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संयुक्त राष्ट्र का घटता प्रभाव और भारत के उदय की नई चुनौतियाँ

वैश्विक व्यवस्था में एक विरोधाभासी स्थिति उभर रही है। एक ओर भारत आर्थिक, सामरिक और कूटनीतिक शक्ति के रूप में निरंतर ऊँचाई की ओर बढ़ रहा है, दूसरी ओर वह संस्था जिसने बीसवीं सदी के बाद की विश्व व्यवस्था को आकार दिया, अर्थात संयुक्त राष्ट्र, अपनी विश्वसनीयता और प्रभाव दोनों खोती जा रही है। यह स्थिति केवल एक संस्थागत संकट नहीं है बल्कि उन उभरती शक्तियों के लिए भी एक गंभीर रणनीतिक प्रश्न है जो नियम आधारित व्यवस्था की स्थिरता पर अपनी दीर्घकालिक योजनाएँ टिकाती हैं। भारत जैसे देश के लिए यह पहेली विशेष रूप से जटिल है क्योंकि उसकी आकांक्षाएँ जितनी बड़ी हैं, वैश्विक संस्थाओं की साख उतनी ही कमजोर होती दिख रही है।

भरोसे का संकट और एकपक्षीय बाध्यकारी उपाय

वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में सबसे गहरी चोट भरोसे पर पड़ी है। जब बड़ी शक्तियाँ एकपक्षीय दबाव के उपाय अपनाती हैं, तो वे रोज़मर्रा के अंतरराष्ट्रीय व्यापार को भी अनिश्चितता से भर देती हैं। इसका सीधा प्रभाव उन देशों की कंपनियों पर पड़ता है जो अंतरराष्ट्रीय अनुबंधों पर निर्भर करते हैं।

इस अनिश्चितता के व्यावहारिक परिणाम कई रूपों में सामने आते हैं:

  • किसी भारतीय कंपनी को यह भरोसा नहीं रहता कि विदेशी अदालत में उसका मुकदमा निष्पक्ष ढंग से सुना जाएगा
  • कोई विदेशी बैंक भुगतान स्वीकार करने से मना कर सकता है, भले ही सारी प्रक्रिया वैध रूप से पूरी की गई हो
  • बीमा कंपनियाँ माल की क्षति की भरपाई से इनकार कर सकती हैं, जिससे व्यापारिक जोखिम असमान रूप से बढ़ जाता है

इस तरह के हस्तक्षेप शक्तिशाली देशों को यह अवसर देते हैं कि वे अपने राष्ट्रीय अधिकार क्षेत्र की सीमाओं को पार करते हुए, बिना किसी वैश्विक प्राधिकरण के, दूसरे देशों के व्यापार और वित्तीय प्रवाह को प्रभावित करें। दुर्भाग्य से इसका सबसे अधिक बोझ महत्वाकांक्षी परन्तु सीमित संसाधनों वाले देशों पर पड़ता है, जो न तो इस प्रकार के दबाव का प्रतिकार करने की क्षमता रखते हैं और न ही इसकी भरपाई कर सकते हैं।

विश्व का विभाजित होता आर्थिक और तकनीकी ढांचा

वैश्वीकरण के दौर में जिस अंतरनिर्भरता को शक्ति का स्रोत माना जाता था, वही अब हथियार के रूप में इस्तेमाल की जा रही है। वित्तीय और तकनीकी प्रणालियाँ, जो पहले सबके लिए साझा मंच थीं, अब प्रतिस्पर्धी गुटों में विभाजित होती जा रही हैं।

इस विभाजन के भारत के लिए दो पहलू हैं। एक ओर यह भारतीय व्यवसायों को नए अवसर प्रदान कर सकता है, विशेष रूप से तब जब बड़ी अर्थव्यवस्थाएँ आपूर्ति श्रृंखला के विविधीकरण की तलाश में हैं। दूसरी ओर, यह भारत को इस दबाव में डाल सकता है कि वह किसी एक तकनीकी या वित्तीय खेमे को चुने, जिससे मुक्त और बहुपक्षीय व्यापार करने की उसकी स्वतंत्रता सीमित हो जाएगी। एक बड़ी अर्थव्यवस्था होने से यह जोखिम स्वतः समाप्त नहीं होता, बल्कि उसका उचित प्रबंधन आवश्यक होता है।

