आज की वैश्विक राजनीति एक ऐसे दौर से गुजर रही है, जहाँ दुनिया एक साथ कई गंभीर संकटों का सामना कर रही है। युद्ध, जलवायु परिवर्तन, महामारी, परमाणु जोखिम, ऊर्जा सुरक्षा, आर्थिक अस्थिरता और कृत्रिम बुद्धिमत्ता जैसी चुनौतियाँ अलग-अलग दिखाई देती हैं, लेकिन वास्तव में वे एक-दूसरे से गहराई से जुड़ी हुई हैं।
इसी संदर्भ में प्रश्न उठता है कि क्या आज की पारंपरिक कूटनीति और राजनीति इन बदलती वैश्विक चुनौतियों से निपटने के लिए पर्याप्त हैं?
- हाल के वर्षों में विश्व के बड़े नेता लगातार द्विपक्षीय बैठकों, बहुपक्षीय सम्मेलनों और अंतरराष्ट्रीय शिखर बैठकों में भाग ले रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र, BRICS, SCO, ASEAN जैसे मंच सक्रिय हैं। इसके बावजूद वैश्विक असुरक्षा कम होने के बजाय कई क्षेत्रों में नई जटिलताएँ दिखाई दे रही हैं।
- इस स्थिति को समझने के लिए केवल यह देखना पर्याप्त नहीं है कि कौन-सा देश किसके साथ खड़ा है। हमें यह समझना होगा कि 21वीं सदी के संकटों की प्रकृति ही बदल गई है।
एक साथ कई संकटों का दौर
- वर्तमान विश्व व्यवस्था की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि दुनिया एक ही समय में अनेक संकटों का सामना कर रही है।
- रूस-यूक्रेन युद्ध जैसी भू-राजनीतिक चुनौतियों के साथ पश्चिम एशिया में संघर्ष, ऊर्जा असुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, महामारी का खतरा, परमाणु हथियारों की मौजूदगी और कृत्रिम बुद्धिमत्ता के तेजी से विकास जैसी समस्याएँ सामने हैं।
- इनमें से किसी भी संकट को पूरी तरह अलग करके नहीं देखा जा सकता।
- उदाहरण के लिए, किसी क्षेत्र में युद्ध होता है तो उसका प्रभाव केवल सैन्य क्षेत्र तक सीमित नहीं रहता। इससे ऊर्जा आपूर्ति प्रभावित हो सकती है, व्यापार मार्ग बाधित हो सकते हैं, खाद्य कीमतें बढ़ सकती हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव पड़ सकता है।
- इसी प्रकार जलवायु परिवर्तन केवल पर्यावरण का प्रश्न नहीं है। यह खाद्य सुरक्षा, जल सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासन और मानव सुरक्षा से भी जुड़ जाता है।
- इसलिए आज की दुनिया को समझने के लिए “Polycrisis” या बहु–संकट की अवधारणा महत्वपूर्ण हो जाती है।
राष्ट्रीय हित बनाम वैश्विक हित
अंतरराष्ट्रीय राजनीति का पारंपरिक आधार राष्ट्र-राज्य और उसका राष्ट्रीय हित रहा है।
- हर देश अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा, आर्थिक विकास, ऊर्जा आवश्यकताओं, तकनीकी क्षमता, क्षेत्रीय अखंडता और रणनीतिक स्वायत्तता को प्राथमिकता देता है।
- यह स्वाभाविक भी है। लेकिन समस्या तब उत्पन्न होती है जब कोई चुनौती ऐसी हो जिसे कोई देश अकेले हल नहीं कर सकता। जलवायु परिवर्तन इसका सबसे अच्छा उदाहरण है।
- यदि एक देश अपने उत्सर्जन को कम कर देता है, लेकिन दूसरे देश लगातार बड़े पैमाने पर उत्सर्जन करते रहते हैं, तो वैश्विक जलवायु समस्या समाप्त नहीं होगी।
- इसी प्रकार महामारी, साइबर सुरक्षा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से उत्पन्न जोखिम किसी एक देश की सीमाओं तक सीमित नहीं रहते।
- इसलिए आज की अंतरराष्ट्रीय राजनीति के सामने एक महत्वपूर्ण प्रश्न है: क्या वैश्विक समस्याओं का समाधान केवल राष्ट्रीय हितों की पारंपरिक राजनीति के माध्यम से किया जा सकता है?
