हाल ही में दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण निर्णय में ‘भूल जाने के अधिकार’ (Right to Be Forgotten – RTBF) को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत संरक्षित निजता के मौलिक अधिकार (Right to Privacy) का अभिन्न हिस्सा माना है।
- न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि उपयुक्त परिस्थितियों में व्यक्तियों की पहचान से जुड़ी जानकारी को इंटरनेट खोज परिणामों से हटाने (De-indexing) अथवा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध न्यायिक दस्तावेजों में छिपाने (Masking/Redaction) के लिए न्यायालय आवश्यक निर्देश जारी कर सकता है।
- यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब इंटरनेट और डिजिटल अभिलेखों की स्थायी उपलब्धता के कारण व्यक्तियों की प्रतिष्ठा, रोजगार, सामाजिक जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ रहे हैं।
पृष्ठभूमि और मामले की उत्पत्ति
यह मामला विभिन्न याचिकाओं के माध्यम से न्यायालय के समक्ष आया, जिनमें याचिकाकर्ताओं ने अनुरोध किया था कि उनके नाम, व्यक्तिगत विवरण तथा उनसे संबंधित न्यायिक अभिलेखों को इंटरनेट पर आसानी से खोजे जाने योग्य न बनाया जाए।
याचिकाकर्ताओं का कहना था कि:
- वे आपराधिक मामलों में बरी हो चुके हैं अथवा दोषमुक्त घोषित किए जा चुके हैं।
- कुछ मामलों में विवादों का आपसी समझौते के माध्यम से निपटारा हो चुका है।
- इसके बावजूद उनके नाम इंटरनेट सर्च इंजन, कानूनी डेटाबेस और न्यायिक पोर्टलों पर उपलब्ध बने हुए हैं।
- ऐसी जानकारी की निरंतर उपलब्धता उनके सामाजिक सम्मान, व्यक्तिगत गरिमा और पेशेवर अवसरों को प्रभावित कर रही है।
न्यायालय के समक्ष मुख्य प्रश्न यह था कि क्या किसी व्यक्ति को अतीत की ऐसी घटनाओं से स्थायी रूप से जोड़े रखना उचित है, जिनका वर्तमान में कोई महत्वपूर्ण सार्वजनिक हित शेष नहीं रह गया है।
‘भूल जाने का अधिकार’ (RTBF) क्या है?
‘भूल जाने का अधिकार’ वह अधिकार है जिसके अंतर्गत कोई व्यक्ति यह मांग कर सकता है कि उसकी व्यक्तिगत जानकारी को:
- सार्वजनिक डिजिटल मंचों से हटाया जाए,
- खोज परिणामों में प्रदर्शित होने से रोका जाए,
- सीमित किया जाए,
- अथवा उसकी पहुँच को नियंत्रित किया जाए,
यदि वह जानकारी अब प्रासंगिक नहीं रह गई हो, पुरानी हो चुकी हो, या उसके सार्वजनिक बने रहने से व्यक्ति की निजता, प्रतिष्ठा और गरिमा पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा हो।
इस अधिकार का मूल उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि व्यक्ति अपने डिजिटल अस्तित्व और ऑनलाइन पहचान पर कुछ हद तक नियंत्रण बनाए रख सके।
भारत में RTBF का संवैधानिक विकास
- आर. राजगोपाल बनाम तमिलनाडु राज्य (1994)
इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने पहली बार व्यापक रूप से निजता के अधिकार को मान्यता प्रदान की। न्यायालय ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति को अपने निजी जीवन से संबंधित सूचनाओं को अनावश्यक सार्वजनिक हस्तक्षेप से सुरक्षित रखने का अधिकार प्राप्त है।
महत्व:
- निजता को संवैधानिक संरक्षण की दिशा में प्रारंभिक आधार मिला।
- व्यक्तिगत जानकारी पर व्यक्ति के नियंत्रण की अवधारणा विकसित हुई।
- के.एस. पुट्टस्वामी बनाम भारत संघ (2017)
यह भारतीय निजता न्यायशास्त्र का ऐतिहासिक निर्णय माना जाता है।
सर्वोच्च न्यायालय की नौ-न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने सर्वसम्मति से निर्णय दिया कि:
‘निजता का अधिकार भारतीय संविधान के अनुच्छेद 21 के अंतर्गत संरक्षित एक मौलिक अधिकार है।’
न्यायालय ने सूचनात्मक निजता (Informational Privacy) को भी मौलिक अधिकार का महत्वपूर्ण घटक माना।
महत्व:
- RTBF के संवैधानिक आधार को मजबूती मिली।
- व्यक्तिगत डेटा पर नियंत्रण की अवधारणा को संवैधानिक मान्यता प्राप्त हुई।
- जोरावर सिंह मुंडी बनाम भारत संघ (2021)
दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस मामले में एक व्यक्ति के पक्ष में निर्णय देते हुए सर्च इंजन से उसके दोषमुक्ति संबंधी निर्णय को डी-इंडेक्स करने की अनुमति प्रदान की।
महत्व:
- RTBF के व्यावहारिक अनुप्रयोग का प्रारंभिक उदाहरण।
- डिजिटल प्रतिष्ठा की रक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम।
अंतरराष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य
Google Spain बनाम AEPD (2014)
- यूरोपीय संघ के न्यायालय (CJEU) ने इस ऐतिहासिक मामले में निर्णय दिया कि सर्च इंजन ऑपरेटरों को कुछ परिस्थितियों में व्यक्तिगत जानकारी वाले लिंक हटाने पड़ सकते हैं।
- यदि जानकारी पुरानी, अप्रासंगिक या अत्यधिक हो चुकी हो तो व्यक्ति उसके हटाने की मांग कर सकता है। यह निर्णय वैश्विक स्तर पर RTBF की अवधारणा का आधार बना।
GDPR और ‘Right to Erasure’
यूरोपीय संघ के General Data Protection Regulation (GDPR) के अनुच्छेद 17 के अंतर्गत:
- व्यक्तियों को अपने डेटा को मिटाने (Erase) का अधिकार प्रदान किया गया।
- इसे ‘Right to Erasure’ या ‘Right to be Forgotten’ कहा जाता है।
‘Open Justice’ और गरिमा (Dignity) के बीच संतुलन
- अदालत ने कहा Open Justice का उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करना है। इसका अर्थ यह नहीं कि किसी व्यक्ति का नाम हमेशा इंटरनेट पर खोजा जा सके।
- न्यायिक निर्णय सार्वजनिक रहेंगे, लेकिन आवश्यक होने पर नाम छिपाए जा सकते हैं।
किन लोगों को लाभ मिलेगा?
- जिन व्यक्तियों को बरी (Acquitted) किया गया हो, आरोपमुक्त (Discharged) किया गया हो, या जिनके मामले रद्द (Quashed) अथवा समझौते (Settled) से समाप्त हुए हों,
- वे अपने मामलों के परिणामों को ऑनलाइन सही रूप में प्रदर्शित कराने का अधिकार रखते हैं।
दिल्ली उच्च न्यायालय के निर्णय के प्रमुख पहलू
- RTBF को मौलिक अधिकार का हिस्सा घोषित करना
न्यायालय ने कहा कि:
- व्यक्ति की गरिमा, प्रतिष्ठा और स्वायत्तता संविधान द्वारा संरक्षित हैं।
- इंटरनेट पर अनिश्चितकाल तक उपलब्ध जानकारी किसी व्यक्ति को जीवन भर दंडित नहीं कर सकती।
- इसलिए RTBF, अनुच्छेद 21 से उत्पन्न सूचनात्मक निजता का स्वाभाविक विस्तार है।
- डी–इंडेक्सिंग और डेटा हटाने में अंतर
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि:
डी–इंडेक्सिंग (De-indexing)
- व्यक्ति का नाम सर्च इंजन परिणामों से हटा दिया जाता है।
- सामान्य नाम-आधारित खोज के माध्यम से जानकारी उपलब्ध नहीं होती।
डेटा हटाना (Deletion)
- मूल दस्तावेज या अभिलेख पूरी तरह समाप्त कर दिए जाते हैं।
न्यायालय ने डी-इंडेक्सिंग को प्राथमिक उपाय माना क्योंकि इससे न्यायिक अभिलेख संरक्षित रहते हैं।
- न्यायिक अभिलेखों में पहचान छिपाने की व्यवस्था
उपयुक्त मामलों में न्यायालय नाम, पता, पहचान संबंधी विवरण, अन्य संवेदनशील सूचनाओं को सार्वजनिक दस्तावेजों से छिपाने (Masking) या संपादित (Redaction) करने का आदेश दे सकता है।
- ‘खुली न्याय प्रणाली’ और निजता के बीच संतुलन
भारतीय न्याय व्यवस्था Open Justice के सिद्धांत पर आधारित है, जिसके अनुसार न्यायिक कार्यवाही सार्वजनिक निरीक्षण के लिए खुली रहती है।
