समकालीन शासन व्यवस्था में प्रशासन की सफलता का मूल्यांकन केवल आर्थिक विकास, संस्थागत दक्षता, नीतियों के क्रियान्वयन और सेवाओं की उपलब्धता के आधार पर नहीं किया जाता, बल्कि इस बात से भी किया जाता है कि शासन नागरिकों के जीवन, उनकी आवश्यकताओं, अधिकारों, गरिमा और कल्याण को किस सीमा तक प्राथमिकता देता है। इसी दृष्टिकोण को मानव-केंद्रित शासन (Human-Centred Governance) कहा जाता है।
मानव-केंद्रित शासन ऐसी शासन व्यवस्था है जिसमें नीतियों के निर्माण, प्रशासनिक निर्णयों, सार्वजनिक सेवाओं और विकास कार्यक्रमों के केंद्र में मनुष्य तथा उसकी आवश्यकताओं को रखा जाता है। इसमें नागरिकों को केवल सरकारी योजनाओं के लाभार्थी या प्रशासनिक प्रक्रिया का हिस्सा नहीं माना जाता, बल्कि उन्हें अधिकारों से संपन्न, सक्रिय और सम्मानित व्यक्ति के रूप में स्वीकार किया जाता है।
- परंपरागत प्रशासन में नियमों, प्रक्रियाओं, पदानुक्रम और संस्थागत लक्ष्यों को अधिक महत्त्व दिया जाता था। इसके विपरीत, मानव-केंद्रित शासन इस बात पर बल देता है कि प्रशासनिक प्रक्रियाएँ नागरिकों की वास्तविक परिस्थितियों, सामाजिक विविधता और मानवीय आवश्यकताओं के अनुरूप होनी चाहिए।
- उदाहरण के लिए, किसी सरकारी अस्पताल की सफलता केवल उपलब्ध बिस्तरों या चिकित्सकों की संख्या से निर्धारित नहीं होगी, बल्कि इस बात से भी होगी कि गरीब, ग्रामीण, वृद्ध और दिव्यांग नागरिकों को समय पर, सुलभ और सम्मानजनक स्वास्थ्य सेवाएँ प्राप्त हो रही हैं या नहीं।
- इस प्रकार, मानव-केंद्रित शासन का मूल उद्देश्य शासन को नागरिकों के अधिक निकट लाना तथा प्रशासनिक व्यवस्था को संवेदनशील, समावेशी, उत्तरदायी और न्यायपूर्ण बनाना है।

मानव–केंद्रित शासन का विकास एवं ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
मानव-केंद्रित शासन किसी एक विचारक द्वारा प्रतिपादित स्वतंत्र सिद्धांत नहीं है। इसका विकास मानवतावाद, लोकतंत्र, मानवाधिकार, कल्याणकारी राज्य, सहभागी शासन और सार्वजनिक सेवा जैसे विभिन्न विचारों के सम्मिलित प्रभाव से हुआ है।
इसके विकास को निम्नलिखित चरणों में समझा जा सकता है।
- प्रथम चरण: मानवतावादी दृष्टिकोण (Humanism): मानवतावाद ने मनुष्य की गरिमा, स्वतंत्रता, विवेक और क्षमता को सामाजिक एवं राजनीतिक जीवन का महत्त्वपूर्ण आधार माना। इस विचार ने शासन को केवल सत्ता संचालन के बजाय मानवीय कल्याण से जोड़ने की बौद्धिक पृष्ठभूमि तैयार की।
- द्वितीय चरण: लोकतांत्रिक एवं अधिकार आधारित शासन: आधुनिक लोकतंत्र के विकास के साथ नागरिक अधिकारों, समानता, स्वतंत्रता और राजनीतिक भागीदारी को शासन की अनिवार्य शर्त माना जाने लगा। इससे नागरिकों को शासन के केंद्र में रखने का विचार मजबूत हुआ।
- तृतीय चरण: कल्याणकारी राज्य (Welfare State): 20वीं शताब्दी में राज्य की भूमिका कानून-व्यवस्था बनाए रखने तक सीमित नहीं रही। शिक्षा, स्वास्थ्य, सामाजिक सुरक्षा, रोजगार और गरीबी उन्मूलन को भी राज्य की जिम्मेदारी के रूप में स्वीकार किया गया।
