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भारतीय राजनीतिक चिंतन में राष्ट्र की अवधारणा

राष्ट्र की सभ्यतागत पृष्ठभूमि

भारतीय चिंतन में ‘राष्ट्र’ की अवधारणा पश्चिमी ‘नेशन-स्टेट’ (Nation-State) की तुलना में कहीं अधिक प्राचीन और दार्शनिक है। जहाँ पश्चिमी राष्ट्रवाद अक्सर एक भाषा, एक धर्म या एक भौगोलिक समझौते से उपजता है, वहीं भारतीय संदर्भ में राष्ट्र को एक ‘सभ्यतागत इकाई’ (Civilizational Entity) के रूप में देखा गया है। यहाँ राष्ट्र केवल मिट्टी का पिंड नहीं, बल्कि एक जीवंत आध्यात्मिक और सांस्कृतिक प्रवाह है।

प्राचीन आधार: वैदिक और कौटिल्यीय दृष्टिकोण

भारतीय चिंतन में ‘राष्ट्र’ शब्द ऋग्वेद के ‘पुरुष सूक्त’ और ‘पृथ्वी सूक्त’ से उपजा है। यहाँ राष्ट्र को एक ‘विराट पुरुष’ की संज्ञा दी गई है।

अथर्ववेद का पृथ्वी सूक्त: यहाँ “माता भूमिः पुत्रो अहं पृथिव्याः” (भूमि मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ) का उद्घोष मिलता है। यह राष्ट्र के प्रति एक जैविक और भावनात्मक जुड़ाव पैदा करता है।

कौटिल्य का अर्थशास्त्र: कौटिल्य ने राष्ट्र को ‘सप्तांग सिद्धांत’ के माध्यम से समझाया। उनके लिए राष्ट्र (जनपद) केवल भूमि नहीं, बल्कि संसाधनों और लोगों का एक प्रबंधित तंत्र था। उन्होंने राष्ट्र की मजबूती के लिए ‘योगक्षेम’ (कल्याण और सुरक्षा) को अनिवार्य माना।

सांस्कृतिक और आध्यात्मिक राष्ट्रवाद

19वीं और 20वीं शताब्दी के पुनर्जागरण काल में राष्ट्र को ‘आध्यात्मिक शक्ति’ के रूप में पुनः परिभाषित किया गया:

स्वामी विवेकानंद का दृष्टिकोण:

विवेकानंद ने राष्ट्रवाद को धर्मनिरपेक्ष राजनीति से निकालकर ‘अध्यात्म’ के केंद्र में रखा।

  • राष्ट्र का मिशन: उनके अनुसार, हर राष्ट्र का एक विशेष ‘चरित्र’ होता है। भारत का चरित्र ‘धर्म’ है। यदि भारत अपने आध्यात्मिक मार्ग को छोड़ देगा, तो वह राष्ट्र के रूप में जीवित नहीं रहेगा।
  • दरिद्र नारायण: उन्होंने राष्ट्र की अवधारणा में ‘जनता’ को शामिल किया। उनके लिए राष्ट्र की सेवा का अर्थ गरीबों और शोषितों की सेवा करना था।

श्री अरविंदो का ‘राष्ट्र-धर्म’: 

अरविंदो का राष्ट्रवाद सबसे क्रांतिकारी और दार्शनिक है। उन्होंने राष्ट्रवाद को राजनीति नहीं, बल्कि एक ‘पवित्र साधना’ माना।

  • राष्ट्र का मनोविज्ञान: उन्होंने तर्क दिया कि राष्ट्र केवल ईंट-पत्थरों या मानचित्र का नाम नहीं है। यह एक ‘चित्त-शक्ति’ (Shared Consciousness) है।
  • भारत माता: अरविंदो ने राष्ट्र को ‘माँ’ के रूप में प्रतिष्ठित किया। उन्होंने कहा कि जैसे एक माँ अपने बच्चों की रक्षा करती है, वैसे ही भारत माता को दासता से मुक्त कराना हर भारतीय का आध्यात्मिक कर्तव्य है।

