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ब्रिटेन में क्या लिखित संविधान होना चाहिए?

ब्रिटेन दुनिया के उन बहुत कम लोकतांत्रिक देशों में शामिल है जिनके पास एक भी संहिताबद्ध, लिखित संविधान दस्तावेज़ नहीं है। इसके स्थान पर वहाँ की शासन व्यवस्था सदियों से विकसित परंपराओं, संसदीय अधिनियमों, न्यायिक निर्णयों और अलिखित परिपाटियों (conventions) के जटिल जाल पर टिकी है। यह बहस नई नहीं है, लेकिन हाल में ब्रिटेन के नए प्रधानमंत्री एंडी बर्नहम ने इसे फिर से राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया है। ग्रेटर मैनचेस्टर के पूर्व मेयर रहे बर्नहम ने प्रधानमंत्री बनने के बाद अपनी विकेंद्रीकरण (devolution) योजनाओं की घोषणा करते हुए कहा कि क्षेत्रीय मेयरों को अधिक वित्तीय स्वायत्तता देने का उनका प्रस्ताव ही यह दर्शाता है कि ब्रिटेन को एक नए, संहिताबद्ध संवैधानिक ढांचे की आवश्यकता है। उनका मानना है कि ब्रिटेन की “पुरातन” राजनीतिक व्यवस्था में सुधार आवश्यक है यदि देश के सभी हिस्सों में समान अवसर सुनिश्चित करना है।

ब्रिटिश संविधान की वर्तमान संरचना: यह “अलिखित” है या “असंहिताबद्ध”?

  • यह समझना आवश्यक है कि ब्रिटेन का संविधान पूर्णतः अलिखित नहीं है, बल्कि “असंहिताबद्ध” (uncodified) है। इसका अर्थ यह है कि अमेरिका या भारत की तरह वहाँ एक ही दस्तावेज़ में समस्त संवैधानिक सिद्धांत संकलित नहीं हैं। इसके स्थान पर यह व्यवस्था कई स्रोतों से मिलकर बनी है:
  • संसदीय अधिनियम जैसे मैग्ना कार्टा, बिल ऑफ राइट्स, ह्यूमन राइट्स एक्ट और स्कॉटलैंड एक्ट जैसे कानून, जो लिखित रूप में मौजूद हैं
  • न्यायिक निर्णय और सामान्य विधि (common law) के सिद्धांत
  • राजनीतिक परिपाटियाँ (conventions), जैसे यह अलिखित नियम कि सम्राट संसद की सलाह पर ही कार्य करेंगे

संधियाँ और अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताएँ

इस पूरी व्यवस्था के केंद्र में एक अलिखित लेकिन सर्वमान्य सिद्धांत है, संसदीय सर्वोच्चता (parliamentary sovereignty), जिसके अनुसार संसद किसी भी कानून को बना या बदल सकती है और कोई भी पूर्व संसद वर्तमान संसद को बाध्य नहीं कर सकती।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: बहस कब शुरू हुई?

ब्रिटेन में संहिताबद्ध संविधान की माँग सर्वथा नई नहीं है। इस विचार को गति देने में लेबर पार्टी के पूर्व प्रधानमंत्री गॉर्डन ब्राउन की भूमिका उल्लेखनीय रही है, जो इस सुधार के शुरुआती समर्थकों में शामिल थे। बर्नहम स्वयं ब्राउन सरकार में मंत्री रह चुके हैं, जिससे यह वैचारिक निरंतरता स्पष्ट होती है। वर्ष 2015 में एक संसदीय समिति ने पाँच वर्षों तक चली समीक्षा के बाद यह निष्कर्ष दिया था कि संविधान को संहिताबद्ध करने पर कोई स्पष्ट राजनीतिक सहमति नहीं बन पाई है।

