हाल ही में 16वें वित्त आयोग ने राज्यों के लिए 41% कर हस्तांतरण (Vertical Devolution) को बरकरार रखा तथा समानता-आधारित पुनर्वितरण (Equity-based Redistribution) की नीति को जारी रखा। किंतु इससे आर्थिक रूप से मजबूत और कमजोर राज्यों के बीच ‘न्याय, दक्षता तथा वित्तीय स्वायत्तता’ को लेकर बहस तेज हो गई है।
भारत की वित्तीय संघवाद (Fiscal Federalism) व्यवस्था का उद्देश्य केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संबंधों में संतुलन स्थापित करना है। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए संविधान के अंतर्गत Finance Commission का गठन किया गया, जो केंद्र और राज्यों के बीच कर राजस्व के वितरण तथा राज्यों के बीच संसाधनों के न्यायसंगत बँटवारे का कार्य करता है।
वित्त आयोग की संवैधानिक भूमिका
भारतीय संविधान के अनुच्छेद 280 के अंतर्गत वित्त आयोग की स्थापना की जाती है। इसका मुख्य कार्य केंद्र के कर राजस्व को राज्यों के बीच बाँटना तथा राज्यों के मध्य क्षैतिज असंतुलन (Horizontal Imbalance) को कम करना है।
प्रमुख कार्य
- केंद्र और राज्यों के बीच करों के हिस्से का निर्धारण करना।
- राज्यों के बीच राजस्व वितरण के लिए मानदंड तय करना।
- पिछड़े और कमजोर राज्यों को अतिरिक्त सहायता प्रदान करना।
- संघीय ढाँचे में वित्तीय संतुलन बनाए रखना।
ऐतिहासिक रूप से आयोग ने आय दूरी (Income Distance), जनसंख्या, क्षेत्रफल तथा जनसांख्यिकीय प्रदर्शन जैसे मानदंडों को महत्व दिया है ताकि क्षेत्रीय असमानताओं को कम किया जा सके।
इसी कारण उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश तथा पश्चिम बंगाल जैसे अपेक्षाकृत गरीब राज्यों को अधिक हस्तांतरण प्राप्त होता है। इसका उद्देश्य सभी राज्यों में विकास और सार्वजनिक सेवाओं की समान उपलब्धता सुनिश्चित करना है।
हालाँकि आर्थिक रूप से बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों का तर्क है कि वर्तमान प्रणाली कमजोर राज्यों को ‘पुरस्कृत’ करती है, जबकि दक्ष शासन और आर्थिक उत्पादकता को पर्याप्त प्रोत्साहन नहीं मिलता।
राज्यों के समक्ष बढ़ते वित्तीय दबाव
- GST और महामारी का प्रभाव
Goods and Services Tax Council द्वारा लागू GST व्यवस्था ने राज्यों की स्वतंत्र कराधान शक्तियों को सीमित कर दिया। पहले राज्यों के पास वैट, प्रवेश कर, मनोरंजन कर आदि अनेक कर लगाने की स्वतंत्रता थी, लेकिन GST के बाद ये शक्तियाँ एकीकृत कर ढाँचे में समाहित हो गईं।
इसके साथ ही COVID-19 महामारी ने राज्यों के व्यय बोझ को अत्यधिक बढ़ा दिया जबकि राजस्व में भारी गिरावट आई। परिणामस्वरूप;
- राज्यों का सार्वजनिक ऋण बढ़ा,
- राजकोषीय घाटा गहरा हुआ,
- तथा विकास व्यय के लिए वित्तीय स्थान (Fiscal Space) कम हो गया।
- केंद्र प्रायोजित योजनाओं का विस्तार
केंद्र प्रायोजित योजनाओं (Centrally Sponsored Schemes – CSS) की बढ़ती संख्या ने भी राज्यों की वित्तीय स्वायत्तता को कमजोर किया है।
उदाहरण के लिए Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Scheme जैसी योजनाओं में राज्यों को भी व्यय का एक बड़ा हिस्सा वहन करना पड़ता है। इससे राज्यों की अपनी प्राथमिकताओं पर खर्च करने की क्षमता सीमित हो जाती है।
- उपकर और अधिभार की समस्या
राज्यों ने केंद्र द्वारा बढ़ते ‘Cess और Surcharge’ के प्रयोग पर भी चिंता व्यक्त की है।
ये कर विभाज्य कर पूल (Divisible Pool) में शामिल नहीं होते, इसलिए राज्यों को इनसे कोई हिस्सा नहीं मिलता। वर्तमान में ये सकल कर राजस्व के 15% से अधिक हो चुके हैं। इसलिए कई राज्यों ने मांग की है कि—
- इन्हें विभाज्य पूल में शामिल किया जाए,
- अथवा इनकी सीमा 8–10% निर्धारित की जाए।
इसके अतिरिक्त केंद्र को प्राकृतिक संसाधनों, परिसंपत्ति मुद्रीकरण (Asset Monetisation) तथा Reserve Bank of India से प्राप्त गैर-कर राजस्व से भी बड़ी आय प्राप्त होती है, जिसका राज्यों के साथ प्रत्यक्ष साझा नहीं होता।
समानता बनाम दक्षता का विवाद
- समानता–आधारित पुनर्वितरण
