भारतीय राजनीति और सामाजिक चिंतन के इतिहास में शायद ही कोई प्रश्न आरक्षण जितना विवादास्पद, जितना संवेदनशील और जितना बहुआयामी रहा हो। यह ऐसा विषय है जिस पर बात करते ही सामान्यतः दो खेमे बन जाते हैं, एक जो इसे सामाजिक न्याय की अनिवार्य शर्त मानता है और दूसरा जो इसे मेधा और समानता के विरुद्ध एक स्थायी विसंगति के रूप में देखता है। परंतु इन दो ध्रुवों के बीच खड़े होकर यदि कोई तर्कशील पाठक इस पूरे प्रश्न को थोड़ी दूरी से देखे, तो उसे यह अनुभव होगा कि पिछले सात दशकों में आरक्षण की जो व्यवस्था स्थिर हो चुकी है, वह अपने भीतर इतने अंतर्विरोध समाहित कर चुकी है कि अब उसकी संरचनात्मक पुनर्समीक्षा को केवल राजनीतिक अवसरवाद कहकर टाल देना बौद्धिक रूप से अनुचित होगा।पिछले कुछ वर्षों में यह मांग जिस तीव्रता से उभरी है, उसके पीछे केवल असंतोष नहीं, बल्कि सर्वोच्च न्यायालय के हाल के निर्णयों, सरकारी आयोगों की उन रिपोर्टों की छाया और वैश्विक न्यायिक विचारधारा में हो रहे परिवर्तन भी हैं, जिन्हें इस लेख में क्रमशः उजागर करने का प्रयास किया जाएगा।

इस लेख का उद्देश्य आरक्षण के विरुद्ध उठने वाली मांगों को केवल दोहराना नहीं है, बल्कि उन्हें तथ्यों, न्यायिक दृष्टांतों और तुलनात्मक अनुभव की कसौटी पर कसकर यह दिखाना है कि इनमें से कौन से तर्क अपने वर्तमान स्वरूप में सुदृढ़ हैं और किन तर्कों को अतिरिक्त प्रमाण की आवश्यकता है। इसके साथ ही यह लेख प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल द्वारा प्रस्तावित बहु-सूचकांक मॉडल की विवेचना करते हुए उससे आगे बढ़कर कुछ अन्य वैकल्पिक समाधानों की भी संभावना तलाशेगा, और अंत में उन आलोचनाओं को भी स्वीकार करेगा जो इस पूरे विश्लेषण के विरुद्ध उठाई जा सकती हैं, क्योंकि कोई भी गंभीर अकादमिक लेखन अपने प्रतिपक्ष को अनदेखा करके विश्वसनीय नहीं बन सकता।
1-आरक्षण के समर्थन के प्रमुख तर्कों का मूल्यांकन:
1.1: संविधान सभा की मूल आत्मा और “अस्थायी उपाय” की भावना
जब यह कहा जाता है कि आरक्षण के लिए संविधान में समय सीमा तय की गई थी और उसे अब आगे नहीं बढ़ाया जाना चाहिए, तो आलोचक अक्सर इस तर्क को खारिज करते हुए यह बताते हैं कि अनुच्छेद 334 केवल लोकसभा और विधानसभाओं में राजनीतिक प्रतिनिधित्व से संबंधित है, शिक्षा या नौकरी के आरक्षण से नहीं। यह तकनीकी आपत्ति अपने आप में सही है, परंतु इससे यह निष्कर्ष निकालना कि शिक्षा और रोजगार का आरक्षण सदैव के लिए अपरिवर्तनीय है, संविधान सभा की मूल भावना को भूल जाना है। संविधान सभा की बहसों को गौर से देखने पर यह पता चलता है कि पिछड़ेपन को परिभाषित करने का प्रश्न स्वयं संविधान निर्माताओं के बीच विवादास्पद रहा।
संयुक्त प्रांत के प्रतिनिधि महावीर त्यागी वर्ग-आधारित आरक्षण के प्रबल समर्थक थे और उनका मानना था कि पिछड़ेपन का सही मापदंड आर्थिक स्थिति होनी चाहिए, न कि केवल सामाजिक पहचान। इसके समकक्ष अर्थशास्त्री के.टी. शाह ने, जो सलाहकार समिति के सदस्य थे, यह प्रश्न उठाया था कि क्या समूहों को लाभार्थी के रूप में वर्गीकृत करना उचित है या व्यक्तिगत नागरिकों के आधार पर मूल्यांकन होना चाहिए। यह ऐतिहासिक तथ्य दिखाता है कि आरक्षण की अवधारणा अपने प्रारंभिक चरण में ही एक स्थिर, सर्वसम्मत सिद्धांत नहीं थी, बल्कि एक अनिश्चित समझौते का परिणाम थी, जिसमें विभिन्न दृष्टिकोणों के बीच एक अस्थायी संतुलन बनाया गया था।
