भारतीय राजनीति में ‘राज्य’ (State) की अवधारणा केवल एक प्रशासनिक ढांचा या संवैधानिक संस्था भर नहीं है, बल्कि यह ऐतिहासिक अनुभवों, औपनिवेशिक विरासत, सामाजिक संरचनाओं और जनता के निरंतर संघर्षों से निर्मित एक जटिल वास्तविकता है। प्रसिद्ध राजनीतिक विचारक Partha Chatterjee ने अपने लेख ‘The State’ में भारतीय राज्य की इसी बहुआयामी प्रकृति को गहराई से समझाने का प्रयास किया है। यह लेख पारंपरिक पश्चिमी राज्य की अवधारणा से अलग हटकर एक ‘postcolonial’ और ‘subaltern’ दृष्टिकोण प्रस्तुत करता है, जो भारत जैसे समाजों के लिए अधिक प्रासंगिक है।
राज्य की पुनर्व्याख्या
पार्था चटर्जी का मूल तर्क यह है कि भारतीय राज्य को समझने के लिए केवल संवैधानिक या संस्थागत दृष्टिकोण पर्याप्त नहीं है। राज्य एक जीवंत प्रक्रिया है, जो समाज के विभिन्न वर्गों, विशेषकर हाशिए पर स्थित समूहों, के साथ निरंतर संवाद और संघर्ष के माध्यम से निर्मित होती है। इस प्रकार, राज्य केवल शासन करने वाली संस्था नहीं, बल्कि सत्ता, वैधता और प्रतिरोध का एक गतिशील क्षेत्र है।
औपनिवेशिक विरासत और भारतीय राज्य
भारतीय राज्य की संरचना को समझने के लिए उसकी औपनिवेशिक पृष्ठभूमि को जानना आवश्यक है। चटर्जी के अनुसार, भारत का आधुनिक राज्य ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से काफी हद तक विरासत में मिला है। प्रशासनिक ढांचा, कानूनी प्रणाली, और नौकरशाही all colonial constructs हैं।
स्वतंत्रता के बाद भले ही राजनीतिक सत्ता भारतीयों के हाथों में आ गई, लेकिन राज्य की कार्यप्रणाली और संस्थागत ढांचा largely unchanged रहा। इस स्थिति को चटर्जी ‘derivative state’ कहते हैं, जिसका अर्थ है कि भारतीय राज्य मौलिक रूप से स्वदेशी नहीं, बल्कि पश्चिमी मॉडल का अनुकूलित रूप है।
Derivative State और ‘अंग्रेज़ी राज बिना अंग्रेज़ों के’
चटर्जी के अनुसार, भारतीय राष्ट्रवाद ने औपनिवेशिक सत्ता का विरोध तो किया, लेकिन उसने उसके संस्थागत ढांचे को पूरी तरह खारिज नहीं किया। यही कारण है कि स्वतंत्र भारत में भी शासन की शैली, कानून, और प्रशासनिक संरचनाएँ largely औपनिवेशिक ही रहीं।
यह स्थिति महात्मा गांधी के उस कथन की याद दिलाती है कि ‘हमें अंग्रेजों के बिना अंग्रेज़ी राज नहीं चाहिए।’ लेकिन वास्तविकता में भारत ने उसी ढांचे को अपनाया, केवल शासकों को बदल दिया।
Dominance without Hegemony
चटर्जी का एक महत्वपूर्ण विचार है ‘dominance without hegemony’। यह अवधारणा बताती है कि भारतीय राज्य जनता की पूर्ण सहमति (consent) के आधार पर नहीं, बल्कि नियंत्रण (dominance) के माध्यम से संचालित होता है।
पश्चिमी लोकतंत्रों में राज्य अपनी वैधता जनता की सहमति से प्राप्त करता है, लेकिन भारत जैसे समाजों में यह प्रक्रिया अधूरी है। यहाँ राज्य को अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए कई बार coercion या प्रशासनिक शक्ति का सहारा लेना पड़ता है।
इसका अर्थ यह नहीं है कि राज्य पूरी तरह दमनकारी है, बल्कि यह कि उसकी वैधता का आधार मिश्रित (partial consent + control) है।
Civil Society और Political Society
चटर्जी का सबसे महत्वपूर्ण योगदान ‘civil society’ और ‘political society’ के बीच का अंतर है।
