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‘नो फर्स्ट यूज़’ से आगे

भारत की परमाणु रणनीति पर पुनर्विचार का प्रश्न

स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट (SIPRI) की वार्षिकी 2026 रिपोर्ट ने भारत की परमाणु क्षमता को लेकर एक नई बहस को जन्म दिया है। रिपोर्ट के अनुसार जनवरी 2026 तक भारत के पास लगभग 190 परमाणु वारहेड थे, जिनमें से 12 को “तैनात” (deployed) श्रेणी में रखा गया है। यद्यपि भारत की परमाणु नीति और तैनाती संबंधी सूचनाएँ गोपनीय होती हैं तथा सरकार ने इस पर कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं की है, फिर भी यह आकलन भारत की परमाणु रणनीति और उसके दीर्घकालिक सिद्धांतों पर पुनर्विचार का अवसर प्रदान करता है।

भारत की परमाणु नीति की पृष्ठभूमि

भारत ने 1974 में पोखरण में अपना पहला परमाणु परीक्षण किया था, जिसे तत्कालीन सरकार ने “शांतिपूर्ण परमाणु विस्फोट” बताया था। इसके बाद 1998 के पोखरण-II परीक्षणों ने भारत को घोषित परमाणु शक्ति के रूप में स्थापित किया। इसी समय भारत ने विश्व के समक्ष एक संतुलित और उत्तरदायी परमाणु सिद्धांत प्रस्तुत किया, जिसका मूल आधार था—“प्रथम प्रयोग नहीं” (No First Use – NFU)

इस सिद्धांत के अनुसार भारत किसी भी देश पर पहले परमाणु हथियार का प्रयोग नहीं करेगा, लेकिन यदि उस पर परमाणु हमला किया जाता है तो वह “विश्वसनीय और व्यापक प्रतिशोध” (Credible Massive Retaliation) करेगा। 2003 में भारत के आधिकारिक परमाणु सिद्धांत में इस नीति की पुनः पुष्टि की गई।


SIPRI रिपोर्ट और वैश्विक परिदृश्य

SIPRI की नवीनतम रिपोर्ट विश्व को एक चिंताजनक दिशा में बढ़ता हुआ दिखाती है। रिपोर्ट के अनुसार:

  • वर्ष 2025 में वैश्विक सैन्य व्यय लगभग 2.9 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच गया।
  • विश्व के अधिकांश परमाणु हथियार अमेरिका और रूस के पास हैं।
  • अमेरिका के पास लगभग 3,700 उपयोग योग्य परमाणु वारहेड हैं, जिनमें से लगभग 1,770 तैनात हैं।
  • रूस के पास लगभग 4,400 परमाणु वारहेड हैं, जिनमें से लगभग 1,796 तैनात हैं।
  • चीन ने अपने परमाणु भंडार का तीव्र विस्तार करते हुए लगभग 620 वारहेड तक पहुँचा दिया है।

SIPRI का मत है कि परमाणु शक्तियों द्वारा अपने शस्त्रागार का निरंतर विस्तार उस समय हो रहा है जब परमाणु अप्रसार संधि (NPT) के तहत निरस्त्रीकरण की प्रतिबद्धताओं को पर्याप्त रूप से पूरा नहीं किया गया है। इससे वैश्विक अप्रसार व्यवस्था की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग रहा है।


NPT और भारत की ऐतिहासिक स्थिति

भारत ने कभी भी परमाणु अप्रसार संधि (NPT) पर हस्ताक्षर नहीं किए। भारत का तर्क रहा है कि यह संधि मूलतः भेदभावपूर्ण है क्योंकि यह पाँच देशों को स्थायी परमाणु शक्ति के रूप में मान्यता देती है, जबकि अन्य देशों पर प्रतिबंध लगाती है।

आज भी भारत का यह दृष्टिकोण प्रासंगिक दिखाई देता है। यदि स्थापित परमाणु शक्तियाँ निरस्त्रीकरण की दिशा में पर्याप्त प्रगति नहीं करतीं, तो अन्य देशों को भी परमाणु हथियार विकसित करने का औचित्य मिल सकता है। पश्चिम एशिया में ईरान को लेकर चल रही बहस इसका एक उदाहरण है।


दक्षिण एशिया में प्रतिरोध (Deterrence) की विशिष्टता

दक्षिण एशिया की सुरक्षा परिस्थितियाँ यूरोप या शीत युद्ध काल की महाशक्तियों से भिन्न हैं। भारत और पाकिस्तान दोनों परमाणु शक्ति संपन्न राष्ट्र हैं, परंतु उनके बीच भौगोलिक निकटता, ऐतिहासिक संघर्ष और सीमित युद्धों का अनुभव एक अलग प्रकार की प्रतिरोधक व्यवस्था निर्मित करता है।

SIPRI के अनुसार पाकिस्तान के पास लगभग 170 परमाणु वारहेड हैं। फिर भी 2025 में भारत-पाकिस्तान के बीच उत्पन्न सैन्य तनाव पूर्ण परमाणु युद्ध में परिवर्तित नहीं हुआ। यह तथ्य दर्शाता है कि दक्षिण एशिया में परमाणु प्रतिरोध की अपनी विशिष्ट गतिशीलता है।