यह ऐतिहासिक पृष्ठभूमि हमें यह समझने में सहायता करती है कि जब संविधान ने राजनीतिक आरक्षण के लिए स्पष्ट समय सीमा रखी, और उस सीमा को समय-समय पर संसदीय स्वीकृति से बढ़ाने की व्यवस्था की, जैसा 104वें संविधान संशोधन अधिनियम, 2019 के माध्यम से अनुच्छेद 334 में संशोधन करते हुए एससी और एसटी के राजनीतिक आरक्षण को 2030 तक बढ़ाया गया, तो इसके पीछे यह विचार था कि कोई भी सुधारात्मक व्यवस्था स्वतः स्थायी नहीं हो जानी चाहिए, बल्कि उसे समय-समय पर अपनी उपयोगिता सिद्ध करनी चाहिए। यही तर्क शिक्षा और रोजगार आरक्षण पर भी लागू किया जा सकता है, भले ही संविधान में इसकी स्पष्ट समय सीमा न लिखी गई हो। यह न मानना कि “समय सीमा न होना अस्थायीता के सिद्धांत का त्याग है” बल्कि यह मानना अधिक तर्कसंगत होगा कि समय सीमा का अभाव एक ऐतिहासिक शून्यता है, जिसे राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी ने कभी भरा ही नहीं। और ठीक इसी शून्यता को भरने के लिए एक आवधिक संसदीय पुनरीक्षण तंत्र की आवश्यकता है, जो आरक्षण को एक जीवंत, प्रमाण-आधारित नीति बनाए रखे, न कि एक ऐसा स्थायी अधिकार जो अपने मूल तर्क से विच्छिन्न हो गया हो।
1.2: क्रीमी लेयर का प्रश्न
जिस मांग को कुछ वर्ष पहले तक एक हाशिए की बहस माना जाता था, वह आज सर्वोच्च न्यायालय की सुस्थापित न्यायिक स्थिति बन चुकी है। अगस्त 2024 में पंजाब राज्य बनाम दविंदर सिंह मामले में सात न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने 6-1 के बहुमत से यह ऐतिहासिक निर्णय दिया कि राज्य सरकारें अनुसूचित जातियों के भीतर उप-वर्गीकरण कर सकती हैं, और इस निर्णय ने ई.वी. चिन्नैया बनाम आंध्र प्रदेश राज्य के उस पूर्ववर्ती निर्णय को पलट दिया जिसमें अनुसूचित जातियों को एक समरूप समूह माना गया था।

इस पीठ के भीतर, न्यायमूर्ति बी.आर. गवई ने अपने पृथक मत में यह स्पष्ट रूप से सुझाव दिया कि सरकार को अनुसूचित जाति और जनजाति के भीतर भी क्रीमी लेयर की अवधारणा को गंभीरता से लागू करने पर विचार करना चाहिए, जैसा पहले से ओबीसी के लिए विद्यमान है। इस टिप्पणी ने एक नई बहस को जन्म दिया है और वर्तमान में सर्वोच्च न्यायालय में एक स्वतंत्र याचिका विचाराधीन है, जिसमें यह आरोप लगाया गया है कि आरक्षण के लाभों पर संपन्न परिवारों का “अभिजात्य कब्जा” हो चुका है, और इसमें दविंदर सिंह मामले के सात में से चार न्यायाधीशों के उन मतों का उल्लेख किया गया है जिन्होंने क्रीमी लेयर सिद्धांत को एससी और एसटी पर विस्तारित करने का समर्थन किया था।
यह मुद्दा तब और अधिक गंभीर हो जाता है जब इसे रोहिणी आयोग के निष्कर्षों के साथ जोड़कर देखा जाता है। सामाजिक न्याय मंत्रालय द्वारा 2017 में गठित यह आयोग, चौदह बार कार्यकाल विस्तार के बाद, 2023 में अपनी रिपोर्ट राष्ट्रपति को सौंप पाया, यद्यपि उसे अभी तक सार्वजनिक नहीं किया गया है। किंतु इसके जो प्रारंभिक निष्कर्ष सार्वजनिक हुए हैं, वे स्वयं में एक गंभीर चेतावनी हैं। आयोग ने पाया कि ओबीसी की लगभग पांच से छह हजार उप-श्रेणियों में से मात्र चालीस उप-श्रेणियों ने, जो कुल ओबीसी जनसंख्या का मात्र एक प्रतिशत हैं, केंद्रीय आरक्षण के पचास प्रतिशत लाभ पर कब्जा कर लिया है। यह आंकड़ा अपने आप में इतना विस्फोटक है कि इसे अनदेखा करना असंभव हो जाता है। इसका सीधा अर्थ यह है कि आरक्षण के नाम पर जो लाभ दिया जा रहा है, वह वास्तव में अपने घोषित उद्देश्य, अर्थात सबसे वंचित समूहों की सहायता, से भटककर एक संकीर्ण, आंतरिक अभिजात वर्ग तक सीमित हो गया है और यही वह बिंदु है जहां आरक्षण का मूल तर्क, अर्थात सामाजिक भेदभाव का निवारण, अपनी ही संरचना के विरुद्ध खड़ा दिखाई देता है, क्योंकि जिस असमानता को दूर करने के लिए यह व्यवस्था बनाई गई थी, वही असमानता अब आरक्षित श्रेणियों के भीतर एक नए, अधिक जटिल रूप में पुनर्जन्म ले चुकी है।

