भारत का संघीय ढांचा केवल प्रशासनिक व्यवस्था नहीं है, बल्कि यह वित्तीय साझेदारी पर भी आधारित है। केंद्र सरकार अधिकांश कर एकत्रित करती है, जबकि राज्यों पर शिक्षा, स्वास्थ्य, कृषि, ग्रामीण विकास और स्थानीय प्रशासन जैसी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियाँ होती हैं। इसी असंतुलन को संतुलित करने के लिए संविधान में वित्त आयोग की व्यवस्था की गई। आज “Finance Commission transfers and equity issue” अर्थात् वित्त आयोग हस्तांतरण और समानता का प्रश्न भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था के सबसे चर्चित मुद्दों में से एक बन गया है। विशेषकर 16वें वित्त आयोग की सिफारिशों को लेकर राज्यों के बीच समानता, न्याय और वित्तीय अधिकारों पर गंभीर बहस चल रही है।
वित्त आयोग का संवैधानिक आधार
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 280 के अंतर्गत वित्त आयोग का गठन किया जाता है। राष्ट्रपति प्रत्येक पाँच वर्ष में एक वित्त आयोग नियुक्त करते हैं। इसका मुख्य कार्य केंद्र और राज्यों के बीच करों के बंटवारे की सिफारिश करना, राज्यों को अनुदान देने के सिद्धांत तय करना तथा राज्यों की वित्तीय स्थिति को मजबूत करने के उपाय सुझाना होता है।
वित्त आयोग भारतीय वित्तीय संघवाद का सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्थान माना जाता है। यह केंद्र और राज्यों के बीच संसाधनों के वितरण में संतुलन बनाने का कार्य करता है ताकि क्षेत्रीय असमानताओं को कम किया जा सके और सभी राज्यों को विकास के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध हो सकें।
ऊर्ध्वाधर और क्षैतिज हस्तांतरण की अवधारणा
वित्त आयोग के माध्यम से होने वाले संसाधन वितरण को मुख्यतः दो भागों में बाँटा जाता है—ऊर्ध्वाधर हस्तांतरण और क्षैतिज हस्तांतरण।
ऊर्ध्वाधर हस्तांतरण
ऊर्ध्वाधर हस्तांतरण का अर्थ है केंद्र और राज्यों के बीच कर राजस्व का बंटवारा। 15वें वित्त आयोग ने राज्यों को केंद्र के विभाज्य कर पूल का 41 प्रतिशत हिस्सा देने की सिफारिश की थी। इससे पहले 14वें वित्त आयोग ने इसे 32 प्रतिशत से बढ़ाकर 42 प्रतिशत किया था। बाद में जम्मू-कश्मीर के पुनर्गठन के कारण इसे 41 प्रतिशत किया गया। 16वें वित्त आयोग ने भी इसी हिस्सेदारी को बनाए रखा है।
क्षैतिज हस्तांतरण
क्षैतिज हस्तांतरण का अर्थ है राज्यों के बीच संसाधनों का वितरण। इसका उद्देश्य राज्यों के बीच आर्थिक असमानताओं को कम करना और संतुलित विकास सुनिश्चित करना है। इसके लिए विभिन्न मानदंडों का उपयोग किया जाता है।
16वें वित्त आयोग के प्रमुख मानदंड
16वें वित्त आयोग ने राज्यों के बीच संसाधनों के वितरण के लिए कई मानदंड अपनाए हैं। इनमें प्रमुख हैं—
- आय दूरी (Income Distance) – 42.5%
- जनसंख्या – 17.5%
- क्षेत्रफल – 10%
- वन और पारिस्थितिकी – 10%
- जनसांख्यिकीय प्रदर्शन – 10%
- राष्ट्रीय GDP में योगदान – 10%
इस बार “Tax Effort” अर्थात कर प्रयास को हटाकर “राष्ट्रीय GDP में योगदान” को शामिल किया गया है। हालांकि आयोग ने वास्तविक सकल राज्य घरेलू उत्पाद (GSDP) के स्थान पर वर्गमूल आधारित पद्धति का प्रयोग किया, जिससे बड़े राज्यों को मिलने वाले लाभ में कमी आई।

समानता बनाम दक्षता की बहस
वर्तमान विवाद का मूल प्रश्न यह है कि वित्त आयोग का उद्देश्य क्या होना चाहिए—क्या उसे गरीब राज्यों की सहायता कर क्षेत्रीय असमानता कम करनी चाहिए, या फिर बेहतर आर्थिक प्रदर्शन करने वाले राज्यों को प्रोत्साहित करना चाहिए?
