भारतीय संविधान के अनुच्छेद 326 में सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार की व्यवस्था की गई है, जिसका अर्थ है कि हर वयस्क नागरिक को मत देने का समान अधिकार प्राप्त है। इसी भावना को आगे बढ़ाते हुए अनुच्छेद 81 और 82 यह सुनिश्चित करते हैं कि लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में जनसंख्या और सीटों का अनुपात सभी राज्यों में लगभग समान रहे, ताकि प्रत्येक मत का वजन बराबर हो। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए हर जनगणना के बाद परिसीमन की आवश्यकता होती है। परंतु जब यह सिद्धांत राजनीतिक यथार्थ से टकराता है, तो जो प्रश्न उभरते हैं, वे भारत के संघीय ढांचे की बुनियाद को ही चुनौती देते हैं। हाल में केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन विधेयकों ने इस बहस को फिर से जीवंत कर दिया है।
परिसीमन की ऐतिहासिक यात्रा
- स्वतंत्रता के बाद से लोकसभा की सदस्य संख्या समय के साथ बदलती रही है।
- 1951 में लोकसभा की सदस्य संख्या 489 थी।
- 1971 की जनगणना के बाद यह संख्या 521 हो गई।
- पूर्वोत्तर में नए राज्यों के गठन तथा उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और बिहार के विभाजन के बाद संविधान तथा जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन करके 22 सीटें और बढ़ाई गईं, जिससे कुल संख्या 543 हो गई।
- परंतु 1976 में आपातकाल के दौर में 42वें संविधान संशोधन के माध्यम से परिसीमन को स्थगित कर दिया गया। इसका उद्देश्य जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रगति करने वाले दक्षिणी राज्यों के साथ संघीय समता बनाए रखना था। उस समय परिवार नियोजन को राष्ट्रीय प्राथमिकता का दर्जा दिया गया था, और यह सुनिश्चित करने के लिए कि जनसंख्या नियंत्रण में विफल राज्यों को संसद में अपेक्षाकृत घटता प्रतिनिधित्व न मिले, यह तय किया गया कि अगला परिसीमन 2000 के बाद ही होगा।
- बाद में 2001 में 84वें संविधान संशोधन के माध्यम से यह स्थगन 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना तक बढ़ा दिया गया। इस प्रकार लगभग पांच दशकों से यह अस्थायी व्यवस्था बनी हुई है।
बढ़ती असमानता की तस्वीर
- 1971 में प्रत्येक लोकसभा सदस्य औसतन दस लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करता था। यदि 2029 के लोकसभा चुनाव तक यही आधार बना रहे, तो यह आंकड़ा 2.7 गुना बढ़ जाएगा, परंतु यह वृद्धि उत्तर और दक्षिण के राज्यों में समान रूप से नहीं होगी। उदाहरण के लिए, बिहार, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु और केरल के एक-एक सांसद क्रमशः लगभग 35 लाख, 31 लाख, 27 लाख, 20 लाख और 18 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व करेंगे। यह स्पष्ट रूप से आनुपातिक प्रतिनिधित्व के मूल सिद्धांत से विचलन है।
- अगर वर्तमान लोकसभा संख्या के आधार पर ही जनसंख्या के अनुपात में सीटों का पुनर्वितरण किया जाए, तो बिहार और उत्तर प्रदेश को दस से ग्यारह अतिरिक्त सीटें मिलेंगी, जबकि तमिलनाडु को दस से ग्यारह और केरल को सात से आठ सीटें गंवानी पड़ेंगी।