Civil Society: यह समाज का वह हिस्सा है जो शिक्षित, शहरी और मध्यम वर्ग से संबंधित है। यह वर्ग संविधान, कानून और अधिकारों के माध्यम से राज्य के साथ संवाद करता है।
Political Society: यह चटर्जी की मौलिक अवधारणा है। इसमें वे लोग आते हैं जो गरीब, हाशिए पर और अनौपचारिक क्षेत्र से जुड़े होते हैं। ये लोग राज्य से अपने अधिकार औपचारिक कानूनी प्रक्रियाओं से नहीं, बल्कि राजनीतिक माध्यमों जैसे वोट, स्थानीय नेताओं, और अनौपचारिक नेटवर्क के जरिए प्राप्त करते हैं।
इस प्रकार, जहाँ civil society ‘rights-based’ approach अपनाती है, वहीं political society ‘negotiation-based’ approach पर काम करती है।
Subaltern दृष्टिकोण: नीचे से राज्य को समझना
चटर्जी का विश्लेषण ‘subaltern studies’ की परंपरा से प्रभावित है, जो इतिहास और राजनीति को नीचे से देखने पर जोर देता है।
वे यह तर्क देते हैं कि राज्य को केवल elite या ruling class के दृष्टिकोण से नहीं समझा जा सकता। इसके बजाय, यह देखना जरूरी है कि आम जनता विशेषकर गरीब और वंचित वर्ग राज्य के साथ कैसे interact करते हैं।
इस दृष्टिकोण से राज्य केवल एक दमनकारी संस्था नहीं, बल्कि एक ऐसा मंच है जहाँ संघर्ष, समझौता और अस्तित्व की राजनीति एक साथ चलती है।
Passive Revolution और राज्य की भूमिका
चटर्जी ने Antonio Gramsci के ‘passive revolution’ के विचार को भारतीय संदर्भ में लागू किया है।
इसका अर्थ है कि भारत में सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन मुख्यतः ऊपर से (top-down) हुए हैं, जैसे कि नेहरू काल की विकास योजनाएँ, औद्योगीकरण और आधुनिकता का प्रसार।
इन प्रक्रियाओं में आम जनता की सक्रिय भागीदारी सीमित रही, जिससे राज्य और समाज के बीच एक दूरी बनी रही।
आधुनिक संदर्भ में राज्य
वैश्वीकरण और उदारीकरण के बाद यह माना जाता था कि राज्य की भूमिका कम हो जाएगी, लेकिन चटर्जी के अनुसार ऐसा नहीं हुआ।
आज भी राज्य:
- संसाधनों का वितरण करता है
- नीतियों का निर्माण करता है
- सामाजिक और आर्थिक असमानताओं को नियंत्रित करने की कोशिश करता है
इस प्रकार, राज्य की भूमिका बदली है, लेकिन उसका महत्व कम नहीं हुआ है।
समकालीन संघर्ष और राज्य
आधुनिक भारत में राज्य के सामने कई प्रकार के संघर्ष हैं:
- विकास बनाम विस्थापन
- बाजार बनाम सामाजिक न्याय
- शहरी बनाम ग्रामीण हित
इन संघर्षों में राज्य एक मध्यस्थ (mediator) की भूमिका निभाता है, लेकिन कई बार यह स्वयं भी विवाद का हिस्सा बन जाता है।
निष्कर्ष
पार्था चटर्जी का विश्लेषण यह स्पष्ट करता है कि भारतीय राज्य को सरल या एकरेखीय रूप में नहीं समझा जा सकता। यह एक जटिल, बहुस्तरीय और निरंतर बदलने वाली संरचना है, जिसमें औपनिवेशिक विरासत, सामाजिक असमानताएँ, और लोकतांत्रिक आकांक्षाएँ एक साथ मौजूद हैं।
भारतीय राज्य न तो पूरी तरह पश्चिमी मॉडल का अनुसरण करता है और न ही पूरी तरह स्वदेशी है; बल्कि यह दोनों का एक अनोखा मिश्रण है।
अंततः, राज्य एक ऐसा ‘contested space’ है जहाँ विभिन्न वर्ग, समूह और शक्तियाँ अपने-अपने हितों के लिए संघर्ष करती हैं और इसी प्रक्रिया में राज्य का वास्तविक स्वरूप निर्मित होता है।
Discover more from Politics by RK: Ultimate Polity Guide for UPSC and Civil Services
Subscribe to get the latest posts sent to your email.