- चतुर्थ चरण: नया लोक प्रशासन (New Public Administration): 1968 के मिनोब्रुक सम्मेलन (Minnowbrook Conference) के बाद प्रशासन में सामाजिक समानता (Social Equity), प्रासंगिकता, परिवर्तन और नागरिक कल्याण पर विशेष बल दिया गया। इससे प्रशासनिक व्यवस्था को अधिक मानवीय बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण योगदान मिला।
- पंचम चरण: नया लोक सेवा दृष्टिकोण (New Public Service): रॉबर्ट डेनहार्ट और जेनेट डेनहार्ट ने नागरिकों को केवल ग्राहक मानने के बजाय लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय भागीदार मानने पर बल दिया। इससे नागरिक-केंद्रित एवं सार्वजनिक हित आधारित शासन की अवधारणा को मजबूती मिली।
- षष्ठम चरण: समकालीन मानव-केंद्रित शासन: वर्तमान समय में डिजिटल तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, सतत विकास, सामाजिक समावेशन और मानवाधिकारों के संदर्भ में मानव-केंद्रित शासन का महत्त्व बढ़ा है। अब प्रशासन से अपेक्षा की जाती है कि वह तकनीकी दक्षता के साथ मानवीय गरिमा, निजता, समानता और नागरिकों की वास्तविक आवश्यकताओं की रक्षा करे।
मानव–केंद्रित शासन की प्रमुख विशेषताएँ
- मानवीय गरिमा (Human Dignity): प्रत्येक व्यक्ति को सम्मान और समान मानवीय मूल्य के साथ देखना मानव-केंद्रित शासन का मूल आधार है। प्रशासनिक अधिकारियों को नागरिकों के साथ सम्मानजनक व्यवहार करना चाहिए तथा किसी भी प्रकार के अपमान, भेदभाव और अमानवीय व्यवहार से बचना चाहिए।
- नागरिक आवश्यकताओं की प्राथमिकता (Citizen Needs): शासन की नीतियाँ और सेवाएँ नागरिकों की वास्तविक आवश्यकताओं के आधार पर तैयार की जानी चाहिए। इसमें स्वास्थ्य, शिक्षा, आवास, रोजगार, सुरक्षा और सामाजिक संरक्षण जैसी मूलभूत आवश्यकताएँ शामिल हैं।
- समावेशिता (Inclusiveness): शासन व्यवस्था में महिलाओं, बच्चों, वृद्धों, दिव्यांग व्यक्तियों, गरीबों, ग्रामीण समुदायों और अन्य वंचित समूहों की आवश्यकताओं को विशेष महत्त्व दिया जाता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि विकास का लाभ समाज के सभी वर्गों तक पहुँचे।
- नागरिक भागीदारी (Citizen Participation): नागरिकों को केवल नीतियों के लाभार्थी के रूप में नहीं, बल्कि नीति निर्माण, क्रियान्वयन और मूल्यांकन की प्रक्रिया में सहभागी के रूप में स्वीकार किया जाता है।
- सुलभता (Accessibility): सार्वजनिक सेवाएँ ऐसी होनी चाहिए कि प्रत्येक नागरिक उनका उपयोग आसानी से कर सके। इसमें भौगोलिक, आर्थिक, भाषाई और डिजिटल बाधाओं को कम करना शामिल है।
- उत्तरदायित्व (Responsiveness): प्रशासन को नागरिकों की शिकायतों, समस्याओं और आवश्यकताओं पर समयबद्ध एवं संवेदनशील प्रतिक्रिया देनी चाहिए।