1.3: शिक्षा में छूट और गुणवत्ता का प्रश्न
आरक्षण को केवल शिक्षा तक सीमित रखने की मांग अपने वर्तमान स्वरूप में शायद उतनी सुसंगत न हो, क्योंकि यदि शिक्षा में मिली छूट का उद्देश्य क्षमता-निर्माण है, तो नौकरी के द्वार पर पुनः प्रतिस्पर्धा में डाल देना उस क्षमता-निर्माण को निष्फल कर सकता है। परंतु इस तर्क के पीछे छिपी हुई एक गहरी और सुसंगत चिंता है, जो गुणवत्ता और मेधा से संबंधित है, और जिसे सम्मान के साथ परखा जाना चाहिए। जब हम उच्च-दक्षता वाले पेशेवर क्षेत्रों की ओर देखते हैं, विशेष रूप से चिकित्सा शिक्षा, जहां किसी भी समझौते का प्रत्यक्ष प्रभाव मानव जीवन पर पड़ता है, तो यह पाया जाता है कि एम्स जैसी संस्थाओं में सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों के लिए नीट परीक्षा में लगभग 675 अंकों की योग्यता सीमा रखी गई है, जबकि आरक्षित श्रेणी के लिए यह सीमा लगभग 650 अंक तक शिथिल हो जाती है। यह अंतर संख्या में सीमित प्रतीत हो सकता है, परंतु इसका सांकेतिक महत्व बहुत बड़ा है, क्योंकि यह दर्शाता है कि प्रवेश स्तर पर एक मापनीय अंतराल औपचारिक रूप से स्वीकृत किया जा चुका है।
इस अंतराल की उपस्थिति को स्वीकार करना यह नहीं कहता कि आरक्षित वर्ग के छात्रों में क्षमता की कमी है, बल्कि यह उन संस्थानों की जिम्मेदारी को उजागर करता है जो प्रवेश स्तर पर छूट तो देते हैं, परंतु इस अंतराल को पाटने के लिए आवश्यक उपचारात्मक शिक्षा, मेंटरशिप और निरंतर सहायता की व्यवस्था करने में असफल रहते हैं। यही वह जगह है जहां सुधार-पक्ष का तर्क अधिक सूक्ष्म और उत्तरदायी रूप ले सकता है, अर्थात यह मांग करना कि आरक्षण को केवल प्रवेश के क्षण तक सीमित रखने के बजाय, संपूर्ण शैक्षणिक यात्रा में एक समानुपातिक सहायता तंत्र से जोड़ा जाए, ताकि जो अंतराल प्रवेश के समय स्वीकार किया गया है, वह स्नातक होने तक पूरी तरह से पट जाए, न कि यह अंतराल आगे बढ़कर पेशेवर क्षमता में परिवर्तित हो जाए।
1.4 : जातीय राजनीति और सीमाओं का विरोधाभास
आरक्षण द्वारा जातीय पहचान के स्थायीकरण की आलोचना तब और अधिक ठोस हो जाती है जब हम विभिन्न राज्यों की परस्पर विरोधाभासी नीतियों को देखते हैं। तमिलनाडु में 1993 से ही उन्नसठ प्रतिशत आरक्षण लागू है, जिसे संविधान की नौवीं अनुसूची में सम्मिलित करके न्यायिक समीक्षा से पूरी तरह सुरक्षित कर दिया गया है। इसके विपरीत जब बिहार सरकार ने जातिगत गणना के आधार पर आरक्षण को पचास प्रतिशत से बढ़ाकर 65% करने का प्रयास किया, तो पटना उच्च न्यायालय ने इस कानून को रद्द कर दिया। यह विरोधाभास स्वयं में एक शक्तिशाली प्रमाण है कि आरक्षण की सीमा अब किसी सुसंगत सिद्धांत से नहीं, बल्कि राज्य विशेष की राजनीतिक शक्ति, ऐतिहासिक विधायी संरक्षण और संवैधानिक अनुसूचियों में शरण पाने की क्षमता से निर्धारित हो रही है। जब आरक्षण की सीमा किसी एक राज्य में उन्नसठ प्रतिशत तक स्वीकार्य होती है और दूसरे राज्य में 65% भी न्यायालय द्वारा निरस्त कर दी जाती है, तो यह स्वाभाविक ही प्रश्न उठता है कि क्या यह सीमा किसी वस्तुनिष्ठ सामाजिक यथार्थ को प्रतिबिंबित करती है, या यह केवल ऐतिहासिक संयोग और राजनीतिक सौदेबाजी का परिणाम है। यह असंगति सुधार-पक्ष के इस तर्क को बल देती है कि आरक्षण अब एक तार्किक न्याय-सिद्धांत से हटकर एक जातीय गोलबंदी और सत्ता-साधन का उपकरण बन चुका है, जिसमें प्रत्येक राजनीतिक दल अपने वोट-आधार को संतुष्ट रखने के लिए सीमाओं को अपने अनुकूल परिभाषित करने का प्रयास करता है।
