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भारतीय संविधान में शक्ति पृथक्करण का सिद्धांत एवं व्यव्हार

Theory and Practice of Separation of Powers in the Indian Constitution

लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था के क्षेत्र में शक्तियों के पृथक्करण (Separation of Powers) की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान रखती है। यह राजनीतिक व्यवस्था में नियंत्रण और संतुलन (Checks and Balances) सुनिश्चित करने का आधार है तथा नागरिकों के हितों और अधिकारों की रक्षा करती है।

  • सरकार की विभिन्न शाखाओं के बीच शक्ति का विभाजन करके संवैधानिक शासन का उद्देश्य किसी एक संस्था में अधिकारों के केंद्रीकरण को रोकना, स्थिरता, जवाबदेही तथा व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं की रक्षा को बढ़ावा देना है।
  • यह लेख शक्तियों के पृथक्करण की परिभाषा, उसके विकास, सर्वोच्च न्यायालय की राय, संविधान सभा की बहसों तथा तुलनात्मक वैश्विक दृष्टिकोण का विश्लेषण करता है।

शक्तियों के पृथक्करण की परिभाषा

  • यह सिद्धांत, जिसकी जड़ें प्रबोधन युग (Enlightenment Era) में हैं, फ्रांसीसी सामाजिक टिप्पणीकार और राजनीतिक विचारक मॉन्टेस्क्यू (Montesquieu) द्वारा 1748 में प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया था। उन्होंने चेतावनी दी थी कि यदि विधायी, कार्यकारी और न्यायिक शक्तियाँ एक ही व्यक्ति या मजिस्ट्रेटों के किसी समूह के हाथों में केंद्रित हो जाएँ, तो यह अत्यंत खतरनाक होगा।

मॉन्टेस्क्यू के शब्द आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं: ‘स्वतंत्रता संभव नहीं हो सकती, यदि न्याय करने की शक्ति को विधायी और कार्यकारी शक्तियों से अलग न रखा जाए तो स्वतंत्रता नहीं रह सकती और यदि वही व्यक्ति या वही निकाय इन तीनों शक्तियों का प्रयोग करे, तो सब कुछ समाप्त हो जाएगा।’

मॉन्टेस्क्यू का प्रभाव

  • मॉन्टेस्क्यू का स्थायी प्रभाव शक्ति के केंद्रीकरण में निहित खतरों की उनकी गहरी समझ में निहित है। उनकी प्रसिद्ध कृति स्पिरिट ऑफ लॉज़ (The Spirit of the Laws)’ ने शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत की नींव रखी।
  • मूल रूप से, मॉन्टेस्क्यू का तर्क इस विचार पर आधारित था कि विधायी, कार्यकारी और न्यायिक शक्तियों का एकीकरण अनिवार्य रूप से व्यक्तिगत स्वतंत्रताओं के क्षरण और निरंकुश शासन के उदय का कारण बनेगा।
  • इसके समाधान के रूप में उन्होंने अत्याचार से सुरक्षा के लिए इन शक्तियों को अलग-अलग शाखाओं में विभाजित करने का प्रस्ताव रखा।

लॉक द्वारा शक्तियों का वर्गीकरण

मॉन्टेस्क्यू के विचारों को आगे बढ़ाते हुए जॉन लॉक (John Locke) ने सरकारी शक्तियों को तीन अलग-अलग क्षेत्रों में वर्गीकृत किया:

  1. सतत कार्यकारी शक्ति (Continuous Executive Power)
  2. असतत विधायी शक्ति (Discontinuous Legislative Power)
  3. संघीय शक्ति (Federative Power)

इस वर्गीकरण ने सरकार के भीतर भूमिकाओं और उत्तरदायित्वों के स्पष्ट विभाजन की आवश्यकता पर बल दिया, जिससे प्रत्येक शाखा के कार्य और सीमाएँ निश्चित हो सकें।

