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ब्रिटेन और भारत में प्रधानमंत्री पद : एक तुलनात्मक संवैधानिक विश्लेषण

जून 2026 में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के इस्तीफे ने एक बार फिर यह प्रश्न सामने रख दिया कि संसदीय लोकतंत्र में प्रधानमंत्री पद की प्रकृति क्या है और नेतृत्व परिवर्तन की प्रक्रिया कितनी जीवंत और जवाबदेह हो सकती है। ब्रिटेन और भारत दोनों ही संसदीय प्रणाली पर आधारित लोकतंत्र हैं और भारत की शासन व्यवस्था की जड़ें काफी हद तक ब्रिटिश वेस्टमिन्स्टर मॉडल में हैं। फिर भी दोनों देशों में प्रधानमंत्री की नियुक्ति, शक्तियाँ, जवाबदेही और पद से हटाने की प्रक्रिया में कई गहरे अंतर हैं।

संवैधानिक आधार : लिखित बनाम अलिखित

भारत का संविधान विश्व का सबसे विस्तृत लिखित संविधान है। अनुच्छेद 74 और 75 प्रधानमंत्री की नियुक्ति, मंत्रिपरिषद की संरचना और राष्ट्रपति के साथ उनके संबंध को स्पष्ट रूप से परिभाषित करते हैं। इसके विपरीत ब्रिटेन के पास कोई एकल लिखित संविधान नहीं है। वहाँ की व्यवस्था सदियों पुरानी परंपराओं, संसदीय अधिनियमों और न्यायिक निर्णयों के संग्रह पर टिकी है। प्रधानमंत्री पद की कोई लिखित परिभाषा नहीं है, फिर भी यह पद अत्यंत शक्तिशाली और व्यवस्थित ढंग से संचालित होता है।

यह अंतर अपने आप में एक महत्त्वपूर्ण तथ्य को उजागर करता है कि संस्थाओं की मजबूती केवल लिखे हुए नियमों से नहीं, बल्कि परंपराओं और सामाजिक-राजनीतिक संस्कृति से भी तय होती है।

प्रधानमंत्री की नियुक्ति : समानताएँ और अंतर

दोनों देशों में प्रधानमंत्री की नियुक्ति की मूल प्रक्रिया एक जैसी दिखती है। जिस दल को संसद के निम्न सदन में बहुमत मिलती है, उस दल के नेता को राज्याध्यक्ष सरकार बनाने का न्योता देते हैं। भारत में यह कार्य राष्ट्रपति करते हैं और ब्रिटेन में राजशाही।

परन्तु व्यावहारिक धरातल पर दोनों में फर्क है। भारत में राष्ट्रपति के पास विवेकाधीन शक्ति तब आती है जब कोई दल स्पष्ट बहुमत न पा सके। ऐसी परिस्थिति में वे यह तय कर सकते हैं कि किसे पहले सरकार बनाने का अवसर दें। 1979 और 1989 जैसे उदाहरण इस विवेकाधीन भूमिका के साक्षी रहे हैं। ब्रिटेन में राजशाही की भूमिका और भी अधिक औपचारिक है क्योंकि वहाँ की दो-दलीय प्रणाली अधिकांश समय स्पष्ट बहुमत दे देती है।

शक्तियों का स्वरूप :

भारत के संविधान में राष्ट्रपति को कार्यपालिका का संवैधानिक प्रमुख माना गया है, लेकिन अनुच्छेद 74 के अनुसार वे मंत्रिपरिषद की सलाह पर कार्य करते हैं। 44वें संविधान संशोधन के बाद यह स्पष्ट हो गया कि राष्ट्रपति मंत्रिपरिषद की सलाह को एक बार लौटा सकते हैं, किन्तु दोबारा भेजे जाने पर वे उसे मानने के लिए बाध्य हैं। इस प्रकार वास्तविक कार्यकारी शक्ति प्रधानमंत्री के नेतृत्व में मंत्रिपरिषद के पास है।

