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ओसीआई कार्डधारकों के अधिकार और सीमाएं

भारतीय मूल के विदेशी नागरिकों और भारत के बीच का संबंध केवल भावनात्मक नहीं, बल्कि विधिक भी है। इस संबंध को औपचारिक रूप देने वाली व्यवस्था है ओवरसीज़ सिटिज़न ऑफ इंडिया (ओसीआई) योजना। हाल में अभिनेता इमरान खान को भारत छोड़ने का नोटिस दिया गया। वे अमेरिकी नागरिक और ओसीआई कार्डधारक हैं। इस घटना ने एक पुराने प्रश्न को फिर उठाया है: भारत में रहने वाले ओसीआई कार्डधारक की राजनीतिक अभिव्यक्ति की सीमा क्या है, और राज्य की कार्यपालिका उसके आचरण पर कितना नियंत्रण रख सकती है?

विधि विदेशियों को विरोध-प्रदर्शन में भाग लेने से स्पष्ट रूप से नहीं रोकती, परंतु वह सरकार को उनके आचरण पर व्यापक विवेकाधिकार अवश्य देती है। यही विरोधाभास इस पूरे विमर्श का केंद्र है।

इमरान खान प्रकरण: घटनाक्रम

  • 10 अक्टूबर: इमरान खान मुंबई के अगस्त क्रांति मैदान में एक प्रदर्शन में शामिल हुए। प्रदर्शनकारी मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की माँग कर रहे थे। पुलिस ने उन्हें अन्य प्रदर्शनकारियों के साथ हिरासत में लिया।
  • शिकायत: भाजपा नेता किरीट सोमैया ने पुलिस से शिकायत की कि एक विदेशी नागरिक होकर खान ने प्रदर्शन में भाग लेकर विधि का उल्लंघन किया है।
  • कार्रवाई: शिकायत विदेशी क्षेत्रीय पंजीकरण कार्यालय (एफआरआरओ) को भेजी गई, जिसने ‘लीव इंडिया नोटिस’ जारी किया। पुलिस के अनुसार नोटिस में कहा गया कि खान ने प्रदर्शन में भाग लेकर आप्रवासन विधि का उल्लंघन किया।
  • समय-सीमा: खान को 28 अक्टूबर तक भारत छोड़ने को कहा गया है।

ओसीआई क्या है और ओसीआई कार्डधारक की स्थिति

ओसीआई योजना वर्ष 2005 में भारतीय मूल के कुछ विदेशी नागरिकों के लिए आरंभ की गई। इसके लिए नागरिकता अधिनियम, 1955 में संशोधनों के माध्यम से धारा 7A से 7D जोड़ी गईं। यह योजना 2000-01 की एल.एम. सिंघवी की अध्यक्षता वाली प्रवासी भारतीयों पर उच्च स्तरीय समिति की अनुशंसाओं की पृष्ठभूमि में आई, जिसने प्रवासी समुदाय को भारत से जोड़ने हेतु दोहरी नागरिकता जैसी व्यवस्था का सुझाव दिया था। वर्ष 2015 में पुरानी पीआईओ (पर्सन ऑफ इंडियन ओरिजिन) कार्ड योजना का ओसीआई में विलय कर दिया गया।

यह ध्यान देने योग्य है कि भारत दोहरी नागरिकता की अनुमति नहीं देता। संविधान का अनुच्छेद 9 स्पष्ट करता है कि स्वेच्छा से किसी विदेशी राज्य की नागरिकता ग्रहण करने वाला व्यक्ति भारत का नागरिक नहीं रहता। अतः ओसीआई कार्डधारक विधिक दृष्टि से विदेशी नागरिक ही है, जो किसी अन्य देश का पासपोर्ट धारण करता है। इसीलिए ‘ओवरसीज़ सिटिज़न’ शब्द भ्रामक होते हुए भी नागरिकता का द्योतक नहीं है।

ओसीआई को प्राप्त सुविधाएँ

ओसीआई कार्डधारकों को सामान्य विदेशियों की तुलना में अनेक विशेष सुविधाएँ प्राप्त हैं:

  • आजीवन, बहु-प्रवेश वीज़ा।
  • भारत में ठहराव की अवधि चाहे जितनी हो, एफआरआरओ में पंजीकरण से छूट।
  • अनेक क्षेत्रों में अनिवासी भारतीयों (एनआरआई) के समतुल्य व्यवहार, जिनमें कुछ संपत्ति संबंधी, शैक्षिक और व्यावसायिक अधिकार शामिल हैं।

प्रतिबंध और सीमाएँ

मार्च 2021 की सरकारी अधिसूचना के अनुसार ओसीआई कार्डधारकों को निम्न गतिविधियों से पहले विशेष अनुमति लेनी होती है:

  • शोध कार्य करना;
  • मिशनरी या तबलीगी कार्य;
  • पर्वतारोहण;
  • पत्रकारिता संबंधी गतिविधियाँ;
  • विदेशी राजनयिक मिशनों में कुछ प्रकार का रोज़गार या इंटर्नशिप;
  • संरक्षित, प्रतिबंधित या निषिद्ध क्षेत्रों में प्रवेश।
  • इसके अतिरिक्त ओसीआई कार्डधारक कृषि भूमि, फार्महाउस या बागान संपत्ति नहीं खरीद सकते।

इमरान खान के प्रसंग में उल्लेखनीय तथ्य यह है कि इस अधिसूचना में राजनीतिक प्रदर्शनों या विरोध-प्रदर्शनों में भागीदारी को उन गतिविधियों में स्पष्ट रूप से शामिल नहीं किया गया है जिनके लिए पूर्व अनुमति आवश्यक हो।

ओसीआई को प्राप्त न होने वाले राजनीतिक अधिकार

नागरिकता अधिनियम की धारा 7B के अंतर्गत ओसीआई कार्डधारकों को भारतीय नागरिकों के समान राजनीतिक अधिकार प्राप्त नहीं हैं:

  • वे मतदान नहीं कर सकते और न ही चुनाव लड़ सकते हैं;
  • उन्हें अनुच्छेद 16 (लोक नियोजन में अवसर की समानता) का लाभ नहीं मिलता;
  • वे राष्ट्रपति, उपराष्ट्रपति, सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय के न्यायाधीश नहीं बन सकते;
  • सामान्यतः सार्वजनिक सेवाओं और राज्य के पदों पर नियुक्ति के पात्र नहीं हैं।
  • सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अनुच्छेद 19 के अधिकार, जिनमें वाक् एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तथा शांतिपूर्ण सभा का अधिकार शामिल हैं, संविधान द्वारा केवल नागरिकों को प्रदान किए गए हैं।
  • विदेशियों को केवल वे मौलिक अधिकार प्राप्त हैं जो ‘व्यक्तियों’ को दिए गए हैं, जैसे अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समता) और अनुच्छेद 21 (प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता)।

सर्वोच्च न्यायालय ने हंस मूलर बनाम अधीक्षक, प्रेसिडेंसी जेल (1955) और लुई डी राएट बनाम भारत संघ (1991) में स्पष्ट किया कि भारत में निवास करने और बसने का अधिकार केवल नागरिकों का है तथा विदेशियों को निष्कासित करने की कार्यपालिका की शक्ति अत्यंत व्यापक है।

क्या किसी ओसीआई को प्रदर्शन में भाग लेने के कारण भारत छोड़ने को कहा जा सकता है?

आप्रवासन और विदेशी अधिनियम, 2025

  • यह प्रश्न आप्रवासन और विदेशी अधिनियम, 2025 के आलोक में देखना होगा, जो सितंबर 2025 से लागू हुआ। इसने विदेशी अधिनियम, 1946 का स्थान लिया है। साथ ही इसने पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, 1920, विदेशियों का पंजीकरण अधिनियम, 1939 और आप्रवासन (वाहक दायित्व) अधिनियम, 2000 को भी निरस्त कर एकीकृत ढाँचा बनाया। इस अधिनियम के प्रयोजन हेतु ओसीआई कार्डधारक विदेशी नागरिक ही माना जाता है।
  • अधिनियम में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जो स्पष्ट रूप से कहे कि विदेशी नागरिक प्रदर्शन में भाग नहीं ले सकता। तथापि यह कानून सरकार को भारत में विदेशियों की उपस्थिति, गतिविधियों और आचरण के नियमन का व्यापक विवेकाधिकार देता है। इमरान खान को जारी नोटिस में धारा 7(2)(c) को धारा 29 के साथ पढ़कर लागू किया गया है।

