जुलाई 2026 में गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा लद्दाख के नागरिक समाज संगठनों के साथ हुई बैठकों के आधिकारिक विवरण जारी किए गए, जिनमें केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 371 के अंतर्गत लद्दाख के लिए एक विशिष्ट (Sui Generis) संवैधानिक ढाँचे का प्रस्ताव रखा है।
इन बैठकों में केंद्र सरकार ने पहली बार यह स्पष्ट किया कि लद्दाख को संविधान के अनुच्छेद 371 के अंतर्गत एक विशेष (Customised) संवैधानिक व्यवस्था दी जाएगी।
इस व्यवस्था का उद्देश्य है;
- स्थानीय लोगों को अधिक राजनीतिक अधिकार देना।
- जनजातीय संस्कृति की रक्षा करना।
- भूमि और रोजगार की सुरक्षा सुनिश्चित करना।
- स्थानीय प्रशासन को अधिक लोकतांत्रिक बनाना।
लद्दाख के लिए प्रस्तावित शासन मॉडल
- अनुच्छेद 371 के अंतर्गत ‘सुई जेनेरिस (Sui Generis)’ मॉडल
- प्रस्ताव का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष यह है कि केंद्र सरकार ने लद्दाख को संविधान की छठी अनुसूची में शामिल करने के बजाय अनुच्छेद 371 के अंतर्गत एक विशेष संवैधानिक ढाँचा प्रदान करने का निर्णय लिया है। इस संदर्भ में ‘Sui Generis’ शब्द का प्रयोग किया गया है। यह लैटिन भाषा का शब्द है, जिसका अर्थ है ‘अपनी तरह का एकमात्र’ या ‘अद्वितीय’।
- इसका आशय यह है कि लद्दाख के लिए पहले से विद्यमान किसी राज्य का मॉडल ज्यों-का-त्यों लागू नहीं किया जाएगा।
- यद्यपि नागालैंड, मिजोरम, सिक्किम अथवा अन्य राज्यों को अनुच्छेद 371 के अंतर्गत प्राप्त विशेष प्रावधानों से प्रेरणा ली जाएगी, फिर भी अंतिम व्यवस्था लद्दाख की स्थानीय आवश्यकताओं, सामाजिक संरचना, जनजातीय स्वरूप, पर्यावरणीय संवेदनशीलता तथा सीमावर्ती स्थिति को ध्यान में रखकर तैयार की जाएगी।
- इस प्रकार का दृष्टिकोण इसलिए आवश्यक माना गया क्योंकि लद्दाख की लगभग संपूर्ण आबादी अनुसूचित जनजातियों से संबंधित है, यहाँ की अर्थव्यवस्था सीमित संसाधनों पर आधारित है, पर्यावरण अत्यंत नाजुक है तथा यह क्षेत्र भारत की चीन और पाकिस्तान के साथ अंतरराष्ट्रीय सीमाओं से जुड़ा हुआ है। ऐसी परिस्थितियों में सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था पर्याप्त नहीं मानी गई।

- निर्वाचित संघ–शासित प्रदेश स्तरीय निकाय
- वर्तमान में लद्दाख एक विधानमंडल–विहीन संघ–शासित प्रदेश है।
- प्रस्ताव के अनुसार एक निर्वाचित लोकतांत्रिक निकाय की स्थापना की जाएगी।
- इससे स्थानीय जनता को नीति-निर्माण में प्रत्यक्ष राजनीतिक प्रतिनिधित्व प्राप्त होगा।
- जनजातीय संस्कृति, भूमि और स्थानीय रोजगार की संवैधानिक सुरक्षा
- इसका मूल उद्देश्य लद्दाख की सांस्कृतिक एवं सामाजिक पहचान का संरक्षण करना है।
- लद्दाख में बौद्ध, बलती, पुरिग, चांगपा, ब्रोकपा आदि अनेक विशिष्ट समुदाय निवास करते हैं, जिनकी अपनी अलग भाषा, संस्कृति, धार्मिक परंपराएँ और जीवनशैली है। आधुनिक विकास, पर्यटन तथा बाहरी जनसंख्या के बढ़ते प्रभाव के कारण इन पारंपरिक समुदायों की सांस्कृतिक पहचान पर संकट उत्पन्न होने की आशंका व्यक्त की जाती रही है।
