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1991 से मिलने वाले तीन विदेश नीति के सबक

इतिहास की तुलनाएं सदैव सावधानी से की जानी चाहिए, क्योंकि कोई भी दो कालखंड पूर्णतः समान नहीं होते। फिर भी 1990-91 में भारत के सामने खड़ी विदेश नीति की चुनौतियों और आज ईरान तथा यूक्रेन के युद्धों से उत्पन्न परिस्थितियों में एक विचित्र समानता दिखाई देती है। मध्य पूर्व और यूरोप में हुए एकसाथ उभरे संकटों ने 1991 में भारत की आर्थिक और सामरिक मान्यताओं को झकझोर दिया था। आज भी यही दो क्षेत्र नई दिल्ली को अपनी राष्ट्रीय रणनीति की बुनियाद पर पुनर्विचार करने के लिए विवश कर रहे हैं।

1990-91 का संकट: दोहरा आघात

अगस्त 1990 में इराक द्वारा कुवैत पर आक्रमण और उसके बाद सद्दाम हुसैन के इस अधिग्रहण को पलटने के लिए अमेरिका के नेतृत्व में हुए युद्ध ने विश्व के तेल बाजार को अस्थिर कर दिया। तेल की कीमतें आसमान छूने लगीं, खाड़ी देशों से आने वाली विदेशी मुद्रा प्रेषण बाधित हो गई और भारत का चुका भुगतान संकट और गहरा गया। इस संकट के कुछ ही महीनों के भीतर सोवियत संघ, जो शीत युद्ध के दौरान भारतीय विदेश नीति का प्रमुख आधार रहा था, स्वयं विघटित हो गया। इन दो आघातों ने भारत को अर्थव्यवस्था में सुधार करने, अपने अंतरराष्ट्रीय संबंधों में विविधता लाने और विश्व में अपनी स्थिति के बारे में नए सिरे से सोचने के लिए मजबूर कर दिया।

आज की परिस्थिति: नए रूप में पुरानी चुनौती

आज की परिस्थितियां भिन्न अवश्य हैं, परंतु इसमें छिपी बुनियादी चुनौती वही परिचित प्रकृति की है। ईरान में सर्वोच्च नेता की हत्या के साथ आरंभ हुए युद्ध ने ऊर्जा की लागत बढ़ा दी है, होरमुज जलडमरूमध्य से होकर गुजरने वाली नौवहन व्यवस्था को बाधित कर दिया है, और मध्य पूर्व पर भारत की निर्भरता को खुलकर उजागर कर दिया है।

इसके साथ ही अमेरिकी नीतियां इस असुरक्षा को और तीव्र कर रही हैं। दिवंगत सीनेटर लिंडसे ग्राहम से जुड़ा प्रतिबंध विधेयक रूसी तेल का आयात करने वाले चीन, भारत और अन्य देशों पर भारी दंडात्मक शुल्क लगाने का प्रस्ताव करता है। राष्ट्रपति ट्रंप ने भी इस विधेयक का दायरा ईरान तक बढ़ाने की मांग की है। अमेरिकी कांग्रेस इसे स्वीकार करे या न करे, भारत की ऊर्जा कूटनीति पर दबाव निरंतर बढ़ता जाएगा।

भारत सरकार ने अब तक इन दबावों का सामना करने में पर्याप्त लचीलापन दिखाया है, परंतु आगे का मार्ग और भी कठिन हो सकता है। जैसा 1991 में हुआ था, वैसा ही आज भी सरकार अपने आसपास के विदेश नीति विमर्श की तुलना में अधिक व्यावहारिक और सहज दिखती है।

1991 का द्वंद्व: प्रतिस्पर्धी दायित्वों के बीच भारत

जब सद्दाम हुसैन ने कुवैत पर आक्रमण किया, तब भारत की आधिकारिक स्थिति परस्पर विरोधी दायित्वों के बीच उलझी हुई थी। एक ओर खाड़ी क्षेत्र में बसे विशाल भारतीय प्रवासी समुदाय को सुरक्षित निकालने की तात्कालिक आवश्यकता थी, दूसरी ओर इराक और अरब जगत के साथ पुराने संबंधों को बनाए रखने की चिंता भी थी, और साथ ही अमेरिका द्वारा जुटाई गई भारी सैन्य शक्ति को स्वीकार करने की व्यावहारिक बाध्यता भी विद्यमान थी। सरकार के तत्कालीन विरोधाभासी कदम, जिनमें विदेश मंत्री आई.के. गुजराल का सद्दाम हुसैन के प्रति सहज झुकाव और साथ ही अमेरिकी सैन्य विमानों को ईंधन भरने की सुविधा प्रदान करना शामिल था, इन्हीं परस्पर विरोधी दबावों का प्रतिबिंब थे।