धारा 7: विनियमन की शक्ति

  • धारा 7 केंद्र सरकार को विदेशियों के प्रवेश, प्रस्थान और निरंतर उपस्थिति को विनियमित या प्रतिबंधित करने वाले आदेश जारी करने का अधिकार देती है।
  • इसकी उपधारा (2) का खंड (c), जिसका प्रयोग खान के विरुद्ध हुआ है, सरकार को यह निर्देश देने की अनुमति देता है कि कोई विदेशी भारत में या उसके किसी निर्दिष्ट क्षेत्र में नहीं रहेगा।
  • धारा 7 अलग से सरकार को यह भी अधिकार देती है कि वह किसी विदेशी के निर्दिष्ट व्यक्तियों से मेलजोल को सीमित करे, निर्दिष्ट प्रकार की गतिविधियों को प्रतिबंधित करे या उसके आचरण को विनियमित करे।
  • महत्वपूर्ण यह है कि खान को जारी नोटिस इन प्रावधानों का प्रयोग करके यह नहीं कहता कि उनका कोई विशेष आचरण निषिद्ध है, बल्कि सीधे यह कहता है कि वे भारत में नहीं रह सकते।

धारा 29: निष्कासन की शक्ति

  • धारा 29 एक कदम आगे जाती है। यह सरकार को किसी विदेशी को निम्न आधारों पर हटाने का अधिकार देती है:
  • अधिनियम, उसके अंतर्गत बने नियमों या आदेशों का उल्लंघन;
  • “प्रतिकूल सुरक्षा रिपोर्ट” के आधार पर।
  • यह प्रावधान अधिकारियों को ऐसे निर्देशों को लागू करने के लिए आवश्यक युक्तियुक्त शक्तियों के प्रयोग की भी अनुमति देता है।

शक्तियों का प्रत्यायोजन

  • ये शक्तियाँ पहले केवल केंद्रीय गृह मंत्रालय के पास थीं। सितंबर 2025 की अधिसूचना द्वारा धारा 7(2) और धारा 29 की शक्तियाँ एफआरआरओ और पंजीकरण अधिकारियों को प्रत्यायोजित कर दी गईं। इसका अर्थ है कि अब क्षेत्रीय स्तर के अधिकारी भी निष्कासन जैसे गंभीर निर्णय ले सकते हैं।
  • निष्कर्षतः कानून ‘राजनीतिक विरोध’ को स्पष्ट रूप से निषिद्ध आचरण घोषित नहीं करता, किंतु कार्यपालिका को आदेश या निर्देश द्वारा विशेष प्रकार की गतिविधियों पर रोक लगाने की खुली छूट देता है।

ओसीआई पंजीकरण का निरस्तीकरण: एक भिन्न प्रक्रिया

‘लीव इंडिया नोटिस’ और ओसीआई पंजीकरण का निरस्तीकरण दो अलग विषय हैं। निरस्तीकरण नागरिकता अधिनियम की धारा 7D से शासित होता है। सरकार ओसीआई पंजीकरण निम्न स्थितियों में रद्द कर सकती है:

  • पंजीकरण धोखाधड़ी, मिथ्या निरूपण या किसी तथ्य को छिपाकर प्राप्त किया गया हो;
  • कार्डधारक ने संविधान के प्रति “असंतोष” (disaffection) प्रदर्शित किया हो;
  • युद्ध के दौरान शत्रु की सहायता की हो;
  • निर्दिष्ट परिस्थितियों में किसी गंभीर अपराध में दोषसिद्ध हुआ हो (पंजीकरण के पाँच वर्ष के भीतर दो वर्ष या उससे अधिक का कारावास);
  • भारत की संप्रभुता और अखंडता, सुरक्षा, विदेशी राज्यों से मैत्रीपूर्ण संबंध या “आम जनता के हित” में ऐसा करना आवश्यक हो।

