संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में वर्ष 2028-29 के लिए गैर-स्थायी सदस्य के रूप में नौवीं बार चुने जाने की भारत की कोशिश एक महत्त्वपूर्ण कूटनीतिक चुनौती प्रस्तुत करती है।
- जून 2027 में होने वाले चुनाव में जीतने के लिए 193 सदस्यीय संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) में कम-से-कम 129 मतों की आवश्यकता होगी।
- भारत को ताजिकिस्तान से प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है।
- यह चुनाव भारत की वैश्विक महत्त्वाकांक्षाओं, वैश्विक दक्षिण (Global South) के साथ उसके संबंधों तथा अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में समान प्रतिनिधित्व के प्रति उसकी प्रतिबद्धता की परीक्षा लेगा।
नौवीं बार सदस्यता प्राप्त करने की भारत की कोशिश
भारत अब तक आठ बार संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का गैर-स्थायी सदस्य रह चुका है:
- 1950-51
- 1967-68
- 1972-73
- 1977-78
- 1984-85
- 1991-92
- 2011-12
- 2021-22
भारत को वर्ष 2010 में 187 और वर्ष 2020 में 184 मत प्राप्त हुए थे, जो उसके पक्ष में व्यापक कूटनीतिक समर्थन को दर्शाते हैं।
भारत एक और कार्यकाल चाहता है, क्योंकि कोविड-19 महामारी के कारण उसके 2021-22 के कार्यकाल की प्राथमिकताएँ प्रभावित हुई थीं। सरकार 2029 में वर्तमान कार्यकाल समाप्त होने से पहले आतंकवाद-रोधी प्रयासों और संयुक्त राष्ट्र सुधार से संबंधित उद्देश्यों को आगे बढ़ाना चाहती है।
एक और कार्यकाल से भारत का अंतरराष्ट्रीय प्रभाव बढ़ सकता है तथा सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की उसकी माँग को बल मिल सकता है।
हालाँकि, ताजिकिस्तान पहले ही अपनी उम्मीदवारी की घोषणा कर चुका था और एशिया-प्रशांत समूह की सर्वसम्मत पसंद बनने की संभावना रखता था।
इस स्थिति में भारत के सामने तीन विकल्प हैं:
- ताजिकिस्तान के विरुद्ध सीधे चुनाव लड़ना।
- ताजिकिस्तान को अपनी उम्मीदवारी वापस लेने के लिए मनाना।
- स्वयं अपनी उम्मीदवारी वापस लेना।
दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता के कारण भारत के लिए व्यापक कूटनीतिक संपर्क और समर्थन जुटाना आवश्यक होगा।
कूटनीतिक प्रतिस्पर्धा
भारत की ताकत और सीमाएँ
- जनसंख्या, आर्थिक क्षमता, कूटनीतिक पहुँच और सुरक्षा परिषद में अनुभव के कारण भारत को कुछ महत्त्वपूर्ण लाभ प्राप्त हैं। हालाँकि, ये कारक चुनाव में जीत की गारंटी नहीं देते।
- छोटे देश अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में अधिक समान और न्यायसंगत प्रतिनिधित्व की माँग कर रहे हैं। ताजिकिस्तान स्वयं को उन छोटे देशों के प्रतिनिधि के रूप में प्रस्तुत कर सकता है, जिन्हें सुरक्षा परिषद में अब तक प्रतिनिधित्व का अवसर नहीं मिला है।
- यह तर्क उन विकासशील देशों को आकर्षित कर सकता है, जो अधिक समावेशी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था चाहते हैं।
- इस प्रकार, भारत की बार-बार की सदस्यता उसके लिए लाभ के साथ-साथ नुकसान का कारण भी बन सकती है।
क्षेत्रीय गठबंधन और मतदान के प्रतिमान
- ताजिकिस्तान को मध्य एशियाई देशों और इस्लामिक सहयोग संगठन (OIC) का समर्थन प्राप्त होने की संभावना है।
- दूसरी ओर, भारत पश्चिमी देशों, दक्षिण-पूर्व एशिया, कैरेबियाई देशों और प्रशांत द्वीपीय देशों का समर्थन पाने की अपेक्षा करता है।
- ऐसी स्थिति में अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और दक्षिण एशिया के देशों के मत निर्णायक हो सकते हैं।
- भारत को विकासशील देशों के सामने यह स्पष्ट करना होगा कि उसकी उम्मीदवारी केवल राष्ट्रीय महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के लिए नहीं, बल्कि साझा हितों को आगे बढ़ाने के लिए भी है।
वैश्विक दक्षिण और भारत की कूटनीतिक स्थिति
संयुक्त राष्ट्र के हालिया चुनाव दर्शाते हैं कि केवल कूटनीतिक प्रभाव या बड़ी शक्तियों का समर्थन चुनाव जीतने के लिए पर्याप्त नहीं है।
- किर्गिस्तान ने पश्चिमी देशों के समर्थन वाले फिलीपींस को पराजित किया था।
- पुर्तगाल और ऑस्ट्रिया ने पश्चिमी यूरोपीय एवं अन्य समूह के चुनाव में जर्मनी को पराजित किया था।
भारत की रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) उसकी कूटनीतिक स्थिति को मजबूत कर सकती है। हालाँकि, इजरायल के साथ भारत के घनिष्ठ संबंध उन देशों के बीच कठिनाइयाँ पैदा कर सकते हैं, जो इजरायली नीतियों की आलोचना करते हैं।
भारत को शांति, बहुपक्षवाद और विकासशील देशों के हितों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता प्रदर्शित करनी होगी।
निर्णायक संघर्ष: ताजिकिस्तान या भारत?