- यही कारण है कि दक्षिणी राज्य अपनी राजनीतिक प्रभाव क्षमता और राष्ट्रीय नीति निर्माण में अपनी आवाज़ कमजोर होने की चिंता से ग्रस्त हैं, जबकि उत्तरी राज्य 1976 से रुके हुए समान प्रतिनिधित्व की मांग करते रहे हैं।
- यदि लोकसभा की कुल संख्या बढ़ाकर भी जनसंख्या के आधार पर सीटें बांटी जाएं, तो दक्षिणी राज्यों की यह चिंता दूर होने की संभावना कम ही है कि इससे राजनीतिक प्रभाव हिंदी पट्टी के भाजपा शासित राज्यों की ओर स्थानांतरित हो जाएगा।
अप्रैल 2026 के विधेयक और उनकी सीमाएं
अप्रैल 2026 में सरकार ने संसद में तीन संबंधित विधेयक प्रस्तुत किए:
- संविधान (131वां संशोधन) विधेयक
- परिसीमन विधेयक, 2026
- संघ राज्यक्षेत्र विधि (संशोधन) विधेयक
इन विधेयकों में लोकसभा की सदस्य संख्या को बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव था। इसके अंतर्गत हर राज्य के प्रतिनिधित्व में पचास प्रतिशत की वृद्धि करते हुए राज्यों के लिए 815 सीटें रखी जानी थीं, जबकि संघ राज्यक्षेत्रों के लिए पैंतीस सीटें बरकरार रखी जानी थीं। किंतु इस प्रस्ताव में हर राज्य के मौजूदा हिस्से और उनके सापेक्षिक प्रतिनिधित्व की असमानता को यथावत रखा गया था। इस विधेयक में यह संवैधानिक प्रत्याभूति भी नहीं दी गई थी कि राज्यों का यह हिस्सा भविष्य में सुरक्षित रहेगा, बल्कि भविष्य की किसी जनगणना के आधार पर संसद के लिए इसे बदलने का विकल्प खुला रखा गया था।
सरकार ने इस मुद्दे पर विपक्ष से कोई सार्थक सहमति बनाने का प्रयास नहीं किया, जिसके परिणामस्वरूप ये विधेयक पारित नहीं हो सके। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इन्हें पश्चिम बंगाल और असम के आने वाले चुनावों से पहले एक राजनीतिक संदेश देने के उद्देश्य से लाया गया था। बहरहाल, इस पूरी बहस ने कुछ महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्नों को फिर से खोल दिया है, जिन पर विशेषज्ञों ने कई विकल्प सुझाए हैं।
विशेषज्ञों द्वारा सुझाए गए विकल्प
- 2027 की जनगणना के पश्चात पूर्णतः जनसंख्या आधारित परिसीमन।
- सीटों में एकसमान वृद्धि, परंतु राज्यों के मौजूदा हिस्से की सुरक्षा के साथ।
- मिश्रित सूत्र, जिनमें जनसंख्या को मुख्य आधार बनाते हुए कम प्रजनन दर वाले राज्यों को क्षतिपूरक सुरक्षा दी जाए।
- प्रोफेसर अमिताभ कुंडू का सुझाव, जिसके अनुसार 1971 के बाद से जनसंख्या वृद्धि में राज्यों के हिस्से के आधार पर उनकी मौजूदा सीटों में अतिरिक्त सीटें जोड़ी जाएं।
- यद्यपि पूर्णतः जनसंख्या आधारित पुनर्वितरण ही संविधान की मूल भावना के अनुरूप है, परंतु यह अब राजनीतिक रूप से इतना संवेदनशील बन चुका है कि केंद्र सरकार को इसके लिए व्यापक सहमति बनाने की आवश्यकता होगी। इसके अतिरिक्त, इनमें से कोई भी विकल्प तीन बुनियादी संवैधानिक प्रश्नों का समाधान प्रस्तुत नहीं करता।
तीन मूलभूत प्रश्न
पहला प्रश्न यह है कि क्या 1976 के स्थगन का अर्थ यह मान लिया जाए कि संघीय समायोजन अब एक स्थायी संवैधानिक सिद्धांत बन गया है?