  • सतत कार्यकारी शक्ति में कार्यपालिका और न्यायपालिका की शक्तियाँ शामिल थीं।
  • असतत विधायी शक्ति में कानून बनाने और संशोधित करने की शक्ति शामिल थी।
  • संघीय शक्ति का संबंध विदेशी मामलों के विनियमन से था।

वेड और फिलिप्स के सिद्धांत (शक्तियों के पृथक्करण के घटक)

विधि विशेषज्ञ वेड (Wade) और फिलिप्स (Phillips) ने शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को तीन मूलभूत सिद्धांतों में संक्षेपित किया:

(i) एक ही व्यक्ति द्वारा एक से अधिक अंगों को धारण करने पर प्रतिबंध

यह सिद्धांत कहता है कि कोई भी व्यक्ति एक ही समय में सरकार के एक से अधिक अंगों में पद नहीं धारण करे। इससे शक्ति का केंद्रीकरण एक व्यक्ति में होने से रोका जा सकता है।

(ii) अंगों के बीच हस्तक्षेप करना

यह सिद्धांत कहता है कि सरकार का प्रत्येक अंग अन्य शाखाओं के कार्यों और अधिकार-क्षेत्र में हस्तक्षेप न करे। इससे विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका की विशिष्ट भूमिकाएँ सुरक्षित रहती हैं।

(iii) पारस्परिक सम्मान और सहयोग

यह सिद्धांत सरकार की विभिन्न शाखाओं के बीच सौहार्दपूर्ण सह-अस्तित्व के महत्व पर बल देता है। यद्यपि स्वतंत्रता आवश्यक है, परंतु यह शत्रुता में परिवर्तित नहीं होनी चाहिए, क्योंकि प्रभावी शासन के लिए सहयोग और समन्वय आवश्यक हैं।

भारत में शक्तियों के पृथक्करण पर संविधान सभा की बहस

भारत की संविधान सभा में शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत को लेकर महत्वपूर्ण चर्चा हुई थी। संविधान सभा के सदस्य प्रो. के. टी. शाह (Prof. K.T. Shah) ने एक संशोधन प्रस्तावित किया था, जिसके तहत एक नया अनुच्छेद 40-A जोड़ा जाना था।

  • इस प्रस्ताव में राज्य के प्रमुख अंगों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच पूर्ण शक्तिपृथक्करण पर बल दिया गया था।
  • संविधान सभा के एक अन्य सदस्य काज़ी सैयद करीमुद्दीन (Kazi Syed Karimuddin) ने प्रो. के. टी. शाह के प्रस्ताव का पूर्ण समर्थन किया और कठोर शक्तिपृथक्करण की अवधारणा का समर्थन किया।
  • हालाँकि, संविधान सभा के सदस्य श्री के. हनुमंथैया (Shri K. Hanumanthiya) ने इस प्रस्ताव से असहमति व्यक्त की।
  • उनका तर्क था कि प्रारूप समिति (Drafting Committee) पहले ही संसदीय शासन प्रणाली को स्वीकृति दे चुकी है, जो उनके अनुसार भारत के लिए अधिक उपयुक्त थी।
  • श्री हनुमंथैया ने आशंका व्यक्त की कि यदि कार्यपालिका, न्यायपालिका और विधायिका को पूरी तरह अलग कर दिया गया, तो उनके बीच टकराव उत्पन्न हो सकता है।
  • उन्होंने इस बात पर बल दिया कि शासन व्यवस्था में सामंजस्य होना चाहिए और इन तीनों शाखाओं के बीच संघर्ष देश की शांति और प्रगति के लिए हानिकारक सिद्ध हो सकता है।

प्रो. शिब्बन लाल सक्सेना (Prof. Shibban Lal Saksena) ने भी श्री हनुमंथैया के विचारों का समर्थन किया। उन्होंने कठोर शक्तिपृथक्करण के बजाय एक सामंजस्यपूर्ण शासन संरचना का समर्थन किया।