इसके बाद 1997 की टोनी ब्लेयर सरकार के दौर में हुए बड़े संवैधानिक सुधार, जैसे स्कॉटलैंड और वेल्स को विकेंद्रीकरण देना और मानवाधिकार अधिनियम लागू करना, इस बात के उदाहरण बने कि असंहिताबद्ध व्यवस्था के भीतर भी बड़े बदलाव संभव हैं। इसके विपरीत ब्रेक्ज़िट (2016 से आगे) के दौर ने संसद, सरकार और न्यायपालिका के अधिकारों की सीमाओं पर गहरे प्रश्न खड़े कर दिए, जिससे संहिताकरण की माँग को नई प्रासंगिकता मिली।

एंडी बर्नहम का वर्तमान प्रस्ताव

  • बर्नहम ने अपनी 2024 की पुस्तक “हेड नॉर्थ” में, जो लिवरपूल सिटी रीजन के मेयर स्टीव रॉदरम के साथ सह-लिखित थी, पहली बार इस विचार को सार्वजनिक रूप से रखा था। प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्होंने इसे ठोस नीतिगत दिशा में आगे बढ़ाया है। उनकी योजनाओं में शामिल हैं:
  • क्षेत्रीय मेयरों को 2028 तक स्थानीय आय कर का एक हिस्सा अपने पास रखने और क्षेत्र में खर्च करने का अधिकार देना
  • वेस्टमिंस्टर से सत्ता को उत्तरी इंग्लैंड की ओर स्थानांतरित करने के प्रतीक के रूप में “नंबर 10 नॉर्थ” नामक एक वैकल्पिक कार्यालय स्थापित करना
  • इंग्लैंड, वेल्स, स्कॉटलैंड और उत्तरी आयरलैंड के लिए एक समान, संहिताबद्ध विकेंद्रीकरण मॉडल तैयार करना
  • बर्नहम का तर्क है कि जब देश की संरचना ही इतने मौलिक रूप से बदल रही है, तो एक नई संवैधानिक व्यवस्था की आवश्यकता स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है।
  • उनका कहना है कि यह “हर पोस्टकोड में समान अच्छे विकास” की प्रतिबद्धता से जुड़ा है और यह केवल एक आकर्षक नारा नहीं है। हालाँकि उन्होंने इस ऐतिहासिक परिवर्तन को लागू करने की कोई समय-सीमा नहीं बताई है।

संहिताबद्ध संविधान के पक्ष में तर्क

1. स्पष्टता और जन-सुगमता

असंहिताबद्ध व्यवस्था की सबसे बड़ी आलोचना यह है कि यह सामान्य नागरिक के लिए भ्रामक और दुरूह है। जब संवैधानिक नियम एक ही स्थान पर संकलित नहीं होते, तो नागरिकों के लिए यह समझना कठिन हो जाता है कि सरकार कब अपनी सीमाएँ लांघ रही है। एक संहिताबद्ध दस्तावेज़ नागरिकों को अपने अधिकारों का दावा करने के लिए एक ठोस, संदर्भनीय आधार देता है।

2. सरकार की सत्ता पर सीमा

समर्थकों का मानना है कि उद्देश्य ही सरकार की शक्ति को सीमित करना है। असंहिताबद्ध व्यवस्था में सरकार स्वयं अपनी शक्तियों को व्याख्यायित या परिवर्तित कर सकती है, जबकि लिखित संविधान में सरकार स्वयं उस दस्तावेज़ के अधीन होती है, न कि दस्तावेज़ सरकार के अधीन।

3. मौलिक अधिकारों की मजबूत सुरक्षा

एक संहिताबद्ध संविधान नागरिक, राजनीतिक, सामाजिक और पर्यावरणीय अधिकारों को अधिक स्थायी और न्यायसंगत सुरक्षा दे सकता है, विशेष रूप से अभिव्यक्ति और प्रदर्शन की स्वतंत्रता को सरकारी हस्तक्षेप से बचाकर।