वास्तव में, 42वां संशोधन एक विशेष ऐतिहासिक परिस्थिति से निपटने के लिए किया गया राजनीतिक समझौता था। इसने अनुच्छेद 81 और 82 में निहित मूल सिद्धांत का स्थान कभी नहीं लिया। एक अस्थायी संवैधानिक व्यवस्था को स्थायी मानदंड नहीं बनाया जा सकता, अन्यथा यह एक विसंगति को दूसरी विसंगति से बदलने भर का काम करेगा।
दूसरा प्रश्न यह है कि परिसीमन का उद्देश्य क्या मात्र चुनावी समानता और संघीय समायोजन के बीच संतुलन बनाना है?
वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। यह केवल राज्यों के बीच समानता का प्रश्न नहीं, बल्कि उससे भी अधिक महत्वपूर्ण रूप से नागरिकों के बीच समानता का प्रश्न है। लोकसभा जनता का सदन है, जहां नागरिक ही लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व के केंद्र में होते हैं। इस मूल सिद्धांत से कोई भी विचलन लोकतंत्र की नींव को कमजोर करता है। कोई नागरिक केवल इस आधार पर अधिक संसदीय प्रभाव का दावा नहीं कर सकता कि उसके राज्य ने परिवार नियोजन कार्यक्रम को सफलतापूर्वक लागू किया है।
तीसरा प्रश्न निम्न प्रजनन दर हासिल करने वाले राज्यों को स्थायी संवैधानिक सुरक्षा और बढ़े हुए मताधिकार के रूप में इनाम दिए जाने से जुड़ा है?
निःसंदेह, निम्न प्रजनन दर एक राष्ट्रीय लक्ष्य है और इसकी सराहना होनी चाहिए, परंतु इसका पुरस्कार राजनीतिक प्रतिनिधित्व और स्थायी रूप से बढ़े हुए मताधिकार के रूप में देना आवश्यक नहीं है। इसके स्थान पर वित्त आयोग जैसी संस्थाओं के माध्यम से वित्तीय हस्तांतरण अथवा अन्य तंत्रों के जरिए राज्यों को पुरस्कृत किया जा सकता है। इस प्रकार लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को विकास नीति से अलग रखते हुए बेहतर प्रोत्साहन दिए जा सकते हैं। इसके अलावा, कमजोर प्रदर्शन करने वाले राज्यों को दंडित करना भी अनुचित होगा, क्योंकि उनकी असमर्थता आवश्यक रूप से अनिच्छा या अक्षमता का परिणाम नहीं होती। प्रजनन दर कई ऐतिहासिक और संरचनात्मक कारकों का परिणाम होती है, जैसे आर्थिक विकास, महिला साक्षरता, शहरीकरण, स्वास्थ्य अवसंरचना और शिशु मृत्यु दर, जो अक्सर किसी राज्य के पूर्ण नियंत्रण में नहीं होते।
संघीय व्यवस्थाओं से सीख: राज्यसभा की भूमिका
- विश्व के अधिकांश संघीय देश यह अच्छी तरह समझते हैं कि लोकतंत्र होने के साथ-साथ वे राज्यों का संघ भी हैं, और इसलिए उन्हें नागरिकों की लोकतांत्रिक समानता तथा घटक इकाइयों की संघीय समता के बीच संतुलन बनाना पड़ता है। इसके लिए विभिन्न देशों ने अलग-अलग रास्ते अपनाए हैं। कुछ संघ, जैसे कनाडा और स्पेन, अपने कुछ घटकों को असममित शक्तियां देकर यह संतुलन साधते हैं। अन्य संघ अपनी विधायिकाओं की द्विसदनीय संरचना के माध्यम से यह संतुलन प्राप्त करते हैं।
- अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया में निचला सदन, यानी प्रतिनिधि सभा, जनसंख्या के अनुपात में नागरिकों द्वारा चुना जाता है, जबकि ऊपरी सदन, यानी सीनेट, में जनसंख्या की परवाह किए बिना हर राज्य को बराबर सीटें मिलती हैं, अमेरिका में प्रत्येक राज्य को दो और ऑस्ट्रेलिया में बारह सीटें।