सुरक्षा परिषद का पक्षाघात और महासभा की सीमाएँ

संयुक्त राष्ट्र का मूल्य आज भी बना हुआ है, विशेष रूप से तब जब सुरक्षा परिषद स्वयं गतिरोध का शिकार हो चुकी है। सार्वभौमिक सदस्यता के कारण महासभा में छोटे देशों को भी अपनी बात कहने का अवसर मिलता है, भले ही उनके पास किसी बड़ी शक्ति जैसी क्षमता न हो।

महासभा की उपयोगिता

महासभा से जुड़ी कुछ प्रमुख उपयोगिताएँ इस प्रकार हैं:

  • यह संगठन उन एजेंसियों के माध्यम से महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है जो शरणार्थियों की देखभाल करती हैं
  • मानवाधिकार उल्लंघनों का दस्तावेजीकरण एक स्वतंत्र और विश्वसनीय प्रक्रिया के माध्यम से होता है
  • जलवायु परिवर्तन पर वैज्ञानिक आकलन तैयार करने का कार्य भी इसी वैश्विक ढांचे के भीतर संभव होता है
  • विकासशील देशों को जलवायु वित्त और सतत विकास की माँगों पर एक साझा मंच मिलता है, जहाँ वे संगठित होकर अपनी बात रख सकते हैं

संरचनात्मक कमजोरियाँ

  • इसके बावजूद, संयुक्त राष्ट्र की संरचनात्मक कमजोरियाँ भी स्पष्ट हैं। सचिवालय पर जटिल प्रक्रियाओं और अत्यधिक खर्च में कटौती का दबाव बना रहता है।
  • सरकारें भी सुविधा के अनुसार इस संगठन के उपयोग में चयनात्मक रवैया अपनाती हैं, जिससे संस्था कमजोर होती है। सुरक्षा परिषद स्वयं तभी प्रभावी ढंग से काम करती है जब बड़ी शक्तियाँ आपस में सहमत हों।
  • जब वे सहमत नहीं होतीं, तो वीटो शक्ति निर्णायक कार्रवाई को रोकने के लिए पर्याप्त हो जाती है, भले ही वह कार्रवाई कितनी भी आवश्यक क्यों न हो।
  • परिषद में सुधार पर सहमति बनाना अत्यंत कठिन है क्योंकि इसके लिए चार्टर में संशोधन आवश्यक है, और स्थायी सदस्यों को यह अधिकार प्राप्त है कि वे विस्तार से जुड़े किसी भी प्रस्ताव को वीटो कर सकें।

संकट के सबूत के रूप में यूक्रेन, गाज़ा और सूडान

तीन समकालीन संकट सुरक्षा परिषद की सीमाओं को उजागर करते हैं। यूक्रेन युद्ध और आक्रामक कार्रवाई पर परिषद की असमर्थता ने यह स्पष्ट कर दिया है कि जब कोई स्थायी सदस्य स्वयं संघर्ष में शामिल हो, तब निर्णायक कार्रवाई असंभव हो जाती है। गाज़ा में जारी संघर्ष ने भी परिषद के सदस्यों और उनके सहयोगियों के बीच के मतभेदों को उजागर किया है। सूडान का उदाहरण दिखाता है कि जब किसी संकट में बड़ी शक्तियों के प्रत्यक्ष हित न हों, तब भी संस्थागत उपेक्षा किस प्रकार भयावह मानवीय परिणाम ला सकती है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नई सुरक्षा चुनौतियाँ