  • भारतीय संविधान के प्रमुख शिल्पकार डॉ. बी. आर. अम्बेडकर ( B.R. Ambedkar) ने इस विषय पर भिन्न दृष्टिकोण प्रस्तुत किया। उन्होंने प्रो. के. टी. शाह के तर्क से असहमति व्यक्त की और अधिक संतुलित दृष्टिकोण का समर्थन किया।
  • डॉ. अम्बेडकर ने स्वीकार किया कि कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच पृथक्करण आवश्यक है। किंतु उन्होंने यह भी इंगित किया कि अमेरिकी मॉडल, जिसमें कार्यपालिका और विधायिका के बीच कठोर पृथक्करण है, उसकी भी अपनी सीमाएँ हैं। उन्होंने संसदीय कार्यों की जटिलता और व्यापकता पर प्रकाश डालते हुए कहा कि विधायिका के सदस्यों को संसद में उपस्थित कार्यपालिका से मार्गदर्शन और पहल की आवश्यकता होती है।
  • डॉ. अम्बेडकर का मानना था कि संयुक्त राज्य अमेरिका की तरह पूर्ण पृथक्करण भारत के लिए उपयुक्त नहीं होगा और इससे विधायिका के प्रभावी कार्य संचालन में बाधा उत्पन्न हो सकती है।

भारतीय संविधान और शक्तियों के पृथक्करण का शिथिलीकरण

भारत के राष्ट्रपति, जो कार्यपालिका के प्रमुख हैं, कुछ विधायी शक्तियों से भी संपन्न हैं।

  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 123(1) राष्ट्रपति को अध्यादेश जारी करने की शक्ति प्रदान करता है, जब ऐसी परिस्थितियाँ उत्पन्न हों जिनमें तत्काल कार्रवाई आवश्यक हो और संसद के दोनों सदन सत्र में न हों। यदि राष्ट्रपति को यह संतोष हो जाए कि ऐसी कार्रवाई आवश्यक है, तो वे अध्यादेश जारी कर सकते हैं।
  • इसके अतिरिक्त, अनुच्छेद 356 के अंतर्गत संवैधानिक तंत्र की विफलता के कारण आपातकाल की घोषणा होने पर राष्ट्रपति को अनुच्छेद 357 के तहत विधायी अधिकार प्राप्त हो जाते हैं। इससे राष्ट्रपति स्थिति से निपटने के लिए कानून बना सकते हैं।

इसके अलावा, भारतीय संविधान के अनुच्छेद 372 और 372-A राष्ट्रपति को मौजूदा कानूनों को संविधान के अनुरूप बनाने हेतु उनमें आवश्यक संशोधन, परिवर्तन अथवा निरसन करने का अधिकार प्रदान करते हैं।