1.5: आर्थिक आधार का प्रश्न और EWS का प्रमाण
जब यह मांग की जाती है कि आरक्षण का आधार केवल आर्थिक होना चाहिए, तो इसका सबसे मजबूत उत्तर स्वयं भारतीय राज्य की अपनी नीति में छिपा है।जनवरी 2019 में संसद ने 103वां संविधान संशोधन अधिनियम पारित किया, जिसके अंतर्गत आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए नौकरियों और शिक्षा में 10% आरक्षण का प्रावधान किया गया। सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने 7 नवंबर 2022 को 3-2 के बहुमत से इस संशोधन को संवैधानिक रूप से वैध ठहराया, और यह स्पष्ट किया कि पचास प्रतिशत की सीमा का उल्लंघन बुनियादी ढांचे का उल्लंघन नहीं है, क्योंकि यह सीमा केवल अनुच्छेद 16(4) और 16(5) के अंतर्गत आने वाले आरक्षण पर लागू होती है, EWS पर नहीं। इस निर्णय का गहरा अर्थ यह है कि सर्वोच्च न्यायालय स्वयं यह मान्यता दे चुका है कि “उचित सीमा” कोई स्थिर, अपरिवर्तनीय संख्या नहीं है, बल्कि यह नई सामाजिक-आर्थिक श्रेणियों के आगमन के साथ पुनर्परिभाषित हो सकती है।
इस मॉडल की व्यावहारिक शक्ति उसकी मानदंड-निर्धारण प्रक्रिया में और अधिक स्पष्ट होती है। सामान्य वर्ग के निर्धनों की पहचान के लिए 2006 में गठित सिन्हो आयोग ने यह सुझाव दिया था कि इसके लिए वही आय सीमा रखी जाए जो ओबीसी के नॉन-क्रीमी-लेयर वर्गीकरण में प्रयुक्त होती है। वर्तमान में यह सीमा 8 लाख रुपये वार्षिक आय निर्धारित है, और इसके साथ पांच एकड़ से अधिक कृषि भूमि, एक हजार वर्ग फुट से अधिक के आवासीय फ्लैट और नगरपालिका क्षेत्रों में एक निश्चित आकार से अधिक के आवासीय भूखंड जैसी अतिरिक्त शर्तें भी जोड़ी गई हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने इस आय सीमा को प्रथमदृष्टया उचित माना है, यद्यपि इस पर विवाद अभी पूर्णतः शांत नहीं हुआ है। यह बहु-आयामी, केवल आय तक सीमित न रहने वाली, बल्कि संपत्ति के विविध रूपों को भी समाहित करने वाली निर्धारण पद्धति यह प्रमाणित करती है कि एक निष्पक्ष, जाति-निरपेक्ष और प्रशासनिक रूप से क्रियान्वयन योग्य वंचना-सूचकांक बनाना कोई काल्पनिक विचार नहीं, बल्कि एक पहले से सिद्ध व्यावहारिक मॉडल है, जिसे अन्य श्रेणियों पर भी विस्तारित किया जा सकता है।
1.6: शोषण के इतिहास और सामाजिक भिन्नता के तर्क की सीमाएं
आरक्षण के पक्षधर यह तर्क देते हैं कि आरक्षण को लागू हुए मात्र सात दशक से थोड़ा अधिक हुआ है, जबकि शोषण का इतिहास सहस्राब्दियों पुराना है, और इसी प्रकार वे यह भी कहते हैं कि अनुसूचित जाति और जनजाति की सामाजिक स्थिति ओबीसी से भिन्न है, अतः उनकी आर्थिक उन्नति भी उनकी सामाजिक स्थिति को स्वतः नहीं बदल सकती। इन दोनों तर्कों में नैतिक बल तो अवश्य है, परंतु नीति-निर्माण के लिए इन्हें मापनीय आधार की आवश्यकता होती है, जो वर्तमान में अनुपस्थित है। किसी ऐतिहासिक अन्याय की अवधि की तुलना उसके सुधार की अवधि से करना यह अंतर्निहित रूप से मान लेता है कि सुधार की अवधि, अन्याय की अवधि के किसी अनुपात में होनी चाहिए, जो एक तार्किक आवश्यकता नहीं, बल्कि एक नैतिक अनुभूति है, जिसका कोई निश्चित मापदंड नहीं दिया जा सकता। इसी प्रकार, सामाजिक भिन्नता का तर्क, चाहे वह समूह के स्तर पर कितना भी सत्य हो, स्वयं दविंदर सिंह मामले के निर्णय से आंशिक रूप से खंडित होता है, जिसमें यह स्वीकार किया गया कि अनुसूचित जाति के भीतर भी भारी असमानता विद्यमान है। यदि एक ही संवैधानिक श्रेणी के भीतर सामाजिक स्थिति इतनी भिन्न हो सकती है कि न्यायालय को उप-वर्गीकरण की अनुमति देनी पड़े, तो यह तर्क स्वयं इस निष्कर्ष की ओर ले जाता है कि केवल एक विस्तृत जातीय पहचान के आधार पर वर्गीकरण अब पर्याप्त सूक्ष्म नहीं रहा, और इसे अधिक बहु-आयामी दृष्टिकोण से प्रतिस्थापित करने की आवश्यकता है।