- समानता एवं सामाजिक न्याय (Equality and Social Justice): मानव-केंद्रित शासन केवल औपचारिक समानता पर बल नहीं देता, बल्कि उन सामाजिक और आर्थिक बाधाओं को भी दूर करने का प्रयास करता है जो कुछ समूहों को अवसरों से वंचित करती हैं।
- पारदर्शिता एवं जवाबदेही (Transparency and Accountability): नागरिकों को सरकारी निर्णयों और योजनाओं की जानकारी प्राप्त करने का अधिकार होना चाहिए। प्रशासन को अपने कार्यों और निर्णयों के लिए जवाबदेह बनाया जाना चाहिए।
- संवेदनशील प्रशासन (Empathetic Administration): प्रशासनिक व्यवस्था में नागरिकों की सामाजिक, आर्थिक और भावनात्मक परिस्थितियों को समझने की क्षमता होनी चाहिए। विशेष रूप से संकट और आपदा के समय संवेदनशील व्यवहार आवश्यक है।
- सशक्तीकरण (Empowerment): मानव-केंद्रित शासन का उद्देश्य नागरिकों को केवल सरकारी सहायता प्रदान करना नहीं, बल्कि उन्हें अपने अधिकारों, संसाधनों और अवसरों का उपयोग करने में सक्षम बनाना भी है।
मानव–केंद्रित शासन के प्रमुख सिद्धांत
- व्यक्ति को साधन नहीं, बल्कि उद्देश्य मानना: शासन का उद्देश्य केवल संस्थागत लक्ष्यों और आर्थिक विकास को प्राप्त करना नहीं होना चाहिए। विकास का वास्तविक मूल्यांकन इस आधार पर होना चाहिए कि उससे मनुष्य के जीवन की गुणवत्ता में कितना सुधार हुआ है।
- अधिकार आधारित दृष्टिकोण (Rights-Based Approach): नागरिकों को सरकारी सुविधाओं के निष्क्रिय प्राप्तकर्ता के बजाय अधिकारों से संपन्न व्यक्ति के रूप में देखा जाना चाहिए। राज्य का दायित्व है कि वह इन अधिकारों की रक्षा और पूर्ति करे।
- आवश्यकता आधारित नीति निर्माण (Needs-Based Policy Making): नीतियों का निर्माण वास्तविक सामाजिक आवश्यकताओं और स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। सभी नागरिकों पर एक जैसी नीति लागू करना हमेशा न्यायपूर्ण परिणाम नहीं देता।
- सहभागी निर्णय प्रक्रिया (Participatory Decision-Making): शासन से प्रभावित होने वाले नागरिकों को निर्णय प्रक्रिया में अपनी बात रखने और सुझाव देने का अवसर मिलना चाहिए।
- गरिमा के साथ सेवा वितरण (Dignified Service Delivery): सरकारी सेवाएँ प्राप्त करने के लिए नागरिकों को अनावश्यक अपमान, भेदभाव, देरी और जटिल प्रक्रियाओं का सामना नहीं करना चाहिए।
- कमजोर वर्गों को प्राथमिकता: सामाजिक और आर्थिक रूप से वंचित समूहों की विशेष आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए ऐसी व्यवस्थाएँ विकसित की जानी चाहिए जो वास्तविक समानता सुनिश्चित करें।
- प्रमुख विचारक एवं सैद्धांतिक योगदान
मानव-केंद्रित शासन का संबंध अनेक राजनीतिक, प्रशासनिक और सामाजिक विचारकों के योगदान से है। निम्नलिखित विचारकों ने इसके वैचारिक आधार को विकसित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
| विचारक | प्रमुख योगदान |
| अब्राहम मैस्लो (Abraham Maslow) | आवश्यकता पदानुक्रम सिद्धांत (Hierarchy of Needs) |
| अमर्त्य सेन (Amartya Sen) | क्षमता दृष्टिकोण (Capability Approach) |