इनमें सबसे व्यापक आधार अंतिम खंड, धारा 7D(e) है, जिसकी शब्दावली अत्यंत लचीली है। नागरिकता (संशोधन) अधिनियम, 2019 ने इस धारा का दायरा और बढ़ाया तथा केंद्र द्वारा अधिसूचित किसी भी विधि के उल्लंघन को भी निरस्तीकरण का आधार बना दिया।

परंतु सामान्य आप्रवासन निर्देश से भिन्न, निरस्तीकरण के साथ एक स्पष्ट प्रक्रियात्मक सुरक्षा कवच जुड़ा है: ओसीआई को सुनवाई का युक्तियुक्त अवसर दिया जाना अनिवार्य है। न्यायालयों ने इन व्यापक निरस्तीकरण प्रावधानों द्वारा दी गई छूट की बार-बार जाँच की है।

इन मामलों से उभरते सूत्र

  • प्रक्रियात्मक निष्पक्षता: न्यायालयों ने आरोपों की स्पष्टता, सामग्री उपलब्ध कराने और सुनवाई के अवसर पर बल दिया है।
  • सीमित विजय: अधिकांश मामलों में न्यायालयों ने सरकार को नए सिरे से, विधिसम्मत ढंग से कार्रवाई करने की छूट दी। अर्थात् न्यायिक हस्तक्षेप प्रक्रिया-केंद्रित रहा, शक्ति को समाप्त करने वाला नहीं।
  • कार्यपालिका की प्रतिक्रिया: क्रिस्टो फिलिप मामले के बाद सरकार ने 2021 की अधिसूचना से उस रिक्ति को भर दिया। इससे स्पष्ट है कि न्यायिक निर्णयों के बाद कार्यपालिका नियमों में संशोधन कर अपनी स्थिति सुदृढ़ कर लेती है।
  • नई विधि, पुरानी शक्तियाँ: सिएदचिंस्की प्रकरण जिस विदेशी अधिनियम, 1946 के अंतर्गत था, उसे 2025 के अधिनियम ने प्रतिस्थापित कर दिया है, किंतु नई विधि भी लगभग समान व्यापक कार्यकारी शक्तियाँ बनाए रखती है।

इमरान खान के समक्ष उपलब्ध विकल्प

  • प्रशासनिक मार्ग: वे एफआरआरओ या केंद्र सरकार के समक्ष अभ्यावेदन देकर नोटिस को वापस लेने या पुनर्विचार का अनुरोध कर सकते हैं।
  • अपील प्रक्रिया का अभाव: धारा 7D के अंतर्गत निरस्तीकरण में सुनवाई का स्पष्ट प्रावधान है, किंतु 2025 के अधिनियम की धारा 7 में ऐसी कोई तुलनीय अपील प्रक्रिया वर्णित नहीं है।
  • न्यायिक मार्ग: उनका प्रमुख उपाय संविधान के अनुच्छेद 226 के अंतर्गत उच्च न्यायालय जाना है, जहाँ वे नोटिस की वैधानिकता को चुनौती देकर अंतरिम संरक्षण माँग सकते हैं। उनके अधिवक्ता बॉम्बे उच्च न्यायालय का रुख कर चुके हैं।

परिणाम: यदि एफआरआरओ नोटिस वापस नहीं लेता या उसमें संशोधन नहीं करता, अथवा न्यायालय उस पर रोक नहीं लगाता, तो निर्देश प्रभावी रहेगा और खान को निर्धारित समय-सीमा तक भारत छोड़ना होगा।