कार्यपालिका और न्यायिक कार्य

  • उल्लेखनीय है कि भारत के राष्ट्रपति कुछ न्यायिक कार्य भी करते हैं, जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 103(1) में वर्णित है।
  • इस अनुच्छेद के अनुसार यदि संसद के किसी भी सदन के किसी सदस्य की अयोग्यता के संबंध में अनुच्छेद 102(1) के अंतर्गत कोई प्रश्न उत्पन्न होता है, तो उस प्रश्न को अंतिम निर्णय के लिए राष्ट्रपति के पास भेजा जाएगा।
  • अनुच्छेद 50 न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच पृथक्करण बनाए रखने के महत्व पर बल देता है। तथापि, व्यवहार में कुछ ऐसे उदाहरण हैं जहाँ कार्यपालिका न्यायिक शक्तियों का प्रयोग करती है, विशेष रूप से न्यायाधीशों की नियुक्ति के संदर्भ में।
  • अनुच्छेद 124, 126 और 127 सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति का ढाँचा प्रदान करते हैं, जिसमें कार्यपालिका और न्यायपालिका दोनों की भूमिका होती है।
  • न्यायपालिका के विधायी कार्य
  • कुछ मामलों में न्यायपालिका भी विधायी कार्यों का निर्वहन करती है।
  • उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय को ऐसे नियम बनाने का अधिकार है जिनका विधायी स्वरूप होता है और जो न्यायिक व्यवस्था के विभिन्न पहलुओं को विनियमित करते हैं।
  • इसके अतिरिक्त, जब न्यायपालिका किसी विधिक प्रावधान को संविधान के विपरीत या लोकनीति (Public Policy) के विरुद्ध पाती है, तो उसे उस प्रावधान को शून्य और अवैध घोषित करने की शक्ति प्राप्त है।
  • ऐसी परिस्थितियों में विधिक व्यवस्था को संविधान के अनुरूप बनाने के लिए संशोधन आवश्यक हो सकते हैं।
  • भारत में शक्तियों का पृथक्करण एक जटिल और गतिशील अवधारणा है। यद्यपि कागज़ पर विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के कार्यों का स्पष्ट विभाजन दिखाई देता है, व्यवहारिक स्तर पर अक्सर इनके बीच परस्पर निर्भरता और कार्यक्षेत्रों का आंशिक ओवरलैप देखने को मिलता है।
  • भारतीय संविधान राष्ट्रपति को विधायी और न्यायिक क्षेत्रों में कुछ विशिष्ट शक्तियाँ प्रदान करता है, और ऐसे उदाहरण भी मौजूद हैं जहाँ कार्यपालिका तथा न्यायपालिका अन्य शाखाओं से संबंधित कार्यों का निर्वहन करती हैं।
  • यह जटिल व्यवस्था भारतीय संवैधानिक ढाँचे की अनुकूलन क्षमता को दर्शाती है, साथ ही यह प्रश्न भी उठाती है कि व्यवहार में शक्तियों का पृथक्करण किस सीमा तक लागू है।

इस सिद्धांत पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय

  • भारत में शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत की स्थिति को विभिन्न न्यायिक निर्णयों के माध्यम से स्पष्ट किया गया है, जैसा कि निम्नलिखित मामलों से प्रदर्शित होता है:

In Re Delhi Law Act Case

  • इस मामले में मुख्य न्यायाधीश कानिया (Chief Justice Kania) ने भारतीय संविधान में शक्तियों के पृथक्करण के संबंध में महत्वपूर्ण टिप्पणी की।
  • उन्होंने कहा कि यद्यपि संविधान ने स्पष्ट रूप से शक्तियों के पृथक्करण की स्थापना नहीं की है, फिर भी यह स्पष्ट है कि संविधान ने कानून बनाने के लिए विस्तृत प्रावधानों के साथ एक विधायिका की स्थापना की है।
  • मुख्य न्यायाधीश कानिया ने प्रश्न उठाया कि क्या इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि संविधान के अंतर्गत कानून बनाने की प्राथमिक जिम्मेदारी विधायिका पर ही निहित है।
  • यह दृष्टिकोण कानून निर्माण में विधायिका की केंद्रीय भूमिका पर बल देता है तथा शक्तियों के एक प्रकार के निहित (Implied) पृथक्करण की ओर संकेत करता है।

Rai Sahib Ram Jawaya v. State of Punjab (1955)

  • मुख्य न्यायाधीश बी. के. मुखर्जी (Chief Justice B.K. Mukherjea) ने भी इसी प्रकार भारतीय संविधान में शक्तियों के स्पष्ट पृथक्करण की अनुपस्थिति को दोहराया।
  • उन्होंने संविधान द्वारा विधायिका की स्थापना और कानून निर्माण संबंधी प्रावधानों पर बल दिया।
  • मुख्य न्यायाधीश मुखर्जी ने यह प्रश्न उठाया कि संविधान में किसी विपरीत संकेत के अभाव में क्या कार्यपालिका या न्यायपालिका जैसी अन्य संस्थाओं को भी विधायी कार्य करने का अधिकार माना जा सकता है।
  • इस निर्णय ने पुनः इस विचार की पुष्टि की कि भारतीय संविधान शक्तियों के पृथक्करण के सिद्धांत का कठोरता से पालन नहीं करता, बल्कि सरकार की विभिन्न शाखाओं के कार्यों में अंतर स्थापित करता है।