- इसलिए संवैधानिक संरक्षण के माध्यम से उनकी विशिष्ट सांस्कृतिक विरासत को सुरक्षित रखने का प्रयास किया जा रहा है।
- इसी प्रकार भूमि संरक्षण भी इस प्रस्ताव का एक अत्यंत महत्वपूर्ण उद्देश्य है। यदि बाहरी व्यक्तियों को बिना किसी प्रतिबंध के भूमि खरीदने की अनुमति मिल जाए, तो धीरे-धीरे स्थानीय लोगों के भूमि अधिकार कमजोर हो सकते हैं।
- इससे न केवल पारंपरिक कृषि एवं पशुपालन प्रभावित होगा, बल्कि स्थानीय समुदाय अपनी आर्थिक एवं सामाजिक सुरक्षा भी खो सकते हैं। इसलिए प्रस्तावित व्यवस्था में भूमि हस्तांतरण पर विशेष प्रावधान किए जाने की संभावना है।
- रोजगार की सुरक्षा भी इस मॉडल का महत्वपूर्ण पक्ष है। लद्दाख की जनसंख्या अपेक्षाकृत कम है और रोजगार के अवसर सीमित हैं।
- यदि सरकारी नौकरियों एवं अन्य अवसरों में स्थानीय निवासियों को पर्याप्त संरक्षण न मिले, तो बाहरी प्रतिस्पर्धा के कारण स्थानीय युवाओं के लिए अवसर कम हो सकते हैं। इसलिए स्थानीय निवासियों के हितों की रक्षा हेतु विशेष प्रावधानों पर विचार किया जा रहा है।
- कार्यपालिका, विधायिका एवं वित्तीय शक्तियों का हस्तांतरण
- प्रस्तावित निकाय केवल एक सलाहकार संस्था नहीं होगा, बल्कि उसे वास्तविक शासन संबंधी शक्तियाँ प्रदान की जाएँगी। इसका अर्थ है कि यह निकाय कार्यपालिका, विधायिका तथा वित्तीय अधिकारों का प्रयोग करेगा।
- कार्यपालिका संबंधी शक्तियों के अंतर्गत यह निकाय स्थानीय प्रशासन का संचालन करेगा, विकास योजनाओं को लागू करेगा तथा विभिन्न विभागों के कार्यों की निगरानी करेगा। प्रशासनिक निर्णय केवल केंद्र सरकार के अधिकारियों द्वारा नहीं लिए जाएँगे, बल्कि स्थानीय निर्वाचित प्रतिनिधि भी उनमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे।
- विधायी शक्तियों का अर्थ यह है कि स्थानीय महत्व के विषयों पर कानून बनाने का अधिकार भी इस संस्था को प्राप्त होगा। उदाहरण के लिए, यदि भूमि संरक्षण, पर्यटन प्रबंधन, स्थानीय बाजारों के नियमन अथवा सांस्कृतिक संरक्षण से संबंधित कोई कानून बनाना आवश्यक हो, तो यह निकाय ऐसे विषयों पर विधायी कार्य कर सकेगा।
- वित्तीय शक्तियों का तात्पर्य यह है कि स्थानीय विकास के लिए बजट तैयार करना, विभिन्न योजनाओं हेतु धन का आवंटन करना तथा वित्तीय प्राथमिकताओं का निर्धारण भी इसी संस्था के अधिकार क्षेत्र में आएगा। इससे स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप संसाधनों का बेहतर उपयोग संभव हो सकेगा।
नौकरशाही पर प्रत्यक्ष नियंत्रण
- वर्तमान व्यवस्था में लद्दाख के प्रशासनिक अधिकारी मुख्यतः उपराज्यपाल के प्रति उत्तरदायी हैं। स्थानीय जनता द्वारा चुने गए प्रतिनिधियों के पास इन अधिकारियों के कार्यों पर सीमित प्रभाव है। परिणामस्वरूप प्रशासनिक उत्तरदायित्व (Administrative Accountability) अपेक्षित स्तर पर विकसित नहीं हो पाता।