16वें वित्त आयोग ने ‘Income Distance’ को सर्वाधिक महत्व दिया। इसका उद्देश्य गरीब राज्यों को अधिक संसाधन उपलब्ध कराना था ताकि पूरे देश में विकास के अवसर समान हो सकें।
यह नीति राष्ट्रीय एकीकरण तथा सामाजिक न्याय की दृष्टि से महत्वपूर्ण मानी जाती है।
- विकसित राज्यों की आलोचना
दक्षिणी राज्यों आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल तथा तमिलनाडु का तर्क है कि वे राष्ट्रीय GDP, औद्योगिक उत्पादन तथा कर संग्रह में अत्यधिक योगदान देते हैं, लेकिन बदले में उन्हें अपेक्षाकृत कम वित्तीय हस्तांतरण प्राप्त होता है।
इन राज्यों की हिस्सेदारी लगातार घटती गई है जबकि लाभार्थी राज्यों की हिस्सेदारी बढ़ी है। इससे संघीय ढाँचे में ‘वित्तीय असंतुलन’ की भावना उत्पन्न हो रही है।
वर्तमान हस्तांतरण प्रणाली की सीमाएँ
- सार्वजनिक सेवाओं में निरंतर असमानता
अधिक हस्तांतरण प्राप्त करने के बावजूद कई गरीब राज्यों में स्वास्थ्य और शिक्षा सेवाओं की स्थिति कमजोर बनी हुई है।
उदाहरण के लिए बिहार में स्वास्थ्य और प्राथमिक शिक्षा पर प्रति व्यक्ति व्यय अभी भी अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम जैसे छोटे राज्यों से काफी कम है। इससे स्पष्ट होता है कि केवल बिना शर्त वित्तीय हस्तांतरण बेहतर शासन की गारंटी नहीं दे सकता।
- वित्तीय अनुशासन के लिए कमजोर प्रोत्साहन
वर्तमान व्यवस्था कभी-कभी राज्यों में राजस्व संग्रह बढ़ाने, वित्तीय जिम्मेदारी निभाने, तथा प्रशासनिक दक्षता सुधारने के प्रोत्साहनों को कमजोर कर सकती है।
बेहतर प्रदर्शन करने वाले राज्यों का मत है कि कर प्रयास (Tax Effort), सुशासन, आर्थिक उत्पादकता और प्रशासनिक क्षमता को अधिक महत्व दिया जाना चाहिए।
16वें वित्त आयोग की सिफारिशों का मूल्यांकन
मानदंड और भार वितरण
16वें वित्त आयोग ने निम्नलिखित भार निर्धारित किए;
- आय दूरी – 45%
- जनसंख्या – 15%
- क्षेत्रफल – 10%
- वनावरण – 10%
- जनसांख्यिकीय प्रदर्शन – 10%
- GDP योगदान – 10%
हालाँकि राज्यों के GDP योगदान को शामिल किया गया, लेकिन वास्तविक GSDP हिस्सेदारी के स्थान पर Square-root Transformation पद्धति अपनाई गई। इससे महाराष्ट्र, तमिलनाडु और कर्नाटक जैसे बड़े आर्थिक राज्यों को अपेक्षित लाभ नहीं मिला।
दक्षता की ओर सीमित बदलाव
15वें वित्त आयोग में 75% भार समानता पर, तथा 25% भार दक्षता पर था। जबकि 16वें वित्त आयोग में यह अनुपात 70% समानता, और 30% दक्षता हो गया। अर्थात् बदलाव तो हुआ, लेकिन गरीब राज्यों को मिलने वाले बड़े लाभ की संरचना मूलतः बनी रही।
राजनीतिक अर्थव्यवस्था और भविष्य की चुनौतियाँ
भारत में जिन राज्यों की संसदीय प्रतिनिधित्व संख्या अधिक है, वे प्रायः आर्थिक रूप से कमजोर हैं लेकिन राजनीतिक रूप से प्रभावशाली हैं।
भविष्य में परिसीमन (Delimitation) के बाद दक्षिणी राज्यों की यह चिंता और बढ़ सकती है कि उनकी राजनीतिक और वित्तीय दोनों प्रकार की हिस्सेदारी कम हो जाएगी।
इसीलिए भविष्य के वित्त आयोगों को निम्न पहलुओं पर अधिक ध्यान देना चाहिए—
- वित्तीय क्षमता (Fiscal Capacity),
- शासन परिणाम (Governance Outcomes),
- राजस्व संग्रह दक्षता,
- तथा डेटा-आधारित पद्धतियाँ जैसे Principal Component Analysis (PCA)।
इससे अधिक पारदर्शी और संतुलित वित्तीय वितरण प्रणाली विकसित की जा सकती है।
निष्कर्ष
16वें वित्त आयोग को लेकर चल रही बहस भारत के संघीय ढाँचे की मूल चुनौती को दर्शाती है ‘समानता और आर्थिक दक्षता के बीच संतुलन’।
एक ओर पिछड़े राज्यों को सहायता देना राष्ट्रीय एकता और समावेशी विकास के लिए आवश्यक है, वहीं दूसरी ओर अत्यधिक पुनर्वितरण से वित्तीय अनुशासन और उत्पादक शासन को हतोत्साहन भी मिल सकता है।
इसलिए भारत को ऐसी वित्तीय संघवाद व्यवस्था विकसित करनी होगी जो;
- कमजोर राज्यों को पर्याप्त सहयोग दे,
- लेकिन साथ ही विकास, जवाबदेही, राजस्व प्रयास और प्रशासनिक दक्षता को भी प्रोत्साहित करे।
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