| मार्था नुसबाम (Martha Nussbaum) | मानवीय क्षमताएँ एवं गरिमापूर्ण जीवन |
| जॉन रॉल्स (John Rawls) | न्याय का सिद्धांत (Theory of Justice) |
| जर्गेन हैबरमास (Jürgen Habermas) | संवादात्मक एवं विचार-विमर्श आधारित लोकतंत्र |
| रॉबर्ट डेनहार्ट (Robert Denhardt) | नया लोक सेवा दृष्टिकोण (New Public Service) |
| जेनेट डेनहार्ट (Janet Denhardt) | नागरिक-केंद्रित सार्वजनिक सेवा |
| ड्वाइट वाल्डो (Dwight Waldo) | प्रशासन में लोकतांत्रिक एवं नैतिक मूल्यों का महत्त्व |
| डेनिस थॉम्पसन (Dennis F. Thompson) | प्रशासनिक नैतिकता एवं सार्वजनिक जवाबदेही |
अब्राहम मैस्लो- आवश्यकता पदानुक्रम सिद्धांत (Hierarchy of Needs): मैस्लो ने मानव आवश्यकताओं को विभिन्न स्तरों में विभाजित किया। इनमें शारीरिक आवश्यकताएँ, सुरक्षा, प्रेम एवं संबंध, सम्मान और आत्म-साक्षात्कार शामिल हैं। उनका सिद्धांत यह समझने में सहायता करता है कि शासन को नागरिकों की केवल आर्थिक आवश्यकताओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि सुरक्षा, सामाजिक सम्मान और व्यक्तिगत विकास की परिस्थितियाँ भी उपलब्ध करानी चाहिए।
अमर्त्य सेन- क्षमता दृष्टिकोण (Capability Approach): अमर्त्य सेन के अनुसार विकास का मूल्यांकन केवल आय या आर्थिक संसाधनों से नहीं किया जा सकता। वास्तविक विकास का अर्थ है कि व्यक्ति के पास वह जीवन जीने की स्वतंत्रता और क्षमता हो जिसे वह मूल्यवान मानता है। शिक्षा, स्वास्थ्य, पोषण, सामाजिक अवसर और राजनीतिक स्वतंत्रता इस दृष्टिकोण के महत्त्वपूर्ण आधार हैं।
मार्था नुसबाम- मानवीय क्षमताओं का दृष्टिकोण: नुसबाम ने गरिमापूर्ण जीवन के लिए आवश्यक मानवीय क्षमताओं पर बल दिया। उनके अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को जीवन, स्वास्थ्य, शारीरिक अखंडता, विचार, भावनात्मक विकास, सामाजिक संबंध और राजनीतिक भागीदारी के लिए आवश्यक अवसर प्राप्त होने चाहिए।
जॉन रॉल्स- न्याय का सिद्धांत (Theory of Justice): रॉल्स ने समान मूल स्वतंत्रताओं, अवसरों की निष्पक्ष समानता और अंतर सिद्धांत (Difference Principle) पर बल दिया। उनके अनुसार सामाजिक एवं आर्थिक असमानताएँ तभी स्वीकार्य हो सकती हैं जब वे समाज के सबसे कम लाभान्वित वर्गों के हित में हों। यह विचार मानव-केंद्रित शासन को सामाजिक न्याय का आधार प्रदान करता है।
रॉबर्ट एवं जेनेट डेनहार्ट- नया लोक सेवा दृष्टिकोण (New Public Service): डेनहार्ट दंपति ने The New Public Service: Serving, Not Steering (2003) में तर्क दिया कि सरकार का कार्य नागरिकों पर नियंत्रण करना या उन्हें केवल ग्राहक मानना नहीं है, बल्कि सार्वजनिक हित की पूर्ति के लिए उनकी सेवा करना है। उन्होंने लोकतांत्रिक नागरिकता, सार्वजनिक हित, संवाद और नागरिक सहभागिता को प्रशासन का आधार माना।
मानव–केंद्रित शासन और परंपरागत प्रशासन में अंतर
| आधार | परंपरागत प्रशासन | मानव–केंद्रित शासन |