महात्मा गांधी: नैतिक और सभ्यतागत राष्ट्रवाद

गांधी जी की राष्ट्र की अवधारणा ‘हिंद स्वराज’ (1909) में स्पष्ट होती है। उनके विचार पश्चिमी राष्ट्रवाद के भौतिकतावादी मॉडल की चुनौती हैं।

  • स्वराज: गांधी के लिए राष्ट्र का अर्थ केवल अंग्रेजों का जाना नहीं था, बल्कि भारतीयों का स्वयं पर शासन (Self-rule) था।
  • साझा सभ्यता: गांधी का मानना था कि भारत अंग्रेजों के आने से पहले भी एक राष्ट्र था। साझा जीवन पद्धति और तीर्थाटन की परंपरा ने भारतीयों को एक सूत्र में बांधा था।
  • अहिंसक राष्ट्रवाद: उनका राष्ट्रवाद ‘वसुधैव कुटुंबकम’ (विश्व एक परिवार है) का विस्तार था। उनके लिए राष्ट्र का अर्थ ‘स्वराज’ था, जिसका तात्पर्य केवल राजनीतिक स्वतंत्रता नहीं, बल्कि आत्म-शासन और आत्म-संयम था।

डॉ. बी.आर. अंबेडकर: सामाजिक न्याय और राष्ट्र की आंतरिक एकता

अंबेडकर ने राष्ट्र के ‘रोमांटिक’ पक्ष के बजाय उसके ‘सामाजिक यथार्थ’ पर जोर दिया:

  • जाति का उन्मूलन: अंबेडकर के अनुसार, एक ऐसा समाज जो हजारों जातियों में बंटा हो, वह राष्ट्र नहीं बन सकता। जाति राष्ट्रवाद की शत्रु है क्योंकि यह ‘बंधुत्व’ (Fraternity) को समाप्त करती है।
  • संवैधानिक नैतिकता: उनके लिए राष्ट्र एक ‘साझा अनुभव’ है। उन्होंने तर्क दिया कि जब तक समाज के अंतिम व्यक्ति (दलित और शोषित) को राष्ट्र में समान हिस्सेदारी नहीं मिलती, तब तक राष्ट्रवाद केवल बहुसंख्यकवाद का एक रूप बनकर रह जाएगा।

जवाहरलाल नेहरू और विविधता में एकता

नेहरू ने राष्ट्र को एक वैज्ञानिक और आधुनिक ढांचा प्रदान किया:

  • डिस्कवरी ऑफ इंडिया: नेहरू ने राष्ट्र को एक ऐतिहासिक निरंतरता के रूप में देखा। उन्होंने ‘विविधता में एकता’ का दर्शन दिया, जो भारतीय राष्ट्रवाद का सबसे मजबूत स्तंभ बना।
  • धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद: उनके अनुसार, राष्ट्र किसी एक धर्म या संस्कृति का नहीं है। राष्ट्र एक ‘साझा विरासत’ है जहाँ सभी विचारधाराओं का संश्लेषण होता है। उन्होंने ‘वैज्ञानिक चेतना’ को राष्ट्र निर्माण का आधार माना।

रबींद्रनाथ टैगोर: राष्ट्रवाद की आलोचना

टैगोर का दृष्टिकोण अन्य सभी से भिन्न था। उन्होंने राष्ट्रवाद को एक ‘सीमित अवधारणा’ माना।

  • मानवतावाद: टैगोर ने चेतावनी दी कि राष्ट्रवाद अक्सर ‘अहंकार’ और ‘विभाजन’ पैदा करता है। उन्होंने ‘राष्ट्र’ के बजाय ‘मानवता’ को प्राथमिकता दी। उनका मानना था कि राष्ट्रवाद का पश्चिमी मॉडल युद्ध और साम्राज्यवादी भूख को जन्म देता है।

वी.डी. सावरकर: हिंदुत्व और सांस्कृतिक पहचान

सावरकर ने राष्ट्र को एक स्पष्ट परिभाषा दी, जिसे उन्होंने ‘हिंदुत्व’ कहा।

  • पितृभू और पुण्यभू: सावरकर के अनुसार, वह व्यक्ति राष्ट्र (हिंदू राष्ट्र) का हिस्सा है जो भारत को अपनी ‘पितृभूमि’ (Ancestral land) और ‘पुण्यभूमि’ (Holy land) दोनों मानता है।
  • सांस्कृतिक एकता: उनकी राष्ट्र की अवधारणा भौगोलिक सीमाओं के साथ-साथ साझा इतिहास, संस्कृति और भाषा (संस्कृत/हिंदी) पर आधारित थी। यह एक ‘नस्लीय-सांस्कृतिक’ राष्ट्रवाद का प्रारूप था।