- प्रस्तावित व्यवस्था में निर्वाचित निकाय को उन अधिकारियों पर प्रत्यक्ष नियंत्रण प्राप्त होगा जो उसके अधिकार क्षेत्र के विषयों का प्रशासन संचालित करेंगे। यह निकाय अधिकारियों के कार्यों की निगरानी करेगा, उनके प्रदर्शन का मूल्यांकन करेगा तथा आवश्यकतानुसार प्रशासनिक सुधारों का सुझाव देगा। इससे नौकरशाही लोकतांत्रिक रूप से अधिक उत्तरदायी बनेगी और जनता की अपेक्षाओं के अनुरूप कार्य करने के लिए प्रेरित होगी।
पंचायती राज संस्थाओं के साथ समन्वित शासन
- प्रस्तावित व्यवस्था में यह भी सुनिश्चित किया गया है कि नया निर्वाचित निकाय ग्राम पंचायतों तथा अन्य पंचायती राज संस्थाओं के साथ समन्वय स्थापित करके कार्य करेगा। इसका उद्देश्य यह है कि स्थानीय स्वशासन की मौजूदा संस्थाएँ कमजोर न हों, बल्कि नई व्यवस्था के साथ मिलकर अधिक प्रभावी प्रशासन प्रदान करें।
- इस प्रकार ग्राम स्तर से लेकर संघ-शासित प्रदेश स्तर तक शासन की विभिन्न संस्थाओं के बीच समन्वय स्थापित होगा, जिससे विकास योजनाओं का बेहतर क्रियान्वयन, स्थानीय भागीदारी तथा प्रशासनिक दक्षता में वृद्धि होगी।
राज्य का दर्जा: दीर्घकालिक लक्ष्य
- लद्दाख के अनेक राजनीतिक एवं सामाजिक संगठन पूर्ण राज्य का दर्जा (Statehood) देने की मांग कर रहे हैं, फिर भी केंद्र सरकार ने फिलहाल इसे स्वीकार नहीं किया है। सरकार का तर्क है कि राज्य बनने पर प्रशासनिक ढाँचे, कर्मचारियों के वेतन, विधानसभा, मंत्रिपरिषद तथा अन्य संस्थाओं पर अत्यधिक वित्तीय व्यय होगा, जिसे वर्तमान परिस्थितियों में वहन करना कठिन है।
- फिर भी सरकार ने आधिकारिक रूप से यह स्वीकार किया है कि पूर्ण राज्य का दर्जा लद्दाख के लोगों की दीर्घकालिक आकांक्षा (Long-term Aspiration) है और भविष्य में परिस्थितियों के अनुकूल होने पर इस विषय पर विचार किया जा सकता है।
लद्दाख द्वारा संवैधानिक सुरक्षा की मांग के कारण
- जम्मू–कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम, 2019
- अनुच्छेद 370 के निरस्तीकरण के पश्चात् लद्दाख को पृथक संघ–शासित प्रदेश बनाया गया।
- किन्तु इसे विधानमंडल के बिना स्थापित किया गया।
- परिणामस्वरूप अधिकांश प्रशासनिक शक्तियाँ उपराज्यपाल (LG) के अधीन चली गईं।
- प्रतिनिधित्व का अभाव (Representation Deficit)
- से पूर्व लद्दाख के 4 विधायक जम्मू-कश्मीर विधानसभा में थे।
2019 के बाद विधानसभा समाप्त हो गई।
- स्थानीय जनता का लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व सीमित हो गया।
- केवल लद्दाख स्वायत्त पर्वतीय विकास परिषद (LAHDC) कार्यरत रही, जिसकी शक्तियाँ सीमित हैं।
- जन–आंदोलन (2021–2026)
संवैधानिक सुरक्षा की मांग को लेकर व्यापक आंदोलन हुए।
मुख्य कारण;
- बाहरी लोगों के आगमन से जनसांख्यिकीय परिवर्तन की आशंका