घरेलू रणनीतिक विमर्श 1991 में कतई यथार्थवादी नहीं था। राजनीतिक और विदेश नीति प्रतिष्ठान के बड़े वर्ग की सहज सहानुभूति सद्दाम हुसैन के साथ थी, जिन्हें लंबे समय से भारत का मित्र और धर्मनिरपेक्ष अरब राष्ट्रवाद का प्रतिनिधि माना जाता रहा था। एक स्वतंत्र देश पर उनके अधिग्रहण को अमेरिका के साथ टकराव की तुलना में कम महत्वपूर्ण समझा गया।

यही अनम्यता सोवियत संकट को लेकर भारत की प्रतिक्रियाओं में भी झलकती थी। 1980 के दशक के अंत तक मिखाइल गोर्बाचोव के भीतरी सुधार और बाहरी मोर्चों से पीछे हटने की नीति ने यह स्पष्ट कर दिया था कि पुरानी सोवियत व्यवस्था अब टिकाऊ नहीं रह सकती। इसके बावजूद दिल्ली के विदेश नीति समुदाय के एक बड़े हिस्से ने पश्चिम के साथ समायोजन की उनकी कोशिशों की आलोचना की। जब अगस्त 1991 में साम्यवादी कट्टरपंथियों ने सत्ता पलटने का प्रयास किया, तो दिल्ली के कुछ हलकों में इसे लेकर बड़ी मुश्किल से छिपाई जा सकने वाली राजनीतिक प्रसन्नता देखी गई। परंतु यह विद्रोह तीन दिनों में ही ध्वस्त हो गया और दिसंबर तक सोवियत संघ का अस्तित्व ही समाप्त हो गया।

आज का पुनरावर्तन: बदले चेहरे, वही मानसिकता

आज पात्र बदल गए हैं, परंतु वही मूल प्रवृत्ति जीवित है। तेहरान के प्रति सहानुभूति इस्लामी गणराज्य के वास्तविक स्वरूप और व्यवहार पर उतनी निर्भर नहीं है, जितनी अमेरिका के प्रतिरोध पर आधारित है। सद्दाम हुसैन का धर्मनिरपेक्ष निरंकुश शासन और ईरान की धार्मिक सत्ता एक दूसरे से बिल्कुल भिन्न प्रकृति की हैं, फिर भी भारतीय विदेश नीति समुदाय ने दोनों को अमेरिका विरोधी अवज्ञा के प्रतीक के रूप में समान रूप से अपनाया है।

रूस को लेकर विमर्श भी इसी प्रकार पुतिन के व्यक्तित्व के इर्दगिर्द केंद्रित है और सोवियत काल में भारत को मिले समर्थन की स्मृतियों से भावनात्मक रूप से जुड़ा हुआ है। इससे रूस के भीतरी तनावों, चीन के साथ उसके बदलते संबंधों और यूरोप तथा अमेरिका के साथ सामंजस्य बिठाने की उसकी आवश्यकताओं की गंभीर समीक्षा करने का अवसर धूमिल पड़ जाता है। भारत के हितों की मांग है कि रूस और ईरान की घरेलू राजनीति को सहज सहानुभूति से न देखा जाए, बल्कि उन्हें समझदारी और गहराई से समझा जाए, न कि वर्तमान सत्ताधीशों के प्रति आत्मिक निष्ठा प्रकट करते हुए।

पहला सबक

विदेश नीति का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत यह है कि कोई भी अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था स्थायी नहीं होती। जो देश समय रहते बदलती परिस्थितियों के अनुरूप स्वयं को अनुकूलित कर लेते हैं, वही दीर्घकाल में अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा कर पाते हैं।

1991 के बाद भारत ने इसी सिद्धांत को अपनाया। सोवियत संघ के विघटन के बावजूद भारत ने रूस के साथ संबंध बनाए रखे, साथ ही अमेरिका, यूरोप, जापान तथा दक्षिण पूर्व एशिया के साथ भी अपने संबंधों का तीव्र विस्तार किया। इसी काल में लुक ईस्ट नीति प्रारंभ हुई, जिसने आगे चलकर एक्ट ईस्ट नीति का स्वरूप ग्रहण किया।

आज भारत इसी सोच को और व्यापक रूप में लागू कर रहा है। भारत क्वाड का सदस्य है, किंतु ब्रिक्स और शंघाई सहयोग संगठन में भी सक्रिय है। भारत अमेरिका के साथ रक्षा सहयोग बढ़ा रहा है, साथ ही रूस से सामरिक संबंध बनाए हुए है। पश्चिम एशिया, यूरोप, अफ्रीका तथा इंडो पैसिफिक सभी क्षेत्रों में संतुलित सक्रियता भारत की नई विदेश नीति की विशेषता बन चुकी है।