2: वैश्विक न्यायिक विचारधारा और तुलनात्मक अनुभव
कोई भी गंभीर विश्लेषण जो भारतीय आरक्षण बहस को केवल राष्ट्रीय संदर्भ में सीमित रखे, वह अधूरा रहेगा, क्योंकि सकारात्मक कार्रवाई की नीतियों को लेकर विश्वभर में एक विचारधारात्मक परिवर्तन देखा जा रहा है। जून 2023 में संयुक्त राज्य अमेरिका के सर्वोच्च न्यायालय ने Students for Fair Admissions बनाम Harvard College मामले में एक ऐतिहासिक निर्णय देते हुए विश्वविद्यालय प्रवेश में नस्ल-आधारित सकारात्मक कार्रवाई को असंवैधानिक घोषित कर दिया। मुख्य न्यायाधीश जॉन रॉबर्ट्स के नेतृत्व में बहुमत ने यह पाया कि हार्वर्ड और नॉर्थ कैरोलिना विश्वविद्यालय की प्रवेश नीतियां छात्र-समुदाय की विविधता के उद्देश्य के लिए पर्याप्त रूप से केंद्रित और मापनीय लक्ष्यों का अभाव रखती हैं, और इस निर्णय ने ग्रटर बनाम बोलिंगर जैसे चार दशक पुराने पूर्ववर्ती निर्णयों को पलट दिया।
इस अमेरिकी उदाहरण को भारत पर सीधे लागू करना निश्चित रूप से भ्रामक होगा, क्योंकि भारतीय संविधान स्वयं अनुच्छेद 15 और 16 के अंतर्गत सकारात्मक कार्रवाई को स्पष्ट रूप से वैध ठहराता है, जबकि अमेरिकी संविधान का चौदहवां संशोधन नस्ल-आधारित वर्गीकरण को समानता संहिता के मूल विरुद्ध मानता है, और दोनों देशों का ऐतिहासिक शोषण अनुभव भी भिन्न प्रकृति का है। परंतु इस तुलना का महत्व इसकी शब्दशः प्रतिलिपि में नहीं, बल्कि इसकी दिशा में है। यह तथ्य कि विश्व के सबसे प्रभावशाली और सबसे अधिक विविधता-सचेत लोकतंत्रों में भी समूह-पहचान-आधारित वर्गीकरण से व्यक्ति-केंद्रित, बहु-आयामी वंचना-मूल्यांकन की ओर एक स्पष्ट वैचारिक बदलाव हो रहा है, यह भारत में प्रस्तावित सूचकांक-आधारित मॉडल की दिशा को एक व्यापक अंतरराष्ट्रीय न्यायिक प्रवाह से संगत बनाता है, चाहे उसका ठोस क्रियान्वयन भारतीय संवैधानिक ढांचे के भीतर ही होना चाहिए।
3: जाति जनगणना, आंकड़ों की अनुपस्थिति
इस पूरी बहस की एक और गहरी संरचनात्मक कमजोरी यह है कि भारत में अंतिम बार संपूर्ण जातिगत सामाजिक-आर्थिक आंकड़े 1931 की जनगणना में एकत्रित किए गए थे, और उसके बाद से सारी नीति-निर्माण प्रक्रिया मंडल आयोग के दशकों पुराने अनुमानों पर निर्भर रही है। जब तक विश्वसनीय, अद्यतन और सत्यापन योग्य आंकड़े उपलब्ध नहीं होते, तब तक न तो आरक्षण की सीमा का युक्तियुक्त पुनर्निर्धारण संभव है, न ही किसी सूचकांक मॉडल के लिए आवश्यक भारांश तय किए जा सकते हैं। यह तर्क सुधार-पक्ष को एक अतिरिक्त वैधता प्रदान करता है, क्योंकि यह किसी वर्ग-विशेष के विरुद्ध नहीं, बल्कि पारदर्शिता के पक्ष में खड़ा है, यह मांग करते हुए कि पहले ठोस आंकड़े जुटाए जाएं और उसके पश्चात ही किसी स्थायी नीति का निर्धारण किया जाए, न कि दशकों पुराने अनुमानों के आधार पर किसी व्यवस्था को अनंतकाल तक चलाया जाए।
4: MiRAA: बहु-सूचकांक मॉडल
इन सभी विरोधाभासों और अंतरालों के बीच, 2006 में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल ने एक ऐसा प्रस्ताव रखा था जो जाति और आर्थिक स्थिति को परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि पूरक चर के रूप में देखता है। यह प्रस्ताव उस समय आया जब भारत सरकार उच्च शिक्षा संस्थानों में ओबीसी वर्ग के लिए सत्ताईस प्रतिशत आरक्षण लागू करने जा रही थी, जिसके अतिरिक्त अनुसूचित जाति और जनजाति को साढ़े बाईस प्रतिशत आरक्षण पहले से प्राप्त था। प्रोफेसर अग्रवाल का मूल प्रश्न यह था कि क्या जाति भारतीय समाज में वंचना का एकमात्र कारक है, या आर्थिक स्थिति, लिंग, प्रथम-पीढ़ी शिक्षार्थी होने की स्थिति और विद्यालयी शिक्षा का प्रकार भी समान महत्व के कारक हैं। इस विचार को उन्होंने MIRAA (Multiple Index Related Affirmative Action) नाम दिया।इसमें विभिन्न पैरामीटर्स के आधार पर अंक दिए जाने का प्रस्ताव था।