संप्रभुता की बदलती प्रकृति
आधुनिक अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था राज्य की संप्रभुता पर आधारित है। प्रत्येक राज्य अपने क्षेत्र और आंतरिक मामलों पर अधिकार रखता है।
लेकिन 21वीं सदी की अनेक समस्याएँ सीमाओं को नहीं मानतीं।
- वायरस पासपोर्ट नहीं देखता।
- जलवायु परिवर्तन राजनीतिक सीमाओं का सम्मान नहीं करता।
- साइबर हमले भौगोलिक सीमाओं से बंधे नहीं हैं।
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता की तकनीकी क्षमता कुछ ही देशों तक सीमित नहीं रह सकती।
इसलिए चुनौती संप्रभुता को समाप्त करने की नहीं, बल्कि संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बीच संतुलन स्थापित करने की है। यही आधुनिक वैश्विक शासन की एक प्रमुख चुनौती है।
क्या अमेरिका और चीन अकेले वैश्विक व्यवस्था तय कर सकते हैं?
- वर्तमान विश्व व्यवस्था में अमेरिका और चीन दो प्रमुख शक्तियाँ हैं, लेकिन दुनिया अब केवल दो शक्तियों के बीच संबंधों से निर्धारित नहीं होती।
- भारत, यूरोपीय संघ, रूस, जापान, ASEAN, अफ्रीकी देश, लैटिन अमेरिकी देश और Global South के अन्य देश भी वैश्विक राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
- इसके अतिरिक्त अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ, बहुराष्ट्रीय कंपनियाँ, तकनीकी कंपनियाँ और गैर-राज्यीय संगठन भी वैश्विक निर्णयों को प्रभावित करते हैं।
- इसलिए वैश्विक व्यवस्था increasingly बहुध्रुवीय और बहु–अभिकर्ता (multi-actor) स्वरूप ग्रहण कर रही है।
- भारत के लिए यह विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, क्योंकि भारत लंबे समय से रणनीतिक स्वायत्तता, बहुपक्षवाद और Global South की आवाज को महत्व देता रहा है।

AI: अवसर भी और नया जोखिम भी
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता वर्तमान वैश्विक राजनीति में एक नई चुनौती के रूप में उभर रही है।
- AI आर्थिक विकास, स्वास्थ्य, शिक्षा, वैज्ञानिक अनुसंधान और प्रशासन में परिवर्तन ला सकता है। लेकिन इसके साथ अनेक जोखिम भी जुड़े हैं। इसलिए AI को केवल तकनीकी विषय मानना पर्याप्त नहीं है।
- यह अब अर्थव्यवस्था + सुरक्षा + नैतिकता + शासन + अंतरराष्ट्रीय राजनीति का विषय बन चुका है।
- इससे एक नई आवश्यकता सामने आती है, AI Governance, अर्थात् कृत्रिम बुद्धिमत्ता के उपयोग और विकास के लिए अंतरराष्ट्रीय नियम और मानदंड विकसित करना।
जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती
- जलवायु परिवर्तन के संदर्भ में भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति एक जटिल स्थिति का सामना कर रही है।
- दुनिया को एक ओर स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ना है, वहीं दूसरी ओर विकासशील देशों को आर्थिक विकास के लिए सस्ती और विश्वसनीय ऊर्जा की आवश्यकता है।
इससे एक महत्वपूर्ण प्रश्न पैदा होता है कि क्या जलवायु सुरक्षा और विकासात्मक आवश्यकताओं के बीच संतुलन बनाया जा सकता है?
