21वीं सदी की वैश्विक राजनीति में अफ्रीका का महत्व अभूतपूर्व रूप से बढ़ा है। लंबे समय तक उपनिवेशवाद, आर्थिक शोषण और वैश्विक शक्ति-संघर्ष का केंद्र रहे अफ्रीका को अब केवल संसाधनों के भंडार के रूप में नहीं, बल्कि भविष्य की वैश्विक अर्थव्यवस्था, भू-राजनीति और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था (Multipolar World Order) के एक निर्णायक स्तंभ के रूप में देखा जा रहा है। विशाल प्राकृतिक संसाधन, युवा जनसंख्या, तेजी से विकसित हो रहे बाजार, ऊर्जा सुरक्षा की संभावनाएँ तथा सामरिक भौगोलिक स्थिति ने अफ्रीका को विश्व की प्रमुख शक्तियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण बना दिया है।
- ऐसे समय में चौथा भारत–अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन (IAFS-IV), जो 28–31 मई को आयोजित होने जा रहा है, भारत के लिए एक महत्वपूर्ण अवसर प्रस्तुत करता है। यह केवल एक कूटनीतिक सम्मेलन नहीं, बल्कि भारत की अफ्रीका नीति को पुनर्परिभाषित करने और उसे नई वैश्विक वास्तविकताओं के अनुरूप ढालने का अवसर है।
- मूलतः यह सम्मेलन 2020 में आयोजित होना था, किंतु कोविड-19 महामारी, वैश्विक आपूर्ति शृंखला संकट, भू-राजनीतिक तनाव और कूटनीतिक व्यवधानों के कारण इसमें विलंब हुआ। इस अंतराल के दौरान अफ्रीका में वैश्विक शक्तियों की सक्रियता अत्यधिक बढ़ गई। यूरोपीय संघ, चीन, जापान, फ्रांस, जर्मनी और दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने अफ्रीका के साथ अपने संबंधों को संस्थागत, आर्थिक और सामरिक रूप से अधिक मजबूत किया।
- इसलिए अब भारत के लिए यह आवश्यक हो गया है कि वह केवल ऐतिहासिक सद्भावना और भावनात्मक संबंधों पर निर्भर न रहे, बल्कि अफ्रीका के साथ अपने संबंधों को दीर्घकालिक, संस्थागत और रणनीतिक साझेदारी में परिवर्तित करे।
अफ्रीका : उभरती वैश्विक भू–राजनीति का केंद्र
बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा और सामरिक महत्व
वर्तमान समय में अफ्रीका विश्व राजनीति का “नई प्रतिस्पर्धा का महाद्वीप” बन चुका है। शीत युद्ध के दौरान जहाँ अफ्रीका वैचारिक संघर्ष का क्षेत्र था, वहीं आज यह आर्थिक, तकनीकी, सामरिक और संसाधन-आधारित प्रतिस्पर्धा का केंद्र बन गया है।
अफ्रीका के महत्व के पीछे अनेक कारण हैं;
- विश्व के विशाल खनिज संसाधन
- Rare Earth Minerals की उपलब्धता
- ऊर्जा सुरक्षा की संभावनाएँ
- विशाल युवा श्रमशक्ति
- उभरते उपभोक्ता बाजार
- हिंद महासागर और अटलांटिक महासागर के बीच सामरिक स्थिति
इन्हीं कारणों से वैश्विक शक्तियाँ अफ्रीका में अपनी उपस्थिति मजबूत करने में लगी हुई हैं।
2025 में यूरोपीय संघ और जापान ने अफ्रीकी देशों के साथ उच्च स्तरीय शिखर सम्मेलन आयोजित किए। दक्षिण कोरिया ने अफ्रीकी साझेदारों के साथ मंत्रिस्तरीय परामर्श बढ़ाया। जर्मनी ने सूडान संकट पर बहुपक्षीय चर्चाओं की मेजबानी की। फ्रांस अपनी “Renewed Africa Strategy” के माध्यम से पश्चिम अफ्रीका और साहेल क्षेत्र में प्रभाव पुनः स्थापित करने का प्रयास कर रहा है।
- सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि चीन ने Forum on China–Africa Cooperation (FOCAC) के माध्यम से अफ्रीका में अत्यंत मजबूत और संस्थागत उपस्थिति स्थापित कर ली है। चीन का निवेश, आधारभूत संरचना निर्माण, ऋण सहायता और संसाधन आधारित समझौते अफ्रीका में उसकी गहरी पैठ को दर्शाते हैं।
- इस प्रकार अफ्रीका आज “Global Power Competition” का प्रमुख मंच बन चुका है। ऐसे वातावरण में भारत के लिए केवल “मित्रवत छवि” बनाए रखना पर्याप्त नहीं होगा; उसे सक्रिय, निरंतर और रणनीतिक भागीदारी सुनिश्चित करनी होगी।
अफ्रीका में भारत की पारंपरिक शक्ति और ऐतिहासिक पूंजी
साझा ऐतिहासिक अनुभव और उपनिवेशवाद–विरोधी विरासत
- भारत और अफ्रीका के संबंध केवल आधुनिक कूटनीतिक संबंध नहीं हैं, बल्कि उनकी जड़ें उपनिवेशवाद-विरोधी संघर्ष और दक्षिण–दक्षिण सहयोग की ऐतिहासिक विरासत में निहित हैं। दोनों क्षेत्रों ने साम्राज्यवाद, नस्लवाद और आर्थिक शोषण का सामना किया तथा स्वतंत्रता और आत्मनिर्णय के लिए संघर्ष किया।
- महात्मा गांधी का दक्षिण अफ्रीका से जुड़ाव तथा जवाहरलाल नेहरू की गुटनिरपेक्ष नीति ने भारत–अफ्रीका संबंधों की वैचारिक नींव रखी। भारत ने हमेशा अफ्रीकी देशों के स्वतंत्रता संघर्ष का समर्थन किया और Apartheid के खिलाफ वैश्विक मंचों पर आवाज उठाई।
- इसी कारण अफ्रीका में भारत को एक “विश्वसनीय और सहानुभूतिपूर्ण साझेदार” के रूप में देखा जाता है।
विकास साझेदारी : भारत की विशिष्ट पहचान
भारत की अफ्रीका नीति की सबसे बड़ी विशेषता यह रही है कि उसने कभी “हेजेमोनिक” या प्रभुत्ववादी दृष्टिकोण नहीं अपनाया। भारत अफ्रीका को केवल संसाधनों के स्रोत के रूप में नहीं, बल्कि साझेदारी के रूप में देखता है।
अफ्रीकी देशों के लिए भारत—
- सस्ती और उपयुक्त तकनीक उपलब्ध कराने वाला देश है,
- स्थानीय आवश्यकताओं के अनुसार अनुकूलन करने वाला साझेदार है,
- क्षमता निर्माण और मानव संसाधन विकास पर जोर देने वाला सहयोगी है,
- तथा संप्रभुता और स्थानीय प्राथमिकताओं का सम्मान करने वाला राष्ट्र है।
भारत ने ITEC कार्यक्रम, छात्रवृत्तियों, फार्मास्यूटिकल्स, सूचना प्रौद्योगिकी, कृषि प्रशिक्षण, डिजिटल सेवाओं और स्वास्थ्य सेवाओं के माध्यम से अफ्रीका में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
COVID-19 महामारी के दौरान “Vaccine Maitri” पहल ने भी भारत की सकारात्मक छवि को और मजबूत किया।
किन्तु वर्तमान वैश्विक प्रतिस्पर्धा में केवल सद्भावना पर्याप्त नहीं है। भारत को अपनी ऐतिहासिक पूंजी को रणनीतिक प्रभाव में बदलना होगा।
संस्थागत और निरंतर जुड़ाव की आवश्यकता
वर्तमान मॉडल की सीमाएँ
भारत–अफ्रीका फोरम शिखर सम्मेलन का पाँच वर्षीय चक्र नेतृत्व-स्तरीय संवाद के लिए महत्वपूर्ण अवश्य है, लेकिन इसके बीच मजबूत संस्थागत तंत्र का अभाव संबंधों की निरंतरता को कमजोर करता है।