4. बदलते ब्रिटेन के अनुकूल ढांचा

बर्नहम जैसे समर्थकों का विशेष तर्क यह है कि जब विकेंद्रीकरण के माध्यम से इंग्लैंड, स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड के बीच सत्ता-संबंध पहले से बदल रहे हैं, तो इसे एक स्पष्ट, संहिताबद्ध रूप देना अनिवार्य हो जाता है, अन्यथा यह असमानता और भ्रम को और बढ़ा सकता है।

संहिताबद्ध संविधान के विरुद्ध तर्क

1. संसदीय सर्वोच्चता को खतरा

सबसे मजबूत विरोध यह है कि लिखित संविधान संसदीय सर्वोच्चता के मूल सिद्धांत को चुनौती देगा, क्योंकि यह भविष्य की संसदों को बाध्य करेगा। ब्रिटिश राजनीतिक परंपरा में यह सिद्धांत केंद्रीय स्तंभ माना जाता रहा है।

2. न्यायपालिका के अनावश्यक राजनीतिकरण का खतरा

आलोचकों का तर्क है कि लिखित संविधान अनिर्वाचित न्यायाधीशों के हाथ में अत्यधिक शक्ति दे देगा, जिससे वे राजनीतिक विवादों में निर्णायक भूमिका निभाने लगेंगे, जैसा अमेरिका में सुप्रीम कोर्ट के साथ देखा जाता है।

3. लचीलेपन की हानि

असंहिताबद्ध व्यवस्था की एक बड़ी शक्ति उसका लचीलापन है। यह तेज़ी से बदलती परिस्थितियों, जैसे आपातकाल या सुरक्षा संकट, के अनुसार त्वरित प्रतिक्रिया देने में सक्षम है। 1997 के बाद के विकेंद्रीकरण सुधार इसका उदाहरण हैं कि बड़े परिवर्तन बिना संहिताकरण के भी संभव हुए।

4. “अगर टूटा नहीं तो सुधारो क्यों” का तर्क

कई विश्लेषकों का मानना है कि ब्रिटेन की मौजूदा व्यवस्था ने सदियों से स्थिर सरकार, लोकतंत्र, पारदर्शिता और सामाजिक कल्याण प्रदान किया है। ऐसे में इसे बदलने का जोखिम लेना अनावश्यक है।

5. लिखित संविधान भी अत्याचार से पूर्ण सुरक्षा नहीं देता

यह तर्क भी दिया जाता है कि एक लिखित दस्तावेज़ स्वयं में तानाशाही या अधिनायकवाद से सुरक्षा की गारंटी नहीं है। इसका उल्लेख अक्सर उन ऐतिहासिक उदाहरणों के साथ किया जाता है जहाँ औपचारिक कानूनी प्रक्रियाओं का पालन करते हुए भी मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ।

6. जनता की उदासीनता

यह भी कहा जाता है कि संहिताकरण के लिए जन-माँग स्वयं सीमित है, और इस पर राजनीतिक सहमति बनाना अत्यंत कठिन है क्योंकि इस बारे में कोई स्पष्ट आम सहमति नहीं है कि नए संविधान में क्या शामिल होना चाहिए।

ब्रेक्ज़िट का अनुभव: क्या लिखित संविधान समाधान होता?

यह ध्यान देने योग्य है कि विश्लेषकों में इस बात पर भी असहमति है कि क्या एक लिखित संविधान ब्रेक्ज़िट के दौरान उत्पन्न हुए संवैधानिक विवादों, जैसे संसद के निलंबन (prorogation) से जुड़ा मामला, को सुलझाने में सक्षम होता। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि लिखित दस्तावेज़ केवल संस्थाओं की भूमिका स्पष्ट करता, लेकिन आधुनिकीकरण की गारंटी नहीं देता। एक संहिताबद्ध संविधान अनिवार्य रूप से एक “आधुनिक” संविधान नहीं होता, यह पुरानी व्यवस्था को भी संहिताबद्ध रूप में स्थिर कर सकता है।