- भूमि अधिकारों का संरक्षण
- स्थानीय रोजगार की सुरक्षा
- सांस्कृतिक एवं जनजातीय पहचान का संरक्षण
इन आंदोलनों का नेतृत्व प्रमुख रूप से सोनम वांगचुक सहित अनेक सामाजिक संगठनों ने किया।
- लद्दाख की चार प्रमुख मांगें
- पूर्ण राज्य का दर्जा (Statehood)
- संविधान की छठी अनुसूची के अंतर्गत संरक्षण
- पृथक लद्दाख लोक सेवा आयोग (LPSC) की स्थापना
- दो लोकसभा सीटों (लेह एवं कारगिल) की व्यवस्था
अनुच्छेद 371 क्या है? (About Article 371)
भारतीय संविधान के भाग XXI (Part XXI) में अनुच्छेद 371 से 371J तक कुछ राज्यों के लिए विशेष संवैधानिक प्रावधान (Special Constitutional Provisions) किए गए हैं। भाग XXI का शीर्षक है ‘अस्थायी, संक्रमणकालीन एवं विशेष उपबंध (Temporary, Transitional and Special Provisions)’।
- अनुच्छेद 371 का मूल उद्देश्य भारत के विभिन्न राज्यों की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सामाजिक, भौगोलिक एवं प्रशासनिक विशिष्टताओं को ध्यान में रखते हुए उन्हें ऐसी संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करना है, जो उनकी स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप हो।
- भारत जैसे विविधतापूर्ण संघीय देश में सभी राज्यों पर एक समान संवैधानिक व्यवस्था लागू करना हमेशा व्यावहारिक नहीं होता। इसलिए संविधान निर्माताओं ने कुछ राज्यों के लिए विशेष प्रावधानों की व्यवस्था की, जिससे उनकी विशिष्ट पहचान, परंपराओं तथा विकास संबंधी आवश्यकताओं की रक्षा की जा सके।
अनुच्छेद 371 का संवैधानिक विकास (Constitutional Evolution)
अनुच्छेद 371 संविधान लागू होने के दिन अर्थात 26 जनवरी 1950 से ही संविधान का भाग था। प्रारम्भ में यह केवल कुछ विशेष प्रशासनिक आवश्यकताओं को ध्यान में रखकर बनाया गया था। बाद के वर्षों में विभिन्न राज्यों की राजनीतिक, सामाजिक तथा क्षेत्रीय आवश्यकताओं के अनुसार अनुच्छेद 371A से 371J तक नए प्रावधान जोड़े गए।
- इन सभी नए अनुच्छेदों को संविधान के अनुच्छेद 368 के अंतर्गत संवैधानिक संशोधनों (Constitutional Amendments) के माध्यम से जोड़ा गया। अर्थात् संसद ने संविधान संशोधन की प्रक्रिया अपनाकर समय-समय पर विभिन्न राज्यों को विशेष संवैधानिक संरक्षण प्रदान किया।
- यह तथ्य भारत के असममित संघवाद (Asymmetric Federalism) का उत्कृष्ट उदाहरण है, जिसमें विभिन्न राज्यों को उनकी परिस्थितियों के अनुसार अलग-अलग संवैधानिक अधिकार दिए जाते हैं।
अनुच्छेद 371 की प्रमुख विशेषता (Key Feature of Article 371)
- अनुच्छेद 371 की सबसे महत्वपूर्ण विशेषता यह है कि यह राज्य–विशिष्ट (State-Specific) संवैधानिक व्यवस्था प्रदान करता है। अर्थात प्रत्येक राज्य के लिए अलग-अलग प्रकार के विशेष प्रावधान किए गए हैं।
- इन प्रावधानों के माध्यम से राज्य की विधानसभा (State Legislature) अथवा राज्यपाल (Governor) को ऐसे विशेष अधिकार दिए जा सकते हैं, जिनका उद्देश्य स्थानीय समाज, संस्कृति और संसाधनों की रक्षा करना होता है।