विश्लेषण: संप्रभुता बनाम विधि का शासन

किसी भी संप्रभु राष्ट्र को यह तय करने का अधिकार है कि उसके भूभाग में कौन विदेशी रहे और किस आचरण के साथ। राष्ट्रीय सुरक्षा, विदेशी हस्तक्षेप की आशंका और लोक व्यवस्था, ये सभी वैध चिंताएँ हैं। दूसरी ओर, ओसीआई कार्डधारक साधारण पर्यटक नहीं हैं; उनमें से अनेक वर्षों से भारत में रहते हैं, यहीं कार्य करते हैं और यहाँ की सामाजिक संरचना का अभिन्न अंग हैं।

समस्या शक्ति के अस्तित्व में नहीं, उसके अस्पष्ट और अपरिभाषित होने में है। जब कानून स्वयं किसी आचरण को निषिद्ध घोषित नहीं करता, परंतु अधिकारी उसी आचरण के आधार पर निष्कासन का आदेश देते हैं, तब मनमानी की आशंका स्वाभाविक है। शक्तियों का क्षेत्रीय अधिकारियों तक प्रत्यायोजन इस चिंता को और गहरा करता है। साथ ही, सरकार के आलोचकों के विरुद्ध कार्रवाई का बार-बार दिखने वाला पैटर्न ‘सॉफ्ट पावर’ और प्रवासी भारतीयों के विश्वास, दोनों को प्रभावित कर सकता है।

अतः संतुलित मार्ग यह होगा कि ओसीआई कार्डधारकों के लिए अनुमत और निषिद्ध गतिविधियों की स्पष्ट, प्रकाशित सूची हो, निष्कासन जैसे निर्णयों में कारणयुक्त आदेश और सुनवाई अनिवार्य हो, तथा एक वैधानिक अपील तंत्र स्थापित किया जाए। इससे राष्ट्रीय हित भी सुरक्षित रहेंगे और विधि का शासन भी।

निष्कर्ष

इमरान खान का मामला यह दर्शाता है कि ओसीआई कार्ड विशेषाधिकार है, अधिकार नहीं। विधि में राजनीतिक विरोध पर प्रत्यक्ष प्रतिबंध न होते हुए भी कार्यपालिका के पास ऐसे पर्याप्त उपकरण हैं जिनसे वह किसी विदेशी की भारत में उपस्थिति समाप्त कर सकती है। न्यायपालिका ने अब तक प्रक्रियात्मक न्याय के प्रहरी की भूमिका निभाई है, परंतु स्थायी समाधान विधायी स्पष्टता में ही निहित है। बॉम्बे उच्च न्यायालय का निर्णय इस दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेतक सिद्ध हो सकता है।

वन लाइनर फैक्ट्स फॉर रिवीजन

  • ओसीआई योजना वर्ष 2005 में आरंभ हुई।
  • ओसीआई संबंधी प्रावधान नागरिकता अधिनियम, 1955 की धारा 7A से 7D में हैं।
  • धारा 7B ओसीआई के अधिकारों और उनकी सीमाओं से संबंधित है।
  • ओसीआई पंजीकरण का निरस्तीकरण धारा 7D के अंतर्गत होता है।
  • संविधान का अनुच्छेद 9 स्वेच्छा से विदेशी नागरिकता लेने पर भारतीय नागरिकता की समाप्ति का प्रावधान करता है।
  • भारत दोहरी नागरिकता की अनुमति नहीं देता; ओसीआई विधिक रूप से विदेशी नागरिक है।
  • पीआईओ कार्ड योजना का ओसीआई में विलय 2015 में हुआ।
  • ओसीआई योजना की पृष्ठभूमि एल.एम. सिंघवी समिति (प्रवासी भारतीयों पर उच्च स्तरीय समिति) की अनुशंसाएँ हैं।
  • ओसीआई को आजीवन बहु-प्रवेश वीज़ा मिलता है और एफआरआरओ पंजीकरण से छूट है।
  • मार्च 2021 की अधिसूचना ने शोध, मिशनरी कार्य, पत्रकारिता, पर्वतारोहण आदि के लिए विशेष अनुमति अनिवार्य की।
  • अनुच्छेद 19 के अधिकार केवल भारतीय नागरिकों को प्राप्त हैं।
  • आप्रवासन और विदेशी अधिनियम, 2025 सितंबर 2025 से लागू हुआ और इसने विदेशी अधिनियम, 1946 का स्थान लिया।
  • इस अधिनियम की धारा 7(2)(c) किसी विदेशी को भारत या निर्दिष्ट क्षेत्र में न रहने का निर्देश देने की शक्ति देती है।
  • धारा 29 “प्रतिकूल सुरक्षा रिपोर्ट” के आधार पर विदेशी को हटाने की शक्ति देती है।
  • सितंबर 2025 की अधिसूचना से ये शक्तियाँ एफआरआरओ और पंजीकरण अधिकारियों को प्रत्यायोजित हुईं।
  • कलकत्ता उच्च न्यायालय ने 2020 में पोलिश छात्र कामिल सिएदचिंस्की का लीव इंडिया नोटिस रद्द किया।
  • दिल्ली उच्च न्यायालय ने मार्च 2025 में अशोक स्वाईं का ओसीआई निरस्तीकरण आदेश रद्द किया।
  • लुई डी राएट बनाम भारत संघ (1991) में विदेशियों को निष्कासित करने की सरकार की व्यापक शक्ति को मान्यता दी गई।