इस मॉडल को यदि वर्तमान भारतीय संदर्भ में विस्तारित किया जाए, तो इसमें जाति अथवा जनजाति की पहचान को न्यूनतम आधार अंक के रूप में बनाए रखते हुए, परिवार की आर्थिक स्थिति को सत्यापनीय आय और संपत्ति के आंकड़ों से मापा जाना चाहिए, लिंग के आधार पर ग्रामीण और वंचित पृष्ठभूमि की महिला अभ्यर्थियों की अतिरिक्त बाधाओं को स्वीकार किया जाना चाहिए, प्राप्त की गई विद्यालयी शिक्षा के प्रकार को, अर्थात वह सरकारी विद्यालय में हुई अथवा प्राइवेट संस्थान में, ध्यान में रखा जाना चाहिए, और साथ ही उस भौगोलिक क्षेत्र को भी सम्मिलित किया जाना चाहिए जहां अभ्यर्थी का बचपन व्यतीत हुआ, चाहे वह अत्यंत पिछड़ा ग्रामीण क्षेत्र हो या समृद्ध शहरी परिवेश। परिवार में प्रथम पीढ़ी के शिक्षार्थी होने की स्थिति और परिवार की समग्र शैक्षिक उपलब्धि को भी इसमें उपयुक्त स्थान मिलना चाहिए, ताकि उस अभ्यर्थी को प्राथमिकता मिल सके जिसके परिवार में शिक्षा की परंपरा नहीं रही, चाहे वह किसी भी जाति से संबंधित हो। इन सभी मानदंडों को उपयुक्त भारांश देकर एक संयुक्त आरक्षण-सूचकांक अंक तय किया जा सकता है, और जब समान श्रेणी के दो अभ्यर्थी परीक्षा में समान अंक प्राप्त करते हैं, तब उनके बीच वरीयता इसी सूचकांक अंक के आधार पर निर्धारित की जा सकती है, जिससे आरक्षण का लाभ उस अभ्यर्थी को प्राथमिकता से मिलेगा जो वास्तव में सबसे अधिक वंचित है।
MiRAA मॉडल की वास्तविक शक्ति इस बात में है कि यह वर्तमान आरक्षण व्यवस्था की लगभग हर बड़ी व्यावहारिक चुनौती को, अलग-अलग पैबंद लगाने के बजाय, एक ही संरचनात्मक समाधान से संबोधित करता है। नीचे इसे बिंदुवार स्पष्ट किया गया है:
(a): एक ही जाति/उपजाति द्वारा असंगत लाभ लेने की समस्या का समाधान
वर्तमान व्यवस्था की सबसे गंभीर विफलता यह है कि एक विस्तृत श्रेणी (जैसे ओबीसी या एससी) के भीतर कुछ प्रभावशाली उपजातियां वर्षों तक लाभ पर कब्जा बनाए रखती हैं, जैसा रोहिणी आयोग के निष्कर्षों में देखा गया। MiRAA में जाति केवल एक प्रवेश-योग्यता शर्त है, अंतिम वरीयता नहीं। जब आर्थिक स्थिति, स्कूली शिक्षा का प्रकार और परिवार की शैक्षिक पृष्ठभूमि को समान भार से जोड़ा जाता है, तो किसी एक उपजाति के भीतर जो परिवार पहले से ही शिक्षा और संसाधनों में आगे निकल चुके हैं, वे स्वतः निम्न सूचकांक अंक प्राप्त करेंगे, भले ही उनकी जाति-पहचान वही रहे। इस तरह असमानता जाति-स्तर पर नहीं, बल्कि परिवार-स्तर पर मापी जाती है, जो कहीं अधिक सटीक है।
(b): फर्जी प्रमाणपत्रों की समस्या को घटाना, समाप्त नहीं करना
यह स्वीकार करना जरूरी है कि बहु-आयामी मॉडल फर्जी प्रमाणपत्रों की समस्या को पूरी तरह समाप्त नहीं करता, बल्कि उसे विकेंद्रीकृत करता है। परंतु इसका एक तार्किक लाभ यह है कि वर्तमान व्यवस्था में केवल एक प्रमाणपत्र (जाति प्रमाणपत्र) में हेरफेर से पूरा लाभ मिल जाता है, जबकि MiRAA में अभ्यर्थी को एक साथ कई अलग-अलग स्वतंत्र स्रोतों से मिलान करना होगा, जैसे आयकर रिटर्न, भूमि रिकॉर्ड, स्कूल प्रमाणपत्र और आधार-लिंक्ड पता। एक साथ इतने दस्तावेज़ों में सुसंगत हेरफेर करना कहीं अधिक कठिन और जोखिमपूर्ण हो जाता है, विशेष रूप से यदि ये डेटाबेस आपस में क्रॉस-वैरिफाई किए जाएं। इस अर्थ में MiRAA धोखाधड़ी को समाप्त नहीं करता, बल्कि उसकी लागत बढ़ा देता है, जो किसी भी नीति-डिज़ाइन में एक व्यावहारिक जीत है।
