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भारतीय न्यायपालिका: महिलाओं का प्रतिनिधित्व, चुनौतियाँ, सुधार और भविष्य की दिशा

Representation of Women in the Indian Judiciary: Challenges, Reforms, and Future Direction

भारत के सर्वोच्च न्यायालय में न्यायमूर्ति वी. मोहना की नियुक्ति न्यायिक इतिहास में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है। वे बार से सीधे सर्वोच्च न्यायालय में पदोन्नत होने वाली दूसरी महिला अधिवक्ता हैं। यह नियुक्ति महिलाओं की बढ़ती भागीदारी का सकारात्मक संकेत अवश्य देती है, लेकिन उच्च न्यायपालिका में महिलाओं की वास्तविक स्थिति अब भी चिंताजनक है। प्रतिनिधित्व की कमी केवल संख्या का प्रश्न नहीं, बल्कि न्यायपालिका की समावेशिता, विश्वसनीयता और लोकतांत्रिक चरित्र से भी जुड़ा हुआ मुद्दा है।

भारत में लैंगिक असमानता की वास्तविक तस्वीर

भारतीय न्यायपालिका के शीर्ष स्तर पर महिलाओं की उपस्थिति लंबे समय से सीमित रही है। सर्वोच्च न्यायालय में अधिकांश प्रत्यक्ष नियुक्तियाँ पुरुष अधिवक्ताओं की हुई हैं, जिनमें कई आगे चलकर भारत के मुख्य न्यायाधीश भी बने। इसके विपरीत, महिलाओं को ऐसे अवसर बहुत कम मिले हैं और नेतृत्वकारी भूमिकाओं तक उनकी पहुँच भी सीमित रही है।

यह स्थिति दर्शाती है कि केवल व्यक्तिगत उपलब्धियाँ पर्याप्त नहीं हैं; संरचनात्मक और संस्थागत सुधारों के बिना न्यायपालिका में संतुलित प्रतिनिधित्व प्राप्त करना कठिन होगा।

भारतीय न्यायपालिका में महिलाओं की वर्तमान स्थिति

  1. सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court)

पहली महिला न्यायाधीश

  • भारत के सर्वोच्च न्यायालय की पहली महिला न्यायाधीश न्यायमूर्ति एम. फातिमा बीवी थीं, जिन्हें 1989 में नियुक्त किया गया था।

उच्च न्यायालय (High Courts)

  • उच्च न्यायालयों में महिला न्यायाधीशों का अनुपात अभी भी सीमित है।
  • कॉलेजियम द्वारा अनुशंसित उम्मीदवारों में महिलाओं की भागीदारी पुरुषों की तुलना में काफी कम रही है।
  • यह दर्शाता है कि उच्च न्यायपालिका तक महिलाओं की पहुँच अभी भी चुनौतीपूर्ण बनी हुई है।

अधीनस्थ न्यायालय (Subordinate Judiciary)

  • अधीनस्थ न्यायपालिका में महिलाओं की भागीदारी अपेक्षाकृत बेहतर है।
  • कई राज्यों में आरक्षण और प्रतियोगी परीक्षाओं के माध्यम से बड़ी संख्या में महिलाएँ न्यायिक सेवाओं में प्रवेश कर रही हैं।

अधिवक्ता (Advocates)

  • भारत में अधिवक्ताओं की कुल संख्या में महिलाओं का अनुपात अभी भी सीमित है।
  • वरिष्ठ अधिवक्ता, बार काउंसिल और नेतृत्वकारी पदों पर महिलाओं का प्रतिनिधित्व और भी कम है।

वैश्विक अनुभव: समावेशी न्यायपालिका का मॉडल

कई लोकतांत्रिक देशों ने न्यायपालिका में लैंगिक संतुलन को संस्थागत रूप दिया है।

बेल्जियम

  • 2014 में, बेल्जियम ने अपने संवैधानिक न्यायालय को नियंत्रित करने वाले 1989 के विशेष अधिनियम के अनुच्छेद 34(5) में संशोधन किया।
  • इस संशोधन के अनुसार,   न्यायाधीशों में कम से कम एक तिहाई सदस्य पुरुष और महिला दोनों से होने चाहिए।
  • जब तक कोटा पूरा नहीं हो जाता, प्रत्येक दो पुरुष नियुक्तियों के बाद, तीसरी नियुक्ति एक महिला की होनी चाहिए।
  • न्यायालय भाषाई और व्यावसायिक प्रतिनिधित्व कोटा का भी पालन करता है।

दक्षिण अफ्रीका

  • संविधान के अनुच्छेद 174(2) के अनुसार न्यायपालिका को देश की नस्लीय और लैंगिक संरचना को प्रतिबिंबित करना आवश्यक है।
  • वर्तमान में संवैधानिक न्यायालय में 11 न्यायाधीशों में से 6 महिलाएं हैं और इसकी अध्यक्षता एक महिला मुख्य न्यायाधीश कर रही हैं।
  • यह विश्व की पहली  महिला-बहुमत वाली  संवैधानिक अदालतों में से एक है।

कनाडा, जर्मनी, अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में भी सर्वोच्च न्यायालयों में महिलाओं की भागीदारी अपेक्षाकृत अधिक है।

ये उदाहरण बताते हैं कि स्पष्ट नीतियाँ और संस्थागत प्रतिबद्धता प्रतिनिधित्व बढ़ाने में प्रभावी हो सकती हैं।

भारत में प्रतिनिधित्व आधारित सोच नई नहीं है

  • भारतीय न्यायिक नियुक्तियों में विभिन्न उच्च न्यायालयों और क्षेत्रों के प्रतिनिधित्व पर पहले से विचार किया जाता है।
  • यदि भौगोलिक संतुलन को महत्व दिया जा सकता है, तो लैंगिक संतुलन को भी न्यायिक नियुक्तियों का वैध और आवश्यक मानदंड बनाया जा सकता है। इससे न्यायपालिका समाज की वास्तविक संरचना के अधिक निकट दिखाई देगी।

महिलाओं की भागीदारी क्यों महत्वपूर्ण है?