ताजिकिस्तान को उम्मीदवारी वापस लेने के लिए मनाना
- भारत ताजिकिस्तान को अपनी उम्मीदवारी वापस लेने के लिए मनाने का प्रयास कर सकता है। इसके लिए वर्ष 2010 में कजाकिस्तान और वर्ष 2013 में अफगानिस्तान से जुड़े उदाहरणों का उल्लेख किया जा सकता है।
- सितंबर 2026 में भारत और ताजिकिस्तान के नेताओं के बीच हुई बैठकों के बावजूद ऐसी कोई घोषणा नहीं हुई है।
- यदि ताजिकिस्तान अपनी उम्मीदवारी वापस ले लेता है, तो भारत के लिए चुनाव जीतने का रास्ता आसान हो सकता है। हालाँकि, इससे यह धारणा भी मजबूत हो सकती है कि भारत छोटे देशों की आकांक्षाओं की तुलना में अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को अधिक प्राथमिकता देता है।
भारत द्वारा अपनी उम्मीदवारी वापस लेना
- भारत अपनी उम्मीदवारी वापस लेकर ताजिकिस्तान का समर्थन कर सकता है और भविष्य के किसी चुनाव में समर्थन प्राप्त करने का प्रयास कर सकता है।
- इस निर्णय से रणनीतिक संयम और क्षेत्रीय एकजुटता का संदेश दिया जा सकता है। इससे वैश्विक दक्षिण के हितों के समर्थक के रूप में भारत की विश्वसनीयता भी मजबूत हो सकती है।
- अफगानिस्तान संघर्ष के दौरान ताजिकिस्तान में आयनी (Ayni) और फारखोर (Farkhor) स्थित सुविधाओं की मेजबानी का इतिहास भारत-ताजिकिस्तान संबंधों को अतिरिक्त रणनीतिक महत्त्व देता है।
- हालाँकि, उम्मीदवारी वापस लेने को भारत की कूटनीतिक असफलता के रूप में भी देखा जा सकता है।
कार्यकाल साझा करने की संभावना
एक अन्य विकल्प दोनों देशों के बीच दो वर्ष के कार्यकाल को बाँटना हो सकता है। अतीत में कुछ चुनावी प्रतिस्पर्धाओं में इस प्रकार की व्यवस्था अपनाई गई है।
हालाँकि, इसके लिए दोनों देशों की सहमति और समझौता करने की इच्छा आवश्यक होगी।
संयुक्त राष्ट्र की विश्वसनीयता का संकट
यूक्रेन पर रूस का आक्रमण, गाजा में संघर्ष तथा अमेरिका और ईरान के बीच तनाव मौजूदा अंतरराष्ट्रीय तंत्र की सीमाओं को उजागर करते हैं।
सुरक्षा परिषद के पाँच स्थायी सदस्यों की वीटो शक्ति कई बार सामूहिक कार्रवाई को बाधित करती है। इससे अंतरराष्ट्रीय कानून और समान व्यवहार के सिद्धांतों पर विश्वास कमजोर हो सकता है।
इन कमियों के बावजूद संयुक्त राष्ट्र कूटनीति, विकास सहयोग और अंतरराष्ट्रीय प्रतिनिधित्व के लिए एक आवश्यक मंच बना हुआ है।
भारत को निम्नलिखित सुधारों पर बल देना चाहिए:
- संयुक्त राष्ट्र की व्यापक संस्थागत संरचना में सुधार।
- निर्णय-प्रक्रिया में अधिक जवाबदेही।
- विकासशील देशों का अधिक प्रतिनिधित्व।
- अधिक न्यायसंगत और समावेशी वैश्विक व्यवस्था का निर्माण।
आगे की राह (Way Forward)
भारत को संतुलित और परिस्थितियों के अनुरूप कूटनीतिक रणनीति अपनानी चाहिए।
- मतदान का यथार्थवादी आकलन: विभिन्न देशों के संभावित मतदान व्यवहार का आकलन करके अनिर्णीत देशों से संपर्क बढ़ाना चाहिए।
- वैश्विक दक्षिण के साथ सहयोग: अफ्रीकी, लैटिन अमेरिकी और अन्य विकासशील देशों के साथ जलवायु न्याय, खाद्य सुरक्षा, विकास वित्तपोषण और प्रौद्योगिकी के क्षेत्रों में सहयोग मजबूत करना चाहिए।
- रणनीतिक स्वायत्तता की स्पष्ट व्याख्या: भारत को समझाना चाहिए कि उसकी रणनीतिक स्वायत्तता अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतों और प्रतिबद्धताओं के साथ किस प्रकार संगत है।
- लागत-लाभ विश्लेषण: एक और गैर-स्थायी कार्यकाल से मिलने वाले लाभों की तुलना संभावित कूटनीतिक और प्रतिष्ठागत लागतों से करनी चाहिए।
- दीर्घकालिक हितों को प्राथमिकता: चुनाव लड़ने, समझौता करने या उम्मीदवारी वापस लेने में से किस विकल्प से भारत के दीर्घकालिक हितों को सबसे अधिक लाभ होगा, इसका मूल्यांकन करना चाहिए।