एक नया और महत्वपूर्ण आयाम कृत्रिम बुद्धिमत्ता से जुड़ी सुरक्षा चिंताओं का उभरना है। सितंबर 2026 के मध्य में सुरक्षा परिषद को तकनीकी विशेषज्ञों द्वारा यह जानकारी दी गई कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता एजेंट मानव नियंत्रण से बाहर होते जा रहे हैं। परिषद की भूमिका इस संदर्भ में विशेष महत्व रखती है क्योंकि यह अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डालने वाले जोखिमों से जुड़ा विषय है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता के मामले में एक विशेष जटिलता यह है कि इसकी व्यावसायिक क्षमता रोजगार, विकास और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में अत्यंत व्यापक विचार की माँग करती है। इसलिए इस पर वैश्विक नियमन का कार्य कठिन है, क्योंकि इसमें सुरक्षा मानकों की आवश्यकता के साथ-साथ विकासशील देशों की उस उचित माँग को भी संतुलित करना होगा कि उन्हें तकनीक तक समान पहुँच मिले। स्थायी सदस्य और प्रमुख तकनीकी कंपनियाँ इस बहस में भविष्य के नियमों को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगी, इसलिए यह क्षेत्र भारत के लिए भी सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण बनता जा रहा है।

भारत की वैश्विक भूमिका और साझेदारी की नई पहल

  • भारत का प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि वह अपने साझेदारों को किस प्रकार वार्ता की मेज पर ला सकता है। इसका एक ठोस उदाहरण सितंबर 2026 के अंतिम सप्ताह में देखने को मिला, जब भारत ने बहुपक्षवाद के लिए एक नई साझेदारी पहल शुरू करने में सहायता की।
  • इस पहल में ब्राज़ील, कनाडा, केन्या, यूरोपीय संघ, ऑस्ट्रेलिया और बारबाडोस जैसे विविध देश शामिल हुए। यह समूह कूटनीतिक दृष्टि से भिन्न भिन्न खेमों का प्रतिनिधित्व करता है, जो दर्शाता है कि भारत की कूटनीति केवल पारंपरिक गठबंधनों तक सीमित नहीं है बल्कि विविध हितों वाले देशों को एक साझा मंच पर लाने में सक्षम है।
  • भारत का प्रभाव जलवायु वित्त के क्षेत्र में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। यह देश विकासशील देशों को यह समझाने में सहायक हो सकता है कि वे अन्यथा जिन देशों पर भरोसा नहीं करते, उनके साथ भी सहमति बना सकें।
  • संयुक्त प्रस्ताव और सांझा नीति दृष्टिकोण उन संबंधों से उत्पन्न होते हैं जो साझेदारी और विश्वास पर आधारित होते हैं, न कि केवल शक्ति के प्रदर्शन पर।

भारत की सुरक्षा परिषद उम्मीदवारी और उससे जुड़ी चुनौतियाँ

भारत 2028-29 के कार्यकाल के लिए सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता की दावेदारी को सुरक्षित करने की दिशा में सक्रिय है। इस चुनाव का समय जून 2027 में निर्धारित है। इस दावेदारी के समक्ष एक उल्लेखनीय चुनौती यह है कि पाकिस्तान भी इस पद के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहा है, हालाँकि पाकिस्तान ने अभी तक कभी परिषद में सेवा नहीं दी है।

भारत की उम्मीदवारी के पक्ष में कुछ ठोस तर्क सामने रखे जा सकते हैं:

  • भारत 1945 में संयुक्त राष्ट्र का संस्थापक सदस्य रहा है
  • भारत ने संयुक्त राष्ट्र शांति अभियानों में अब तक पौने तीन लाख से अधिक कार्मिक भेजे हैं, जो इसके शांति स्थापना में योगदान का प्रमाण है
  • छोटे देश स्वाभाविक रूप से यह जानना चाहेंगे कि भारत अपनी अस्थायी सदस्यता की अवधि का उपयोग उनके हितों की पैरवी के लिए किस प्रकार करेगा