ब्रिटेन में भी यही स्थिति है। राजशाही की भूमिका पूर्णतः औपचारिक और संवैधानिक है। प्रधानमंत्री ही वास्तविक सत्ता के केंद्र हैं। परन्तु ब्रिटेन में प्रधानमंत्री को “समानों में प्रथम” अर्थात Primus Inter Pares कहा जाता है। इसका अर्थ है कि वे अपने मंत्रिमंडल के साथियों से ऊपर नहीं, बल्कि उनके बीच पहले हैं। उनकी शक्ति का असली स्रोत उनके सांसदों का भरोसा है।

भारत में प्रधानमंत्री की स्थिति ब्रिटेन से कहीं अधिक केंद्रीकृत हो गई है, विशेषकर जब किसी दल को भारी बहुमत मिलता है। नेहरू, इंदिरा गाँधी और अटल बिहारी वाजपेयी से लेकर आज तक भारत में प्रधानमंत्री पद क्रमशः अधिक प्रभावशाली होता गया है।

जवाबदेही का तंत्र : अविश्वास बनाम आंतरिक चुनाव

यह वह बिंदु है जहाँ दोनों प्रणालियाँ सबसे अधिक भिन्न दिखती हैं

भारत में प्रधानमंत्री को हटाने का एकमात्र संवैधानिक मार्ग लोकसभा में अविश्वास प्रस्ताव है। यदि सरकार बहुमत खो दे तो उसे इस्तीफा देना होता है और इससे पूरी सरकार गिर जाती है। दसवीं अनुसूची अर्थात दल-बदल विरोधी कानून यह सुनिश्चित करता है कि पार्टी का कोई सांसद पार्टी व्हिप की अवज्ञा करके मतदान करे तो उसकी सदस्यता खतरे में पड़ सकती है। इस कानून ने जहाँ एक ओर दल-बदल पर अंकुश लगाया, वहीं दूसरी ओर सांसदों की स्वतंत्र अभिव्यक्ति को भी सीमित किया।

ब्रिटेन में ऐसा कोई कठोर कानून नहीं है। वहाँ के सांसद अपने नेता के विरुद्ध खड़े होने में कहीं अधिक स्वतंत्र हैं। जब पार्टी के 20 प्रतिशत सांसद किसी नेतृत्व परिवर्तन का समर्थन करते हैं, तो पार्टी की नेशनल एग्जीक्यूटिव कमेटी तुरंत आंतरिक चुनाव की प्रक्रिया शुरू करती है। इसमें केवल प्रधानमंत्री बदलते हैं, पूरी सरकार नहीं गिरती। यही कारण है कि ब्रिटेन पिछले एक दशक में सात प्रधानमंत्री देख चुका है, जबकि सरकार की निरंतरता बनी रही।

भारत में यदि सत्तारूढ़ दल अपना नेता बदलना चाहे, तो यह प्रक्रिया पूर्णतः दल के आंतरिक संविधान पर निर्भर करती है और इसका संविधान में कोई औपचारिक उल्लेख नहीं है। व्यावहारिक रूप से भारत में यह बहुत कम हुआ है कि किसी सत्तारूढ़ प्रधानमंत्री को उसी दल के दबाव में बदला गया हो।

नेता चुनने की प्रक्रिया : दलीय लोकतंत्र की परीक्षा

ब्रिटेन में लेबर पार्टी की नेता चुनने की प्रक्रिया चार स्तरीय है। पहले नेतृत्व की रिक्तता घोषित होती है। फिर एग्जीक्यूटिव कमेटी समय-सीमा तय करती है। उसके बाद उम्मीदवार को सांसद होना अनिवार्य है और उसे कम से कम 5 प्रतिशत सांसदों तथा 5 प्रतिशत संबद्ध संगठनों का समर्थन पाना होता है। अंत में अधिमानी मतदान यानी Preferential Ballot से नेता चुना जाता है जिसमें 50 प्रतिशत से अधिक मत पाना आवश्यक है।

भारत में प्रमुख दलों में नेता चुनने की प्रक्रिया अलग-अलग है। कांग्रेस पार्टी में कांग्रेस कार्य समिति और AICC की भूमिका होती है। भाजपा में संसदीय दल और राष्ट्रीय कार्यकारिणी नेता का चुनाव करती है। व्यावहारिक दृष्टि से इन प्रक्रियाओं में पारदर्शिता का स्तर भिन्न-भिन्न रहा है और प्रायः एक मजबूत केंद्रीय नेतृत्व ही उत्तराधिकारी तय करता है।