निष्कर्ष (Conclusion)
वर्ष 2027 का चुनाव भारत के सामने तत्काल कूटनीतिक जीत और दीर्घकालिक अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा के बीच संतुलन स्थापित करने की चुनौती प्रस्तुत करता है।
सुरक्षा परिषद में एक और कार्यकाल आतंकवाद-रोधी प्रयासों और संस्थागत सुधारों को आगे बढ़ाने में सहायक हो सकता है। हालाँकि, ताजिकिस्तान को पराजित करने की कोशिश विकासशील देशों के बीच भारत की छवि को प्रभावित कर सकती है।
भारत का व्यापक उद्देश्य केवल एक और अस्थायी सीट प्राप्त करना नहीं, बल्कि सुधारित सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता हासिल करना है।
इसलिए, ऐसा निर्णय जो विकासशील देशों के बीच भारत के प्रति विश्वास और सहयोग को मजबूत करे, वह किसी एक चुनाव में जीतने से भी अधिक महत्त्वपूर्ण साबित हो सकता है।
महत्त्वपूर्ण MCQs
प्रश्न 1. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वर्ष 2028–29 के लिए गैर-स्थायी सदस्य चुने जाने हेतु 193 सदस्यीय संयुक्त राष्ट्र महासभा में कम-से-कम कितने मतों की आवश्यकता होगी?
(क) 97 (ख) 120 (ग) 129 (घ) 145
सही उत्तर: (ग) 129
प्रश्न 2. भारत की संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में गैर-स्थायी सदस्यता के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- भारत अब तक आठ बार गैर-स्थायी सदस्य रह चुका है।
- भारत वर्ष 2021–22 में सुरक्षा परिषद का गैर-स्थायी सदस्य था।
- गैर-स्थायी सदस्यता प्राप्त करने से किसी देश को सुरक्षा परिषद में वीटो शक्ति प्राप्त हो जाती है।
सही उत्तर का चयन कीजिए:
(क) केवल 1 और 2 (ख) केवल 2 और 3 (ग) केवल 1 और 3 (घ) 1, 2 और 3
सही उत्तर: (क) केवल 1 और 2
प्रश्न 3. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के चुनाव में भारत के समक्ष ताजिकिस्तान की उम्मीदवारी किस प्रमुख कूटनीतिक चुनौती को रेखांकित करती है?
(क) संयुक्त राष्ट्र महासभा में वीटो शक्ति का प्रयोग (ख) छोटे देशों के अधिक समान प्रतिनिधित्व की आकांक्षा (ग) गैर-स्थायी सदस्यों का स्थायी सदस्यता प्राप्त करना (घ) संयुक्त राष्ट्र महासभा की सदस्यता में कमी
सही उत्तर: (ख) छोटे देशों के अधिक समान प्रतिनिधित्व की आकांक्षा
प्रश्न 4. भारत की रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) के संदर्भ में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:
- यह भारत को स्वतंत्र विदेश नीति अपनाने की गुंजाइश प्रदान करती है।
- इसका अर्थ सभी अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर तटस्थ रहना है।
- वैश्विक दक्षिण के देशों के बीच भारत की विश्वसनीयता उसकी कूटनीतिक स्थिति को प्रभावित कर सकती है।
सही उत्तर का चयन कीजिए:
(क) केवल 1 (ख) केवल 1 और 3 (ग) केवल 2 और 3 (घ) 1, 2 और 3
सही उत्तर: (ख) केवल 1 और 3
प्रश्न 5. संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधारों के संदर्भ में निम्नलिखित में से कौन-सा विकल्प वैश्विक दक्षिण की प्रमुख आकांक्षाओं के सर्वाधिक अनुरूप है?
(क) केवल पाँच स्थायी सदस्यों की वीटो शक्ति को मजबूत करना (ख) गैर-स्थायी सदस्यों की भूमिका समाप्त करना (ग) निर्णय-प्रक्रिया में जवाबदेही और विकासशील देशों का प्रतिनिधित्व बढ़ाना (घ) सुरक्षा परिषद के चुनावों में दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता समाप्त करना
सही उत्तर: (ग) निर्णय-प्रक्रिया में जवाबदेही और विकासशील देशों का प्रतिनिधित्व बढ़ाना
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