महिला न्यायाधीशों की बढ़ी हुई उपस्थिति केवल समान अवसर का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह न्यायिक प्रणाली को कई स्तरों पर मजबूत बनाती है;

  • निर्णय प्रक्रिया में विविध दृष्टिकोण शामिल होते हैं।
  • लैंगिक संवेदनशील मामलों की समझ और विश्लेषण व्यापक हो सकता है।
  • न्यायपालिका में जनता का विश्वास और वैधता बढ़ती है।
  • लोकतांत्रिक मूल्यों और समावेशी शासन को मजबूती मिलती है।
  • भविष्य की महिला विधि पेशेवरों के लिए प्रेरणादायक वातावरण बनता है।

आवश्यक सुधार

भारत में अधिक संतुलित प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए निम्नलिखित कदम उपयोगी हो सकते हैं;

  • संवैधानिक एवं नीतिगत सुधार: न्यायिक नियुक्ति प्रक्रिया में लैंगिक विविधता को स्पष्ट रूप से महत्व देने वाले प्रावधानों पर विचार किया जा सकता है, ताकि नियुक्तियाँ समाज की व्यापक संरचना को प्रतिबिंबित करें।
  • संस्थागत लक्ष्य: सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालयों में महिला न्यायाधीशों की न्यूनतम भागीदारी के लिए स्पष्ट लक्ष्य निर्धारित किए जा सकते हैं, जिससे चयन प्रक्रिया अधिक संतुलित बने।
  • प्रतिभा विकास और अवसर: बार, वरिष्ठ अधिवक्ताओं, न्यायिक सेवाओं और नेतृत्व पदों पर महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए मार्गदर्शन, प्रशिक्षण और समान अवसरों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
  • पारदर्शी चयन प्रक्रिया: नियुक्तियों में योग्यता के साथ-साथ विविधता और समावेशन को भी एक महत्वपूर्ण मूल्य के रूप में स्वीकार किया जाना चाहिए।

ऐतिहासिक निर्णय जिन्होंने महिलाओं के अधिकारों की दिशा तय की

  1. बेब बनाम लॉ सोसायटी (1914)

यह मामला विधि व्यवसाय में महिलाओं के प्रवेश के संघर्ष का महत्वपूर्ण उदाहरण माना जाता है। चार महिलाओं ने यह तर्क दिया कि कानून में प्रयुक्त व्यक्ति (Person)” शब्द में महिलाओं को भी शामिल माना जाना चाहिए और उन्हें सॉलिसिटर बनने की परीक्षा में बैठने का अधिकार मिलना चाहिए।

प्रमुख महत्व

  • विधि पेशे में महिलाओं के प्रवेश पर लगे अवरोधों को चुनौती मिली।
  • इसने भविष्य में कानूनी सुधारों और लिंग-तटस्थ व्याख्या की दिशा में बहस को गति दी।
  • यद्यपि तत्काल राहत नहीं मिली, लेकिन इस संघर्ष ने आगे आने वाले सुधारों की नींव रखी।
  1. मेसर्स पीएलआर प्रोजेक्ट प्राइवेट लिमिटेड बनाम महाकाली कोलफील्ड

इस मामले के माध्यम से उच्च न्यायपालिका में महिलाओं के समान प्रतिनिधित्व की आवश्यकता पर बल दिया गया। महिला अधिवक्ताओं और संगठनों ने संवैधानिक न्यायालयों में महिला न्यायाधीशों की कम संख्या को लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व और समान अवसर के दृष्टिकोण से चुनौती दी।

प्रमुख संदेश

  • न्यायपालिका में लैंगिक संतुलन केवल सामाजिक न्याय का नहीं, बल्कि संस्थागत वैधता का भी प्रश्न है।
  • न्यायालय ने प्रत्यक्ष अनिवार्य निर्देश नहीं दिए, किंतु इस बहस ने महिला प्रतिनिधित्व के मुद्दे को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाया।

चुनौतियाँ

  • वरिष्ठ स्तर पर महिलाओं की अपेक्षाकृत कम संख्या
  • पारंपरिक पेशेवर नेटवर्क में असमान पहुँच
  • नेतृत्व पदों तक सीमित अवसर
  • संस्थागत परिवर्तन की धीमी गति
  • दीर्घकालिक नीतिगत प्रतिबद्धता का अभाव

निष्कर्ष

न्यायमूर्ति वी. मोहना की नियुक्ति भारतीय न्यायपालिका में सकारात्मक परिवर्तन का संकेत है, किंतु वास्तविक लैंगिक समानता के लिए केवल प्रतीकात्मक उपलब्धियाँ पर्याप्त नहीं हैं। आवश्यक है कि न्यायिक संस्थाएँ ऐसी नीतियाँ और प्रक्रियाएँ विकसित करें जो योग्यता, समान अवसर और समावेशी प्रतिनिधित्व के बीच संतुलन स्थापित करें। एक अधिक संतुलित और विविध न्यायपालिका न केवल महिलाओं की भागीदारी बढ़ाएगी, बल्कि न्याय व्यवस्था की विश्वसनीयता, लोकतांत्रिक वैधता और सार्वजनिक विश्वास को भी सुदृढ़ करेगी।

 


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