इसका परिणाम यह हुआ है कि;
- भारत–अफ्रीका संबंध कई बार “episodic diplomacy” तक सीमित रह जाते हैं,
- घोषणाएँ और समझौते प्रभावी रूप से लागू नहीं हो पाते,
- सहयोग अक्सर द्विपक्षीय स्तर तक सीमित रह जाता है,
- और पैन-अफ्रीकी सहयोग कमजोर बना रहता है।
इससे भारत की छवि एक “Occasional Diplomatic Actor” के रूप में उभरती है, जबकि चीन जैसे देश निरंतर और संरचित जुड़ाव बनाए रखते हैं।
इसलिए आवश्यकता है कि भारत “Summit-Centric Diplomacy” से आगे बढ़कर “Process-Driven Diplomacy” को अपनाए।
त्रिस्तरीय अफ्रीका ढाँचे का पुनर्जीवन
भारत ने पहले अफ्रीका के साथ जुड़ाव के लिए तीन-स्तरीय ढाँचा विकसित किया था—
- द्विपक्षीय स्तर
- क्षेत्रीय स्तर
- पैन-अफ्रीकी स्तर
यद्यपि कार्यान्वयन संबंधी समस्याओं के कारण यह मॉडल पूर्ण सफलता प्राप्त नहीं कर सका, फिर भी वर्तमान संदर्भ में इसकी प्रासंगिकता अत्यंत महत्वपूर्ण है।
आवश्यक सुधार
- African Union Commission (AUC) के अध्यक्ष को प्रतिवर्ष भारत आमंत्रित किया जाए।
- African Union Chair के लिए नियमित राज्य यात्राएँ आयोजित की जाएँ।
- उन अफ्रीकी देशों को अधिक प्रतिनिधित्व दिया जाए जो अब तक भारत की कूटनीतिक प्राथमिकताओं से बाहर रहे हैं।
वर्तमान में बुरुंडी African Union की अध्यक्षता कर रहा है और IAFS-IV का सह-अध्यक्ष भी है। इससे अफ्रीकी नेतृत्व के साथ भारत की साझेदारी को नया आयाम मिल सकता है।
African Union Commission (AUC) का रणनीतिक महत्व
African Union Commission केवल एक प्रशासनिक संस्था नहीं, बल्कि अफ्रीका की सामूहिक रणनीतिक सोच का केंद्र है।
यह संस्था:
- जलवायु परिवर्तन,
- ऊर्जा संक्रमण,
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI),
- डिजिटल शासन,
- तथा Global South Cooperation
जैसे मुद्दों पर अफ्रीका की सामूहिक स्थिति को आकार देती है।
भारत के लिए यह अवसर है कि वह अपने विकासात्मक अनुभव—
- Digital Public Infrastructure (DPI),
- UPI आधारित भुगतान प्रणाली,
- Aadhaar मॉडल,
- e-Governance,
- Public Health Systems,
- Financial Inclusion
को अफ्रीकी देशों के साथ साझा करे।
यह सहयोग भारत को केवल आर्थिक साझेदार नहीं, बल्कि “Development Partner” के रूप में स्थापित करेगा।
Regional Economic Communities (RECs) की भूमिका
अफ्रीका की Regional Economic Communities महाद्वीपीय आर्थिक एकीकरण और क्षेत्रीय सहयोग की आधारशिला हैं।
- इनके साथ भारत का जुड़ाव व्यापार, ऊर्जा, आधारभूत संरचना और क्षेत्रीय स्थिरता को बढ़ावा दे सकता है।
- “Track 1.5 India–Africa Strategic Dialogue” जैसी पहल अत्यंत उपयोगी हो सकती है, जिसमें नीति निर्माता, शिक्षाविद, उद्योग विशेषज्ञ, AUC नेतृत्व, तथा PRC प्रतिनिधि शामिल हों।
- इस प्रकार का निरंतर संवाद नीति-निर्माण में स्थायित्व और सामरिक स्पष्टता ला सकता है।