(c): भौगोलिक असमानता का सीधा समाधान
वर्तमान वर्गीकरण, जैसे राज्य-वार आरक्षण सूची, यह मान लेता है कि एक ही जाति के भीतर सभी क्षेत्रीय अभ्यर्थी समान वंचना का सामना करते हैं, जो सत्य नहीं है। किसी पिछड़े जिले के सरकारी स्कूल में पढ़ा अभ्यर्थी और महानगर के निजी स्कूल में पढ़ा अभ्यर्थी, भले ही एक ही जाति से हों, बिल्कुल भिन्न परिस्थितियों से आते हैं। MiRAA में क्षेत्र (श्रेणी क/ख/ग/घ) को एक स्वतंत्र चर के रूप में शामिल करने से यह भेद स्वाभाविक रूप से पकड़ में आ जाता है, बिना यह मान्यता तोड़े कि जाति भी एक वास्तविक कारक है। इससे एक ही जाति के भीतर के “आंतरिक भौगोलिक क्रीमी लेयर” को भी संबोधित किया जा सकता है, जो वर्तमान व्यवस्था में पूरी तरह अनदेखा रहता है।
(d): पीढ़ीगत उन्नति को मापने की क्षमता
सबसे उल्लेखनीय लाभ यह है कि MiRAA “प्रथम-पीढ़ी शिक्षार्थी” और “परिवार की शैक्षिक उपलब्धि” को स्पष्ट चर के रूप में शामिल करता है। इसका अर्थ है कि यह मॉडल स्वाभाविक रूप से एक गतिशील, स्व-समायोजित क्रीमी लेयर की तरह काम करता है, बिना किसी बाहरी आय-सीमा को कृत्रिम रूप से थोपे। जिस परिवार ने एक पीढ़ी पहले ही उच्च शिक्षा और सरकारी नौकरी प्राप्त कर ली है, उसके बच्चे को स्वतः निम्न अंक मिलेंगे, जबकि उसी जाति के उस परिवार को, जो अब भी शिक्षा से वंचित है, प्राथमिकता मिलेगी। यह ठीक वही समस्या हल करता है जिसे क्रीमी लेयर बहस में “अभिजात्य कब्जा” कहा गया है, परंतु बिना किसी जाति को पूरी तरह बाहर किए।
इन सभी बिंदुओं का समवर्ती प्रभाव यह है कि MiRAA वंचना के एक ही आयाम (जाति) पर निर्भर रहने के बजाय, चार से पांच स्वतंत्र संकेतकों की परस्पर-पुष्टि पर टिका है। इससे कोई भी एक हेरफेर, एक अपवाद या एक ऐतिहासिक विसंगति पूरी व्यवस्था को विकृत नहीं कर सकती, क्योंकि अन्य आयाम उसे स्वतः संतुलित कर देते हैं। यही बहु-आयामिता इस मॉडल को केवल एक वैचारिक सुधार नहीं, बल्कि एक क्रियान्वयन योग्य, आत्म-संशोधक तंत्र बनाती है।
5- अन्य समाधान
इस भाग में कुछ अन्य समाधानों की संभावना भी तलाशी गई है, जो MIRAA के साथ-साथ लागू किए जा सकते हैं।
- पहला विकल्प एक आवधिक पुनरीक्षण तंत्र का निर्माण है। जिस प्रकार राजनीतिक आरक्षण को प्रत्येक दस वर्ष में संसदीय पुनर्वैधीकरण से गुजरना पड़ता है, उसी प्रकार शिक्षा और रोजगार आरक्षण को भी एक निश्चित अवधि, जैसे पंद्रह अथवा बीस वर्ष में, नवीनतम सामाजिक-आर्थिक आंकड़ों के आधार पर संसद में पुनरीक्षण से गुजरने की अनिवार्यता बनाई जा सकती है, जिससे आरक्षण एक स्थिर, अपरिवर्तनीय अधिकार के बजाय एक सतत साक्ष्य-आधारित नीति बन जाएगी।
- दूसरा विकल्प, जिसे क्रीमी लेयर से आगे बढ़कर देखा जाना चाहिए, वह है एक-पीढ़ी अपवर्जन का सिद्धांत। इसके अंतर्गत यह मानदंड रखा जा सकता है कि यदि किसी परिवार में माता-पिता में से किसी एक को आरक्षण के माध्यम से सरकारी नौकरी अथवा उच्च शिक्षा में प्रवेश का लाभ पहले ही मिल चुका है, तो उस परिवार की अगली पीढ़ी को उसी श्रेणी में पुनः आरक्षण का लाभ न मिले। यह मॉडल आय-आधारित क्रीमी लेयर से अधिक निष्पक्ष हो सकता है, क्योंकि यह एक ठोस, दस्तावेजी और असंदिग्ध तथ्य, अर्थात पूर्व में लाभ प्राप्ति के प्रमाण, पर आधारित है, न कि विवादास्पद और सरलता से हेरफेर योग्य आय-स्व-घोषणा पर।