इन विशेष प्रावधानों के अंतर्गत सामान्यतः निम्नलिखित विषयों का संरक्षण किया जाता है-
- स्थानीय जनजातीय एवं पारंपरिक संस्कृति का संरक्षण।
- धार्मिक एवं सामाजिक परंपराओं की रक्षा।
- प्रथागत कानूनों (Customary Laws) की मान्यता।
- स्थानीय समुदायों के भूमि अधिकारों की सुरक्षा।
- बाहरी व्यक्तियों द्वारा भूमि खरीदने पर नियंत्रण।
- स्थानीय युवाओं के रोजगार के अवसरों की रक्षा।
- क्षेत्रीय विकास एवं प्रशासनिक संतुलन सुनिश्चित करना।
इस प्रकार अनुच्छेद 371 केवल प्रशासनिक व्यवस्था नहीं, बल्कि स्थानीय समाज की सांस्कृतिक और आर्थिक सुरक्षा का भी संवैधानिक साधन है।
अनुच्छेद 371 और छठी अनुसूची (Sixth Schedule) में अंतर
- यद्यपि दोनों व्यवस्थाओं का उद्देश्य स्थानीय समुदायों, विशेषकर जनजातीय समाज के हितों की रक्षा करना है, फिर भी दोनों की कार्यप्रणाली पूर्णतः भिन्न है।
- छठी अनुसूची के अंतर्गत जनजातीय क्षेत्रों में स्वायत्त जिला परिषदों (Autonomous District Councils) की स्थापना की जाती है। ये परिषदें विधायी, प्रशासनिक तथा कुछ न्यायिक शक्तियों का प्रयोग करती हैं और स्थानीय स्वशासन का एक पृथक संस्थागत ढाँचा विकसित करती हैं।
- इसके विपरीत अनुच्छेद 371 किसी नई स्वायत्त परिषद की स्थापना नहीं करता। इसके स्थान पर यह संबंधित राज्य की मौजूदा शासन व्यवस्था के भीतर ही विशेष संवैधानिक संरक्षण प्रदान करता है। इसमें राज्य की विधानसभा, राज्यपाल अथवा अन्य संवैधानिक संस्थाओं को विशेष अधिकार देकर स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति की जाती है।
- अर्थात जहाँ छठी अनुसूची एक संस्थागत (Institutional) मॉडल है, वहीं अनुच्छेद 371 एक संवैधानिक संरक्षण (Constitutional Safeguard) का मॉडल है।
अनुच्छेद 371 के अंतर्गत विभिन्न राज्यों के विशेष प्रावधान
अनुच्छेद 371 : महाराष्ट्र एवं गुजरात
- अनुच्छेद 371 के अंतर्गत महाराष्ट्र तथा गुजरात में क्षेत्रीय असमानताओं को कम करने के लिए अलग विकास बोर्ड (Separate Development Boards) स्थापित करने का प्रावधान किया गया है।
- महाराष्ट्र में विदर्भ, मराठवाड़ा तथा शेष महाराष्ट्र के संतुलित विकास तथा गुजरात में सौराष्ट्र, कच्छ एवं अन्य क्षेत्रों के समावेशी विकास को सुनिश्चित करने के लिए यह व्यवस्था की गई।
अनुच्छेद 371A : नागालैंड
यह अनुच्छेद नागालैंड की विशिष्ट जनजातीय पहचान को सबसे व्यापक संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करता है।
इसके अनुसार संसद द्वारा बनाए गए ऐसे कानून, जो
- नागाओं की धार्मिक एवं सामाजिक परंपराओं,
- प्रथागत कानून,
- पारंपरिक न्याय व्यवस्था,
- भूमि एवं प्राकृतिक संसाधनों के स्वामित्व
से संबंधित हों, वे तब तक नागालैंड में लागू नहीं होंगे जब तक राज्य विधानसभा उन्हें स्वीकार न कर दे।
