
- न्यायिक परीक्षण से प्रतिरक्षा: न्यायालयों को संसदीय कार्यवाहियों की जांच करने से रोका गया है, जिससे विधायी विचार-विमर्श संस्थागत रूप से स्वायत्त और विधिक रूप से संरक्षित रहता है।
- विधानमंडल द्वारा आंतरिक विनियमन: भाषण केवल संविधान के प्रावधानों और सदन के स्थायी आदेशों के अधीन होता है, जो बहस को व्यवस्थित करते हैं, परंतु संवैधानिक गारंटी को निरस्त नहीं करते।
- सीमाएँ अधिकारों को नष्ट नहीं कर सकतीं: प्रतिबंध तभी वैध हैं जब वे आचरण को नियंत्रित करें, न कि संविधान द्वारा संरक्षित अभिव्यक्ति की मूल भावना को समाप्त कर दें।
- संसदीय विशेषाधिकार का उद्देश्य: यह विशेष संरक्षण मुक्त, स्पष्ट और निर्भीक बहस सुनिश्चित करने के लिए है, ताकि विधानमंडल बाहरी दबाव या दमन के बिना प्रभावी रूप से कार्य कर सके।
- विनियमन का उद्देश्य सुविधा प्रदान करना, न कि नियंत्रण: प्रक्रिया संबंधी नियम व्यवस्था, गरिमा और अनुशासन बनाए रखते हैं, परंतु उनका उद्देश्य संवैधानिक भाषण अधिकारों का समर्थन करना है, उन्हें प्रतिस्थापित करना नहीं।
- विशिष्ट संवैधानिक प्रतिबंध: अनुच्छेद 121 न्यायाधीशों के आचरण पर चर्चा को निषिद्ध करता है, सिवाय उनके पद से हटाने के प्रस्ताव के दौरान।
- प्रक्रियात्मक सीमाओं के उदाहरण: नियम न्यायालय में लंबित मामलों, व्यक्तिगत आरोपों तथा पूर्व सूचना के बिना लगाए गए मानहानिकारक आरोपों को सीमित करते हैं।
रिकॉर्ड से शब्द/बयान हटाने का विवाद और उसके निहितार्थ
- अभिलेखित भाषण का अधिकार: सांसदों को स्वतंत्र रूप से बोलने और अपने संपूर्ण वक्तव्य को आधिकारिक अभिलेखों में दर्ज कराने का अधिकार है, क्योंकि अपूर्ण अभिलेखन प्रतिनिधित्व और सार्वजनिक जवाबदेही की प्रक्रिया को कमजोर करता है।
- नियम 380 का दायरा: पीठासीन अधिकारी असंसदीय, मानहानिकारक, अशोभनीय या गरिमा-विहीन शब्दों को हटाने का अधिकार रखते हैं, परंतु यह नियम केवल विशिष्ट आपत्तिजनक शब्दों को हटाने की अनुमति देता है, संपूर्ण वाक्यों या अनुच्छेदों को नहीं।
- अत्यधिक विलोपन (Expunction) के प्रभाव: भाषण के बड़े हिस्सों को हटाने से अर्थ विकृत हो सकता है, तर्क असंगत हो सकते हैं, और संसदीय अभिव्यक्ति एवं प्रतिनिधित्व को प्राप्त संवैधानिक संरक्षण प्रभावी रूप से कमजोर हो सकता है।
- अधिकार के प्रयोग में दायित्व: पीठासीन अधिकारियों का दायित्व है कि वे बहस की गरिमा की रक्षा करें, परंतु अनुशासनात्मक शक्तियों का प्रयोग इस प्रकार न करें कि सदस्यों की मूल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित हो जाए।
- यांत्रिक प्रयोग और ऐतिहासिक अभिलेख: जब नियमों का यांत्रिक रूप से प्रयोग किया जाता है तो भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षित भाषण अपनी सुसंगति खो देते हैं, जिससे संस्थागत स्मृति कमजोर होती है और समय के साथ संसदीय विचार-विमर्श का महत्व घटता है।
संसदीय लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का महत्व
- कार्यपालिका के प्रभुत्व से संरक्षण: अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता विधायकों को निर्भय होकर बहस करने की अनुमति देती है, जिससे कार्यपालिका संसदीय चर्चा को नियंत्रित या दमन नहीं कर पाती।
- लोकतांत्रिक शासन की आधारशिला: विधानमंडलों में खुली अभिव्यक्ति उदार लोकतंत्र को बनाए रखती है, क्योंकि निर्णय लेने से पहले विविध विचारों पर बहस सुनिश्चित होती है।
- विधायी पर्यवेक्षण के लिए अनिवार्य: संसद तभी प्रभावी रूप से कार्यपालिका की समीक्षा और जांच कर सकती है, जब सदस्य नीतियों, कार्यों और निर्णयों पर स्वतंत्र रूप से प्रश्न उठा सकें।