हालाँकि न्यायालय ने कहा:
- पारदर्शिता का अर्थ यह नहीं है कि किसी व्यक्ति की पहचान हमेशा इंटरनेट पर खोजी जा सके।
- न्यायिक निर्णय सार्वजनिक रह सकते हैं जबकि व्यक्तिगत पहचान को सीमित किया जा सकता है।
- राहत प्रदान करने के लिए परीक्षण
न्यायालय ने संकेत दिया कि निम्न कारकों पर विचार किया जाएगा:
- सूचना की प्रकृति,
- सार्वजनिक हित की उपस्थिति,
- जानकारी की वर्तमान प्रासंगिकता,
- व्यक्ति की प्रतिष्ठा पर प्रभाव,
- निजता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन।
- सर्च इंजन और कानूनी डेटाबेस की जिम्मेदारी
न्यायालय ने कहा कि:
- Google जैसे सर्च इंजन,
- कानूनी शोध मंच,
- डिजिटल डेटाबेस
को न्यायालय के आदेशों का पालन करते हुए नाम-आधारित खोजों को निष्क्रिय करना होगा।
निर्णय का व्यापक महत्व
- डिजिटल निजता की सुदृढ़ सुरक्षा: यह निर्णय नागरिकों को अपने डिजिटल डेटा और ऑनलाइन पहचान पर अधिक नियंत्रण प्रदान करता है।
- प्रतिष्ठा और गरिमा का संरक्षण: कई बार व्यक्ति कानूनी रूप से दोषमुक्त हो जाता है, लेकिन इंटरनेट पर उपलब्ध पुरानी जानकारी उसकी सामाजिक छवि को प्रभावित करती रहती है।
यह निर्णय ऐसी स्थायी प्रतिष्ठात्मक क्षति को कम करने का प्रयास करता है।
- डिजिटल युग की चुनौतियों का समाधान: इंटरनेट के युग में सूचना लगभग स्थायी हो जाती है।
न्यायालय ने स्वीकार किया कि ‘डिजिटल स्मृति’ (Digital Memory) और ‘मानवीय भूलने की क्षमता’ (Human Forgetfulness) के बीच संतुलन आवश्यक है।
- न्यायिक दिशानिर्देशों की स्थापना
भारत में RTBF पर अभी तक कोई समर्पित कानून मौजूद नहीं है।
ऐसी स्थिति में यह निर्णय:
- डी-इंडेक्सिंग,
- मास्किंग,
- ऑनलाइन गोपनीयता
के लिए विस्तृत न्यायिक मानक स्थापित करता है।
- प्रतिस्पर्धी संवैधानिक मूल्यों का संतुलन
यह निर्णय निम्न अधिकारों के बीच संतुलन स्थापित करने का प्रयास करता है:
- निजता का अधिकार
- अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता
- प्रेस की स्वतंत्रता
- सूचना का अधिकार
- न्यायिक पारदर्शिता
- भविष्य की डिजिटल नीतियों पर प्रभाव
यह निर्णय आगे चलकर:
- डेटा संरक्षण कानून,
- डिजिटल प्लेटफॉर्म की जवाबदेही,
- ऑनलाइन प्रतिष्ठा प्रबंधन,
- कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डेटा उपयोग,
- नागरिकों के डिजिटल अधिकार
से संबंधित नीतियों और न्यायिक निर्णयों को प्रभावित कर सकता है।
अपवाद (Exemptions)
RTBF पूर्ण (Absolute) अधिकार नहीं है। निम्न मामलों में राहत नहीं दी जा सकती:
- महिलाओं या बच्चों के विरुद्ध अपराध,
- सार्वजनिक विश्वास (Public Trust) के उल्लंघन से जुड़े अपराध,
- लोक सेवकों, निर्वाचित प्रतिनिधियों या फिड्यूशरी पदों पर बैठे व्यक्तियों से संबंधित गंभीर मामले।
निष्कर्ष
दिल्ली उच्च न्यायालय का यह निर्णय भारतीय संवैधानिक और डिजिटल अधिकार न्यायशास्त्र में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर है। यह स्पष्ट करता है कि डिजिटल युग में किसी व्यक्ति की निजता, प्रतिष्ठा और गरिमा को अनिश्चितकाल तक ऑनलाइन उपलब्ध सूचनाओं के कारण क्षति नहीं पहुंचाई जा सकती। साथ ही न्यायालय ने यह भी सुनिश्चित किया है कि पारदर्शिता और न्याय तक सार्वजनिक पहुंच के सिद्धांतों से समझौता किए बिना व्यक्तिगत अधिकारों की प्रभावी सुरक्षा की जा सके। यह निर्णय भारत में उभरते हुए डिजिटल अधिकार ढाँचे को नई दिशा प्रदान करता है।
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