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शांति, संतुलन और बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था के लिए भारत की रणनीतिक भूमिका

(India’s strategic role for peace, balance, and a multipolar world order)

हाल के वर्षों में अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था अभूतपूर्व अस्थिरता के दौर से गुजर रही है। रूस यूक्रेन युद्ध, पश्चिम एशिया में इज़राइल ईरान संघर्ष, ताइवान जलडमरूमध्य में बढ़ता तनाव तथा अमेरिका चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा ने वैश्विक सुरक्षा वातावरण को अत्यंत जटिल बना दिया है। इन समानांतर संकटों ने ऐसी आशंका को जन्म दिया है कि यदि क्षेत्रीय संघर्ष परस्पर जुड़ते गए, तो वे व्यापक वैश्विक युद्ध का रूप ले सकते हैं।

ऐसी परिस्थितियों में भारत केवल एक क्षेत्रीय शक्ति नहीं, बल्कि उत्तरदायी वैश्विक हितधारक (Responsible Global Stakeholder) और उभरती मध्यस्थ शक्ति (Emerging Mediating Power) के रूप में सामने आया है। भारत की विदेश नीति का उद्देश्य किसी शक्ति-गुट का हिस्सा बनना नहीं, बल्कि संवाद, संतुलन और नियम-आधारित शांति व्यवस्था को प्रोत्साहित करना है।

समकालीन वैश्विक व्यवस्था: परस्पर जुड़े संकटों का युग

इक्कीसवीं सदी का अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य अनेक समानांतर संघर्षों से प्रभावित है। यूरोप में रूस यूक्रेन युद्ध ने नाटो और रूस के बीच टकराव को तीव्र किया है। पश्चिम एशिया में इज़राइल ईरान प्रतिस्पर्धा ने पूरे क्षेत्र को अस्थिर बना दिया है, जबकि हिंद-प्रशांत में ताइवान प्रश्न और दक्षिण चीन सागर के विवाद अमेरिका चीन प्रतिद्वंद्विता को सैन्य आयाम प्रदान कर रहे हैं।

इन संकटों की विशेषता यह है कि वे अब अलग-अलग नहीं रहे। वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएँ, ऊर्जा बाजार, समुद्री व्यापार, साइबर अवसंरचना और वित्तीय तंत्र एक-दूसरे से इतने गहराई से जुड़े हैं कि किसी एक क्षेत्र का संघर्ष पूरी विश्व अर्थव्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। इसलिए आधुनिक विश्व में युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहता, बल्कि उसका प्रभाव खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा, निवेश, तकनीक और विकास पर भी पड़ता है।

क्या विश्व वास्तव में तृतीय विश्वयुद्ध की ओर बढ़ रहा है?

यथार्थवादी (Realist) दृष्टिकोण के अनुसार जब महाशक्तियों के बीच शक्ति-संतुलन बदलता है, तब संघर्ष की संभावना बढ़ जाती है। अमेरिका चीन प्रतिद्वंद्विता, रूस पश्चिम टकराव और क्षेत्रीय शक्ति-संघर्ष इसी प्रवृत्ति को दर्शाते हैं।

किन्तु आधुनिक विश्व में युद्ध का स्वरूप बदल चुका है। परमाणु प्रतिरोध (Nuclear Deterrence), आर्थिक परस्पर निर्भरता (Economic Interdependence), वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाएँ तथा डिजिटल अर्थव्यवस्था महाशक्तियों को प्रत्यक्ष वैश्विक युद्ध से रोकने वाले महत्त्वपूर्ण कारक हैं। इसलिए भविष्य का संघर्ष पूर्ण सैन्य युद्ध की अपेक्षा हाइब्रिड युद्ध (Hybrid Warfare), साइबर संघर्ष, आर्थिक प्रतिबंध, प्रौद्योगिकी प्रतिस्पर्धा तथा सूचना युद्ध के रूप में अधिक दिखाई देता है।

भारत के लिए वैश्विक युद्ध क्यों सबसे बड़ी चुनौती है?

भारत विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, सबसे बड़ी जनसंख्या वाला लोकतंत्र तथा वैश्विक दक्षिण का प्रमुख प्रतिनिधि है। उसकी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा भाग आयात पर निर्भर है तथा उसका व्यापार हिंद महासागर और पश्चिम एशिया से होकर गुजरता है।

यदि वैश्विक संघर्ष व्यापक रूप लेता है, तो भारत पर इसके अनेक प्रत्यक्ष प्रभाव पड़ सकते हैं;

  • ऊर्जा आपूर्ति में व्यवधान और तेल की कीमतों में वृद्धि।
  • वैश्विक व्यापार मार्गों का बाधित होना।
  • विदेशी निवेश एवं विनिर्माण गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव।
  • खाद्य एवं उर्वरक सुरक्षा पर दबाव।
  • वैश्विक वित्तीय बाजारों में अस्थिरता।
  • भारतीय प्रवासी समुदाय की सुरक्षा संबंधी चुनौतियाँ।

अतः भारत के लिए शांति केवल नैतिक आदर्श नहीं, बल्कि राष्ट्रीय हित (National Interest) और आर्थिक विकास (Economic Development) की अनिवार्य शर्त है।