यह प्रावधान भारत में जनजातीय स्वायत्तता का सबसे सशक्त उदाहरण माना जाता है।
अनुच्छेद 371B : असम
- इस अनुच्छेद के अंतर्गत असम विधानसभा में जनजातीय क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए एक विशेष समिति (Committee) के गठन का प्रावधान किया गया है।
- इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जनजातीय क्षेत्रों से संबंधित विषयों पर निर्णय लेते समय उनकी आवाज़ प्रभावी रूप से सुनी जाए।
अनुच्छेद 371C : मणिपुर
- मणिपुर के पहाड़ी क्षेत्रों के हितों की रक्षा के लिए यह प्रावधान किया गया है।
- राज्यपाल को यह विशेष उत्तरदायित्व दिया गया है कि वे पहाड़ी क्षेत्रों के प्रशासन की निगरानी करें तथा समय-समय पर राष्ट्रपति को रिपोर्ट प्रस्तुत करें।
अनुच्छेद 371D एवं 371E : आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना
- इन प्रावधानों का मुख्य उद्देश्य विभिन्न क्षेत्रों के लोगों को सरकारी नौकरियों तथा शिक्षा में समान अवसर उपलब्ध कराना है।
- क्षेत्रीय असंतुलन दूर करने के लिए स्थानीय उम्मीदवारों के लिए विशेष व्यवस्थाएँ तथा प्रशासनिक न्यायाधिकरण (Administrative Tribunal) की व्यवस्था भी की गई।
अनुच्छेद 371F : सिक्किम
- 1975 में सिक्किम के भारत में विलय के बाद उसकी विशिष्ट ऐतिहासिक, राजनीतिक एवं सांस्कृतिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए यह विशेष प्रावधान जोड़ा गया।
- इसका उद्देश्य सिक्किम की सामाजिक एवं सांस्कृतिक पहचान को बनाए रखना तथा उसके शांतिपूर्ण एकीकरण को सुनिश्चित करना था।
अनुच्छेद 371G : मिजोरम
- यह प्रावधान नागालैंड की तरह मिजोरम की जनजातीय संस्कृति, धार्मिक परंपराओं, प्रथागत कानूनों तथा भूमि अधिकारों की रक्षा करता है।
- संसद के ऐसे कानून, जो इन विषयों से संबंधित हों, राज्य विधानसभा की स्वीकृति के बिना लागू नहीं किए जा सकते।
अनुच्छेद 371H : अरुणाचल प्रदेश
- इस अनुच्छेद के अंतर्गत राज्यपाल को कानून-व्यवस्था (Law and Order) के संबंध में विशेष उत्तरदायित्व प्रदान किया गया है।
- यह व्यवस्था राज्य की सीमावर्ती एवं सामरिक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए बनाई गई है।
अनुच्छेद 371I : गोवा
- यह अनुच्छेद गोवा विधानसभा के सदस्यों की न्यूनतम संख्या निर्धारित करता है।
- यद्यपि इसमें अन्य राज्यों की तरह व्यापक विशेष अधिकार नहीं दिए गए हैं, फिर भी यह गोवा की विशिष्ट प्रशासनिक आवश्यकताओं को संबोधित करता है।
अनुच्छेद 371J : कल्याण कर्नाटक क्षेत्र
- यह प्रावधान कर्नाटक के अपेक्षाकृत पिछड़े कल्याण कर्नाटक (पूर्व में हैदराबाद–कर्नाटक) क्षेत्र के संतुलित विकास के लिए बनाया गया है।
- इसके अंतर्गत स्थानीय युवाओं को सरकारी नौकरियों एवं शैक्षणिक संस्थानों में विशेष आरक्षण तथा क्षेत्रीय विकास बोर्ड की व्यवस्था की गई है।

लद्दाख के लिए अनुच्छेद 371 क्यों प्रस्तावित किया गया है?