यह नीति किसी एक शक्ति के साथ पूर्ण संरेखण के स्थान पर बहुआयामी साझेदारी पर आधारित है। इसे रणनीतिक स्वायत्तता का आधुनिक स्वरूप माना जा सकता है।

दूसरा सबक

1991 का सबसे बड़ा संदेश यह था कि कमजोर अर्थव्यवस्था किसी भी देश की विदेश नीति को सीमित कर देती है। यदि आर्थिक आधार कमजोर हो तो कूटनीतिक स्वतंत्रता भी प्रभावित होती है।

भुगतान संतुलन संकट ने भारत को यह समझाया कि आर्थिक सुधार केवल विकास का प्रश्न नहीं बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा का भी विषय है। उदारीकरण के बाद भारत की आर्थिक क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई। विदेशी निवेश बढ़ा, निर्यात का विस्तार हुआ, विदेशी मुद्रा भंडार मजबूत हुए तथा भारत वैश्विक अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण भागीदार बन गया।

आज आर्थिक शक्ति विदेश नीति का सबसे प्रभावी उपकरण बन चुकी है। मुक्त व्यापार समझौते, वैश्विक आपूर्ति शृंखलाओं में भागीदारी, डिजिटल अर्थव्यवस्था, हरित ऊर्जा, विनिर्माण क्षमता, सेमीकंडक्टर उत्पादन तथा महत्वपूर्ण खनिजों तक पहुंच भविष्य की रणनीतिक प्रतिस्पर्धा को निर्धारित करेंगे।

भारत आत्मनिर्भर भारत, उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना, राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति, हरित हाइड्रोजन मिशन तथा डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से अपनी आर्थिक एवं तकनीकी क्षमता को सुदृढ़ बनाने का प्रयास कर रहा है।

स्पष्ट है कि आर्थिक सामर्थ्य के बिना दीर्घकालिक सामरिक स्वायत्तता संभव नहीं है।

तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण सबक

अंतरराष्ट्रीय संबंध स्थायी मित्रता या स्थायी शत्रुता पर आधारित नहीं होते, बल्कि स्थायी राष्ट्रीय हितों पर आधारित होते हैं। यही विदेश नीति का सबसे व्यावहारिक सिद्धांत है।

1991 में इराक के साथ भारत के ऐतिहासिक संबंध थे, किंतु खाड़ी युद्ध ने यह स्पष्ट कर दिया कि भावनात्मक या वैचारिक निकटता संकट के समय पर्याप्त नहीं होती। इसी प्रकार सोवियत संघ के विघटन ने यह भी सिद्ध किया कि किसी एक शक्ति पर अत्यधिक निर्भरता दीर्घकाल में जोखिम उत्पन्न कर सकती है।

वर्तमान समय में भी भारत इसी यथार्थवादी दृष्टिकोण का अनुसरण कर रहा है। रूस यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने राष्ट्रीय हितों के अनुरूप संतुलित नीति अपनाई। ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए रियायती दरों पर रूसी तेल का आयात जारी रखा, वहीं अमेरिका और यूरोप के साथ अपने संबंधों को भी मजबूत बनाए रखा।

इसी प्रकार पश्चिम एशिया में भारत इजरायल और अरब देशों दोनों के साथ अपने संबंधों का संतुलन बनाए हुए है। यह संतुलन भारतीय विदेश नीति की परिपक्वता को प्रदर्शित करता है।

पश्चिम एशिया का बदलता सामरिक महत्व

1991 के बाद पश्चिम एशिया भारत की विदेश नीति का अत्यंत महत्वपूर्ण क्षेत्र बन गया। ऊर्जा आयात, प्रवासी भारतीय, समुद्री व्यापार और निवेश के कारण इस क्षेत्र का महत्व लगातार बढ़ता गया।

आज भी भारत के ऊर्जा आयात का बड़ा भाग इसी क्षेत्र से आता है। लाखों भारतीय नागरिक खाड़ी देशों में कार्यरत हैं तथा भारत को विशाल मात्रा में विदेशी मुद्रा प्रेषण प्राप्त होता है। इसलिए इस क्षेत्र की स्थिरता भारत के आर्थिक हितों से प्रत्यक्ष रूप से जुड़ी हुई है।

वर्तमान संघर्षों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि समुद्री मार्गों की सुरक्षा, ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण तथा क्षेत्रीय साझेदारियों का विस्तार भारत की विदेश नीति की अनिवार्य आवश्यकता है।