| प्राथमिकता | नियम एवं प्रक्रियाएँ | नागरिक एवं मानवीय आवश्यकताएँ |
| नागरिक की स्थिति | प्रशासनिक व्यवस्था का प्राप्तकर्ता | सक्रिय भागीदार एवं अधिकारधारी |
| निर्णय का आधार | संस्थागत नियम एवं प्रशासनिक विवेक | नागरिक आवश्यकताएँ, अधिकार एवं सामाजिक परिस्थितियाँ |
| प्रशासनिक व्यवहार | औपचारिक एवं प्रक्रियात्मक | संवेदनशील एवं सम्मानजनक |
| सेवा वितरण | विभागीय सुविधा के अनुसार | नागरिकों की सुविधा के अनुसार |
| समानता | समान नियम लागू करना | वास्तविक एवं समावेशी समानता |
| जवाबदेही | विभागीय एवं पदानुक्रम आधारित | नागरिकों के प्रति उत्तरदायित्व |
| सफलता का माप | दक्षता एवं कार्य निष्पादन | मानवीय कल्याण एवं जीवन की गुणवत्ता |

मानव–केंद्रित शासन और समकालीन डिजिटल प्रशासन
वर्तमान समय में डिजिटल तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने मानव-केंद्रित शासन के सामने नए अवसर और चुनौतियाँ प्रस्तुत की हैं। डिजिटल प्रशासन सरकारी सेवाओं को अधिक तेज, सुलभ और सुविधाजनक बना सकता है, लेकिन इसका उपयोग नागरिकों की वास्तविक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए।
मानव-केंद्रित डिजिटल शासन (Human-Centred Digital Governance) के अंतर्गत तकनीकी प्रणालियों को इस प्रकार विकसित किया जाता है कि वे नागरिकों की सुविधा, अधिकारों और गरिमा को प्राथमिकता दें।
इसके प्रमुख पक्ष निम्नलिखित हैं-
- सरल डिजिटल सेवाएँ: सरकारी पोर्टल और मोबाइल एप्लीकेशन नागरिकों के लिए सरल एवं उपयोग में सहज होने चाहिए।
- बहुभाषी प्रशासन: डिजिटल सेवाएँ विभिन्न भारतीय भाषाओं में उपलब्ध होनी चाहिए ताकि भाषा तकनीकी पहुँच में बाधा न बने।
- डिजिटल समावेशन: ग्रामीण नागरिकों, वृद्धों, दिव्यांग व्यक्तियों और डिजिटल साक्षरता से वंचित लोगों के लिए वैकल्पिक सहायता उपलब्ध होनी चाहिए।
- डेटा गोपनीयता: नागरिकों की व्यक्तिगत जानकारी का उपयोग वैधानिक उद्देश्य और उचित सुरक्षा के अंतर्गत किया जाना चाहिए।
- मानवीय निगरानी: AI आधारित निर्णयों में आवश्यक मानवीय समीक्षा और अपील की व्यवस्था होनी चाहिए।
- सार्वजनिक हित: तकनीकी नवाचार का उद्देश्य केवल प्रशासनिक लागत घटाना नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाना होना चाहिए।
इस संदर्भ में मानव-केंद्रित शासन और एल्गोरिदमिक नौकरशाही के बीच महत्त्वपूर्ण संबंध है। एल्गोरिदमिक नौकरशाही प्रशासन में तकनीक और स्वचालन की भूमिका पर बल देती है, जबकि मानव-केंद्रित शासन यह सुनिश्चित करता है कि तकनीक का उपयोग मानवीय मूल्यों और सार्वजनिक हित के अनुरूप हो।
मानव–केंद्रित शासन की चुनौतियाँ एवं आलोचनाएँ
- प्रशासनिक संवेदनशीलता का अभाव: कई बार प्रशासनिक अधिकारी नियमों और प्रक्रियाओं को प्राथमिकता देते हैं, जिसके कारण नागरिकों की व्यक्तिगत एवं सामाजिक परिस्थितियों की उपेक्षा होती है।