- भारत जैसे विकासशील देशों के लिए यह प्रश्न विशेष महत्व रखता है। भारत को आर्थिक विकास, ऊर्जा सुरक्षा, गरीबी उन्मूलन और जलवायु प्रतिबद्धताओं को एक साथ आगे बढ़ाना है।
- इसलिए जलवायु कूटनीति में केवल उत्सर्जन कम करने की बात नहीं, बल्कि Climate Justice और समान लेकिन विभेदित उत्तरदायित्व जैसे सिद्धांत भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं।
परमाणु जोखिम और रणनीतिक स्थिरता
- परमाणु हथियारों ने अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा की प्रकृति को पूरी तरह बदल दिया है।
- शीत युद्ध के दौरान परमाणु प्रतिरोध यानी Nuclear Deterrence ने महाशक्तियों के बीच प्रत्यक्ष युद्ध को रोकने में भूमिका निभाई।
- लेकिन आज की दुनिया अधिक जटिल है। परमाणु शक्तियों की संख्या, क्षेत्रीय संघर्ष, मिसाइल तकनीक, साइबर क्षमताएँ और नई सैन्य तकनीकें रणनीतिक स्थिरता को प्रभावित करती हैं।
इसलिए परमाणु निरस्त्रीकरण, अप्रसार और रणनीतिक स्थिरता आज भी वैश्विक कूटनीति के महत्वपूर्ण विषय हैं।
फिर सवाल उठता है कि कूटनीति कहाँ खड़ी है?
यही इस पूरे विमर्श का केंद्रीय प्रश्न है।
- दुनिया में लगातार शिखर सम्मेलन हो रहे हैं, द्विपक्षीय बैठकें हो रही हैं, बहुपक्षीय संस्थाएँ सक्रिय हैं, घोषणाएँ जारी हो रही हैं, नए समझौते किए जा रहे हैं। लेकिन क्या यह गतिविधियाँ वास्तव में दुनिया को अधिक सुरक्षित बना रही हैं? यहाँ हमें “Diplomacy as usual” की अवधारणा को समझना होगा।
- पारंपरिक कूटनीति अक्सर राज्यों के बीच हितों के संतुलन, बातचीत और समझौते पर आधारित होती है।
- लेकिन वर्तमान संकटों की प्रकृति ऐसी है कि केवल दो देशों के बीच समझौता पर्याप्त नहीं हो सकता।
- जलवायु परिवर्तन, महामारी, AI और साइबर सुरक्षा जैसी समस्याओं के लिए सामूहिक कार्रवाई आवश्यक है।
पारंपरिक कूटनीति से आगे: Preventive Diplomacy
- आज आवश्यकता केवल संकट के बाद बातचीत करने की नहीं है।
- बल्कि ऐसी कूटनीति की आवश्यकता है जो संकट को उत्पन्न होने से पहले पहचान सके। इसे Preventive Diplomacy कहा जाता है।
इसका उद्देश्य है: संभावित तनाव की पहचान, संवाद, विश्वास निर्माण, तनाव कम करना, संघर्ष की रोकथाम यह दृष्टिकोण विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि आधुनिक संघर्षों की आर्थिक और मानवीय लागत बहुत अधिक हो सकती है।
भारत के लिए इसका क्या महत्व है?
- भारत वर्तमान वैश्विक व्यवस्था में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की स्थिति में है।
- भारत एक साथ कई मंचों पर सक्रिय है और विभिन्न शक्तियों के साथ अपने संबंध बनाए रखता है।
- भारत के लिए चुनौती यह है कि वह राष्ट्रीय हितों की रक्षा करे + रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखे + बहुपक्षीय सहयोग को मजबूत करे + Global South की चिंताओं को सामने रखे।
- इसी संदर्भ में भारत की कूटनीति को केवल शक्ति-राजनीति के दृष्टिकोण से समझना पर्याप्त नहीं होगा।
- भारत की विदेश नीति में बहुपक्षवाद, संवाद, सह–अस्तित्व, विकासात्मक सहयोग और रणनीतिक स्वायत्तता जैसे तत्व भी महत्वपूर्ण हैं।
निष्कर्ष
आज की वैश्विक राजनीति का सबसे महत्वपूर्ण परिवर्तन यह है कि सुरक्षा की परिभाषा विस्तृत हो रही है। पहले सुरक्षा का मुख्य अर्थ राज्य की सीमा और सैन्य सुरक्षा से था। लेकिन आज सुरक्षा में मानव सुरक्षा, स्वास्थ्य सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, जलवायु सुरक्षा, साइबर सुरक्षा, तकनीकी सुरक्षा आदि तत्व शामिल हो गए हैं। इसलिए 21वीं सदी की कूटनीति को भी इसी परिवर्तन के अनुरूप बदलना होगा। केवल संकट आने के बाद बातचीत करना पर्याप्त नहीं है।
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