जनमत की स्थिति

पिछले वर्षों में हुए एक सर्वेक्षण में यह पाया गया था कि लगभग 44 प्रतिशत ब्रिटिश नागरिक लिखित संविधान के पक्ष में थे, जबकि 39 प्रतिशत इसके विरुद्ध, और बाकी अनिर्णीत थे। यह आँकड़ा दर्शाता है कि जनमत विभाजित है, स्पष्ट बहुमत की कमी इस सुधार के मार्ग की एक बड़ी बाधा रही है।

बर्नहम के प्रस्ताव का महत्व और आगे की चुनौतियाँ

बर्नहम का प्रस्ताव इस बहस को दो नए आयाम देता है:

  • संघीय ढांचे की ओर संकेत: बर्नहम ने यह भी कहा है कि ब्रिटेन को अस्तित्व बनाए रखने के लिए अधिक संघीय स्वरूप अपनाना होगा, जैसा यूरोप के कई देशों में देखा जाता है।
  • समान न्यूनतम मानकों की माँग: उनका तर्क है कि देश के सभी भागों में जीवन स्तर, कनेक्टिविटी और बुनियादी सुविधाओं के समान न्यूनतम मानक तय होने चाहिए, और यही एक भविष्य के संविधान की “आधारशिला” बन सकती है।

फिर भी विश्लेषक यह भी चेतावनी देते हैं कि विकेंद्रीकरण का उपयोग सरकार द्वारा अपनी जिम्मेदारियों को क्षेत्रों पर डालने के औजार के रूप में भी हो सकता है, जैसा पूर्व में कुछ स्थानीयकरण नीतियों में देखा गया जहाँ जिम्मेदारी उन क्षेत्रों पर डाल दी गई जो उसे उठाने में सक्षम नहीं थे। इस दृष्टि से बर्नहम की योजना पर यह उत्तरदायित्व है कि वह वास्तविक शक्ति-हस्तांतरण करे, न कि केवल जिम्मेदारियों का हस्तांतरण।

यह भी स्पष्ट है कि किसी भी गंभीर संहिताकरण प्रक्रिया में वर्षों लगेंगे, जिसमें व्यापक सार्वजनिक जांच और सलाह-मशविरा आवश्यक होगा। ऐतिहासिक रूप से देखा गया है कि अधिकांश देशों ने लिखित संविधान किसी बड़ी क्रांति, युद्ध या शासन-परिवर्तन के बाद अपनाया, ताकि पूर्व व्यवस्था से स्पष्ट विदाई का संकेत दिया जा सके। ब्रिटेन के पास ऐसा कोई निर्णायक क्षण अभी नहीं है, जिससे यह प्रश्न उठता है कि क्या क्रमिक विकेंद्रीकरण अकेले इस स्तर के परिवर्तन के लिए पर्याप्त प्रेरक शक्ति बन सकता है।

निष्कर्ष

ब्रिटेन में लिखित संविधान की बहस केवल एक कानूनी या तकनीकी प्रश्न नहीं, बल्कि यह राष्ट्रीय पहचान, सत्ता के केंद्रीकरण-विकेंद्रीकरण और लोकतांत्रिक जवाबदेही से जुड़ा गहरा वैचारिक प्रश्न है। एंडी बर्नहम का हस्तक्षेप इस पुरानी बहस को नई राजनीतिक ऊर्जा देता है, विशेष रूप से इसलिए कि यह विकेंद्रीकरण की ठोस नीतिगत पहल से जुड़ा हुआ है, न कि केवल सैद्धांतिक विमर्श। फिर भी यह देखना बाकी है कि क्या यह प्रस्ताव संसद और जनमत में पर्याप्त समर्थन जुटा पाएगा, या यह भी उस लंबी सूची में शामिल हो जाएगा जिसमें संहिताकरण के प्रस्ताव उठते हैं, चर्चित होते हैं, और फिर बिना किसी ठोस परिणाम के विलीन हो जाते हैं। जो निश्चित है वह यह है कि जैसे-जैसे ब्रिटेन का संघीय स्वरूप वास्तविकता में बदलता जाएगा, इस प्रश्न से बचना कठिन होता जाएगा कि क्या असंहिताबद्ध व्यवस्था एक बदलते हुए, अधिक विकेंद्रीकृत ब्रिटेन की जटिलताओं को संभालने में सक्षम रह पाएगी।