यह तुलना दर्शाती है कि ब्रिटेन में दलीय लोकतंत्र अपेक्षाकृत अधिक संस्थागत और पारदर्शी है, जबकि भारत में यह प्रक्रिया अभी भी पूर्ण रूप से संस्थागत होने की राह पर है।

राज्याध्यक्ष की भूमिका : औपचारिकता या वास्तविकता

ब्रिटेन में राजशाही पूर्णतः संवैधानिक प्रतीक है। वे न नीति बनाते हैं, न विधेयक अस्वीकार करते हैं। नए प्रधानमंत्री को राजमहल में बुलाना और उन्हें सरकार बनाने का न्योता देना एक औपचारिक अनुष्ठान है।

भारत में राष्ट्रपति की भूमिका कुछ अधिक जटिल है। यद्यपि वे संवैधानिक प्रमुख हैं, फिर भी कुछ विशेष परिस्थितियों में उनकी विवेकाधीन शक्ति सक्रिय होती है। जैसे त्रिशंकु संसद की स्थिति में, राष्ट्रपति शासन लगाने के निर्णय में या उच्चतम न्यायालय के निर्देश पर। राष्ट्रपति की भूमिका को लेकर भारत में कई बार संवैधानिक विवाद भी उठे हैं।

स्थिरता का प्रश्न : कौन सी प्रणाली बेहतर है

ब्रिटेन में पिछले एक दशक में सात प्रधानमंत्री हुए। यह संख्या देखकर कोई यह कह सकता है कि वहाँ राजनीतिक अस्थिरता है। किन्तु वास्तव में यह प्रणाली की जीवंतता का प्रमाण है। हर बार सरकार गिरे बिना केवल नेता बदला गया। नीतिगत निरंतरता बनी रही। जनता के प्रति जवाबदेही बनी रही।

भारत में नेतृत्व परिवर्तन अपेक्षाकृत कम हुआ है। यह एक ओर राजनीतिक स्थिरता का सूचक है, किन्तु दूसरी ओर यह प्रश्न भी उठता है कि क्या आंतरिक दलीय लोकतंत्र उतना मजबूत है जितना होना चाहिए। जवाबदेही का जो तंत्र ब्रिटेन में पार्टी के भीतर से आता है, वह भारत में अभी पूर्ण विकसित नहीं है।

इस तुलनात्मक विश्लेषण से कई महत्त्वपूर्ण प्रश्न उभरते हैं,क्या भारत में दल-बदल विरोधी कानून ने संसदीय जवाबदेही को कमजोर किया है? क्या प्रधानमंत्री पद का अत्यधिक केंद्रीकरण संसदीय लोकतंत्र की मूल भावना के अनुरूप है? क्या भारत को अपनी आंतरिक दलीय प्रक्रियाओं को अधिक पारदर्शी और संस्थागत बनाने की आवश्यकता है?

ये प्रश्न भारत के लोकतंत्र की गुणवत्ता से सीधे जुड़े हैं

निष्कर्ष

ब्रिटेन और भारत दोनों संसदीय लोकतंत्र हैं और दोनों ने इस प्रणाली को अपनी-अपनी परिस्थितियों के अनुसार ढाला है। ब्रिटेन में परंपरा और अलिखित नियम वही काम करते हैं जो भारत में विस्तृत संवैधानिक प्रावधान करते हैं। दोनों प्रणालियों में प्रधानमंत्री वास्तविक सत्ता का केंद्र है, किन्तु उसकी जवाबदेही के तरीके भिन्न हैं।

कीर स्टार्मर के इस्तीफे और एंडी बर्नहम के उभरने की घटना हमें यह याद दिलाती है कि एक स्वस्थ लोकतंत्र में सत्ता न तो स्थायी होती है और न ही व्यक्तिगत। वह संस्थाओं, प्रक्रियाओं और जनविश्वास पर टिकी होती है। यही संसदीय लोकतंत्र की असली ताकत है और यही उसकी चुनौती भी।


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