- विधायी कार्यप्रणाली की अखंडता: निर्भीक चर्चा संसदीय प्रक्रियाओं की विश्वसनीयता बनाए रखती है और यह सुनिश्चित करती है कि जन-चिंताएँ उचित रूप से प्रस्तुत हों।
- विचार-विमर्श की क्षमता का सुदृढ़ीकरण: सार्थक कानून-निर्माण खुली और अविराम बहस पर निर्भर करता है; भाषण पर प्रतिबंध संसद की विषयों की समग्र जांच की क्षमता को कमजोर करता है।
- पारदर्शिता और जनविश्वास: खुली बहस कार्यवाही को नागरिकों के लिए दृश्यमान और समझने योग्य बनाती है, जिससे संस्थानों की निष्पक्षता और जवाबदेही में विश्वास बढ़ता है।
- प्रक्रियात्मक शक्तियों के दुरुपयोग की रोकथाम: जब भाषण संरक्षित होता है, तो प्रक्रिया संबंधी नियमों का प्रयोग असहमति को दबाने या बहस को नियंत्रित करने के साधन के रूप में नहीं किया जा सकता।
- संसदीय संतुलन का संरक्षण: लोकतांत्रिक स्थिरता इस पर निर्भर करती है कि बहुमत शासन करे और अल्पमत आलोचना करे; अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इस संतुलन को कार्यशील बनाए रखती है।

संसदीय लोकतंत्र में विपक्ष की कार्यात्मक भूमिका
- विपक्ष का अनिवार्य स्थान: लोकतांत्रिक विधानमंडलों में सरकार की सक्रिय आलोचना आवश्यक है, क्योंकि सत्ता से प्रश्न करना और मंत्रियों को चुनौती देना विपक्ष की केंद्रीय जिम्मेदारी है।
- असहमति की सूचना-समृद्ध भूमिका: विपक्ष के भाषणों को सुनने से आधिकारिक कथनों से परे वास्तविकताओं का पता चलता है, जिससे संसद को उत्तरदायी निर्णय लेने हेतु संपूर्ण और सटीक जानकारी मिलती है।
- परस्पर संयम का लोकतांत्रिक सिद्धांत: संसदीय शासन तभी सुचारु रूप से चलता है जब बहुमत शासन करे और अल्पमत आलोचना करे, तथा दोनों पक्ष एक-दूसरे की संवैधानिक भूमिकाओं और संस्थागत वैधता का निरंतर सम्मान करें।
- कार्य संबंधों का क्षरण: विपक्षी नेताओं को बोलने से रोकना और कठोर दंडात्मक उपायों के प्रयास संसदीय राजनीतिक प्रक्रियाओं में विश्वास, सहयोग और संतुलित कार्यप्रणाली के विघटन को दर्शाते हैं।
संसदीय आचरण और व्यवहार की मानक आधारशिलाएँ
- स्थापित लोकतांत्रिक परंपराएँ: संसदीय आचरण पारस्परिक सम्मान, जवाबदेही और खुली बहस जैसे साझा मानकों पर आधारित है, जो लिखित नियमों से परे विधायी कार्यप्रणाली को दिशा देते हैं।
- उपस्थिति और सहभागिता के माध्यम से जवाबदेही: कार्यवाही के दौरान सक्रिय भागीदारी यह सुनिश्चित करती है कि सही और पूर्ण जानकारी संसद तक पहुँचे, जिससे शासन की प्रक्रियाओं में पारदर्शिता, उत्तरदायित्व और सूचित निर्णय-निर्माण सुदृढ़ होता है।
- आलोचनात्मक स्वरों का सम्मान: विपक्ष के तर्कों को सुनना उन वास्तविकताओं को समझने के लिए आवश्यक है जो समर्थक दल के वक्तव्यों से प्रकट नहीं होतीं, जिससे विचार-विमर्श गहन होता है और प्रतिनिधिक कार्यप्रणाली सुदृढ़ होती है।
- मानक लोकतांत्रिक संतुलन की रक्षा करते हैं: ये परंपराएँ सरकार और विपक्ष के बीच सहयोग को बनाए रखती हैं, जिससे विधायी कार्य संयम, उत्तरदायित्व और संस्थागत परस्पर निर्भरता की मान्यता के साथ आगे बढ़ता है।
निष्कर्ष
संसद में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की रक्षा लोकतांत्रिक संतुलन और प्रभावी शासन के लिए अत्यंत आवश्यक है। प्रक्रियात्मक नियमों का उद्देश्य बहस को विनियमित करना होना चाहिए, न कि संवैधानिक गारंटियों को कमजोर करना या असहमति के स्वर को दबाना। सरकार और विपक्ष के बीच पारस्परिक सम्मान की पुनर्स्थापना संस्थागत अखंडता, सार्थक विचार-विमर्श तथा वर्तमान और भावी पीढ़ियों के लिए भारत में संसदीय लोकतंत्र की दीर्घकालिक स्थिरता को बनाए रखने के लिए आवश्यक है।
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