चीन का उभार और नई रणनीतिक चुनौती

यदि 1991 का सबसे बड़ा परिवर्तन सोवियत संघ का पतन था, तो वर्तमान काल की सबसे महत्वपूर्ण घटना चीन का अभ्युदय है।

चीन केवल आर्थिक शक्ति नहीं रहा, बल्कि वह सैन्य, तकनीकी तथा समुद्री क्षमता के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को प्रभावित करने का प्रयास कर रहा है। दक्षिण चीन सागर, हिंद महासागर, बेल्ट एंड रोड पहल, सीमावर्ती तनाव तथा प्रौद्योगिकीय प्रतिस्पर्धा इसके प्रमुख आयाम हैं।

भारत के लिए चुनौती केवल सीमा विवाद तक सीमित नहीं है। आपूर्ति शृंखलाओं, उन्नत विनिर्माण, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, दुर्लभ खनिजों तथा वैश्विक संस्थाओं में प्रभाव की प्रतिस्पर्धा भी उतनी ही महत्वपूर्ण है।

इसलिए भारत को अपनी आर्थिक क्षमता, रक्षा आधुनिकीकरण, समुद्री शक्ति तथा प्रौद्योगिकीय नवाचार पर समान रूप से बल देना होगा।

रणनीतिक स्वायत्तता का विकसित स्वरूप

शीत युद्ध के समय भारत की गुटनिरपेक्षता का उद्देश्य किसी सैन्य गुट में शामिल न होना था। वर्तमान समय में रणनीतिक स्वायत्तता का अर्थ कहीं अधिक व्यापक हो गया है।

आज इसका आशय है कि भारत प्रत्येक मुद्दे पर स्वतंत्र निर्णय लेने में सक्षम हो, किसी एक शक्ति पर अत्यधिक निर्भर न रहे तथा विभिन्न साझेदारियों के माध्यम से अपने राष्ट्रीय हितों को अधिकतम कर सके।

इसी कारण भारत बहुपक्षीय संस्थाओं में सक्रिय रहते हुए द्विपक्षीय साझेदारियों का भी विस्तार कर रहा है। यह नीति बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में भारत की भूमिका को सुदृढ़ बनाती है।

आंतरिक परिवर्तन और विदेश नीति का संबंध

विदेश नीति केवल बाहरी परिस्थितियों से निर्धारित नहीं होती। किसी भी देश की आंतरिक आर्थिक, औद्योगिक, वैज्ञानिक तथा संस्थागत क्षमता उसकी वैश्विक भूमिका को निर्धारित करती है।

1991 के आर्थिक सुधारों ने भारत की विदेश नीति को नई ऊर्जा प्रदान की। आज भी यदि भारत वैश्विक नेतृत्व की आकांक्षा रखता है, तो उसे शिक्षा, अनुसंधान, विनिर्माण, रक्षा उत्पादन, नवाचार, आधारभूत संरचना तथा मानव संसाधन विकास में निरंतर निवेश करना होगा।

अंतरराष्ट्रीय प्रभाव अंततः घरेलू क्षमता पर ही आधारित होता है।

निष्कर्ष

वर्तमान विश्व व्यवस्था पुनः संक्रमण के दौर से गुजर रही है। शक्ति संतुलन बदल रहा है, वैश्विक संस्थाओं की भूमिका पुनर्परिभाषित हो रही है और भू राजनीतिक प्रतिस्पर्धा नए क्षेत्रों तक फैल चुकी है। ऐसे समय में 1991 का अनुभव भारत को तीन महत्वपूर्ण संदेश देता है। पहला, बदलती वैश्विक परिस्थितियों के अनुरूप शीघ्र रणनीतिक अनुकूलन आवश्यक है। दूसरा, आर्थिक शक्ति विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा की आधारशिला है। तीसरा, विदेश नीति का संचालन वैचारिक आग्रहों के स्थान पर यथार्थवादी राष्ट्रीय हितों के आधार पर होना चाहिए।

इन सिद्धांतों के साथ यदि भारत अपनी आर्थिक क्षमता, तकनीकी नवाचार, समुद्री शक्ति, रक्षा आधुनिकीकरण तथा बहुआयामी कूटनीतिक साझेदारियों को निरंतर सुदृढ़ करता है, तो वह न केवल वर्तमान वैश्विक अनिश्चितताओं का सफलतापूर्वक सामना कर सकेगा, बल्कि उभरती बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में एक उत्तरदायी, प्रभावशाली और निर्णायक शक्ति के रूप में भी स्थापित होगा। यह दृष्टिकोण केवल विदेश नीति की सफलता का आधार नहीं है, बल्कि विकसित भारत की व्यापक राष्ट्रीय परियोजना का भी अनिवार्य अंग है।


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