वैश्विक सर्वसामान्य (Global Commons) अंतरराष्ट्रीय राजनीति और अंतरराष्ट्रीय कानून की एक महत्वपूर्ण अवधारणा है, जो उन भौगोलिक क्षेत्रों, संसाधनों और प्रणालियों को संदर्भित करती है जो किसी एक राष्ट्र-राज्य की संप्रभुता या राष्ट्रीय अधिकार-क्षेत्र (national jurisdiction) से बाहर स्थित हैं तथा सिद्धांततः सभी राष्ट्रों और मानवता के साझा उपयोग व लाभ के लिए उपलब्ध हैं। इन्हें “सामान्य संसाधन क्षेत्र” (common-pool resource domains) भी कहा जाता है, क्योंकि इन पर किसी एक देश का स्वामित्व या नियंत्रण नहीं होता, बल्कि इनके प्रबंधन के लिए सामूहिक एवं सहयोगात्मक अंतरराष्ट्रीय शासन व्यवस्था (governance) आवश्यक होती है।
अंतरराष्ट्रीय कानून परंपरागत रूप से चार वैश्विक सर्वसामान्य क्षेत्रों को मान्यता देता है-
1- उच्च सागर (High Seas)
2- वायुमंडल (Atmosphere)
3- अंटार्कटिका (Antarctica)
4- बाह्य अंतरिक्ष (Outer Space)
हाल के वर्षों में विद्वानों और नीति-निर्माताओं द्वारा साइबर स्पेस (Cyberspace) को भी एक उभरते हुए पाँचवें वैश्विक सर्वसामान्य के रूप में चर्चा में लाया गया है, यद्यपि इसकी कानूनी स्थिति अभी पूर्णतः स्थापित नहीं है।
मानवता की साझा विरासत:
वैश्विक सर्वसामान्य की अवधारणा का सैद्धांतिक आधार “मानवता की साझा विरासत” के सिद्धांत में निहित है। इस सिद्धांत के अनुसार कुछ क्षेत्र और संसाधन किसी एक राष्ट्र की संपत्ति न होकर समस्त मानव जाति, वर्तमान और भावी पीढ़ियों दोनों की साझा धरोहर हैं।
इस सिद्धांत के चार प्रमुख तत्व माने जाते हैं —
(i) गैर-विनियोजन (non-appropriation) अर्थात कोई भी राष्ट्र इस पर संप्रभु दावा नहीं कर सकता,
(ii) साझा प्रबंधन (shared management) सभी राष्ट्रों द्वारा,
(iii) लाभ-साझाकरण (benefit-sharing), विशेषतः विकासशील देशों के साथ,
(iv) केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए उपयोग।

1- उच्च सागर (High Seas)
उच्च सागर पृथ्वी की सतह के लगभग आधे भाग को कवर करता है और यह सबसे बड़ा वैश्विक सर्वसामान्य क्षेत्र है। 1982 के संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (UNCLOS) के अंतर्गत इसे विनियमित किया जाता है, जो “मुक्त सागर” (mare liberum) के सिद्धांत पर आधारित है अर्थात सभी राष्ट्रों को नौवहन, मत्स्यन और वैज्ञानिक अनुसंधान की स्वतंत्रता प्राप्त है। गहरे समुद्र तल (deep seabed) तथा उसके खनिज संसाधनों के प्रबंधन हेतु अंतरराष्ट्रीय समुद्र-तल प्राधिकरण की स्थापना की गई है।
राष्ट्रीय अधिकार-क्षेत्र से परे जैव-विविधता (BBNJ) के संरक्षण हेतु एक महत्वपूर्ण नया कानूनी ढाँचा ‘हाई सीज़ ट्रीटी’ के रूप में सामने आया है। यह संधि UNCLOS के अंतर्गत एक कार्यान्वयन समझौते के रूप में 19 जून 2023 को संयुक्त राष्ट्र द्वारा सर्वसम्मति से अपनाई गई थी। आवश्यक 60 अनुसमर्थनों की सीमा सितंबर 2025 में पूर्ण हुई और यह संधि 17 जनवरी 2026 को औपचारिक रूप से प्रभावी हो गई।