ब्रिटिश संविधान के विकास की टाइमलाइन 

  1. 1215, मैग्ना कार्टा — राजा जॉन को बैरनों के दबाव में यह दस्तावेज़ स्वीकार करना पड़ा, जिसने पहली बार यह सिद्धांत स्थापित किया कि राजा की शक्ति भी कानून के अधीन है।
  2. 1689, अधिकार पत्र (Bill of Rights) — गौरवशाली क्रांति के बाद पारित इस अधिनियम ने संसद की शक्तियों को मजबूत किया और राजा की मनमानी सत्ता पर रोक लगाई, जिससे संवैधानिक राजतंत्र की नींव पड़ी।
  3. 1701, उत्तराधिकार अधिनियम (Act of Settlement) — इसने राजसिंहासन के उत्तराधिकार को नियंत्रित किया और न्यायाधीशों की स्वतंत्रता को सुरक्षित किया, जिससे न्यायपालिका की स्वायत्तता को बल मिला।
  4. 1707, संघ अधिनियम (Act of Union) — इंग्लैंड और स्कॉटलैंड की संसदों का विलय करके ग्रेट ब्रिटेन का निर्माण हुआ, जो आधुनिक यूनाइटेड किंगडम की संरचनात्मक शुरुआत मानी जाती है।
  5. 1832 से 1928 तक, सुधार अधिनियम (Reform Acts) — कई चरणों में मताधिकार का क्रमिक विस्तार हुआ, जिसमें अंततः महिलाओं को भी पुरुषों के समान मताधिकार मिला, जिससे लोकतांत्रिक भागीदारी व्यापक हुई।
  6. 1911 और 1949, संसद अधिनियम (Parliament Acts) — इन अधिनियमों ने हाउस ऑफ लॉर्ड्स की शक्तियों को सीमित किया और हाउस ऑफ कॉमन्स की प्रधानता को स्पष्ट रूप से स्थापित किया।
  7. 1972, यूरोपीय समुदाय अधिनियम (European Communities Act) — इसके माध्यम से ब्रिटेन यूरोपीय आर्थिक समुदाय में शामिल हुआ, जिससे यूरोपीय कानून का ब्रिटिश व्यवस्था पर सीधा प्रभाव शुरू हुआ।
  8. 1998, मानवाधिकार अधिनियम और विकेंद्रीकरण (Human Rights Act एवं Scotland, Wales व Northern Ireland Acts) — टोनी ब्लेयर सरकार के इस दौर में यूरोपीय मानवाधिकार अभिसमय को घरेलू कानून में शामिल किया गया, साथ ही स्कॉटलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड को अपनी विधानसभाएँ मिलीं।
  9. 2005, संवैधानिक सुधार अधिनियम (Constitutional Reform Act) — इसने सुप्रीम कोर्ट की स्थापना की और लॉर्ड चांसलर की भूमिका में बदलाव करते हुए न्यायपालिका को कार्यपालिका से और अधिक अलग किया।
  10. 2016 से 2020, ब्रेक्ज़िट प्रक्रिया — जनमत संग्रह के बाद यूरोपीय संघ से बाहर निकलने की प्रक्रिया ने संसद, सरकार और न्यायपालिका की शक्तियों की सीमाओं को लेकर गहरे संवैधानिक विवाद उत्पन्न किए, जिससे संहिताकरण की बहस को नई प्रासंगिकता मिली।

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