भारतीय राष्ट्रवाद और मुस्लिम चिंतन (विविध धाराएं)

भारतीय राष्ट्र के निर्माण में मुस्लिम विचारकों का योगदान और उनके वैचारिक मतभेद राष्ट्र की अवधारणा को समझने के लिए अनिवार्य हैं।

  • सर सैयद अहमद खान: प्रारंभ में उन्होंने हिंदू-मुस्लिम को भारत की “दो सुंदर आंखें” कहा, लेकिन बाद में उनका झुकाव ‘दो-राष्ट्र सिद्धांत’ की वैचारिक नींव की ओर हुआ। उनके लिए राष्ट्रवाद का आधार आधुनिक शिक्षा और सामुदायिक हित था।
  • मुहम्मद इकबाल: इकबाल के चिंतन में राष्ट्रवाद का क्रमिक विकास दिखता है। “सारे जहाँ से अच्छा” लिखने वाले इकबाल बाद में ‘प्रादेशिक राष्ट्रवाद’ (Territorial Nationalism) के आलोचक बन गए। उनका मानना था कि इस्लाम एक वैश्विक भाईचारा है जो भौगोलिक सीमाओं में नहीं बंध सकता।
  • मौलाना आजाद: आजाद ने ‘संयुक्त राष्ट्रवाद’ (Composite Nationalism) का पुरजोर समर्थन किया। उन्होंने तर्क दिया कि भारतीय मुसलमान अपनी धार्मिक पहचान को बनाए रखते हुए भी भारतीय राष्ट्र का अभिन्न अंग हो सकते हैं। उनका ‘मुत्तहिदा कौमियत’ का सिद्धांत नेहरू के धर्मनिरपेक्ष राष्ट्रवाद का आधार बना।

समाजवादी और मार्क्सवादी परिप्रेक्ष्य:

भारतीय समाजवादियों ने राष्ट्र को ‘वर्ग’ और ‘आम आदमी’ के चश्मे से देखा।

  • राम मनोहर लोहिया: लोहिया का राष्ट्रवाद ‘भाषाई अस्मिता’ और ‘विकेंद्रीकरण’ पर आधारित था। उन्होंने अंग्रेजी के वर्चस्व को राष्ट्र की आत्मा के विरुद्ध माना। उनके लिए राष्ट्र तब मजबूत होगा जब “पिछड़ा पावे सौ में साठ” के सिद्धांत पर सामाजिक न्याय सुनिश्चित होगा।
  • जयप्रकाश नारायण (JP): जेपी ने राष्ट्र को ‘शक्ति के विकेंद्रीकरण’ के रूप में देखा। उनका ‘समग्र क्रांति’ का विचार राष्ट्र को राज्य (State) के नियंत्रण से मुक्त कर जनता के हाथ में सौंपने का प्रयास था।
  • मार्क्सवादी दृष्टिकोण (M.N. Roy): मार्क्सवादियों ने प्रारंभ में राष्ट्रवाद को ‘बुर्जुआ’ (पूंजीपति) विचार माना। हालांकि, बाद में उन्होंने इसे उपनिवेशवाद विरोधी संघर्ष के रूप में स्वीकार किया। उनका मानना था कि वास्तविक राष्ट्र वह है जहाँ उत्पादन के साधनों पर जनता का अधिकार हो।

भारतीय राष्ट्रवाद की विशिष्ट विशेषताएं:

भारतीय विचारकों के मंथन से राष्ट्र की जो तस्वीर उभरती है, उसके मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • अद्वैतवादी एकता (Monistic Unity): भारतीय चिंतन अक्सर यह मानता है कि विभिन्नताओं के पीछे एक मौलिक एकता है। ‘अनेकता में एकता’ केवल नारा नहीं, बल्कि एक दार्शनिक सत्य है।
  • धर्म-आधारित (Ethical/Dharmic): यहाँ राष्ट्र केवल शक्ति का प्रदर्शन नहीं है, बल्कि ‘धर्म’ (नैतिकता) की स्थापना का साधन है।
  • सभ्यतागत राष्ट्र (Civilizational State): भारत स्वयं को केवल 1947 में बना एक नया देश नहीं मानता, बल्कि हजारों वर्षों पुरानी सभ्यता का आधुनिक राजनीतिक स्वरूप मानता है।
  • लचीलापन (Elasticity): भारतीय राष्ट्रवाद ने बाहरी संस्कृतियों (इस्लाम, ईसाई धर्म, पारसी) को आत्मसात करने की अद्भुत क्षमता दिखाई है, जिसे नेहरू ने ‘संश्लेषण’ (Synthesis) कहा।

संप्रभुता, क्षेत्र और राष्ट्र: एक राजनीतिक विश्लेषण

  • प्रादेशिक राष्ट्रवाद (Territorial Nationalism): यह वह राष्ट्रवाद है जो केवल भारत की सीमाओं के भीतर रहने वाले लोगों की राजनीतिक एकता की बात करता है। आधुनिक भारतीय गणराज्य इसी पर आधारित है।
  • सांस्कृतिक राष्ट्रवाद (Cultural Nationalism): यह भौगोलिक सीमाओं से परे “भारतीयता” या “संस्कृति” को प्राथमिकता देता है।
  • संवैधानिक देशभक्ति (Constitutional Patriotism):समकालीन विचारकों का मानना है कि विविधतापूर्ण भारत में राष्ट्र का एकमात्र साझा सूत्र ‘संविधान’ है। राष्ट्र के प्रति प्रेम का अर्थ संविधान के मूल्यों (न्याय, स्वतंत्रता, समानता) के प्रति निष्ठा है।

भारतीय राष्ट्रवाद के समक्ष चुनौतियां

राष्ट्र की अवधारणा आज भी स्थिर नहीं है। इसके मुख्य विवादास्पद बिंदु निम्नलिखित हैं:

  • क्षेत्रीयतावाद बनाम राष्ट्रवाद: भाषाई और क्षेत्रीय पहचान (जैसे द्रविड़ आंदोलन या पूर्वोत्तर के मुद्दे) अक्सर केंद्रीय राष्ट्रवाद को चुनौती देते रहे हैं। भारतीय चिंतन ने इसे ‘सहकारी संघवाद’ (Cooperative Federalism) के माध्यम से सुलझाने का प्रयास किया है।
  • धर्मनिरपेक्षता की बहस: क्या भारत एक ‘धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र’ है या ‘बहुसंख्यकवादी राष्ट्र’? गांधी और नेहरू का ‘सर्वधर्म समभाव’ आज भी भारतीय राष्ट्रवाद की वैचारिक सुरक्षा दीवार है।
  • वैश्वीकरण (Globalization): वैश्वीकरण के दौर में राष्ट्र की संप्रभुता कम हो रही है। भारतीय विचारक अब ‘ग्लोबल इंडिया’ और ‘विश्व गुरु’ की बात करते हैं, जो प्राचीन ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का आधुनिक संस्करण है।

भारतीय बनाम पश्चिमी राष्ट्रवाद: तुलनात्मक विश्लेषण

निष्कर्ष: समकालीन प्रासंगिकता

आज भारतीय राजनीतिक चिंतन में राष्ट्र की अवधारणा एक ‘संवैधानिक देशभक्ति’ की ओर बढ़ रही है। इसका अर्थ है कि राष्ट्र के प्रति प्रेम का आधार केवल इतिहास या संस्कृति नहीं, बल्कि संविधान के मूल्यों (स्वतंत्रता, समानता और न्याय) के प्रति निष्ठा है।

निष्कर्षतः, भारतीय राष्ट्रवाद एक ‘निरंतर विकसित होने वाली प्रक्रिया’ है। यह अरविंदो के अध्यात्म, गांधी की नैतिकता, अंबेडकर के सामाजिक न्याय और नेहरू की आधुनिकता का एक ऐसा संगम है, जो भारत को एक ‘सभ्यतागत राष्ट्र’ के रूप में विश्व पटल पर स्थापित करता है।


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