केंद्र सरकार का मत है कि यदि लद्दाख को छठी अनुसूची के अंतर्गत शामिल किया जाता है, तो वहाँ स्वायत्त जिला परिषदों जैसी अलग प्रशासनिक संरचना स्थापित करनी होगी, जिससे प्रशासनिक जटिलताएँ बढ़ सकती हैं।
इसके विपरीत अनुच्छेद 371 के अंतर्गत एक विशेष रूप से अनुकूलित (Customised) संवैधानिक ढाँचा तैयार किया जा सकता है, जो लद्दाख की विशिष्ट परिस्थितियों के अनुरूप होगा। इस ढाँचे के माध्यम से जनजातीय संस्कृति, स्थानीय भूमि अधिकारों तथा रोजगार के अवसरों की रक्षा भी की जा सकेगी और प्रशासनिक व्यवस्था अपेक्षाकृत सरल एवं अधिक लचीली बनी रहेगी।
इसी कारण केंद्र सरकार ने लद्दाख के लिए अनुच्छेद 371 आधारित ‘Sui Generis Framework’ को अधिक उपयुक्त समाधान माना है।
| अनुच्छेद | राज्य/क्षेत्र | मुख्य उद्देश्य |
| 371 | महाराष्ट्र, गुजरात | क्षेत्रीय विकास बोर्ड |
| 371A | नागालैंड | धार्मिक परंपराएँ, प्रथागत कानून, भूमि एवं संसाधनों की सुरक्षा |
| 371B | असम | जनजातीय क्षेत्रों के लिए विधानसभा समिति |
| 371C | मणिपुर | पहाड़ी क्षेत्रों के प्रशासन की विशेष व्यवस्था |
| 371D एवं 371E | आंध्र प्रदेश एवं तेलंगाना | शिक्षा एवं रोजगार में क्षेत्रीय समानता |
| 371F | सिक्किम | विलय के बाद विशेष संवैधानिक संरक्षण |
| 371G | मिजोरम | संस्कृति, प्रथागत कानून एवं भूमि अधिकारों की सुरक्षा |
| 371H | अरुणाचल प्रदेश | राज्यपाल को कानून-व्यवस्था संबंधी विशेष उत्तरदायित्व |
| 371I | गोवा | विधानसभा की न्यूनतम सदस्य संख्या |
| 371J | कल्याण कर्नाटक | क्षेत्रीय विकास एवं स्थानीय आरक्षण |
प्रस्तावित मॉडल का महत्व
- जनजातीय पहचान का संरक्षण
- लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व की पुनर्स्थापना
- प्रशासनिक उत्तरदायित्व में वृद्धि
- सहकारी एवं सहभागी संघवाद को प्रोत्साहन
- सीमावर्ती क्षेत्र में राजनीतिक स्थिरता एवं राष्ट्रीय सुरक्षा को मजबूती
- स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप प्रशासनिक व्यवस्था
संभावित चुनौतियाँ
- अनुच्छेद 371 के अंतर्गत संवैधानिक संशोधन की आवश्यकता।
- प्रस्तावित निकाय एवं उपराज्यपाल के बीच शक्तियों का स्पष्ट विभाजन।
- वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता।
- लेह एवं कारगिल के क्षेत्रीय हितों के बीच संतुलन।
- छठी अनुसूची के समर्थकों को संतुष्ट करना।
निष्कर्ष
लद्दाख के लिए प्रस्तावित अनुच्छेद 371 आधारित ‘सुई जेनेरिस’ शासन मॉडल भारतीय संघवाद की लचीली एवं बहुलतावादी प्रकृति का उदाहरण है। यह मॉडल एक ओर स्थानीय जनजातीय पहचान, भूमि एवं रोजगार की सुरक्षा सुनिश्चित करने का प्रयास करता है, वहीं दूसरी ओर लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व एवं प्रशासनिक उत्तरदायित्व को भी सुदृढ़ बनाता है। यदि इसे प्रभावी संवैधानिक एवं संस्थागत ढाँचे के साथ लागू किया जाता है, तो यह राष्ट्रीय एकता, सीमावर्ती क्षेत्रों के समावेशी विकास तथा सहकारी संघवाद को नई दिशा प्रदान कर सकता है।
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