- अन्य संघीय व्यवस्थाएं इसमें कुछ भिन्नताएं अपनाती हैं, परंतु सभी में यह मूल ढांचा समान है कि निचला सदन जनसंख्या के अनुपात में और ऊपरी सदन छोटे राज्यों को अधिक भारांक तथा समान मताधिकार देकर संतुलन बनाता है।
- भारत में स्थिति भिन्न है। राज्यसभा का गठन राज्य विधानसभाओं के निर्वाचित सदस्यों के निर्वाचक मंडल के माध्यम से होता है, जो स्वयं जनसंख्या से जुड़ा होता है, और इस कारण राज्यसभा राज्यों को समान या लगभग समान प्रतिनिधित्व नहीं दे सकती।
- परिणामस्वरूप बड़े राज्यों को दोनों सदनों में अधिक प्रतिनिधित्व मिलता है, जबकि आदर्श स्थिति में राज्यसभा को लोकसभा के प्रति एक प्रति-संतुलन के रूप में कार्य करना चाहिए था।
- अन्य संघीय व्यवस्थाओं की तुलना में भारतीय संसद में यह सच्चा संघीय चरित्र नहीं दिखता। यदि संविधान में संशोधन करना ही है, तो प्रश्न यह उठता है कि लोकसभा को बदलने के बजाय राज्यसभा में सभी राज्यों को समान प्रतिनिधित्व देने की दिशा में सुधार क्यों नहीं किया जाना चाहिए।
आगे की राह:
- प्रतिनिधित्व में आनुपातिकता एक अलंघनीय संवैधानिक सिद्धांत है, और प्रत्येक परिसीमन को इस आनुपातिकता को पुनःस्थापित करना चाहिए। परंतु इसे एक ही बार में लागू करना राजनीतिक रूप से व्यावहारिक नहीं होगा।
- इसे आगामी दो या तीन परिसीमन चक्रों में धीरे-धीरे लागू किया जाना चाहिए, ताकि यह राजनीतिक रूप से स्वीकार्य बन सके। साथ ही, राज्यसभा में छोटी जनसंख्या वाले राज्यों को अधिक संघीय शक्तियां देने की दिशा में तत्काल सुधार आवश्यक है, चाहे वह समान प्रतिनिधित्व के रूप में हो या भारांकित मताधिकार के रूप में, जिससे प्रत्येक राज्य को प्रभावी रूप से समान वोट मिल सकें।
- इसके अतिरिक्त, परिसीमन को भी वित्त आयोग की तरह एक सांविधिक तंत्र के अंतर्गत लाया जाना चाहिए, बजाय इसके कि यह राजनीतिक विवेकाधिकार पर निर्भर रहे।
निष्कर्ष
इस मुद्दे पर सर्वसम्मति बनाना आसान नहीं होगा, क्योंकि बड़े राज्य अपनी राजनीतिक शक्तियों में किसी भी कमी का प्रतिरोध करेंगे। परंतु यह समझना आवश्यक है कि परिसीमन की यह बहस केवल आंकड़ों की नहीं, बल्कि भारत के विकसित होते स्वरूप की बहस है। यह उत्तर और दक्षिण के बीच कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है, और न ही जनसांख्यिकीय प्रदर्शन के लिए किसी पुरस्कार या दंड का प्रश्न है। एक परिपक्व संघ न तो इतिहास को अनिश्चित काल तक स्थगित रख सकता है, और न ही अपनी घटक इकाइयों की वास्तविक चिंताओं को नजरअंदाज कर सकता है। इसका उत्तर इतिहास को जमाकर रखने में नहीं, बल्कि संवैधानिक कुशलता और राजनीतिक सहमति के माध्यम से परिवर्तन का प्रबंधन करने में निहित है। यही हमारे संघीय गणराज्य की संवैधानिक परिपक्वता की सच्ची परीक्षा होगी।
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