- तीसरा विकल्प विस्तारित आर्थिक-सामाजिक हाइब्रिड मॉडल है, जिसमें सिन्हो आयोग द्वारा प्रस्तावित बहु-मानदंड आर्थिक निर्धारण पद्धति को, जिसमें आय के साथ भूमि और आवासीय संपत्ति को भी शामिल किया गया है, सभी आरक्षित श्रेणियों पर समान रूप से लागू किया जाए, जिससे जाति को प्रवेश-योग्यता की प्रारंभिक शर्त बनाए रखते हुए, अंतिम लाभ का निर्धारण इस विस्तारित आर्थिक सूचकांक से किया जा सके।
- चौथा विकल्प निजी क्षेत्र के लिए विशेष रूप से उपयुक्त है, जिसमें अनिवार्य कोटा के स्थान पर एक प्रोत्साहन-आधारित मॉडल अपनाया जा सकता है, जिसके अंतर्गत उन कंपनियों को कॉर्पोरेट कर में छूट अथवा सरकारी अनुबंधों में वरीयता दी जाए जो स्वेच्छा से अपने कार्यबल में वंचित वर्गों का एक निश्चित अनुपात सुनिश्चित करती हैं, जिससे बाजार की स्वतंत्रता को अक्षुण्ण रखते हुए सामाजिक न्याय के उद्देश्य को प्रोत्साहन के माध्यम से आगे बढ़ाया जा सके।
- पांचवां और अंतिम विकल्प दविंदर सिंह मामले में स्थापित न्यायिक मानक को सार्वभौमिक बनाने का है। जिस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय ने उप-वर्गीकरण के लिए मापनीय आंकड़ों के आधार पर अपर्याप्त प्रतिनिधित्व सिद्ध करने की अनिवार्यता रखी, उसी मानक को संपूर्ण आरक्षण व्यवस्था पर लागू किया जा सकता है, अर्थात प्रत्येक श्रेणी और उप-श्रेणी को समय-समय पर प्रतिनिधित्व के ठोस आंकड़ों से अपने निरंतर औचित्य को सिद्ध करना अनिवार्य हो, अन्यथा उसका आरक्षण स्वतः पुनरीक्षण के अंतर्गत आ जाए।
6- निष्कर्ष
आरक्षण सुधार की मांग को यदि संवैधानिक इतिहास, न्यायिक निर्णयों, सरकारी आयोगों के आंकड़ों और वैश्विक तुलनात्मक अनुभव की समग्र दृष्टि से देखा जाए, तो यह किसी भावनात्मक असंतोष की उपज नहीं रह जाती, बल्कि एक सुसंगत, बहुस्तरीय और प्रमाण-आधारित नीति-विश्लेषण का रूप ले लेती है। दविंदर सिंह मामले का निर्णय, EWS की न्यायिक स्वीकृति, रोहिणी आयोग के आंशिक रूप से उजागर हो चुके निष्कर्ष, तथा वैश्विक स्तर पर समूह-आधारित वर्गीकरण से हटती हुई न्यायिक विचारधारा, यह सभी मिलकर इस बात का प्रमाण देते हैं कि मौजूदा व्यवस्था अपने वर्तमान स्वरूप में पुनर्विचार की मांग जायज है। प्रोफेसर पुरुषोत्तम अग्रवाल का MIRAA जैसा बहु-आयामी सूचकांक मॉडल, आवधिक पुनरीक्षण तंत्र, एक-पीढ़ी अपवर्जन नियम, विस्तारित आर्थिक-सामाजिक हाइब्रिड मॉडल और निजी क्षेत्र के लिए प्रोत्साहन-आधारित विविधता नीति, ये सभी विकल्प परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि परस्पर पूरक हैं, और इनका सुविचारित समन्वय ही आरक्षण को उसके मूल उद्देश्य, अर्थात वास्तविक और सत्यापनीय वंचना का निवारण, की ओर पुनः केंद्रित कर सकता है। किंतु यह सुधार तभी टिकाऊ और न्यायसंगत होगा जब वह अपने प्रतिपक्ष की चिंताओं को अनदेखा किए बिना, विश्वसनीय आंकड़ों की नींव पर, चरणबद्ध ढंग से और संवैधानिक प्रक्रिया के भीतर ही आगे बढ़े।
संदर्भ स्रोत:
सत्य हिंदी रिपोर्ट, मार्च 2025, रोहिणी आयोग के मसौदा अध्ययन के हवाले से
Justice Usha Mehra Commission Report (Ministry of Home Affairs, Govt. of India)
Supreme Court of India – State of Punjab v. Davinder Singh (2024)
Census 2011- Registrar General & Census Commissioner, India
Tamil Nadu Arunthathiyar (Special Reservation of Seats) Act, 2009
PIB Press Release & Lok Sabha Written Reply (7 August 2026)
State Govt. of Punjab – relevant legislation (1975, 2006)
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