- संसाधनों की कमी: सीमित बजट, कर्मचारियों की कमी और कमजोर संस्थागत क्षमता के कारण सभी नागरिकों की आवश्यकताओं को पूरा करना कठिन हो सकता है।
- नीति और क्रियान्वयन के बीच अंतर: मानव-केंद्रित दृष्टिकोण नीतियों में स्वीकार कर लिया जाता है, लेकिन जमीनी स्तर पर सेवाओं की गुणवत्ता और उपलब्धता में असमानता बनी रह सकती है।
- सामाजिक असमानताएँ: जाति, वर्ग, लिंग, क्षेत्र और आर्थिक स्थिति से जुड़ी असमानताएँ नागरिकों की सरकारी सेवाओं तक पहुँच को प्रभावित करती हैं।
- डिजिटल विभाजन: डिजिटल सेवाओं पर अत्यधिक निर्भरता उन नागरिकों को पीछे छोड़ सकती है जिनके पास इंटरनेट, उपकरण या डिजिटल साक्षरता नहीं है।
- राजनीतिक हस्तक्षेप: कई बार सार्वजनिक नीतियों और सेवाओं का वितरण राजनीतिक प्राथमिकताओं से प्रभावित होता है, जिससे निष्पक्षता कमजोर हो सकती है।
- नागरिक सहभागिता की सीमाएँ: सभी नागरिकों को निर्णय प्रक्रिया में समान अवसर नहीं मिल पाता। प्रभावशाली समूहों की आवाज अधिक सुनी जा सकती है।
- मापन की समस्या: मानवीय गरिमा, सम्मान, संतुष्टि और सामाजिक समावेशन जैसे पहलुओं को केवल संख्यात्मक संकेतकों से मापना कठिन है।
- अधिकारों और कल्याण के बीच संतुलन: प्रशासन को नागरिकों को सहायता प्रदान करने के साथ उनकी स्वतंत्रता, निजता और स्वायत्तता की भी रक्षा करनी होती है।
निष्कर्ष
मानव-केंद्रित शासन समकालीन प्रशासन का ऐसा दृष्टिकोण है जो शासन की सफलता को मानवीय गरिमा, नागरिक कल्याण, समानता, सामाजिक न्याय और समावेशिता के आधार पर परिभाषित करता है। यह प्रशासन को केवल नियमों और प्रक्रियाओं तक सीमित न रखकर नागरिकों की वास्तविक आवश्यकताओं तथा उनके जीवन की गुणवत्ता से जोड़ता है।
समकालीन समय में डिजिटल तकनीक और कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रशासन को अधिक सक्षम बना सकती हैं, लेकिन तकनीकी दक्षता अपने आप में सुशासन की गारंटी नहीं है। यदि प्रशासनिक व्यवस्था नागरिकों की निजता, गरिमा, समानता और अधिकारों की रक्षा नहीं करती, तो तकनीकी प्रगति भी सामाजिक अन्याय को बढ़ा सकती है। अतः आदर्श शासन वही है जिसमें संस्थागत दक्षता और मानवीय संवेदनशीलता के बीच संतुलन स्थापित हो। मानव-केंद्रित शासन का मूल संदेश है कि शासन व्यवस्था मनुष्य के लिए है, मनुष्य शासन व्यवस्था के लिए नहीं।
परीक्षा की दृष्टि से महत्त्वपूर्ण तथ्य
| अवधारणा / विचारक | संबंधित योगदान |
| अब्राहम मैस्लो | आवश्यकता पदानुक्रम सिद्धांत |
| अमर्त्य सेन | क्षमता दृष्टिकोण |
| मार्था नुसबाम | मानवीय क्षमताएँ एवं गरिमापूर्ण जीवन |
| जॉन रॉल्स | न्याय का सिद्धांत |
| रॉबर्ट एवं जेनेट डेनहार्ट | नया लोक सेवा दृष्टिकोण |
| ड्वाइट वाल्डो | प्रशासन में लोकतांत्रिक एवं नैतिक मूल्य |
| 1968 का मिनोब्रुक सम्मेलन | नया लोक प्रशासन एवं सामाजिक समानता |
| 2003 | The New Public Service: Serving, Not Steering का प्रकाशन |
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