भारत की विदेश नीति: संतुलन और रणनीतिक स्वायत्तता का मॉडल

स्वतंत्रता के बाद भारत ने गुटनिरपेक्षता से लेकर रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy) तक की विदेश नीति विकसित की है। इसका मूल उद्देश्य किसी एक शक्ति-गुट के साथ पूर्णतः जुड़ने के बजाय अपने राष्ट्रीय हितों के आधार पर स्वतंत्र निर्णय लेना है।

आज भारत अमेरिका के साथ रक्षा एवं प्रौद्योगिकी सहयोग को मजबूत कर रहा है, वहीं रूस के साथ रक्षा और ऊर्जा संबंधों को बनाए हुए है। दूसरी ओर, पश्चिम एशिया के सभी प्रमुख देशों इज़राइल, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और ईरान के साथ भी संतुलित संबंध बनाए रखे गए हैं। यही नीति भारत को विश्वसनीय और संतुलित शक्ति के रूप में स्थापित करती है।

भारत: संघर्षरत पक्ष नहीं, संवाद का सेतु

भारतीय कूटनीति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि भारत ने संकटों के दौरान किसी भी पक्ष के साथ वैचारिक ध्रुवीकरण से बचते हुए संवाद की नीति अपनाई है।

रूस यूक्रेन युद्ध के दौरान भारत ने हिंसा समाप्त करने और कूटनीतिक समाधान पर बल दिया। पश्चिम एशिया संकट में भारत ने आतंकवाद की निंदा करते हुए मानवीय सहायता तथा क्षेत्रीय स्थिरता का समर्थन किया। इसी प्रकार हिंद-प्रशांत में भारत मुक्त, समावेशी और नियमआधारित समुद्री व्यवस्था की वकालत करता है।

यह दृष्टिकोण भारत को एक विश्वसनीय मध्यस्थ (Credible Mediator) और विश्वसनीय साझेदार (Reliable Partner) के रूप में स्थापित करता है।

वसुधैव कुटुम्बकम्से वैश्विक नेतृत्व तक

भारतीय विदेश नीति केवल यथार्थवादी शक्ति-संतुलन पर आधारित नहीं है; इसमें सभ्यतागत मूल्यों की भी महत्वपूर्ण भूमिका है। वसुधैव कुटुम्बकम्, पंचशील, अहिंसा, तथा संवाद के माध्यम से विवाद समाधान जैसी अवधारणाएँ भारत की वैश्विक दृष्टि को विशिष्ट बनाती हैं।

जी-20 की अध्यक्षता के दौरान भारत ने “One Earth, One Family, One Future” का संदेश देकर यह स्पष्ट किया कि वैश्विक चुनौतियों का समाधान प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि सहयोग और समावेशी बहुपक्षवाद (Inclusive Multilateralism) में निहित है।

बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था में भारत की भूमिका

वर्तमान अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था एकध्रुवीयता से बहुध्रुवीयता की ओर संक्रमण के दौर में है। इस परिवर्तन में भारत केवल शक्ति-संतुलन का निष्क्रिय घटक नहीं, बल्कि नई वैश्विक व्यवस्था का सक्रिय निर्माता बन सकता है।

भारत

  • वैश्विक दक्षिण की आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व करता है।
  • संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में सुधार की वकालत करता है।
  • BRICS, SCO, QUAD, G-20 और I2U2 जैसे विविध मंचों पर समानांतर रूप से सक्रिय है।
  • जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य सुरक्षा, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना तथा विकास वित्त जैसे विषयों पर वैश्विक सहमति बनाने का प्रयास करता है।

इस प्रकार भारत ब्रिजिंग पावर (Bridging Power) और लीडिंग पावर (Leading Power) दोनों की भूमिका निभा सकता है।

निष्कर्ष

समकालीन विश्व में सबसे बड़ी चुनौती केवल युद्ध की संभावना नहीं, बल्कि महाशक्तियों के बीच बढ़ता अविश्वास, वैचारिक ध्रुवीकरण और वैश्विक संस्थाओं की कमजोर होती क्षमता है। भारत की सबसे बड़ी रणनीतिक शक्ति उसकी सैन्य क्षमता भर नहीं, बल्कि विश्वसनीयता (Credibility), रणनीतिक स्वायत्तता (Strategic Autonomy), बहुपक्षीय कूटनीति (Multilateral Diplomacy) तथा सभ्यतागत सॉफ्ट पावर (Civilizational Soft Power) है।

यदि भारत अपनी संतुलित विदेश नीति, आर्थिक क्षमता और कूटनीतिक विश्वसनीयता को निरंतर सुदृढ़ करता है, तो वह केवल संभावित वैश्विक संघर्षों के प्रभावों को कम करने में ही नहीं, बल्कि इक्कीसवीं सदी की अधिक न्यायपूर्ण, बहुध्रुवीय और शांतिपूर्ण विश्व व्यवस्था (Just, Multipolar and Peaceful World Order) के निर्माण में भी निर्णायक भूमिका निभा सकता है। यह भूमिका भारत की विदेश नीति के मूल मंत्र रणनीतिक स्वायत्तता के साथ वैश्विक उत्तरदायित्व—को वास्तविक अर्थ प्रदान करती है।


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