2- वायुमंडल (Atmosphere)
वायुमंडल को एक वैश्विक सर्वसामान्य के रूप में मुख्यतः जलवायु परिवर्तन और ओज़ोन परत क्षरण जैसी वैश्विक पर्यावरणीय समस्याओं के संदर्भ में देखा जाता है। चूँकि ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का प्रभाव सीमाओं से परे जाकर समूचे विश्व को प्रभावित करता है, इसलिए इसके प्रबंधन हेतु बहुपक्षीय सहयोग आवश्यक है। 1992 का जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क समझौता (UNFCCC), 1997 का क्योटो प्रोटोकॉल, तथा 2015 का पेरिस समझौता इस दिशा में प्रमुख प्रयास हैं। वायुमंडल को चारों वैश्विक सर्वसामान्य में सबसे कम प्रभावी ढंग से विनियमित माना जाता है, क्योंकि इसके लिए कोई एकीकृत, सशक्त प्रवर्तन तंत्र (enforcement mechanism) उपलब्ध नहीं है।
3- अंटार्कटिका (Antarctica)
अंटार्कटिका को वैश्विक सर्वसामान्य का सबसे सुसंगत और सफल उदाहरण माना जाता है। 1959 की अंटार्कटिक संधि पर मूलतः 12 देशों ने हस्ताक्षर किए थे, जिसने इस महाद्वीप को केवल शांतिपूर्ण एवं वैज्ञानिक उद्देश्यों के लिए सुरक्षित रखा तथा सभी प्रकार के सैन्य उपयोग, परमाणु परीक्षण व क्षेत्रीय दावों को निलंबित कर दिया। 1991 के मैड्रिड प्रोटोकॉल ने पर्यावरण संरक्षण को और सुदृढ़ करते हुए वर्ष 2048 तक खनन गतिविधियों पर रोक लगा दी।
4- बाह्य अंतरिक्ष (Outer Space)
1967 की बाह्य अंतरिक्ष संधि अंतरिक्ष शासन का मूल आधार है। इसके अनुसार बाह्य अंतरिक्ष, चंद्रमा और अन्य खगोलीय पिंड किसी भी राष्ट्रीय विनियोजन के अधीन नहीं हो सकते, इनका उपयोग केवल शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए होगा, तथा अंतरिक्ष में सामूहिक विनाश के हथियार तैनात करने पर प्रतिबंध है। हालाँकि, बाह्य अंतरिक्ष को “वैश्विक सर्वसामान्य” के रूप में स्वीकार करने पर अंतरराष्ट्रीय सहमति पूर्ण नहीं है, विशेषतः संयुक्त राज्य अमेरिका ने वर्ष 2020 के एक कार्यकारी आदेश में स्पष्ट रूप से इस अवधारणा को अस्वीकार किया था, जो वाणिज्यिक अंतरिक्ष संसाधन दोहन की बढ़ती संभावनाओं के समय आया।
5- साइबर स्पेस: उभरता हुआ पाँचवाँ वैश्विक सर्वसामान्य?
परंपरागत चार क्षेत्रों के अतिरिक्त, विद्वानों के एक वर्ग द्वारा साइबर स्पेस को भी वैश्विक सर्वसामान्य की श्रेणी में रखने पर बहस चल रही है। साइबर स्पेस की विशेषता यह है कि यह मानव-निर्मित है (अन्य चारों के विपरीत जो प्राकृतिक हैं), और इस पर राष्ट्रीय बुनियादी ढाँचे (servers, cables) के माध्यम से आंशिक राष्ट्रीय नियंत्रण भी संभव है। इस कारण इसकी “वास्तविक सर्वसामान्य” की स्थिति विवादास्पद बनी हुई है। फिर भी, साइबर सुरक्षा, डेटा शासन और इंटरनेट गवर्नेंस से जुड़े वैश्विक मुद्दे इसे अंतरराष्ट्रीय राजनीति के अध्ययन में एक महत्वपूर्ण उभरता आयाम बनाते हैं।
सैद्धांतिक ढाँचा:
वैश्विक सर्वसामान्य की राजनीतिक-सैद्धांतिक चर्चा में पारिस्थितिकीविद् गैरेट हार्डिन (Garrett Hardin) के 1968 के प्रसिद्ध निबंध “The Tragedy of the Commons” का केंद्रीय स्थान है। हार्डिन का तर्क था कि जब कोई संसाधन साझा रूप से सबके लिए खुला होता है और उस पर कोई विनियमन नहीं होता, तो प्रत्येक उपयोगकर्ता अपने व्यक्तिगत हित में अधिकतम दोहन करता है, जिसके परिणामस्वरूप संसाधन का अतिशोषण और अंततः क्षरण होता है भले ही यह सामूहिक हित के विरुद्ध हो।
इस “त्रासदी” से बचने हेतु अंतरराष्ट्रीय संबंधों में मुख्यतः तीन दृष्टिकोण प्रस्तावित किए गए हैं:
(a) संप्रभुता-आधारित समाधान (Privatization/Sovereignty): संसाधन को राष्ट्रीय या निजी स्वामित्व में विभाजित करना, ताकि स्वामी को संरक्षण का प्रोत्साहन मिले।
(b) केंद्रीकृत वैश्विक प्राधिकरण (Global/Leviathan Solution): एक सशक्त अंतरराष्ट्रीय संस्था द्वारा नियमन व प्रवर्तन, जैसे अंतरराष्ट्रीय समुद्र-तल प्राधिकरण।
(c) सहकारी स्व-शासन (Polycentric/Cooperative Governance): एलिनोर ओस्ट्रोम द्वारा प्रस्तावित मॉडल, जिसमें समुदाय आपसी सहयोग व स्थानीय नियमों के माध्यम से साझा संसाधनों का प्रबंधन करते हैं, बिना पूर्ण निजीकरण या केंद्रीकरण के।
एलिनोर ओस्ट्रोम को इसी कार्य हेतु 2009 में अर्थशास्त्र का नोबेल पुरस्कार प्रदान किया गया था, क्योंकि उन्होंने प्रयोगसिद्ध रूप से दर्शाया कि सामूहिक कार्य-प्रणाली के माध्यम से साझा संसाधनों का सतत प्रबंधन संभव है, बिना अनिवार्यतः निजीकरण अथवा राज्य-नियंत्रण के।

भारत का दृष्टिकोण
- भारत वैश्विक सर्वसामान्य शासन में एक सक्रिय भागीदार रहा है। भारत ने UNCLOS की पुष्टि की है तथा अंतरराष्ट्रीय समुद्र-तल प्राधिकरण के अंतर्गत हिंद महासागर में पॉलीमेटैलिक नोड्यूल्स की खोज हेतु अन्वेषण क्षेत्र प्राप्त किया है।
- अंटार्कटिका में भारत के दो स्थायी अनुसंधान केंद्र हैं ; मैत्री और भारती और भारत अंटार्कटिक संधि प्रणाली का सक्रिय सदस्य है।
- अंतरिक्ष के क्षेत्र में, भारत बाह्य अंतरिक्ष संधि (1967) का हस्ताक्षरकर्ता है तथा इसरो के माध्यम से शांतिपूर्ण अंतरिक्ष अन्वेषण को बढ़ावा देता रहा है।
- साथ ही जलवायु वार्ताओं में भारत “साझा परंतु विभेदित उत्तरदायित्व” के सिद्धांत का दृढ़ता से समर्थन करता रहा है, जो विकसित व विकासशील देशों के बीच ऐतिहासिक उत्सर्जन-दायित्व के अंतर को मान्यता देता है।
निष्कर्ष:
वैश्विक सर्वसामान्य की अवधारणा अंतरराष्ट्रीय राजनीति में संप्रभुता, सहयोग और सतत विकास के बीच के जटिल संबंधों को उजागर करती है। जलवायु परिवर्तन, समुद्री संसाधनों के दोहन और अंतरिक्ष की बढ़ती वाणिज्यिक गतिविधियों के युग में, इन साझा क्षेत्रों के प्रभावी एवं न्यायसंगत प्रबंधन की आवश्यकता पहले से कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
UGC NET PYQ
निम्नलिखित में कौनसा एक “पाँच वैश्विक सर्वसामान्यों” (Five Global Commons) का हिस्सा नहीं है?
(a) हाई सीज
(b) जलवायु व्यवस्था
(c) गहन सागर तल
(d) उत्तर-ध्रुवीय क्षेत्र
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