परंपरागत रूप से वित्त आयोग “समानता” के सिद्धांत पर कार्य करता रहा है। इसलिए कम विकसित राज्यों को अधिक वित्तीय सहायता दी जाती रही है। आय दूरी का मानदंड इसी सोच पर आधारित है। जिन राज्यों की प्रति व्यक्ति आय कम होती है, उन्हें अधिक हिस्सा मिलता है।
लेकिन विकसित राज्यों का कहना है कि यह व्यवस्था उनके साथ अन्याय करती है। उनका तर्क है कि जिन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य, उद्योग और जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया, उन्हें कम लाभ मिल रहा है। दक्षिण भारत के कई राज्यों ने इसे “सफलता की सजा” तक कहा है।
जनसंख्या आधारित वितरण पर विवाद
विवाद का एक बड़ा कारण जनसंख्या को आधार बनाना भी है। पहले वित्त आयोग 1971 की जनगणना को महत्व देते थे ताकि जिन राज्यों ने जनसंख्या नियंत्रण में अच्छा कार्य किया है, वे नुकसान में न रहें। लेकिन अब 2011 की जनगणना को अधिक महत्व दिया जा रहा है।
दक्षिणी राज्यों का कहना है कि उन्होंने दशकों तक परिवार नियोजन और सामाजिक विकास पर काम किया, जिससे उनकी जनसंख्या वृद्धि कम रही। अब यदि अधिक जनसंख्या वाले राज्यों को अधिक हिस्सा मिलेगा, तो यह उन राज्यों के साथ अन्याय होगा जिन्होंने जनसंख्या नियंत्रण की राष्ट्रीय नीति का सफल पालन किया।
इसी कारण “Demographic Performance” को एक अलग मानदंड के रूप में शामिल किया गया ताकि कम प्रजनन दर वाले राज्यों को कुछ हद तक संतुलन मिल सके।
उपकर और अधिभार का बढ़ता प्रयोग
राज्यों की सबसे बड़ी शिकायतों में से एक केंद्र सरकार द्वारा उपकर (Cess) और अधिभार (Surcharge) का अत्यधिक प्रयोग है। संविधान के अनुसार इनसे प्राप्त आय विभाज्य कर पूल में शामिल नहीं होती, इसलिए इन्हें राज्यों के साथ साझा नहीं किया जाता।
राज्यों का तर्क है कि भले ही उन्हें औपचारिक रूप से 41 प्रतिशत हिस्सा मिल रहा हो, लेकिन केंद्र द्वारा उपकर और अधिभार बढ़ाने से वास्तविक हस्तांतरण कम हो जाता है। इसलिए कई राज्यों ने सुझाव दिया कि या तो इन्हें भी विभाज्य कर पूल में शामिल किया जाए या फिर इनकी अधिकतम सीमा 8–10 प्रतिशत तय की जाए।
अनुदान आधारित व्यवस्था पर प्रश्न
वित्त आयोग केवल कर हस्तांतरण ही नहीं करता, बल्कि राज्यों को विभिन्न प्रकार के अनुदान भी देता है। इनमें राजस्व घाटा अनुदान, स्थानीय निकाय अनुदान और प्रदर्शन आधारित अनुदान शामिल हैं।
15वें वित्त आयोग ने स्वास्थ्य, शिक्षा, कृषि सुधार और स्थानीय निकायों के लिए कई शर्तों वाले अनुदान दिए थे। लेकिन कई राज्यों का कहना था कि अत्यधिक शर्तों वाले अनुदान राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता को कमजोर करते हैं और केंद्र का नियंत्रण बढ़ाते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अनुदान अत्यधिक शर्तों पर आधारित होंगे, तो राज्य अपनी प्राथमिकताओं के अनुसार खर्च नहीं कर पाएंगे। इससे सहकारी संघवाद की भावना प्रभावित हो सकती है।
वित्तीय संघवाद और क्षेत्रीय असमानता
भारत जैसे विविध देश में क्षेत्रीय असमानता एक बड़ी चुनौती है। कुछ राज्य औद्योगिक और सेवा क्षेत्र में काफी आगे हैं, जबकि कुछ अभी भी कृषि और केंद्रीय सहायता पर निर्भर हैं। ऐसे में वित्त आयोग की भूमिका केवल संसाधन वितरण तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह राष्ट्रीय एकता और संतुलित विकास से भी जुड़ जाती है।
यदि केवल आर्थिक दक्षता को महत्व दिया जाएगा, तो पिछड़े राज्य और पीछे रह सकते हैं। वहीं यदि केवल पुनर्वितरण पर जोर दिया जाएगा, तो बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों में असंतोष बढ़ सकता है। इसलिए वित्त आयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती समानता और दक्षता के बीच संतुलन स्थापित करना है।
आगे की दिशा
विशेषज्ञों के अनुसार भविष्य में वित्त आयोग को कुछ महत्वपूर्ण सुधारों पर ध्यान देना होगा—
- उपकर और अधिभार की सीमा तय करना
- जनसंख्या नियंत्रण करने वाले राज्यों को अतिरिक्त प्रोत्साहन देना
- पिछड़े राज्यों की उत्पादक क्षमता बढ़ाने पर ध्यान देना
- राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता को मजबूत करना
- प्रदर्शन और समानता दोनों को संतुलित करने वाला मॉडल विकसित करना
इसके अतिरिक्त अंतर-राज्यीय परिषद और सहकारी संघवाद की संस्थाओं को भी अधिक सक्रिय बनाना आवश्यक होगा ताकि राज्यों की चिंताओं का समाधान संवाद के माध्यम से किया जा सके।
निष्कर्ष
“Finance Commission transfers and equity issue” केवल कर बंटवारे का तकनीकी प्रश्न नहीं है, बल्कि यह भारतीय संघवाद, क्षेत्रीय न्याय और राष्ट्रीय संतुलन का प्रश्न है। 16वें वित्त आयोग के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह विकासशील और विकसित राज्यों के हितों के बीच संतुलन स्थापित करे।
एक ओर पिछड़े राज्यों को पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराना आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों के योगदान और दक्षता का सम्मान भी जरूरी है। यदि यह संतुलन सफलतापूर्वक स्थापित किया जाता है, तभी भारतीय वित्तीय संघवाद मजबूत और स्थायी बन सकेगा।
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