अभ्यास प्रश्न

प्रश्न 1. ओवरसीज़ सिटिज़न ऑफ इंडिया (ओसीआई) कार्डधारकों के संबंध में निम्नलिखित कथनों पर विचार कीजिए:

  1. वे लोकसभा चुनावों में मतदान कर सकते हैं।
  2. उन्हें भारत आने हेतु आजीवन बहु-प्रवेश वीज़ा प्राप्त होता है।
  3. वे अनुच्छेद 16 के अंतर्गत लोक नियोजन में अवसर की समानता के अधिकारी हैं।

उपर्युक्त में से कितने कथन सही हैं?

(a) केवल एक (b) केवल दो

(c) सभी तीन (d) कोई नहीं

प्रश्न 2. नागरिकता अधिनियम, 1955 की कौन-सी धारा ओसीआई पंजीकरण के निरस्तीकरण से संबंधित है?

(a) धारा 7A (b) धारा 7B

(c) धारा 7C (d) धारा 7D

प्रश्न 3. आप्रवासन और विदेशी अधिनियम, 2025 ने निम्नलिखित में से किन अधिनियमों को निरस्त किया है?

  1. विदेशी अधिनियम, 1946
  2. पासपोर्ट (भारत में प्रवेश) अधिनियम, 1920
  3. विदेशियों का पंजीकरण अधिनियम, 1939
  4. नागरिकता अधिनियम, 1955

नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

(a) केवल 1 और 2 (b) केवल 1, 2 और 3

(c) केवल 2, 3 और 4 (d) 1, 2, 3 और 4

प्रश्न 4. भारतीय संविधान के निम्नलिखित में से कौन-से मौलिक अधिकार भारत में रह रहे विदेशी नागरिकों को भी प्राप्त हैं?

  1. अनुच्छेद 14
  2. अनुच्छेद 19
  3. अनुच्छेद 21

नीचे दिए गए कूट का प्रयोग कर सही उत्तर चुनिए:

(a) केवल 1 और 2 (b) केवल 2 और 3

(c) केवल 1 और 3 (d) 1, 2 और 3

प्रश्न 5. पर्सन ऑफ इंडियन ओरिजिन (पीआईओ) कार्ड योजना का ओवरसीज़ सिटिज़न ऑफ इंडिया (ओसीआई) योजना में विलय किस वर्ष हुआ?

(a) 2005 (b) 2011

(c) 2015 (d) 2019

प्रश्न 6. प्रवासी भारतीयों पर गठित उच्च स्तरीय समिति, जिसकी अनुशंसाओं ने ओसीआई योजना की पृष्ठभूमि तैयार की, के अध्यक्ष कौन थे?

(a) एल.एम. सिंघवी (b) एम.एन. वेंकटचलैया

(c) सरकारिया (d) बी.पी. जीवन रेड्डी


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