Ram Krishna Dalmia v. Justice Tendolkar (1958)

  • इस मामले में मुख्य न्यायाधीश एस. आर. दास (Chief Justice S.R. Das) ने स्वीकार किया कि भारतीय संविधान में अमेरिकी संविधान की तरह कठोर शक्तिपृथक्करण के लिए कोई विशिष्ट प्रावधान नहीं है।
  • फिर भी उन्होंने इस बात पर बल दिया कि भारतीय संविधान में विधायी, कार्यकारी और न्यायिक शक्तियों का एक निहित विभाजन विद्यमान है।
  • मुख्य न्यायाधीश दास ने कहा कि यद्यपि इस सिद्धांत को स्पष्ट रूप से मान्यता नहीं दी गई है, फिर भी संविधान विभिन्न शाखाओं के कार्यों को परोक्ष रूप से अलग-अलग करता है।

Jayanti Lal Amrit Lal v. S.M. Ram (1964)

  • इस मामले में भी पूर्ववर्ती निर्णयों के समान विचार व्यक्त किए गए।
  • न्यायालय ने कहा कि यद्यपि भारतीय संविधान ने अमेरिकी संविधान में पाए जाने वाले कठोर शक्तिपृथक्करण को स्पष्ट रूप से नहीं अपनाया है, फिर भी उसने अपनी विभिन्न शाखाओं के बीच शक्तियों का एक निहित विभाजन बनाए रखा है।

निष्कर्ष (Conclusion)

  • शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत लोकतांत्रिक शासन की एक महत्वपूर्ण आधारशिला है, जिसका उद्देश्य किसी एक संस्था या व्यक्ति के हाथों में शक्ति के अत्यधिक केंद्रीकरण को रोकना तथा नागरिकों की स्वतंत्रता और अधिकारों की रक्षा करना है। मॉन्टेस्क्यू द्वारा प्रतिपादित यह सिद्धांत आधुनिक संवैधानिक व्यवस्थाओं को गहराई से प्रभावित करता रहा है।
  • यद्यपि शक्तियों का पूर्ण और कठोर पृथक्करण व्यवहार में संभव नहीं है, फिर भी इसका मूल उद्देश्य सरकार के विभिन्न अंगों विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संतुलन और नियंत्रण बनाए रखना है। भारत में संविधान ने अमेरिकी मॉडल की तरह कठोर पृथक्करण को नहीं अपनाया, बल्कि सहयोग, समन्वय और परस्पर नियंत्रण (Checks and Balances) पर आधारित एक व्यावहारिक व्यवस्था विकसित की है।
  • भारतीय संविधान में विभिन्न अंगों के कार्यों का विभाजन तो किया गया है, किन्तु कई क्षेत्रों में उनके कार्य एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने भी अपने विभिन्न निर्णयों में यह स्पष्ट किया है कि भारतीय संविधान शक्तियों के पूर्ण पृथक्करण के बजाय कार्यों के पृथक्करण और संतुलन की व्यवस्था को मान्यता देता है।
  • अतः यह कहा जा सकता है कि शक्तियों के पृथक्करण का सिद्धांत लोकतांत्रिक शासन में स्वतंत्रता, उत्तरदायित्व और सुशासन सुनिश्चित करने का एक प्रभावी साधन है। इसकी वास्तविक सफलता कठोर विभाजन में नहीं, बल्कि विभिन्न संवैधानिक संस्थाओं के बीच संतुलित सहयोग, पारस्परिक सम्मान और संवैधानिक सीमाओं के पालन में निहित है।

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