भारत और पाकिस्तान के बीच पारंपरिक सैन्य शक्ति में बड़ा अंतर है। भारत ने लंबे समय से आतंकवाद और सीमा पार आक्रामकता का मुकाबला मुख्यतः पारंपरिक सैन्य साधनों से किया है। इस संदर्भ में भारत की NFU नीति क्षेत्रीय स्थिरता में योगदान देती है क्योंकि यह परमाणु हथियारों को युद्ध लड़ने के साधन के बजाय प्रतिरोध के साधन के रूप में प्रस्तुत करती है।


नई चुनौतियाँ: कृत्रिम बुद्धिमत्ता और उभरती सैन्य तकनीकें

आज परमाणु सुरक्षा केवल परमाणु हथियारों तक सीमित नहीं रह गई है। SIPRI ने कई नई चुनौतियों की ओर संकेत किया है:

  • कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) आधारित हथियार प्रणालियाँ।
  • अंतरिक्ष का सैन्यीकरण।
  • हाइपरसोनिक मिसाइलें।
  • साइबर हमले।
  • जैविक युद्ध की संभावनाएँ।

इन तकनीकों के कारण संकट की स्थिति में निर्णय लेने का समय कम हो सकता है और गलत आकलन की संभावना बढ़ सकती है। इससे परमाणु जोखिम भी बढ़ सकता है। इसलिए परमाणु स्थिरता को केवल हथियारों की संख्या से नहीं, बल्कि कमान-नियंत्रण प्रणाली, संचार तंत्र और राजनीतिक विवेक से भी मापा जाना चाहिए।


भारत की परमाणु नीति का नैतिक और कूटनीतिक महत्व

भारत की “प्रथम प्रयोग नहीं” नीति उसे नैतिक और कूटनीतिक बढ़त प्रदान करती है। यह नीति भारत को एक उत्तरदायी परमाणु शक्ति के रूप में स्थापित करती है और वैश्विक निरस्त्रीकरण के समर्थन में उसकी विश्वसनीयता बढ़ाती है।

संयुक्त राष्ट्र में भारत लगातार “परमाणु हथियारों के पूर्ण उन्मूलन” की वकालत करता रहा है। 1988 में तत्कालीन प्रधानमंत्री राजीव गांधी द्वारा प्रस्तुत Action Plan for a Nuclear Weapon Free and Non-Violent World Order इसका महत्वपूर्ण उदाहरण है।

NFU नीति निम्नलिखित लाभ प्रदान करती है—

  1. आकस्मिक परमाणु युद्ध की संभावना कम करती है।
  2. संकट के समय स्थिरता बढ़ाती है।
  3. भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि को मजबूत करती है।
  4. निरस्त्रीकरण संबंधी भारतीय दावों को विश्वसनीय बनाती है।
  5. क्षेत्रीय शक्ति संतुलन बनाए रखने में सहायता करती है।

क्या भारत को अपनी नीति बदलनी चाहिए?

समय-समय पर यह बहस उठती रही है कि चीन और पाकिस्तान की सुरक्षा चुनौतियों को देखते हुए भारत को अपनी NFU नीति में संशोधन करना चाहिए या नहीं। किंतु अब तक कोई आधिकारिक परिवर्तन नहीं किया गया है।

रणनीतिक दृष्टि से देखा जाए तो भारत की वर्तमान नीति ने पिछले दो दशकों में पर्याप्त स्थिरता प्रदान की है। इसके अतिरिक्त, परमाणु सिद्धांत में अचानक परिवर्तन से क्षेत्रीय हथियार प्रतिस्पर्धा तेज हो सकती है और भारत की दीर्घकालिक कूटनीतिक स्थिति प्रभावित हो सकती है।


निष्कर्ष

SIPRI की 2026 रिपोर्ट केवल भारत के परमाणु शस्त्रागार का आकलन नहीं है; यह विश्व को याद दिलाती है कि परमाणु युग में सुरक्षा केवल अधिक हथियार रखने से नहीं आती। आज जब वैश्विक स्तर पर परमाणु शस्त्रीकरण पुनः बढ़ रहा है, तब भारत के लिए अपनी “प्रथम प्रयोग नहीं” नीति और निरस्त्रीकरण समर्थक दृष्टिकोण को अधिक दृढ़ता से प्रस्तुत करना आवश्यक है।

भारत को अपनी सुरक्षा आवश्यकताओं और संप्रभु हितों की रक्षा करते हुए एक ऐसे विश्व की वकालत जारी रखनी चाहिए जहाँ परमाणु हथियारों की भूमिका लगातार घटे और अंततः उनका पूर्ण उन्मूलन संभव हो। यही भारत की ऐतिहासिक नीति, नैतिक दृष्टिकोण और दीर्घकालिक वैश्विक हितों के अनुरूप होगा।


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