स्थायी सदस्यता की स्थायी माँग

अस्थायी सदस्यता से आगे बढ़ते हुए, भारत की मूल आकांक्षा सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट प्राप्त करने की रही है। यह आकांक्षा कई ठोस आधारों पर टिकी है, जैसे विश्व की सबसे बड़ी जनतांत्रिक व्यवस्था होना, एक प्रमुख अर्थव्यवस्था होना, तथा अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा और विकास में योगदान करना।

इस दिशा में मुख्य बाधाएँ इस प्रकार समझी जा सकती हैं:

  • अफ्रीकी देशों का स्थायी सदस्यता से बहिष्कार सुधार प्रक्रिया को और अधिक जटिल बना देता है, क्योंकि अफ्रीकी संघ इसे क्षेत्रीय न्याय के प्रश्न के रूप में उठाता है
  • क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विता विस्तार पर सहमति बनाने में बाधा उत्पन्न करती है
  • वर्तमान स्थायी सदस्य ऐसे विस्तार की अनुमति देने के लिए तत्पर नहीं दिखते जो उनकी अपनी विशिष्ट स्थिति को कमजोर करे
  • चार्टर संशोधन की प्रक्रिया इतनी कठिन है कि किसी भी वास्तविक सुधार के लिए सभी पाँच स्थायी सदस्यों की सहमति अनिवार्य हो जाती है
  • इन बाधाओं के बावजूद, भारत की स्थायी सदस्यता की दावेदारी को औपचारिक समर्थन का आधार व्यापक होता जा रहा है। भारत की स्थिति इस तर्क पर आधारित है कि परिषद की सीट भारत को अधिक गुंजाइश देगी कि वह समझौतों पर बातचीत करे और सरकारों को उनके वायदे पूरे करने के लिए बाध्य कर सके।

आगे की राह

एक महत्वपूर्ण बिंदु यह है कि परिषद की सीट तभी अर्थपूर्ण होगी जब कोई समझौता प्राप्त करने की स्थिति उत्पन्न हो। यह परीक्षा तब सामने आएगी जब सरकारों को अपने वायदों का सम्मान करना होगा। जब बात आर्थिक दबाव से बचने या शक्तिशाली देशों की मनमानी को सीमित करने की हो, तब चार्टर स्वयं इसमें सर्वाधिक बाधक बनता है, क्योंकि इसकी संरचना ही उन देशों के हितों को प्राथमिकता देती है जिन्हें सुधार से नुकसान होने की संभावना है।

इस पूरी परिस्थिति से यह स्पष्ट होता है कि भारत के लिए वैश्विक व्यवस्था में स्थान बनाना केवल एक कूटनीतिक लक्ष्य नहीं, बल्कि एक बहुआयामी रणनीतिक प्रक्रिया है। इसमें आर्थिक शक्ति, संस्थागत सुधार की पैरवी, बहुपक्षीय गठबंधन निर्माण और तकनीकी शासन जैसे नए क्षेत्रों में सक्रिय भागीदारी, सभी एक साथ आवश्यक हैं।

निष्कर्ष

संयुक्त राष्ट्र की घटती साख भारत के उदय के लिए एक विरोधाभासी चुनौती प्रस्तुत करती है। एक ओर वैश्विक संस्थाओं की कमजोरी भारत जैसे देशों को अधिक स्वायत्त और व्यावहारिक कूटनीति अपनाने का अवसर देती है, दूसरी ओर यह उस बहुपक्षीय ढांचे को भी दुर्बल करती है, जिसके भीतर भारत अपनी दीर्घकालिक आकांक्षाओं को साकार करना चाहता है। भारत की चुनौती यह है कि वह इस कमजोर होती व्यवस्था के भीतर भी अपने लिए स्थान और विश्वसनीयता का निर्माण करे, साथ ही उस सुधार प्रक्रिया के लिए भी निरंतर प्रयास करता रहे जो अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को अधिक न्यायपूर्ण और प्रतिनिधित्वपूर्ण बना सके। यही संतुलन आने वाले दशकों में भारत की वैश्विक भूमिका की दिशा निर्धारित करेगा।


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