भारत–अफ्रीका संबंधों की प्रमुख चुनौतियाँ
घोषणाओं और कार्यान्वयन के बीच अंतर
IAFS के अंतर्गत की गई अनेक घोषणाएँ कमजोर कार्यान्वयन और निगरानी तंत्र के कारण अपेक्षित परिणाम नहीं दे सकीं।
कई परियोजनाएँ धीमी गति से आगे बढ़ीं, जिससे भारत की विश्वसनीयता पर प्रभाव पड़ा।
चीन की बढ़ती उपस्थिति
- चीन ने अफ्रीका में अत्यधिक वित्तीय और संस्थागत उपस्थिति स्थापित कर ली है।
- उसकी Belt and Road Initiative (BRI), आधारभूत संरचना परियोजनाएँ, विशाल ऋण सहायता, तथा निरंतर उच्च स्तरीय संवाद भारत के लिए चुनौती उत्पन्न करते हैं।
सहयोग का अपर्याप्त संस्थानीकरण
Renewable Energy, Climate Finance, Digital Economy और Counter-Terrorism जैसे क्षेत्रों में भारत–अफ्रीका सहयोग अभी भी पर्याप्त रूप से विकसित नहीं हो पाया है।
आगे की राह
प्रतीकात्मक कूटनीति से रणनीतिक साझेदारी की ओर
IAFS-IV को केवल औपचारिक शिखर सम्मेलन तक सीमित नहीं रखना चाहिए। इसे स्थायी रणनीतिक साझेदारी में बदलना आवश्यक है।
इसके लिए
- मध्यावधि समीक्षा बैठकें आयोजित की जाएँ,
- कार्यान्वयन निगरानी तंत्र विकसित किया जाए,
- नई दिल्ली और अदीस अबाबा में नियमित परामर्श तंत्र बनाया जाए।
भारत की तुलनात्मक शक्तियों का उपयोग
भारत को उन क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाना चाहिए जहाँ उसकी विशेष क्षमता है—
- Digital Public Infrastructure
- FinTech और UPI
- Affordable Healthcare
- Pharmaceuticals
- Skill Development
- Renewable Energy
ये क्षेत्र अफ्रीका की विकासात्मक आवश्यकताओं के अनुरूप हैं।
अफ्रीकी प्राथमिकताओं को केंद्र में रखना
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2018 में युगांडा में कहा था;
“अफ्रीकी प्राथमिकताएँ ही भारत की अफ्रीका नीति का मार्गदर्शन करेंगी।”
यह सिद्धांत भारत की नीति का आधार बनना चाहिए।
जब सहयोग “Demand-Driven” होगा और अफ्रीकी देशों की प्राथमिकताओं के अनुरूप होगा, तभी संबंधों में वास्तविक विश्वास और दीर्घकालिक स्थिरता विकसित होगी।
निष्कर्ष
IAFS-IV ऐसे समय में आयोजित हो रहा है जब अफ्रीका वैश्विक राजनीति के केंद्र में उभर चुका है और विश्व व्यवस्था तेजी से बहुध्रुवीय होती जा रही है।
भारत के लिए यह केवल एक कूटनीतिक अवसर नहीं, बल्कि अपनी अफ्रीका नीति को पुनर्परिभाषित करने का ऐतिहासिक क्षण है।
यदि भारत अपनी ऐतिहासिक सद्भावना को संस्थागत सहयोग, प्रभावी कार्यान्वयन, निरंतर संवाद और रणनीतिक दृष्टिकोण में बदलने में सफल होता है, तो भारत–अफ्रीका संबंध 21वीं सदी की सबसे महत्वपूर्ण दक्षिण–दक्षिण साझेदारियों में से एक बन सकते हैं।
अंततः भारत और अफ्रीका का संबंध केवल व्यापार या कूटनीति का संबंध नहीं, बल्कि साझा विकास, वैश्विक न्याय, बहुध्रुवीयता और मानव-केंद्रित वैश्वीकरण की सामूहिक आकांक्षा का प्रतीक है।
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